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Tuesday, February 14, 2012

पंच प्रेमधुन

     वेलेंटाइन डे मनाने या ना मनाने के आपके तमाम तर्क और ऐतराज हो सकते हैं, लेकिन अगर इसी बहाने कुछ प्यार मे ढली प्यारी धुने गुनगुनाने का इरादा हो तो फ़ितरतन ये शय बुरी नही! प्यार पे पड़ने, ना पड़ने, उससे बाहर निकल आने, फिर से उसी मे जा पड़ने की तमाम वजहें जिंदगी दे सकती है (और आप खुद को जस्टीफ़ाइ भी कर सकते हैं..हर बार) मगर प्रेम नामक इस रहस्यमय तत्व (जिसके गुणो-अवगुणो पर अनंत काल से निष्कर्षहीन वैज्ञानिक-दार्शनिक-सामाजिक अनुसंधान जारी हैं) को अपनी जिंदगी से स्थाई तौर पर बाहर कर पाना संभव नही होता है। क्योंकि हमारी आत्मा भी इसी तत्व से बनी हुई होगी शायद। खैर अगर ढाई अक्षर पढ़ने (और डाकिये की बकवास सुनने) का आपका इरादा ना भी हो तो भी संगीत की कोमल स्वर लहरियों के जादू से बच पाना नामुमकिन होता है। और यह एक ऐसी दुनिया का दरवाजा है जो दुनिया की सारी भाषाओं, भूगोल के परे जा कर खुलता है, अनुभूतियों के आँगन मे। फिर प्रेम भी तो एक अनुभूति है बस। तो भाषाओं और भूगोल की सरहदों से परे सुरों की सीढियाँ चढ़ते हुए इस मौके पर रूबरू होते हैं समंदर पार के कुछ क्लासिक और शुद्ध 24 कैरेट के रोमांस भरे गीतों से। वैसे तो कोई भी गीत बोलों के संग ही अपनी धुन और गायन की कमंद के सहारे आपके दिल मे उतरता जाता है, फिलहाल गानों के लिरिक्स के ’संक्षिप्त और चलताऊ’ भावानुवाद भी इस डाक के साथ मे नत्थी कर दिये गये हैं। रोमांस की यह संगीतमय पेशकश खासकर उन लोगों के लिये जो प्यार के सिर्फ़ सैद्धांतिक पक्ष पर यकीन रखते हैं (या रखने को मजबूर हैं)। ;-)


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    अल दी ला (ईटालियन): साठ के दशक के प्रसिद्धतम और गजब के रोमांटिक इस इतालवी गीत को यूं तो कई गायकों ने अपनी आवाज दी है. मगर एमिलिओ पेरिकोली के गाये इस वर्जन की बात जुदा है। पहले प्यार जैसी शुद्ध भावुक और आवेगपूर्ण गीत मे गुइलिओ रपेत्ती के लिखे हुए प्रेमिका की तारीफ़ मे शब्दों के खजाने खोल देने वाले बोल एमिलिओ की लोचदार आवाज के पंखों पर चढ़ कर आपको इस दुनिया से परे प्यार की एक दूसरी ही दुनिया मे ले जाते हैं। यह वर्जन (और वीडियो भी) फ़िल्म ’रोमन एडवेंचर’ का हिस्सा है, मगर गीत की लोकप्रियता कई दशकों के बावजूद अभी तक कायम है। वैसे इस गाने के कोनी फ़्रांकिस और बेट्टी कर्टिस वाले फ़ीमेल वर्जन भी कुछ कम लोकप्रिय नही। 

कभी यकीन नही था खुद पर
कि कह पाऊँगा तुमको ये बात:
दुनिया की सबसे अनमोल चीजों से भी परे, वहाँ हो तुम
सबसे महत्वाकाँक्षी सपनो से भी परे, वहाँ हो तुम
खूबसूरत से भी खूबसूरत चीजों से परे
सितारों से भी परे, वहाँ है तुम्हारी जगह
दुनिया की हर चीज से जुदा, वहाँ जहाँ तुम मेरी हो, हाँ सिर्फ़ मेरी
सबसे गहरे समंदरों से भी परे, वहाँ तुम हो
दुनिया की हदों से भी परे, वहाँ तुम्हारी जगह है
अनंत समय से परे, जिंदगी से परे
वहाँ जहाँ तुम हो, हर चीज से परे
वहाँ तुम हो मेरे लिये !


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   तू सेइ रोमांतिका (फ़्रेंच): अब अगली बारी प्रेमी की तारीफ़ की। दालिदा का नाम पिछली सदी के फ़्रांस की सबसे लोकप्रिय गायिकाओं मे से एक है। मूलतः इतालवी इस गीत का यह फ़्रांसीसी वर्जन है जिसे दालिदा ने अपनी अलहदा और खूबसूरत आवाज के पैमाने मे ढाल कर खासा नशीला बना दिया है। दालिदा भी वैसे तो इतालवी मूल की ही थीं मगर उन्होने दस से भी ऊपर भाषाओं मे गाने गाये। किसी शर्माये सकुचाये प्रेमी के मन की गिरहें खोलती प्रेमिका के दिल से छलकते प्यार का सोंधापन दालिदा की आवाज से भी छलका जाता है। वैसे इसका मूल इतालवी वर्जन डिनो वर्दे का लिखा और रोनातो रास्केल का गाया हुआ है।

तुम भी अजब हो, पर जाहिर नही होने देते
और कोई जान भी नही पाता है
अजीब हो तुम, तुम्हारी आँखों मे अगन नही दिखती
मगर तुम्हारे दिल मे छुपी है अगन

कितने रूमानी हो तुम, और आवारा
तुम नही करोगे कुबूल
मगर मै जानती हूँ
सब पता है मुझे
इतने रूमानी हो तुम, तभी मेरा दिल आता है तुम पर
कितनी उदास होती है तुम्हारी आंखें
जब हमारे आसमां का नीलापन होता है कम

बच्चे से खिलखिलाती हँसी या कि बहार का कोई फ़ूल
लकड़ियों मे जलती आग सा कोई गीत
दिल मे ही छुपा लेते हो प्यार
और मेरे सामने जाहिर नही होने देते
डरते हो कि मजाक न बने तुम्हारा
अपनी खुशियों को जाहिर नही होने देते
रखते हो खुद से भी छुपा कर

तुम हो इतने रूमानी कि मै तुम पर जान देती हूँ
तुम्हारे होने से मुझे जिंदगी एक खूबसूरत कविता सी लगती है

तुम छुपाते हो मगर पता है मुझे
तुम्हारे अक्स से बने होते हैं मेरे सब सपने
और जब मै देखती हूँ तुम्हे रूमानी और आवारा
मुझे तुम ही लगते हो वजह
मेरी सारी खुशियों की

कितने रूमानी हो तुम
रूमानी हो मेरे लिये


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   केरार इ अमॉर (स्पेनिश): यह मधुर गाना प्रसिद्ध मेक्सिकन गायक होसे होसे के सबसे लोकप्रिय गानों मे शुमार है। रोमांटिक गीतों के राजकुमार की उपाधि से नवाजे गये होसे बीसवी सदी के उत्तरार्ध के सबसे प्रसिद्ध लैटिन गायकों मे से माने जाते हैं। उनकी सौम्य और मोहक आवाज और कर्णप्रिय संगीत से सजा यह गीत प्यार को डिफ़ाइन करने की कोशिश करता है और सच्चे प्यार को हाइलाइट करने की भी। वैसे होसे के गाये रोमांटिक गाने दुनिया के हर कोने मे लोकप्रिय हुए हैं।

हर किसी को मालुम है लगभग
कि कैसे चाहा जाता है किसी को
मगर कुछ ही जानते हैं
कि कैसे किया जाता है प्रेम
एक बात नही है दोनो
चाहना और प्रेम करना
प्यार होता है दर्द, चाह होती है आनंद के लिये
प्यार होता है बढ़ते जाना आगे
निछावर कर दे्ना जीवन प्रेम मे
लालसा रखने वाला जिये जाना चाहता है जबकि,
नही चाहता पीड़ा भोगना
प्रेम मे सो्चा नही जाता कुछ, बस दे देना होता है अपना सब कुछ
कामना रखने वाला भूलना चाहता है सब
नही उठाना चाहता दुख
बहुत जल्द खत्म हो जाती है चाहत
जबकि प्रेम होता है अनंत

प्रेम है आकाश और प्रकाश
प्रेम सम्पूर्णता देता है
समंदर जिसका कोई किनारा नही
प्रेम है कीर्ति और अमन
लालसा है दैहिक, एक अंधे कोने की तलाश
लालसा है छुअन, चुंबन
लालसा है पल भर की आग

सबको आता है चाहना किसी को
किसी किसी को आता है प्रेम करना


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   बेबी इट्स कोल्ड आउटसाइड (इंग्लिश): इस कड़ी मे अगली पेशकश एक अमेरिकन युगल गीत है। फ़िल्म ’नेपच्यून’स डाटर’ के इस गीत को 1949 का आस्कर अवार्ड मिला था और यह गीत आस्कर विजेता लोकप्रियतम गीतों मे से शुमार किया जाता है। इसको जॉनी मर्सर और मार्गरेट व्हाइटिंग ने अपनी आवाज दी है। इस गीत मे टीन-एज प्रेम अपने सबसे आम और सहज रूप मे सामने आता है। यहाँ प्यार फ़ैंटेसी भर नही है बल्कि प्यार की कोमल मिठास भरे विलयन मे पिता, भाई, अम्मा, पडोसी और दुनिया भर की भी फ़्रिक्रें घुली हुई हैं। छेड़छाड़ और हलकी शरारत, नजाकत भरे बोलों मे जहाँ लड़के की अपनी प्रेमिका से कुछ देर और रुक जाने की प्यार भरी कामनामय मनुहार है तो लड़की के प्यार मे डूबे दिल और तमाम डरों से घिरे दिमाग के तमाम बहानों के बीच की कशमकश है। टिपिकल बालीवुडिया किस्म के प्रेम मे रचा हुआ यह गाना कितनी भी बार सुने आपको हर बार पहले से अच्छा ही लगता है। क्लासिक का दर्जा प्राप्त इस गाने को तमाम दूसरे कई गायकों ने भी अपनी आवाज दी है।


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   ला वियें इन रोज (फ़्रेंच): पोस्ट का आखिरी गाना पिछली सदी के सबसे रोमांटिक और पापुलर गानों मे से एक है। फ़्रेंच गायिका एदिथ पियाफ़ का यह गाना प्रेमधुन के धुनियों के लिये जरूरी खुराक है। सौ टके रोमांस मे डूबे बोलों को एडिथ की विशिष्ट आवाज की कालातीत स्पर्श और खासे नास्टाल्जिक म्यूजिक का साथ एक दैवीय फ़्लेवर देता है कि यह गीत फ़्रांस के सर्वकालिक लोकप्रिय गीतों मे ही नही बल्कि प्रेम की सर्वकालिक लोकप्रिय धुनों मे से एक माना जाता है।

