Showing posts with label इंटरनेशनल डाक. Show all posts
Showing posts with label इंटरनेशनल डाक. Show all posts

Tuesday, June 11, 2013

What tнē #$*! D̄ө ωΣ (k)πow!?


डाकिये के ओर से :  हम सोचते है कि हम बहुत बड़े देश भक्त हैं, बहुत बड़े प्रेमी हैं, बहुत बड़े पापी हैं, हमने ये किया है, हमने वो किया है। हम ये नहीं कर पाए, हम ऐसे नहीं जी पाये। हमने ऐसे जिया, हमने ये खाया, हमने ये पहना। हम ये भी सोचते हैं, हमें एक दिन मर जाना है।  और ये सब सोच चुकने के बाद एक दिन हम कहते हैं, "मेरी आँखें खुल गयी मैंने तो कुछ भी नहीं किया।" पर ये सोचना भी इगो का शुष्मतम रूप ही ठहरा। अंत में पता लगता है, कि किया तो सब कुछ गया है, पर जिसने किया वो मैं नहीं था। मृत्यु तो होगी पर मेरी नहीं। पता लगता है कि जिसे, जिन चीजों को, इस कथित समाज ने इतना ऊँचा  दर्जा दिया है, वो भी इगो का ही एक रूप है। वीरता, आज़ादी, देशभक्ति,परोपकार। पता लगता है कि समाज खुद एक इगो है। शुद्ध इगो। प्रक्षेपण। हमारे विचारों का। केवल सोच आपकी दुनिया को बनाती है। और सोच के पार? कुछ नहीं? 
ना... ना...
...'कुछ नहीं' भी नहीं।

पिछले कुछ दिनों में कई मिस्टिक कवियों से दो चार हुआ हूँ, पेसोवा, एड्रिएन सिसिल रिच, रोबेर्टो जुराज़ो, कबीर, फरीद, रूमी। 
पर जिसने पढ़ा इनको वो मैं न था। 






We create our own reality




प्रॉसपेक्टिव इमिग्रेंट प्लीज़ नोट (प्रस्तावित अप्रवासी कृपया ध्यान दें)

दो ही सम्भावनाएँ हैं
या तो आप इस द्वार से जाओगे, या नहीं जाओगे

इस द्वार से गुजर चुकने के बाद हमेशा ही एक जोखिम बना रहेगा तुम्हारे साथ
अपना नाम याद रखने का जोखिम
हर वस्तु तुम्हें घूरने लगेंगी
और फिर प्रत्युतर में तुम्हें भी उन्हें देखना होगा
उन्हें, उन चीज़ों को, हो जाने देना होगा

और यदि तुम इस द्वार से नही गुज़रते
तुम्हारे लिए एक सम्पूर्ण जीवन जीना सम्भव है
सम्भव है अपनी प्रवृति को बनाये रखना
अपनी प्रतिष्ठा को सम्भाले रखना 
वीरता पूर्वक मृत्यु को स्वीकार करना
आदि, आदि 

लेकिन बहुत कुछ तुमको अँधा बनाएगा
बहुत कुछ तुमसे बच निकलेगा
किस कीमत पर, कौन जाने ?

ये द्वार अपने आप में कोई वचन नहीं देता,
वस्तुतः , ये मात्र एक द्वार है। 


                                           -एड्रिएन सिसिल रिच

___________________________________________________

PS: राँझना का म्युज़िक रिव्यू अगली पोस्ट से ज़ारी 

Monday, April 22, 2013

जलवायु नहीं, व्यवस्था बदलो


डाकिए की ओर से:    दिल की बात और माकूल मौजू। ह्यूगो शावेज फ्रियास के साम्राज्यवाद के खिलाफ संदेश की तरह इसे भी टाइप करके लगाता लेकिन थोड़ी देर हो जाती। संयोग से आज पृथ्वी दिवस के मौके पर यह सन्देश इन्टरनेट पर मिल गया। शावेज के इस संदेश को पढ़ें तो लगता है कि कई बार समस्या वहां नहीं होती जहां दिखती है। यह दोगलापन ही है कि हमारे देश में आतंकवाद लाल आतंकवाद। तुम्हारे देश में आतंकवाद पीला आतंकवाद। और अगर अपने हित में है तो वहीं का पीला आतंकवाद हमारे लिए हरा आतंकवाद। बहरहाल..... बात जलवायु की हो रही है। ज़रा शावेज से जानते हैं दुनिया की हकीकत। तिरछी स्पेलिंग का तहे दिल से धन्यवाद। सुंदर अनुवाद के लिए संदीप सिंह सहित अप्रैल अंक, 13 के समकालीन जनमत का भी धन्यवाद।

