नये साल का खैर-मक़दम करती अगली कविता शुंतारू तानीकावा की है। शुंतारू तानीकावा जापान के दूसरे विश्व-युद्ध के बाद के सबसे महत्वपूर्ण और ज्यादा पढ़े जाने वाले कवियों मे रहे हैं, जिन्होने जापानी पारंपरिक कविता को आधुनिक और ज्यादा सामयिक कलेवर देने मे मदद की। लिक्खाड़ किस्म के इस लोकप्रिय कवि के साठ से अधिक संग्रह प्रकाशित हैं। उनकी कविताएँ वक्त के बदलते पैरहन से उपजी उहापोह और वैचारिक उत्सुकता की कविताएं हैं। उनकी कविताओं मे बच्चे सा खिलंदड़ापन भी मिलता है तो किसी अधेड़ सा आत्मालोचन भी। वहाँ अक्सर कवि हम जैसे साधारण लोगों की जमात मे खड़ा जीवन के नमकीनपन के ब्योरे दर्ज करता पाया जाता है। प्रस्तुत कविता इसकी एक बानगी है। हिंदी अनुवाद ख्यात कवि और महारथी अनुवादक श्री अशोक पांडे का है।नये साल की कसमें
क़सम खाता हूँ दारू और सिगरेट नही छोड़ूँगा
क़सम खाता हूँ जिनसे मै नफ़रत करता हूँ उन्हे नहला दूँगा नीच शब्दों से
क़सम खाता हूँ सुंदर लड़कियों को ताका करूँगा
क़सम खाता हूँ, हँसने का जब भी उचित मौका होगा
खूब खुले मुँह से हँसूगा
सूर्यास्त को देखूँगा खोया-खोया
फ़सादियों की भीड़ को नफ़रत से देखूँगा
क़सम खाता हूँ
दिल को हिला देने वाली कहानियों पर रोते हुए भी संदेह करूँगा
दुनिया और देश के बारे मे दिमागी बहसें नही करूँगा
बुरी कविताएँ और अच्छी कविताएँ लिखूँगा
कसम खाता हूँ समाचार-पत्र संवाददाताओं को नही बताऊँगा
अपने विचार
कसम खाता हूँ अंतरिक्ष-यान मे चढ़ने की इच्छा नही करूँगा
क़सम खाता हूँ क़समें तोड़ने का अफ़सोस नही करूँगा।
इसकी गवाही मे हम दस्तख़त करते हैं
(चित्र: शुंतारू ताकीनावा
पेंटिंग: अट्ठारहवी सदी के प्रतिनिधि चित्रकार कत्सुशिका होकुसाई की ’विलेज ओन थे सुमिदा रिवर’
आभार-गूगल)
पेंटिंग: अट्ठारहवी सदी के प्रतिनिधि चित्रकार कत्सुशिका होकुसाई की ’विलेज ओन थे सुमिदा रिवर’
आभार-गूगल)