आंखें जो निहारती हैं मुझमे
मुस्कराहट जो खो जाती है होठों पर
अछूती सी छवि है मेरे प्रियतम की
मै हूँ जिसकी

जब वो मुझे बाहों मे भरता है
और हौले से कुछ कहता है कानों मे
मुझे जिंदगी गुलाबों सी रंगीन दिखती है
उसकी प्रेम से पगी बातें
रोजमर्रा की बातें
जादू सा करती जाती है मुझ पर
खुशी से भरता जाता है मेरा दिल
और मै जानती जाती हूँ
कि वो मेरा है और मै उसकी, सारी उमर
उसने बोला है मुझे
जिंदगी भर के संग का वादा किया है मुझसे
मै अपने अंदर महसूसती हूँ
अपना दिल धड़कता हुआ

प्यार की अंतहीन रातों मे
एक खुशी छाती है धीरे-धीरे
और सारा दर्द, सारी चिंताएं गुम होती जाती हैं
खुशी खुशी मर सकते हैं प्रेम मे



Wednesday, January 4, 2012

कविता के पन्नों मे नया साल: कोबायाशी इस्सा-2

(पिछली पोस्ट से जारी)
     कोबायाशी इस्सा साहब की जो बात उनको दूसरे समकालीन हाइकू के महारथियों से अलग करती थी, वह थी उनकी कविता की बच्चों जैसी अद्भुत सरलता और साधारणता। गहरी दार्शनिक गुत्थियों मे गंभीरता के साथ उलझने की बजाय वो ज्यादातर अपने आस-पास की चीजों को कविता का विषय बनाते थे और उनके तमाम हाइकू उनके इसी खिलंदड़ेपन और ह्यूमर की बानगी नजर आते हैं। कोई भी चीज उनकी कविता के परिधि से परे नही थी और उनकी उपहासात्मक नजर विषयों मे पवित्रता का फ़र्क नही देखती थी। लगातार संघर्षों से जूझते उनके जीवन ने अपने दुखों का भी मजाक बनाने की कला विकसित कर ली थी। वो खुद ही कविता के बहाने अपनी मुफ़लिसी, बीमारी, पियक्कड़ी, आलसीपन और शक्लो-सूरत का मजाक उडाते ही थे बल्कि उनकी मजे लेने की शैली चपेट मे अक्सर देवता और धार्मिक व्यक्ति भी आ जाते थे। मगर जिंदगी के प्रति इतना उपहासात्मक रवैया रखने के बावजूद उनकी तमाम उम्र विषमताओं से जूझते हुए ही बीती।
    खुद को ’शिनानो-प्रांत का भिक्षुक’ कहलाना पसंद करने वाले इस्सा की कविता मे अतिशय विद्वत्ता, विशिष्टता और पवित्रता जैसी ’असाधारणताओं’ के प्रति निषेध-भाव ही देखने को मिलता है। अपनी जिंदगी की तरह वो अपनी कविता को भी आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से करीब और और फलतः जमीन से जुड़ा हुआ बनाये रखते हैं। तमाम ’काव्योचित’ विषयों (तब की जापानी कविता जिन विषयों के इर्द-गिर्द घूमती थी) के प्रति नकार का भाव ही था कि वो बेहद उपेक्षणीय और साधारण सी चीजों को अपनी कविता का केंद्र बनाते थे। पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी उनकी कविता मे बेहद प्रभावी और सजीव रूप से उपस्थित होते थे। एक स्रोत के मुताबिक अपने जीवनकाल मे उन्होने 54 हाइकु घोंघे पर, 200 मेढक पर, 230 जुगनू पर, 150 मच्छर पर, 90 मक्खियों पर लिख डाले। कविता मे साधारणता और मानवीयता का यही आग्रह उन्हे हाइकु के दूसरे मास्टरों से अलग खड़ा करता है।
  खैर, यहाँ इस्सा के नये साल पर कुछ और उम्दा हाइकु का हिंदी तर्जुमा पेशे-खिदमत है।

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गोदाम के पिछवाड़े
तिरछा चमकता है
साल का पहला सूरज


 
(अपने जीवन के उत्तरार्ध मे उनके गाँव मे आग लग जाने से उनका घर साजो-सामान सहित जल कर खाक हो गया था। फलतः जिंदगी के बाकी तमाम दिन उन्हे जरा सी गोदाम मे रह कर गुजारने पड़े थी, जहाँ कि सूरज की रोशनी भी थोड़ी सी ही आती थी। यह हाइकु संभवतः उन्होने इसी परेशानी पर तंज कसते हुए लिखा था।)
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थोक मे अभिनंदन करता
साल की पहली बारिश का
टपकता हुआ घर

 
(अपने घर की दुर्दशा के बहाने वो अपनी आर्थिक खस्ताहाली पर भी व्यंग्य करने से नही चूकते हैं।)
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खूब है ये भी साल
भिनभिनाती आपस मे
द्वार पर मक्खियाँ


(इस्सा के हाइकु मे पशुओं-पौधों-कीड़ों की उपस्थिति बड़ी मानवीय और मूर्त होती थी, वहीं अपने अहसास उजागर करने के रूपक भी।)
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दीवार मे छेंद
कितना सुंदर तो है
मेरे साल का पहला आकाश


(यह इस्सा के तीखे हास्यबोध और जिंदगी के प्रति फ़क्कडपन का बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ टूटे घर मे भी वो ऐसी सकारात्मकता खोज लेते हैं कि जिंदगी से कोई शिकायत न हो।)
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झोपड़ी के मच्छर
इस कम्बख्त साल भी
उड़ायेंगे दावत


(यह हाइकु भी इस्सा के खुद का मजाक उड़ाने की आदत की बानगी है। अपनी कठिन जिंदगी और रहने की दिक्कतों के बहाने मच्छरों की लाटरी खुल जाने की बात करना उनके स्वभाव के खिलंदड़ेपन की निशानी ही होगी।)
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निकल आये पंख
उड़ गया मेरा रुपिया
खतम हुआ साल


(साल के आखिर मे सारा उधार चुकता करने मे गाँठ के पैसे खतम हो जाने पर इस्सा को अचरज होता है कि इतनी मेहनत से कमाया पैसा कितनी जल्दी ’उड़’ गया, कि नये साल का स्वागत करने के लिये उनके पास धेला भी नही बचा।)
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नही खड़ी कर पाया हवेली
जिसने नही चखी शराब
गम मे खतम हुआ साल


(अपनी पियक्कड़ी का बचाव करते हुए इस्सा मजाक करते हैं कि अमीर बनने के लिये ’पीना’ भी जरूरी शर्त है, मगर बहाने से इशारा भी करते हैं कि दारू नही मिलने की वजह से उनका साल द्खद तरीके से खतम हो रहा है।)
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साल का अंत
मेरे मृत्यु-ग्रह की घंटी
भी बजती सी

 
(ताजिंदगी अपने प्रियजनों (पहले माँ, दादी, पिता फिर बीवी और बच्चे) की मौत से जूझते इस्सा की कविता मे मृत्यु बड़ी सहजता मगर अपरिहार्यता के संग नजर आती है।)
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एक नया साल
वही पुरानी बकवास
बकवास के ढेर पर इकट्ठी होती


(अपनी आर्थिक मुश्किलों से जूझते इस्सा कुढ़ते भी हैं कि साल बदलने के बावजूद परेशानियाँ यथावत रहती हैं, संग ही जिंदगी की एकरसता पर कटाक्ष भी करते हैं।)
****
एक और नया साल
जब तलक नही घिसता है
बारिश रोकने का पत्थर


(यहाँ पर इस्सा अपने नये घर की खुशी ही व्यक्त करना चाहते हैं कि जब तक उनका घर बारिश रोकने मे सक्षम है उन्हे वक्त बीतने की कोई फ़िकर नही है।)
**** 
बुद्ध पर है मुझे भरोसा
अब अच्छा हो या बुरा
जाते साल को विदा


(बौद्ध-भिक्षु रहे इस्सा की कविता पर बौद्ध-दर्शन का असर साफ़ दिखता है. जो शायद उनकी जिंदगी के प्रति धैर्यपूर्ण रवैये की भी वजह रही है।)


 (चित्र: उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्द जापानी पेंटर उतागावा हिरोशिगे की मशहूर कलाकृति ’फ़ुजी और अश्तका पहाड़ पर बर्फ़बारी के बाद मौसम’. साभार-गूगल)

Tuesday, January 3, 2012

कविता के पन्नों मे नया साल: कोबायाशी इस्सा-1



केंचुली बदलते कैलेंडर के बहाने कविताओं के पन्ने पलटते हुए अगला नाम आता है कोबायाशी इस्सा का। जापान के अठारहवीं शताब्दी के इस अद्भुत संत कवि के हाइकु जापान के साहित्यिक इतिहास मे कुछ वैसा ही मुकाम रखते हैं जैसा हिंदुस्तान मे कबीर की साखियों का है। हाइकु के चार स्तंभों मे ’बाशो’, ’बुसान’ और ’शिकी’ के साथ ही उनका नाम भी शामिल है। अपने जीवन काल मे कोई 20000 हाइकु लिखने वाले इस्सा की लोकप्रियता वक्त से संग बढ़ती ही गयी है। नये साल के मौके पर उनके चुनिंदा हाइकु की ओर चलने से पहले उनसे कुछ और तअर्रुफ़ करते हैं।

कोबायाशी इस्सा (1763-1827) का 64 साल का जीवन लगातार उथलपुथल से भरा रहा। गरीब किसान परिवार मे पैदाइश, कम उम्र मे माँ का गुजर जाना, सौतेली माँ का सौतेला बरताव, बीवी से अनबन, कमउम्र मे बच्चों की मौत और ताजिंदगी गरीबी से जद्दोजहद ने उनकी जिंदगी के साथ कविता पर भी गहरा असर डाला। मगर उम्दा प्रतिभाओं को तमाम विपरीत हालातों मे ही पनाह मिलती है। जगह-जगह छोटे-मोटे काम कर जीविका कमाते हुए वो शहर-शहर भटकते रहे। अपने जीवन के उत्तरार्ध मे बौद्ध-भिक्षु बन गये इस्सा कैलीग्राफी और ड्राइंग मे भी खासा दखल रखते थे। उनके हाइकु रोजमर्रा की छोटी-छोटी और बड़ी सामान्य सी घटनाओं से निकलते हैं और जीवन की इन साधारणताओं को गहरी दार्शनिक और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति देते हैं।

बचपन मे ही अपनी माँ को फिर अपनी प्यारी दादी को भी खो देने वाला यह बच्चा अपने अनुशासन-पसंद कठोर पिता और सौतेली माँ के बुरे बर्ताव के बीच पिसता हुआ बड़ा एकाकी होता गया। लोगों से मेलजोल के बजाय इधर-उधर जंगलों मे घूमता हुआ पेड़-पौधों-पक्षियों के संग अपना निपट अकेलापन बाँटता रहा। कविता की प्रतिभा इसी अंतस्‌ के अकेलेपन से छन-छन के बाहर आता रहा। बचपन का लिखा एक हाइकु एक बानगी है-
उतर आओ नीचे
खेलो मेरे संग
ओ अनाथ गौरैया!