*****

अध्यक्ष महोदय, देवियों और सज्जनों, राष्ट्राध्यक्षों और दोस्तों, मैं वादा करता हूं कि उतना लंबा नहीं बोलूंगा जितना कि आज दोपहर यहां बहुत सारे लोग बोले हैं। ब्राजील, चीन, भारत और बोलीविया के प्रतिनिधियों ने यहां अपना पक्ष रखते हुए जो कहा है, मैं भी अपनी बात की शुरूआत वहीं से करना चाहता हूं। मैं उनके साथ ही बोलना चाहता था, पर शायद तब यह संभव नहीं था। बोलीविया के प्रतिनिधि ने यह बात रखी, इसके लिए मैं बोलीविया के राष्ट्रपति कॉमरेड इवो मोरालेस को सलाम करता हूं। तमाम बातों के बीच उन्होंने कहा कि जो दस्तावेज यहां रखा गया है, वह न तो बराबरी पर आधारित है और न ही लोकतंत्र पर।

इससे पहले के सत्र में जब अध्यक्ष यह कह ही रहे थे कि एक दस्तावेज यहां पेश किया जा चुका है, तब बमुश्किल मैं यहां पहुचा ही था। मैंने उस दस्तावेज की मांग भी की, पर वह अभी भी हमारे पास नहीं है। मुझे लगता है कि यहां उस ‘टॉप सीक्रेट’ दस्तावेज के बारे में कोई भी कुछ नहीं जानता है। यहां बराबरी और लोकतंत्र जैसा कुछ भी नहीं है, जैसा कि बोलीवियन कॉमरेड ने कहा था। पर दोस्तों, क्या यह हमारे समय और समाज की एक सच्चाई नहीं है? क्या हम एक लोकतांत्रिक दुनिया में रह रहे हैं? क्या यह दुनिया सबकी और सबके लिए है? क्या हम दुनिया के वर्तमान तंत्र से बराबरी या लोकतंत्र जैसी किसी भी चीज की उम्मीद कर सकते हैं? सच्चाई यह है कि इस दुनिया में, इस ग्रह में हम एक साम्राज्यवादी तानाशाही के अंदर जी रहे हैं। और इसीलिए हम इसकी निंदा करते हैं। साम्राज्यवादी तानाशाही मुर्दाबाद! लोकतंत्र और समानता जिंदाबाद!

और यह जो भेदभाव हम देख रहे हैं, यह उसी का प्रतिबिंब है। यहां कुछ देश हैं, जो खुद को हम दक्षिण के देशों से, हम तीसरी दुनिया के देशों से, अविकसित देशों से श्रेष्ठ और उच्च मानते हैं। अपने महान दोस्त एडवर्डो गेलियानो के शब्दों में कहूं तो ‘हम कुचले हुए देश हैं, जैसे कि इतिहास में कोई ट्रेन हमारे ऊपर से दौड़ गई हो’। इस आलोक में यह कोई बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि दुनिया में बराबरी और लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। और इसीलिए आज फिर से हम साम्राज्यवादी तानाशाही से दो-चार हैं। अपना विरोध दर्ज कराने के लिए अभी दो नौजवान यहां खड़े हो गए थे, सुरक्षा अधिकारियों की सावधानी से मामला सुलझ गया। पर क्या आपको पता है कि बाहर ऐसे बहुत सारे लोग हैं। सच यह है कि उनकी संख्या इस सभागार की क्षमता से बहुत-बहुत ज्यादा है। मैंने अखबार में पढ़ा है कि कोपेनहेगन की सड़कों पर कुछ गिरफ्तारियां हुईं हैं, और कुछ उग्र प्रतिरोध भी दर्ज कराये गए हैं। मैं उन सारे लोगों को, जिनमें से अधिकांश युवा हैं, सलाम करता हूं।