बच्चों सी सरलता लिये और देशज भाषा के कलेवर मे सजी उनकी कविता उनकी मुश्किल जिंदगी का बेबाक आइना है। जापान की हाइकु की विधा की यह खासियत भी है कि उनका विषय और शैली बेहद सरल होते हुए भी वो भावों की गहराई लिये होते हैं। आमतौर पर हाइकु का मुख्य विषय प्रकृति होती है और इसी के बहाने उनमे जिंदगी के तमाम दार्शनिक पहुलुओं पर गहरी टिप्पणियाँ छुपी होती हैं। खैर हाइकु और इस्सा साहब की कुछ बातें और भी करेंगे मगर अभी उनके कुछ हाइकु के हिंदी तर्जुमे से परिचित होते हैं जो खासकर साल के बदलाव के इस मुकाम पर मौजूँ बैठते हैं।

****
साल का पहला सपना
मेरे गाँव का घर
आँसुओं से धुला


(साल के पहले आँसुओं मे भरे सपने की गहरी भावुकता और घर से बिछड़ने की यातना से भरा यह हाइकु उनके अपने गाँव से 17 साल लंबी जुदाई से उपजा था जैसा कि उनकी जिंदगी के बारे मे बताने वाले कई स्रोत इशारा करते हैं।)

****
लकड़ी उतराती पानी मे
कभी इधर कभी उधर
खतम होता है साल


(जिंदगी के दिशाहीन क्षणिक अस्तित्व की तरफ़ टिप्पणी करते इस हाइकु मे शायद उनके अपने ताजिंदगी भटकते रहने पर भी इशारा है)
****
गढ़ रही है
साल का पहला आकाश,
चाय की भाप

(चाय यहाँ नये साल के उत्सव का भी एक पहलू है। एक मजेदार बात यह भी है कि कवि के तखल्लुस ’इस्सा’ का जापानी मतलब भी चाय-का-कप जैसा कुछ होता है)
****
खतम हुआ साल
कब आयेगी मेरी बारी
ओ मंदिर की घंटी


(यहाँ मंदिर की घंटी अंतिम-संस्कार के वक्त बजायी जाने वाली घंटी है। किसी गहन दुख के वक्त लिखा गया यह हाइकु इस्सा के कष्टमय जीवन का एक इशारा भर है।)
****
उसका पति भी था संग
जब साल था नया
विधवा तितली

 
(साल ही नही बल्कि हमारे साथ के चीजें भी वक्त के साथ पुरानी पड़ती जाती हैं और हमारा साथ छोड़ देती हैं, इतनी कि फिर तकलीफ़देह अकेली जिंदगी और बरहना होती जाती है, यह इस्सा ने अपनी जिंदगी से खूब समझा था।)
***
बाड़ से बँधा
कुल तीन हाथ चौड़ा
साल का पहला आकाश

 
(शहरी गरीब इलाकों मे रहने की जगह की तंगी अपने हिस्से की जमीन ही नही आसमान को भी छोटा कर देती है, इस्सा को इसका अच्छा तजुर्बा रहा था।)
******
अपनी झोपड़ी मे तो
दोपहर से होता है शुरू
साल का पहला दिन

 
(साल के सबसे पवित्र दिन मे भी छायी सुस्ती के बहाने इस्सा अपने आलसीपन का एक भर नमूना पेश करते हैं)
***
कलाई का बना तकिया
अब खतम हो ये साल
चाहे ना हो खतम

(हमारे जैसे आलसियों के लिये एंथम सरीखा यह हाइकु इस्सा साहब की ’फक्कड़-फ़िलासफी’ के सबसे बेहतरीन नमूनों मे से एक है। गौरतलब है कि इस्सा साब का यह हाइकू उनके पीने के शौक की ओर भी इशारा करता है।)
******
जाड़े की सर्द हवाएँ
बहा कर लाती मृत्यु
और नजदीक, हर साल

 
(अपनी दादी की 33वीं पुण्यतिथि पर लिखा यह हाइकु जीवन से उनकी विरक्ति का एक उदाहरण है। गौरतलब है कि तमाम जिंदगी भर अपने निकटस्थ प्रियजनों के बिछोह को सहते रहे इस्सा की कविताओं मे मृत्यु बार-बार दस्तक देती है।)
********

कृमशः

(पहला चित्र: कोबायाशी इस्सा
दूसरा चित्र: होकुसाइ की प्रसिद्ध पेंटिंग ’गस्ट’)

पोस्ट के लिये हाइकु और इस्सा संबंधी जानकारी के लिये ’बैरंग’ निम्न स्रोतों का आभारी है:

Sunday, January 1, 2012

कविता के पन्नों मे नया साल: राबर्ट फ़िशर


यह एक मजेदार अंग्रेजी कविता है राबर्ट फ़िशर की। नेट पर ही कहीं मिली मुझे और पढ़ते हुए बड़ा मजा आया। मुख्यरूप से बाल कविता के कलेवर मे इस कविता की खास बात यह लगी कि यह किसी भी उम्र मे आपके बचपन के विस्मृत तंतुओं को स्पर्श करती है और आपकी एक सहज सी बरबस मुस्कान इस कविता का असल हासिल है। प्रस्तुत है हिंदी तर्जुमा नये साल की अशेष शुभकामनाओं के संग!


नये साल की कसमें: राबर्ट फ़िशर

ठान लिया है मैने
अब से बिल्ली को खिड़की से बाहर नही फ़ेकूँगा
बहन के बिस्तर मे मेढ़क भी नही छोड़ा करूँगा अब
और भइया के जूतों के फ़ीते भी आपस मे नही बाँधा करूँगा
पापा की टीन की छत से नही लगाऊँगा छलांग
बुआ का अगला जनमदिन याद रखूँगा अबकी बार
और हफ़्ते मे एक बार तो जरूर करूँगा अपने कमरे की सफ़ाई
मम्मी के बनाये खाने पर नाक-भौँ भी नही सिकोड़ूँगा
(उफ़्फ़! फ़िर वही बैंगन की सड़ी सी सब्जी!)
मम्मी से तमीज से पेश आऊँगा
अब अपनी नाक नही खोदूँगा, जब तक बस चलेगा
और तह कर के रखा करूँगा अपने कपड़े
कंघी भी करूँगा बालों मे
अब से मैं सीखूँगा ’प्लीज’ बोलना और ’थैंक यू’ भी
(भले ही झूठ-मूठ बोलना पड़े)
अब से चिल्लाना और इधर-उधर थूकना बन्द
और गाली देना तो एकदम बन्द
हर दिन करूँगा अपनी डायरी मे नोट
स्कूल मे सबकी मदद करने की भरसक कोशिश करूँगा
बूढ़ी औरतों को हाथ पकड़ कर सड़क पार करा दिया करूँगा
(भले ही उन्हे नही करनी हो सड़क पार)
तभी सोया करूँगा जब उल्लू सोने जाते हैं
और सुबह चिड़ियों के संग उठ जाया करूँगा
और अपने पीछे से दरवाजा बंद करना याद रखूँगा
अब टूथपेस्ट को एकदम नीचे से दबा कर निकालूँगा पेस्ट
और ऐसी जगह रहूँगा जहाँ मुसीबतें मेरे पास ही ना फटकें
अब सब कुछ नये सिरे से शुरू करूँगा
बदल दूँगा खुद को
एक अच्छा बच्चा बन कर दिखाऊँगा
और अपनी बुरी आदतें हमेशा के लिये छोड़ दूँगा
वैसे यह सब इस साल से शुरू करूँ या अगले साल से?
शुरू करूँ भी या....??

(चित्र: आभार गूगल)

Saturday, December 31, 2011

कविता के पन्नों मे नया साल: जेनिफ़र स्वीनी


अभी जब एक साल से दूसरे साल तक सत्ता-हस्तांतरण का वक्त नजदीक आता जा रहा है।ऐसे मे गुनगुनी धूप मे बैठ कर चाय की चुस्कियों के संग गुजर गये साल पर आत्मचिंतन करना सबसे स्वाभाविक और आरामदायक काम होता है। खैर, नया कैलेंडर टांगने से पहले पुराने हो गये इस कैलेंडर पर लगी तमाम उम्मीदों, खुशी, भरोसे, डर, आशंकाओं, कसमों की चिप्पियाँ साल के कुल जमा-हासिल की एक बानगी होती हैं। गुजरते साल के ऐसे ही हासिलों और आने वाले साल से बावस्ता उम्मीदों की इबारत को कविता के चश्मे से परखने की कोशिश हम भी करते हैं। सो आइये अगले कुछ दिनों मे देखते हैं कि कोई कवि वक्त के इस मुकाम को कितनी अलहदा नजरों से परख पाता है। इस सिलसिले मे सबसे पहले पेश है जेनिफ़र स्वीनी की एक अंग्रेजी कविता का हिंदी मे तर्जुमा। अमेरिका की इस युवा कवियत्री को कम उम्र मे ही कई अवार्ड्स से नवाजा जा चुका है। उनके कविता संकलन ’हाउ टु लीव ऑन ब्रेड एंड म्यूजिक’ (पेरुगिया प्रेस) की इस कविता मे जिंदगी की कुल गणित के टुकड़े बिखरे से नजर आते हैं।


बीत गये साल के लिये चंद कतरनें

मैने पाया है कि
औसतन विषम संख्या वाले साल
ज्यादा बेहतर रहे हैं मेरे लिये

मै उस दौर मे हूँ जहाँ मुझे हर मिलने वाला
लगता है उस जैसा
जिसे मै पहले से जानती हूँ

पतझड़ का मौसम बिना हिचकिचाहट के
मुझे धकेल देता है उन चीजों की स्मृतियों मे
जो कभी हुई ही नही मेरी जिंदगी मे

केंचुली बदलता है आसमान
और मुझे नही पता कि इसकी वजह ग्लोबल-वार्मिंग है
या कि वायुमंडल बस खुद को तैयार करता है
कि सह सके और ज्यादा नयी चमकदार यंत्रणायें

मेरे अंदर हिलोरें मारती है
आइसलैंड जाने की बेताब ख्वाहिश

तमाम बुरी चीजों के बावजूद
अभी भी हम भरे हुए हैं विचारों से
जो कि उतने ही संभव हैं
जितने कि वंध्या फ़ल

मुझे सख्त अफ़सोस होता है
कि मुझे ही समझाना होगा
नर्सरी के बच्चों को
कि सूर्यास्त और प्रदूषण के बीच रिश्ता क्या है

और क्या पता है तुम्हे
कि शुक्र-ग्रह पर हमारी उम्र
अभी एक साल से भी कम की होगी

तब यहाँ दो आसमान थे
एक जिसमे भरते थे हम अपनी उड़ान
तो दूसरे मे हम दफ़्न करते खुद को

शुक्र है कि अभी भी
मेरी दिलचस्पी कामुक विलासिता की चीजों मे नही,
मसलन बाथरूम के ऐशो-आराम के सामान

हम साथ-साथ ही हुआ करते थे हर वक्त
कहानी मे

और उसकी शादी के दिन
उसके सीने मे गड़ा पत्थर
कुछ-कुछ तो पिघल सा गया था

कभी-कभी लगता है मुझे
कि जैसे परिंदे उड़ जाते हैं मेरे अंदर से
अनंत की ओर।





(प्रथम चित्र: अमेरिकन कवियत्री- जेनिफ़र के स्वीनी)
(द्वितीय चित्र: The Key -अब्स्ट्रैक्ट-एक्सप्रेशनिज्म के अगुआ ख्यात अमेरिकन पेंटर जैक्सन पोलॉक)

Saturday, February 12, 2011

देखी है कभी डाकिये के नाम भी कोई चिट्ठी?

बचपन में जब मैं अपने डाकिये को लोगों की चिट्ठियां उनतक पहुँचाते हुये देखता था तब एक बात अक्सर मुझे परेशान करती थी कि उस डाकिये की चिट्ठियां उसतक कौन पहुँचाता होगा? बढती उम्र ने जब कई चीजों के जवाब दिये, शायद तभी समझ आया कि वो भी कोई और नहीं एक डाकिया ही था।
तो आज एक चिट्ठी  डाकियों के लिये जो अबतक बैरंग चिट्ठियों को उनके पतों तक पहुँचाने का काम बडी शिद्दत से कर रहे हैं। इस चिट्ठी को लिखा है एक डाकिये ने (अपूर्व शुक्ला), पढा है एक डाकिये ने (दर्पण साह) और यहाँ तक पहुँचाने की साजिश भी एक डाकिये ने ही (डिम्पल) रची है।
…तो प्रस्तुत है ’ओ समय!’



 
प्रेषक :- दर्पण साह 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

Sunday, February 6, 2011

ख़त की इबारत

(कभी-कभी कुछ कविताएँ अचानक हमको भिगो जाती हैं...और फिर अकेला छोड़ जाती हैं हमें...पतझड़ की बेमौसम बारिश की तरह....और हम उदासी के गहरे धुंधलके मे शाख से टूटे हुए गीले पत्तों का मूक बिलखना सुनते रहते हैं...देर तलक। कुछ कविताएं थोड़ा सा कह कर इतना अनकहा छोड़ जाती हैं हमारे पास..कि मन देर तक उसी अनकहे के बीहड़ मे अकेला भटकता रहता है..उस अव्यक्त के आइने मे अपनी पहचान के अक्स तलाश करता...जैसे कि माँ बच्चे को रात मे देर तक लोरी सुनाती है..प्यार करती है..दुलारती है..और परियों की कहानी..दूर देश के राजकुमारो, उड़ने वाले घोड़ों की कहानी.....मगर सो जाने के बाद बच्चे के ख्वाबों मे परियाँ नही आतीं..ना राजकुमार..ना उड़ने वाले घोड़े...ख्वाब मे माँ का आँसुओं भरा चेहरा आता है..ख्वाब गीले हो जाते हैं।..व्यस्त दिन बावरे मन को किसी बच्चॆ सा भटकाये रहता है..बाजार मे...रंगीनियों मे..हासिल की जा सकने वाली उपलब्धियों मे..मगर शाम होते-होते मन उसी बच्चे सा खयालों की स्कूल-बस से चुपके से उतर जाता है..बिना बताये..और वापस आ कर उसी टूटी मुँडेर पर उदास सा बैठ जाता है..जहाँ अपना सिसकना सिर्फ़ अपने आप को ही सुनाई देता है..खैर!!..यह एक मेरी पसंदीदा पंजाबी कविता है..सरोद सुदीप की..ज्ञानपीठ के किसी पुराने प्रकाशन मे संकलित..हिंदी रूपांतर डॉ हरभजन सिंह का था...पढ़ें यह बैरंग ख़त..शायद आपको भी पसंद आये..)





इबारत एक पत्र की
 

वैसे तो उदास नही होता मैं
छोटी-छोटी बात पर हँसी आ जाती है
माँ का ख़त आया -बेटा तुम्हारे पाँव बहुत दूर चले गये हैं
तब जलती-जलती सिगरेट जल गयी
 
जहाज आये होंगे, चले गये होंगे
सभी द्वार खुले हैं, एक भी गुजर जाने योग्य नही
कल नींद नही आयी तो न सही
कहीं  न कहीं कोई खुशी बैठी होगी
उसके पास जाओ और कहो:
यह भी एक फ़ालतू भ्रम था

मधुमक्खी एक फूल पर बैठती है,
फिर दूसरे पर, फिर तीसरे पर
और उड़ जाती है
चश्मे ने तुम्हे देखा और उसे तुमने
और बात खुदगर्जी पर आ कर खत्म हो गयी

कल जो पल जाग उठा था
आज बुझ गया है...
बच्चों समेत कबूतरी खा ली गयी
और कबूतर शाम तक
टूटे पंखों के इर्द-गिर्द गुटकूँ, गुटकूँ करता रहा...
सारा ब्रह्माण्ड है, बहुत कुछ जानने योग्य है
किंतु मेरे पास आते-आते एक प्रश्न
कुछ दूरी पर खड़ा हो जाता है
एक मजाक की तरह...

माँ के ख़त का उत्तर लिखने बैठा था
लिफाफे पर मेरा अपना पता लिखा गया है
वैसे तो उदास नही होता मैं...

(चित्र: वाया फ़्लिकर)

Sunday, January 2, 2011

कविता के पन्नों मे नया साल: शुंतारू तानीकावा

   नये साल का खैर-मक़दम करती अगली कविता शुंतारू तानीकावा की है। शुंतारू तानीकावा जापान के दूसरे विश्व-युद्ध के बाद के सबसे महत्वपूर्ण और ज्यादा पढ़े जाने वाले कवियों मे रहे हैं, जिन्होने जापानी पारंपरिक कविता को आधुनिक और ज्यादा सामयिक कलेवर देने मे मदद की। लिक्खाड़ किस्म के इस लोकप्रिय कवि के साठ से अधिक संग्रह प्रकाशित हैं। उनकी कविताएँ वक्त के बदलते पैरहन से उपजी उहापोह और वैचारिक उत्सुकता की कविताएं हैं। उनकी कविताओं मे बच्चे सा खिलंदड़ापन भी मिलता है तो किसी अधेड़ सा आत्मालोचन भी। वहाँ अक्सर कवि हम जैसे साधारण लोगों की जमात मे खड़ा जीवन के नमकीनपन के ब्योरे दर्ज करता पाया जाता है। प्रस्तुत कविता इसकी एक बानगी है। हिंदी अनुवाद ख्यात कवि और महारथी अनुवादक श्री अशोक पांडे का है।


नये साल की कसमें

क़सम खाता हूँ दारू और सिगरेट नही छोड़ूँगा
क़सम खाता हूँ जिनसे मै नफ़रत करता हूँ उन्हे नहला दूँगा नीच शब्दों से
क़सम खाता हूँ सुंदर लड़कियों को ताका करूँगा
क़सम खाता हूँ, हँसने का जब भी उचित मौका होगा
खूब खुले मुँह से हँसूगा
सूर्यास्त को देखूँगा खोया-खोया
फ़सादियों की भीड़ को नफ़रत से देखूँगा
क़सम खाता हूँ
दिल को हिला देने वाली कहानियों पर रोते हुए भी संदेह करूँगा
दुनिया और देश के बारे मे दिमागी बहसें नही करूँगा
बुरी कविताएँ और अच्छी कविताएँ लिखूँगा
कसम खाता हूँ समाचार-पत्र संवाददाताओं को नही बताऊँगा
अपने विचार
कसम खाता हूँ अंतरिक्ष-यान मे चढ़ने की इच्छा नही करूँगा
क़सम खाता हूँ क़समें तोड़ने का अफ़सोस नही करूँगा।

इसकी गवाही मे हम दस्तख़त करते हैं

(चित्र: शुंतारू ताकीनावा
पेंटिंग: अट्ठारहवी सदी के प्रतिनिधि चित्रकार कत्सुशिका होकुसाई की ’विलेज ओन थे सुमिदा रिवर’
आभार-गूगल)

Saturday, January 1, 2011

कविता के पन्नों मे नया साल: ऑक्टावियो पाज़



   एक और साल रो-गा के कट गया। और ठिठुरे सूरज को पीछे धकिया के नया साल सिर पर चढ़ आया। एक सक्षम कवि वक्त की हर हलचल को किसी कुम्हार के सलीके और मछुआरे के धैर्य से अपनी कविता मे दर्ज करता है। खैर अपनी आदत के विपरीत ज्यादा वक्त न लेते हुए आपको कुछ कविताई पन्नो की दावत देता हूँ। सो आइये नये साल के मौके पर हम देखते हैं कि कुछ विख्यात कवियों ने कैलेंडर के अपनी केंचुली बदलने की सालाना फ़ितरत को किस नजरिये से देखा। इस सिलसिले मे सबसे पहले पेश है विख्यात स्पानी कवि ऑक्टावियो पाज़ की एक कविता। ऑक्टावियो पाज़ मेक्सिको के प्रतिनिधि कवियों मे रहे हैं। उन्हे 1990 मे नोबेल से नवाजा गया था। इनकी कविताएं अन्तरावलोकन की भीतरी जमीन पर पनपती हैं और धीमे-धीमे अपने निहित अर्थों की गाँठें खोलती हैं। प्रस्तुत कविता भी बार-बार पढ़े जाने के बाद फिर किसी पेंडुलम की तरह आपके अंतस्‌ मे लयबद्ध आंदोलन करती है। हिंदी-अनुवाद प्रसिद्ध कवि, कथाकार और कला समीक्षक श्री प्रयाग शुक्ल का है।

पहली जनवरी: ऑक्टावियो पाज़

द्वार खुल पड़ते हैं वर्ष के
जैसे कि भाषा के,
अज्ञात मार्गों मे:
कहा तुमने गत रात्रि:

      कल
सोचने पड़ेंगे हमें दिशा-चिह्न,
बनाना होगा एक दृश्यालेख
पन्नों पर दिन और कागज के
निर्मित करनी होंगी योजना।
कल, खोजना पड़ेगा हमें
फिर से
यथार्थ संसार का।

खोली आँखें देर से मैने
एक लघु मुहूर्त को
 अनुभव किया मैने
जो अजतेक* करते थे
जल से निकली मुख्यभूमि
पर लेटे,
करते प्रतीक्षा-
निकले न निकले
सूर्य - समय का,
क्षितिज की दरारों से।

किंतु, नही, आया है लौट वर्ष।
भर दिये हैं इसने सारे कमरे,
नजर ने इसे मेरी छू लिया लगभग।
समय ने, बिना किसी मदद के हमारी,
कल जैसे, रख दिये फिर से,
घर खाली सड़कों पर,
रख दी घरों पर बर्फ,
चुप्पी उस बर्फ पर।

थीं तुम बगल मे मेरी,
अब तक सोयी पड़ी,
दिन ने तुम्हे लिया ढूँढ़
अब तक अनजान
पर इससे तुम,
कर लिया आविष्कृत
दिन ने तुमको।
-न ही यह ज्ञात तुम्हे मै भी
पकड़ मे हूँ दिन की।
थीं तुम किसी अन्य ही दिन मे।

थीं तुम बगल मे मेरी,
बर्फ की तरह, लिया देख
मैने तुम्हे
सोयी पड़ी बीच आभासों के।
समय बिना मदद के हमारी,
है खोजता घर, पेड़, गलियाँ
स्त्रियाँ सोयी हुई।

खोलोगी जब अपनी आँखें तुम,
टहलेंगे फिर से हम एक बार
प्रहरों के बीच और उनकी
प्राप्तियों में,
बीच आभासों के डोलते,
देंगे गवाही हम समय की.
उसकी क्रियाओं की।
खोलेंगे दरवाजे दिन के हम,
करेंगे प्रवेश
अज्ञात मे।

(अज़तेक: एक मेक्सिकोवासी जातीय समुदाय जिनका अस्तित्व सोलहवीं शताब्दी का था। वे सूर्य के आराधक थे।)

(चित्र: ऑक्टावियो पाज़;
पेंटिंग: ख्यात मेक्सिकन पेंटर डिएगो रिवेरा की ’फ़्लावर वेंडर’
चित्र आभार-गूगल)

Tuesday, December 28, 2010

बहरे वक्त मे बिनायक सेन होना

    सच एक भयावह शब्द होता है। एक मुश्किल वक्त मे सच की मशाल थामने वालों को यंत्रणाओं के दौर से गुजरना पड़ता है। निरंकुश ताकतों के खिलाफ़ आवाज उठाने की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। और अगर वह निरंकुश ताकत सरकार की हो जिसके हितों को आपका सच बोलना नुकसान पहुँचा सकता है तो एवज मे आप राजद्रोही भी करार दिये जा सकते हैं। डॉ बिनायक सेन को छत्तीसगढ़ के ट्रायल-कोर्ट द्वारा उम्रकैद की सजा देना इसलिये नही चौंकाता है कि हमें राजसत्ता से उनके लिये किसी रियायत की उम्मीद थी, बल्कि इसलिये ज्यादा व्यथित करता है कि राजनैतिक व्यवस्था से हताश इस देश के आम आदमी की मुल्क की न्याय-प्रणाली मे अभी भी कुछ आस्था बाकी थी। डॉ सेन को 120B, 124A के चार्जेज़ के अलावा बहुविवादास्पद ’छत्तीसगढ स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट-2005’ और UAPA के अंतर्गत सजा सुनाई गयी।

   ’व्हाट इज डेमोक्रेसी’ मे प्रख्यात संवैधानिक कानूनविद जॉन ओ फ़्रैंक कहते हैं- ’सत्ता की निरंकुशता के लिये एक असरदार हथियार होता है अपने सरकार के विरोधियों पर राजद्रोह का जुर्म लगा देना। इसलिये राजद्रोह संबंधित कानून बनाते वक्त इस बात का खास खयाल रखना चाहिये कि सत्ता द्वारा उन कानूनों का इस्तेमाल अपनी नीतियों के आलोचकों को खामोश करने के लिये न किया जाने पाये।’ इतिहास देखें तो दुनिया की तमाम लोकतांत्रिक सरकारें भी राजनैतिक विरोधियों को शांत करने के लिये संदिग्ध कानूनों का सहारा लेते पायी गयी हैं। लातिन-अमेरिकी या तमाम अफ़्रीकी मुल्कों के राजनैतिक इतिहास मे ऐसे अनगिन उदाहरण मिल जाते हैं। मगर सबसे अहम्‌ तथ्य यह है कि कानून का ऐसा गैरकानूनी इस्तेमाल अंततः मुल्क के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिये ही घातक सिद्ध होता है। भारत के लिये भी डॉ बिनायक सेन की सजा का उदाहरण न तो पहला है न ही आखिरी होगा।

   डॉ सेन पर माओवादियों का साथ देने और भारतीय राज्य के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने की साजिश का जुर्म लगाया गया था। क्या छत्तीसगढ़ सरकार के लिये डॉ सेन इतना बड़ा खतरा हैं कि उन्हे खामोश करा दिये जाने की जरूरत पड़े? पुलिस उन्हे फ़र्जी इनकाउंटर मे भी मार सकती थी या एक्सीडेंट भी करा सकती थी। मगर उन्हे कानून की रोशनी मे अपराधी करार दिये जाना इसलिये ज्यादा जरूरी था कि आम नागरिकों के बीच उनकी विश्वसनीयता को मारा जा सके। ताकि उस सच की धार को भोथरा किया जा सके जो सरकार की निरंकुशता के क्रूर चेहरे को बेनकाब करता था।

   सरकार की नजर मे खतरनाक यह इंसान दरअस्ल ख्यातिप्राप्त पीडिएट्रिशियन, स्वास्थ्य-सेवी और सामाजिक अधिकारों का प्रखर कार्यकर्ता था जिसे अपने कार्य के लिये देश-विदेश के तमाम पुरस्कारों के साथ ’ग्लोबल हेल्थ एंड ह्यूमन राइट्स’ के लिये जोनाथन मैन अवार्ड मिल चुका था। डॉ सेन जो प्रतिष्ठित CMC इंस्टीट्यूट से मेडिकल के टॉपर स्टुडेंट रहे थे मगर उनकी गलती यह थी कि शिक्षा के इस स्तर पर जब लोग विदेश जा कर पैसा कमाने की अंधी दौड़ मे शामिल होने के सपने देखते हैं तब उन्होने  देश के उन उपेक्षित और ग़रीब हिस्सों मे काम करने को प्राथमिकता दी जहाँ मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं की सबसे ज्यादा कमी थी। पिछले तीस सालों से छत्तीसगढ़ के बेहद पिछड़े आदिवासी इलाकों मे निःस्वार्थभाव से जन-स्वास्थ्य के क्षेत्र मे उनके अथक काम का नतीजा है कि वहाँ के लोकल स्वास्थ्यसेवी भी यह मानते हैं कि उनके प्रयासों से आदिवासी इलाकों मे शिशु-स्वास्थ्य की हालत सुधारने मे बड़ी मदद मिली। मुल्क के पिछड़े हिस्सों मे चिकित्सा सेवा मे अपनी जिंदगी समर्पित कर देने वाले इस शख्स को उसी मुल्क का दुश्मन करार देने की जरूरत कैसे महसूस हो गयी?

   यहाँ मुझे रेणु की कालजयी कृति ’मैला आँचल’ के अहम्‌ पात्र डॉ प्रशांत की याद आती है। मुल्क की आजादी के वक्त की इस कथा मे वो बिहार के पिछड़े और ग्रामीण इलाके मे लोगों को मलेरिया जैसी बीमारी से निजात दिलाने का सपना ले कर जाता है। मगर उस इलाके मे रिसर्च के दौरान अपना वक्त गुजारने के बाद उसे तब बड़ा धक्का लगता है जब उसे यह समझ आता है कि मलेरिया से भयावह तरीके से ग्रसित उस इलाके की असल बीमारियाँ मलेरिया आदि नही वरन् उससे इतर और खतरनाक थी। कुनैन मलेरिया का इलाज कर सकती थी मगर गरीबी का नही! जंगली वनस्पति बुखार जैसे रोगों को ठीक कर सकती थी मगर सामाजिक-भेदभाव जैसी खतरनाक बीमारी को नही! और इन असल बीमारियों का इलाज किये बगैर कोई हालत संवरने वाली नही थी।

   डॉ सेन का हाल भी ऐसा ही रहा। डॉ सेन का जुर्म यह रहा कि उन्होने आदिवासियों के लिये काम करते हुए उनके अधिकारों की बात की, उन पर हो रहे जुल्मों का जिक्र किया। उन्होने हिंसा का हमेशा सख्त विरोध किया चाहे वह माओवादियों की हो या सरकारी बलों की! डॉ सेन पुलिस और पुलिस समर्थित गुटों द्वारा व्यापक पैमाने पर किये जा रहे भूमि-हरण, प्रताड़नाओं, बलात्कारों, हत्याओं को मीडिया की रोशनी मे लाये; पीडित तबके के लिये कानूनी लड़ाई मे शामिल हुए। उनका अपराध यह रहा कि वो उस ’पीपुल’स यूनियन फ़ॉर पब्लिक लिबर्टीज’ की छत्तीसगढ़ शाखा के सचिव रहे, जिसने मीडिया मे ’सलवा-जुडुम’ के सरकार-प्रायोजित  अत्याचारों को सबसे पहले बेनकाब किया।

   इतने गुनाह सरकार की नजर मे आपको कुसूरवार बनाने के लिये काफ़ी है। फिर तो औपचारिकता बाकी रह जाती है। इस लोकतांत्रिक देश की पुलिस ने पहले उन्हे बिना स्पष्ट आरोपों के महीनो जबरन हिरासत मे रखा। फिर कानूनी कार्यवाही का शातिर जाल बुना गया। सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी किसी हिंसात्मक गतिविधि मे संलग्नता को प्रमाणित नही कर पायी। सरकार के पास उनके माओवादियों से संबंध का कोई स्पष्ट साक्ष्य नही दे पायी। पुलिस का उनके खिलाफ़ सबसे संगीन आरोप यह था कि जेलबंद माओवादी कार्यकर्ता नरायन सान्याल के ख़तों को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने का काम उन्होने किया। मगर इस आरोप के पक्ष मे कोई तथ्यपरक सबूत पुलिस नही दे पायी। उनके खिलाफ़ बनाये केस की हास्यास्पदता का स्तर एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि सरकारी वकील अदालत मे उन पर यह आरोप लगाता है कि उनकी पत्नी इलिना सेन का ईमेल-व्यवहार ’आइ एस आइ’ से हुआ था। मगर बाद मे अदालत को पता चलता है कि यह आइ एस आइ कोई ’पाकिस्तानी एजेंसी’ नही वरन दिल्ली का सामाजिक-शोध संस्थान ’इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट’ था। फ़र्जी सबूतों और अप्रामाणिक आरोपों के द्वारा ही सही मगर पुलिस के द्वारा उनको शिकंजे मे लेने के पीछे अहम्‌ वजह यह थी कि उनके पास तमाम पुलिसिया ज्यादतियों और फ़र्जी इन्काउंटर्स की तथ्यपरक जानकारियां थी जो सत्ता के लिये शर्म का सबब बन सकती थी।

   सरकारी-तंत्र की ज्यादतियों के शिकार दंतेवाड़ा के वो अकेले ऐसे कार्यकर्ता नही है। उनके अलावा भी तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं को सरकारी मनमानी का विरोध करने के एवज मे पुलिसिया प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा है। एक नाम हिमांशु कुमार का है। स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र और प्रखर गांधीवादी हिमांशु  उस इलाके के आदिवासियों के लिये दो दशकों से ’वनवासी चेतना आश्रम’ नामक संस्था बना कर काम कर रहे थे। उनके आश्रम को जबरन तरीके से पुलिस द्वारा बार-बार जमींदोज किया गया है। आदिवासियों पर हुई ज्यादतियों की सरकारी रिपोर्ट करने के एवज मे उन्हे भी राजसत्ता का शत्रु करार दिया गया। लिस्ट आगे भी है। मगर अहम्‌ बात यह है कि समाज के अंधेरे और उपेक्षित तबके के उत्थान के लिये काम करने वाले इन अहिंसक समाजसेवियों को सरकार द्वारा एक-एक कर निशाने पर लेते जाने से कितने लोगों मे उत्साह रह जायेगा वहाँ जा कर काम करने का? फिर उन तमाम वंचित और शिकार लोगों की आवाज कौन बनेगा इस मुल्क मे? कौन उन्हे बचा पायेगा हमारी अंधव्यवस्था का शिकार होने से? और वे लोग कब तक हमारे आर्थिक विकास की कीमत अपनी जमींन और जान से चुकाते रहेंगे?

     अहम्‌ बात यह भी है कि ये लोग सरकार की लोकहित की मंशा और उसकी काबिलियत पर सवाल खड़े करते हैं। ये सवाल तकलीफ़देह हैं। कैसे तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद राज्य मे गरीबी-रेखा से नीचे की जनसंख्या पिछले दशक भर मे 18 लाख से बढ़ कर 37 लाख हो गयी? खनिज संसाधनों के हिसाब से देश के सबसे अमीर राज्यों मे से एक मे किस वजह से 70 प्रतिशत से ज्यादा आबादी अपने बल पर पर्याप्त खाने को नही जुटा पाती? पिछले दशक से योजनाबद्ध भूमि-हड़प कार्यक्रम के बहाने कैसे राज्य की प्रचुर खनिज संपदा उद्योगपतियों और मुनाफ़ाखोरों के हवाले की जा रही है? सवाल और भी हैं!

   बात सिर्फ़ डॉ सेन के मुकदमे तक सीमित रहती तो अलग बात थी। आजादी के पिछले साठ सालों मे अगर हमने कोई चीज संजो कर रखी है, अगर किसी चीज पर हमारी सबसे ज्यादा आस्था रही है तो वह हमारा अच्छुण लोकतंत्र है। तमाम भीतरी-बाहरी उथल-पुथल राजनैतिक-सामाजिक परेशानियों के बावजूद किसी भी आम नागरिक का देश के लोकतांत्रिक मूल्यों मे भरोसा रहा है, लोकतंत्र की प्रक्रिया ने उम्मीद की शमा जलाये रखी कि तमाम समस्याओं का हल सिस्टम मे रहते हुए तलाशा जा सकता है! मगर इस लोकतंत्र का ढ़ाँचा पिछले कुछ वक्त मे जैसे कमजोर हुआ है और जिस तरह लोकतंत्र के स्तंभों की विश्वसनीयता खंडित हुई है वह देश के भविष्य के प्रति आशावादिता पर बड़ा प्रश्नवाचक चिह्न लगाती है। पिछले कुछ वक्त मे मुल्क के राजनैतिक तंत्र के प्रति हमारी आस्था लगभग खतम हो चुकी है, कि अब लाखों करोड़ के घोटाले भी हमारी आदी हो चुकी चेतना को आश्चर्यचकित नही कर पाते। ब्यूरोक्रेसी भ्रष्टाचार के सागर मे ऐसी आकंठ डूब चुकी है कि किसी सरकारी अधिकारी के भ्रष्ट न होने की बात हमें ज्यादा हैरान करती है। तो मीडिया के बड़े तबके के उद्योगपतियों और राजनीतिज्ञों के हाथ बिके होने की खबर इस बार सिस्टम की पतनशीलता का नया आयाम बन रही है। ऐसे कठिन वक्त मे ले-दे कर देश का न्याय-तंत्र यहाँ के हारे हुए आदमी की आँखों की आखिरी उम्मीद की लौ के तरह लगता था। ऐसे मे डॉ सेन जैसे उदाहरणों मे अदालत की विश्वसनीयता पर सवाल उठ जाना खतरनाक है। सरकार द्वारा उसको भी अपने फायदे के लिये इस्तेमाल किये जाने की घटनाएं इस उम्मीद के भी असमय बुझ जाने की आशंका बनती जा रही हैं।

   यह एक कठिन और अँधेरा समय है। इस साल ने गुजरते-गुजरते हमारी राजव्यवस्था की कुरूपतम होती जा रही शक्ल को आइना दिखा दिया है। अब पौने दो लाख करोड़ के टेलिकाम-घोटाले जैसे स्कैम्स हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का नियमित हिस्सा बन चुके हैं। हमें पता है कि उन घोटालों मे लिप्त ताकतवर नेताओं का इस देश की व्यवस्था कुछ भी बिगाड़ नही पायेगी। उनकी हिफ़ाजत के लिये कानूनी किताबों के तमाम लूप-होल्स हैं, देश के सबसे महँगे वकीलों की जोरदार फौज है, भष्ट और नाकारा हो चुका तंत्र है। हम जानते हैं कि इससे पहले कि कितने स्कैम्स या तो कभी खुले ही नही और अगर खुले तो उनकी फ़ाइलें वक्त के साथ दीमकें चाट गयीं। हमें पता है कि देश मे पॉलिटिक्स-ब्यूरोक्रेसी-इंडस्ट्रियलिस्ट्स-मीडिया का खतरनाक गठजोड़ दिनों-दिन मजबूत ही होगा और देश के संसाधनों पे उनकी लूट-बाँट दिनों-दिन बढ़ती ही जायेगी। हमे मालूम है कि राजा जैसे मिनिस्टर्स चेन्नई-हाइ-कोर्ट के न्यायमूर्ति आर रघुपति जैसे जजों को आगे भी धमकाते रहेंगे और उनकी शिकायत कहीं सुनी नही जायेगी! हमें यह भी पता है कि अगर कर्नाटक के लोकायुक संतोष हेगड़े जैसा कोई ईमानदार अफ़सर सरकारी अंधेरगर्दी की जाँच जैसा कदम उठायेगा भी तो उसके रास्ते मे अगम्य रोड़े खड़े कर दिये जायेंगे और अंततः कुछ नतीजा नही होगा। हम जानते हैं कि देश का कृषि मंत्री आगे भी खेल की पालिटिक्स मे बेशर्मी से बिजी रहेगा और उसके ही राज्य के किसान थोक के भाव आत्महत्या करते रहेंगे। हम यह भी जानते हैं कि देश का मीडिया आगे भी सत्ता और बाजार के सावन के झूलों मे पींगे लेता रहेगा और हमे सावन के अंधों के तरह हर तरफ़ हरा ही दिखाया जायेगा। हमें अंदाजा है कि मुल्क के कुछ लोगों को अरबपति बनाने के वास्ते बाकी के करोड़ो लोग गरीबी-रेखा के नीचे खिसकते रहेंगे, कि उद्योगपतियों के आरामगाहों के बनाने का बजट जितना बढ़ता रहेगा, मुल्क मे भूमिहीन होते लोग उसी अनुपात मे बढ़ते रहेंगे। हमें पता है कि आगे भी हमें देश की आठ से दस फ़ीसदी दर से बढ़ती अर्थव्यवस्था के स्लोगन दिखा कर उन स्लोगन्स के पीछे के अंधेरे को हमारी अज्ञानता से ढँक दिया जायेगा! हम जानते हैं कि अगले सालों मे भी हमें खुद को व्यस्त रखने के लिये मुन्नी की बदनामी और शीला की जवानी मे से ज्यादा उत्तेजक क्या है जैसे सवालो के जवाब एस एम एस करने को मिलते रहेंगे? मगर, आज लोकतंत्र के सबसे बड़े वार्षिक उत्सव से कुल अट्ठाइस दिन दूर खडे हुए हम यह भूले जाते हैं कि हमारे मिडिल-क्लासीय ’हू-केयर्स-एट्टीट्यूड’ के विषदंश से ग्रसित हमारा लोकतंत्र पल-पल कोमा मे जाता दिखता है।

   तो आइये हम अपने-अपने ड्राइंग-रूमों मे टीवी पर चलते चार्टबस्टर गानों का वोल्यूम इतना तेज कर दें कि हमें शहरी चकाचौंध के बाहर से आती चीखें सुनाई न दें!...कि हमारे वक्त के कान इतने बहरे हो जायें कि किसी बिनायक सेन जैसे सिरफिरे लोगों की आवाजें हमारे आनंद मे बाधक न बने।..आइये इस पल मे ही जिंदगी को भरपूर जी लें, क्या पता आदमखोर होते जा रहे तंत्र के अगले शिकार हम ही हों !

Tuesday, July 27, 2010

एक भूमिका और रिल्के का पहला ख़त

   यूरोप के विएना शहर की सन्‌ 1888 के पतझड़ की एक शाम।

  बलूत के पेड़ तले झड़ती पत्तियों के बीच एक कमजोर और दुबला सा लड़का उदास बैठा हुआ था। अपने कुल तेरह साल के जीवन के धूसर से रंगों के बीच उलझा, हताश। अपने ही अनबुझ सवालों से परेशान, कि आखिर जिंदगी उससे चाहती क्या है? वो अपनी जिंदगी से क्या चाहता है? ..और उसके माँ-बाप क्या चाहते हैं उससे? पिता, जो फ़ौज की नौकरी पूरी लगन से करने के बावजूद कोई खास ओहदा हासिल नही कर पाये थे, अपने बेटे को फ़ौज का बहुत बड़ा ऑफ़िसर बनाना चाहते थे। वहीं अभिजात्य संस्कारों वाली माँ अपनी पहली संतान जो कि बेटी थी, के असमय गुजर जाने से इतना व्यथित रहती थीं, कि अपने बेटे को एक लड़की की तरह रखती थीं। यहाँ तक कि उसका बचपन लड़कियों वाले पहनावों और लड़कियों वाले नामों के साथ बीता था।


   अपने पिता की प्रछन्न महत्वाकाँक्षा के बोझ तले वह ग्यारह साल की उम्र मे ही घर से बहुत दूर वियेना की उस मिलिट्री अकादमी मे पहुँचा दिया गया था, जो कि अपनी कठिन जीवन-शैली और कठोर अनुशासन के लिये प्रख्यात था। मगर उसके कच्चे मन की मिट्टी सैन्य-प्रशिक्षण की दहकती भट्ठी मे तप कर एक आर्मी ऑफ़िसर मे ढल जाने के लिये नही बनी थी। उसका संवेदनशील मन तो तितलियों के सतरंगे परों, सुबह के शर्माये गालों की लाली या घास की नोक पर उनींदी पड़ी ओस के दिवास्वप्नों मे ही रमा रहता था। नतीजन अकादमी का कठोर अनुशासन उसके कृशकाय शरीर और उससे भी नाजुक मन को चक्की सा पीसे डाल रहा था। अपनी दमतोड़ कोशिशों के बावजूद भी वह शारीरिक कार्य-कलापों, खेल-कूद, कसरत जैसे विषयों मे हर बार फ़िसड्डी रहता था। गुस्सैल शिक्षकों की निरंतर डाँट-फटकार और खिल्ली उड़ाते साथियों के बीच वह बहुत एकाकी होता जा रहा था, खुद के भीतर गुम (हाँ, और यहतारे जमीं परसे करीब सवा सौ साल पहले की बात है) और ऐसे दमघोंटू माहौल मे उसे बस एक चीज का हारा मिला, कविता का। उदासी के गहन क्षणों मे उसकी कापियों के पिछले पन्ने तमाम अनगढ़ और कच्ची कविताओं से भर जाते थे। उसके सारे सुख-दुःख, अनगिन शिकायतें, सारा अवसाद, तमाम अकेलेपन के आँसू शब्दों मे ढल कर कविता के रास्ते बहने लगते थे। और अकादमी के कठोर प्रशिक्षण की जितनी असफ़लता, जितनी उपेक्षा और निराशा उसके शरीर को बीमार और जिंदगी को तकलीफ़देह बनाती जाती थी, उतना ही उसका मन साहित्य और किताबों मे रमता जाता था।


  खैर, अकादमी के पाँच कष्टकर सालों की असफ़लता और उसकी खराब होती तबियत के बीच जब पिता को यह समझ गया कि उसका बेटा फ़ौज की कठोर जिंदगी के काबिल नही है, तब हार कर उन्होने उसे अकादमी से निकाल लिया। आगे की पढ़ाई करते हुए अगले कुछ सालों मे वह तमाम यूरोप की खाक छानता रहा। अपनी जिंदगी के उन्ही सवालों की तलाश मे, कि आ्खिर उसका प्रारब्ध कहाँ है! मगर जिंदगी तो उस सवाल का जवाब पहले ही चुन चुकी थी। साँझ के उस टिमटिमा्ते तारे को बीसवी सदी के साहित्यिक आकाश के सबसे चमकदार सितारों मे से एक होना था।


   यहाँ हम बात कर रहे हैं रेनर मारिया रिल्के की, जो जर्मन भाषा के सबसे प्रतिभाशाली और विख्यात साहित्यकारों मे माने जाते हैं। एक ऐसा कवि जो अपने साहित्य मे, अपनी कविताओं मे जीता था, अपनी कविताओं के लिये जीता था। एक कवि जिसमे कविताएँ जीती थीं, साँस लेती थीं। रिल्के अबुझ मानवीय संवेदनाओं के ऐसे कुशल चितेरे थे, जिनकी कविताएँ हमारे अंतर्मन के सबसे गहरे धरातल को स्पर्श करती हैं, मन के सबसे अँधेरे कोनों मे रोशनी करती हैं। उनकी कविताएँ एक उत्सुक बच्चे की तरह आस-पास की हर चीज के बारे मे सवाल करती हैं, दुनिया के बारे मे, प्रकृति के बारे मे, ईश्वर के बारे मे, हमारे होने के बारे मे। मगर कविूताओं के केंद्र मे सृष्टि का सबसे मूलभूत भाव होता है, प्रेम। एक सूफ़ियाना किस्म का प्रेम, जिसमे से यह सृष्टि आकार लेती है और उसी मे विलीन हो जाती है।


    रिल्के के मिलिट्री अकादमी के वक्त के करीब बारह वर्षों के बाद 1902 मे फिर एक बार अकादमी के उसी बलूत के पेड़ के नीचे एक लड़का उदास सा बैठा है। हाथ मे अपनी कविताएँ लिये, जो कि पत्रिकाओं से खारिज हो कर वापस गयी थी। उसके सामने भी भविष्य की यही उलझन है, कि क्या वो फ़ौज का सम्मानित और ओहदेदार भविष्य चुने, जिसके लिये वह अकादमी मे भर्ती हुआ है, या फिर कविता का रास्ता चुने, जो उसके मन के लिये अधिक तुष्टिदायक और आत्मा के करीब है? और ऐसे मे अपने प्रोफ़ेसर के द्वारा उसे पता चलता है रिल्के का नाम, जो कि पंद्रह वर्ष पहले इसी जगह पर इन्ही परिस्थितियों और सवालों से गुजर चुके थे। बस फिर फ़्रैंज कापुस नाम का वह लड़का अपनी सारी उलझनें ख़त मे लिख कर और अपनी कुछ कविताओं के साथ रिल्के को भेज देता है। उस ख़त को पढ़ कर रिल्के को उस लड़के मे अपना पंद्रह साल पहले का अक्स नजर आता है। निराशा और अनिश्चितता के गहरे भँवर मे फ़ँसे लड़के का मार्गदर्शन करना उनको अपना दायित्व महसूस होता है। और वे अपना स्नेहपूर्ण मगर ईमानदार प्रत्युत्तर उसको भेज देते हैं। फिर तो ख़तो-क़िताबत का यह सिलसिला चल निकलता है। और नतीजन सामने आती है रिल्के के दस अविस्मरणीय पत्रों की वह अद्भुत श्रंखला, जो रिल्के के निधन के बाद उसी फ़्रैंज कापुस के प्रयासों से पुस्तकाकार रूप मे प्रकाशित हुए, ’लेटर्स टु यंग पोएट नाम से।


   यह दस पत्र विश्व-साहित्य की वह अनमोल धरोहर हैं, जिनकी प्रासंगिकता इनके लिखे जाने के एक सदी बाद भी और ज्यादा बढ़ती ही गयी है। साहित्य, कला, प्रेम, एकाकीपन, आस्तिकता, दर्शन, जीविका जैसे तमाम जरूरी विषय हर वक्त की पीढ़ी के लिये उतने ही प्रासंगिक होते हैं। इसीलिये जिंदगी के ऐसे तमाम पहलुओं पर रोशनी डालते हुए यह पत्र सौ सालों के बाद भी उतने ही प्रेरणाप्रद, उतने ही मार्गदर्शक हैं, जितने कि कभी फ़्रैंज कापुस के लिये रहे होंगे। इन्हे पढ़ते हुए हम खुद अपनी जिंदगी के तमाम मुश्किल सवालों के जवाब इन ख़तों के जरिये तलाश पाते हैं। इन ख़तों के बहाने इस जीनियस के विचारों को पढ़ते वक्त यह यकीं कर पाना मुश्किल होता है कि यह एक सिर्फ़ सत्ताइस साल के युवा कवि के विचार हैं।


   रिल्के के बारे मे हम दोबारा कभी भी ढेरों बाते करेंगे, फ़िलहाल बैरंग विचारों को पनाह देते इस ब्लॉग की शुरुआत हम रिल्के की इसी पत्र-श्रंखला के सबसे पहले ख़त से कर रहे हैं। इसका अंग्रेजी अनुवाद जॉन बुर्न्हम ने किया था, जिसको अनगढ़ हिंदी मे आपके सामने रखने का एक कच्चा प्रयास किया गया है। अगर वक्त ने साथ दिया तो श्रंखला के दूसरे पत्रों को भी साझा करने की कोशिश करूँगा, फिलहाल देखते हैं रिल्के का फ़्रैंज को पहला पत्र जो उन्होने उस युवा कवि को जवाब देते वक्त तब लिखा था, जब फ़्रैंज ने उन्हे अपनी कविता, आलोचना और जीवन संबंधी दुविधाएँ खत मे अपनी कुछ कविताओं के साथ लिख भेजी थीं। रिल्के का यह ख़त एक नवोदित कवि-मन की उलझन ही नही वरन्आज के युवा की कैरियर संबंधी तमाम दुविधाओं को सुलझाने मे भी मदद करता है।

रेनर मारिया रिल्के का पहला पत्र फ़्रैंज कापुस के नाम

पेरिस
17 फ़रवरी 1903
मान्यवर

   आपका पत्र मुझे कुछ दिन पहले ही मिला था। इसमे आपने मुझ पर जो प्यार भरा विश्वास जताया है, इसके लिये मैं आपका बेहद शुक्रगुजार हूँ। मैं इससे ज्यादा क्या कहूँ? मैं आपकी कविताओं की शैली पर कोई टिप्पणी नही कर सकता हूँ; आलोचना मेरे स्वभाव का हिस्सा नही है। किसी कला-कर्म के लिये आलोचनात्मक शब्दों से ज्यादा गैरजरूरी कुछ भी नही होता। क्योंकि अक्सर वो कोई दुर्भाग्यपूर्ण गलतफ़हमी ही पैदा करते हैं, कभी कुछ कम या कभी ज्यादा। चीजें अक्सर उतनी स्पष्ट नही होतीं, जितना आसान कि लोग आमतौर पर उन्हे मान लिया करते हैं, ही उनको व्यक्त कर पाना इतना सरल ही होता है। देखा जाय तो हमारी तमाम अनुभूतियाँ अक्सर अभिव्यक्ति के दायरे के बाहर होती हैं, हमारे शब्दों की दुनिया से परे। और उन सबसे भी ज्यादा शब्दातीत चीज होती है कला, या कला-कर्म, जिनका रहस्यमय अस्तित्व हमारे तनिक से जीवन से बहुत ज्यादा लम्बा होता है।

    शुरुआत मे ये सारी बातें कह देने के बाद अब मैं आप से यह बोल पाने की हिमाकत कर सकता हूँ, कि आपकी रचनाओं की अभी कोई अपनी व्यक्तिगत शैली नही है। फिर भी उनमे कुछ बेहद निजी भावों को व्यक्त कर पाने की एक मूक सी अंतर्निहित चाह झलकती है। खासकर आपकी आखिरी कविता ’My Soul' मे मैने यह बात महसूस की है। जिसमे आपका कोई अंदरूनी भाव खुद को व्यक्त करने के लिये, शब्दों मे ढल पाने के लिये व्याकुल है। ऐसे ही आपकी खूबसूरत कविता ’To Leopardi' मे भी कुछ है, कोई महानता के निकट का एकाकी सा भाव, पूर्णता की हद तक पहुँचने को बेकरार। मगर फिर भी आपकी रचनाएँ स्वयं मे स्वतंत्र नही हैं, सो उत्कृष्टता की हद तक नही पहुँच पाती हैं। आखिरी वाली और लियोपार्डी वाली भी नही। साथ मे भेजे अपने स्नेहिल पत्र मे आप भी अपनी उन कमियों का जिक्र करना और उन्हे स्वीकार करना नही भूले हैं; जिन्हे मैं आपकी कविता पढ़ कर महसूस तो कर सकता था, मगर शायद शब्द नही दे पाता।

  आपने पूछा है कि आपकी कविताएँ अच्छी हैं या नही। आप अन्य लोगों से भी यह बात पूछ चुके हैं। आप दूसरों की कविताओं से भी इनकी तुलना करते रहते हैं। आपने इन्हें प्रकाशकों के पास भी भेजा है। और जब कुछ प्रकाशकों ने इन्हे खारिज कर दिया तो आप काफ़ी निराश भी हुए। अच्छा, जब आपने मुझे इतनी इजाजत दे दी है कि मैं आपको सलाह दे सकूँ तो मैं आपसे एक बात ही कहूँगा: यह सारी चीजें तुरंत बंद कर दीजिये। अपने काम के मूल्यांकन के लिये अभी आप बाह्य-जगत को और दूसरे लोगों की ओर देख रहे हैं। आपको ऐसा नही करना चाहिये। आपको कोई सलाह नही दे सकता, कोई आपकी मदद ही कर सकता है।

   इसके लिये सिर्फ़ एक ही तरीका है: खुद मे झाँकने का ! उस कारण की तलाश करिये, उस प्रेरक-तत्व की, जो आपको लिखने के लिये बाध्य करता है। उसे इस कसौटी पर परखिये: क्या उस प्रेरणा की जड़े आपके हृदय के सबसे गहरे कोनों तक पहुँचती हैं? क्या यह बात आप यकीन के साथ कह सकते हैं कि अगर आप को लिखने दिया जाय तो आप जीवित नही रह पायेंगे? और सबसे ज्यादा, रात के सबसे शांत प्रहर मे आप खुद से यह सवाल करें कि क्या आपके लिये लिखना इतना ही जरूरी है? फिर इस सवाल का सच्चा जवाब अपने भीतर की गहराई मे जा कर तलाशिये। और अगर इस सवाल का जवाब आप एक विश्वास भरेहाँमे पाते हैं, तब अपनी जिंदगी को इसी जवाब के इर्द-गिर्द तैयार कीजिये। अब यह आपके जीने की वजहों मे शामिल हो जाती है। आपकी जिंदगी, अपने सबसे सामान्य और उपेक्षणीय पलों मे भी इसी जरूरत की गवाह और इसी उत्कट लालसा की निशानी होगी|

   अब खुद को प्रकृति के नजदीक लाने की कोशिश करें। कल्पना करें कि आप इस स्रष्टि के पहले मनुष्य हैं। अब आपने जो देखा है, जो अनुभव किया है उसे अपने शब्द दीजिये। लिखिये कि आपने क्या हासिल किया है, क्या खोया है। और हाँ, प्रेम कविता मत लिखें, कम से कम शुरुआत मे तो नही। क्योंकि वो एक बड़ी चुनौती की तरह होती हैं। अपनी उन व्यक्तिगत अनुभूतियों को शब्द देने के लिये बहुत काव्य-कौशल चाहिये, लेखनी मे परिपक्वता चाहिये। खासकर तब, जब इस बारे मे पहले ही इतना बेहतरीन और इतना ढेर सारा लिखा जा चुका है। आपको सामान्य और चलताऊ विषयों से सावधान रहने की जरूरत है। बल्कि आप उन चीजों को पकड़िये जो आपकी रोजमर्रा की जिंदगी मे घुली होती हैं; जैसे अपने दुःख, अपनी ख्वाहिशें, आते-जाते ख्यालात, और सबसे ज्यादा तमाम चीजों की खूबसूरती मे आपकी आस्था। यह सब आपको लिखने की विषय-वस्तु देंगे। ऐसी चीजों का उल्लेख अपनी उत्साहपूर्ण, मौन एवं एकनिष्ठ ईमानदारी से करें। अपने आसपास की चीजें, अपने सपनों के दृश्य-चित्र, अपनी स्मृतियों के संकेत, इन सब चीजों का इस्तेमाल स्वयं को अभिव्यक्त करने मे करें।

   अगर आपको ऐसा लगता है कि आपकी रोजमर्रा की जिंदगी मे कुछ भी ऐसा महत्वपूर्ण नही है, जिसका जिक्र किया जा सके; तो इसका दोष जिंदगी को नही वरन्खुद को दीजिये। खुद पर कुसूर दीजिये कि जीवन की इस अतुल संपदा को बरत पाने भर का कवित्व आपके भीतर नही पाया है। एक स्रजनशील कलाकार के लिये कहीं भी दरिद्रता नही होती, कोई भी चीज महत्वहीन नही होती, कुछ भी निरर्थक नही होता है। जैसे मानो कि आप अगर किसी जेल मे भी हैं, जहाँ की दीवारें बाहरी दुनिया की सारी हलचलों को आप तक पहुँचने से रोक लेती हैं; तब भी क्या अपने बचपन की अमूल्य स्मृतियों की अथाह संपदा आपके पास नही है? अपना ध्यान उसकी ओर केंद्रित करें। विगत अतीत की उन विस्मृत संवेदनाओं को जगा्यें। आपका विश्वास बढ़ेगा। और आपके एकाकीपन का दायरा विस्तृत हो कर आपके घर जैसा हो जायेगा, एक शांत सी भोर के मानिंद। ऐसा कि तमाम दुनियावी शोर दूर से ही दबे-पाँव गुजर जायेगा, आपको परेशान किये बिना।

   इस तरह आपके आत्ममुखी होने से, अपने अंदर की दुनिया मे डूब जाने से, अगर कविता जन्म लेती है; तब आपको किसी से यह पूछने की जरूरत नही महसूस होगी कि वो अच्छी है या नही। तब आपको पत्रिकाओं के प्रकाशकों की राय भी जरूरत नही होगी। क्योंकि तब आप उस कविता मे अपनी खुद की आवाज सुन सकेंगे, अपनी जिंदगी का अक्स देख सकेंगे। यही आपके जीवन की नैसर्गिक निधि होगी। कला तभी श्रेष्ठ होती है, जब वह किसी जरूरत से जन्म लेती है। उसका यह उसका यह उद्गम, यह प्रयोजन ही कला की मूलभूत कसौटी होता है, और कोई नही।

   इसलिये मेरे प्यारे दोस्त, मैं आपको सिर्फ़ यही एक सलाह दे सकता हूँ, अपने अंदर झाँकिये और अंतस्के उस स्रोत की गहराई मापिये जहाँ से जिंदगी की जड़ें फूटती हैं। इसी स्रोत मे आपको अपने इस सवाल का जवाब मिलेगा, कि क्या लिखना आपकी जरूरत है! इस उत्तर को स्वीकार कीजिये, बिना तर्क किये, चाहे आपको यह कैसा भी लगे। और क्या पता शायद आप के सामने यही स्पष्ट हो जाये कि आप लिखने के लिये बने हैं। यदि ऐसा हो तो अपनी इस नियति को स्वीकार कीजिये, इसके भार को वहन्कीजिये और इसकी महानता को भी, किसी सम्मान की अपेक्षा किये बिना। एक स्रजनशील कलाकार के अंतर्जगत मे उसकी अपनी एक दुनिया होती है, उसे सारी चीजें वहीं तलाशनी होती हैं, या फिर उस प्रकृति मे जो उसके जीवन का मूल आधार रही है।

  यह संभव है कि अपने भीतर उतरने के बाद, और अपने अंतस्के निविड़ एकांत को तलाश लेने के बाद भी आप यह महसूस करें कि आपको लेखन-कर्म से विरत होना होगा। जैसा कि मैने कहा था कि यदि लेखन-कर्म आपके जीवित रहने का कारण नही बन जाता है तो आपको लेखन से विरत ही रहना चाहिये। मगर फिर भी आत्मलीन होने की यह प्रक्रिया, जिससे गुजरने की गुजारिश मैने आपसे की है, आपके लिये व्यर्थ नही जायेगी। क्योंकि तब आपका जीवन अपने लिये और ज्यादा अनुकूल मार्ग चुन सकेगा। जो आपको समृद्धि और विकास की ओर ले जायेंगे, जिनकी अकथनीय कामना मैं आपके लिये करता हूँ।

   इसके अतिरिक्त मैं आपसे क्या कहूँ? मुझे लगता है कि सारी जरूरी बातें अपने महत्व के हिसाब से कही जा चुकी हैं। अपनी विकास-प्रक्रिया मे आप पूरी गंभीरता और संयम के साथ आगे बढ़ते रहें, बस यही मेरा मंतव्य था। लेकिन आपका यह विकास बाधित हो सकता है, अगर आप बाह्यजगत की ओर देखते हैं; अगर आप अपने उन सवालों के जवाब बाहरी दुनिया मे तलाशते हैं। वो सवाल, जिनके जवाब शायद आपका अंतर्मन समय के सबसे मौन प्रहर मे आपको दे सके।

   आपके खत मे प्रोफ़ेसर होरासेक का जिक्र देख कर मुझे निहायत ही खुशी मिली। उनके जैसे विद्वान मगर विनम्र व्यक्ति के लिये मेरे मन मे अच्क्षुण श्रद्धा है। क्या आप मेरी भावना उन तक पहुँचा सकेंगे? यह उनकी विनम्रता ही है कि अभी भी वो मेरा स्मरण करते हैं, और मैं उनका कृतज्ञ हूँ।

  मैं आपकी कविताएँ आपको लौटा रहा हूँ, जो आपने मुझ पर विश्वास कर के भेजी थीं। मुझमे बिना शर्त हार्दिक आस्था दिखाने के लिये आपका शुक्रिया कहते वक्त मै अभिभूत हूँ। इसीलिये मैने और अपनी पूरी ईमानदारी और सामर्थ्य से खुद को आपके लिये एक अजनबी से ज्यादा उपयोगी साबित हो पाने कोशिश की है।
आपका
रेनर मारिया रिल्के
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