सच यह है कि ये नौजवान लोग आने वाले कल के लिए, इस दुनिया के भविष्य के लिए हमसे कहीं ज्यादा परेशान और चिंतित हैं, और यह सही भी है। इस सभागार में मौजूद हम में से अधिकांश लोग जिंदगी की ढलान पर हैं, जबकि इन नौजवान लोगों को ही आने वाले कल का मुकाबला करना है। इसलिए उनका परेशान होना लाजिमी है।

अध्यक्ष महोदय, महान कार्ल माक्र्स के शब्दों का सहारा लेकर कहूं तो एक भूत कोपेनहेगन को आतंकित कर रहा है। वह भूत को कोपेनहेगन की गलियों को आतंकित कर रहा है और मुझे लगता है कि वह चुपचाप इस कमरे में हमारे चारों तरफ भी टहल रहा है, इस बड़े से हॉल में, हमारे नीचे और आसपास; यह एक भयानक और डरावना भूत है और लगभग कोई भी इसका जिक्र नहीं करना चाहता। यह भूत, जिसका जिक्र कोई भी नहीं करना चाहता, पूंजीवाद का भूत है।

बाहर लोग चीख रहे हैं कि यह भूत पूंजीवाद ही है, कृपया उन्हें सुनिए। बाहर सड़कों पर नौजवान लड़कों और लड़कियों ने जो नारे लिख रखे हैं, उनमें से कुछ को मैंने पढा है। इन्हीं में से कुछ को मैंने अपनी जवानी में भी सुना था। पर इनमें से दो नारों का जिक्र मुझे जरूरी लग रहा है, आप भी उन्हें सुन सकते हैं- पहला, ‘जलवायु को नहीं, व्यवस्था को बदलो (डोंट चेंज द क्लाइमेट, चेंज द सिस्टम)।

इसलिए मैं इसे हम सबके लिए चुनौती के तौर पर लेता हूं। हम सबको सिर्फ जलवायु बदलने के लिए नहीं, बल्कि इस व्यवस्था को, इस पूंजी के तंत्र को बदलने के लिए प्रतिबद्ध होना है। और इस तरह हम इस दुनिया को, इस ग्रह को बचाने की शुरूआत भी कर सकेंगे। पूंजीवादी एक विनाशकारी विकास का मॉडेल है, जो जीवन के अस्तित्व के लिए ही खतरा है। यह संपूर्ण मानव जाति को ही पूरी तरह खत्म करने पर आमादा है।

दूसरा नारा भी बदलाव की बात करता है। यह नारा बहुत कुछ उस बैंकिंग संकट की ओर संकेत करता है, जिसने हाल ही में पूरी दुनिया को आक्रांत कर रखा था। यह नारा इस बात का भी प्रतिबिंब है कि उत्तर के अमीर देशों ने किस हद तक जाकर बड़े बैंकों और बैंकरों की मदद की थी। बैंकों को बचाने के लिए अकेले अमेरिका ने जो मदद की थी, मैं उसके आंकड़े भूल रहा हूं, पर वह जादुई आंकड़े थे। वहां सड़क पर नौजवान लड़के और लड़कियां कह रहे हैं कि जलवायु एक बैंक होती तो इसे जाने कब का बचा लिया गया होता (इफ द क्लाइमेट वॅर अ बैंक, इट वुड हेव वीन सेव्ड ऑलरेडी)।

और मुझे लगता है कि यह सच है। अगर जलवायु दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में से एक होती तो अमीर सरकारों द्वारा इसे अब तक बचा लिया गया होता।

मुझे लगता है कि ओबामा अभी यहां नहीं पहुचे हैं। जिस दिन उन्होंने अफगानिस्तान में निर्दोष नागरिकों को मारने के लिए 30 हजार सैनिकों को भेजा, लगभग उसी दिन उन्हें शांति के लिए नोबल पुरस्कार भी मिला। और अब संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति शांति के नोबल पुरस्कार के साथ यहां शामिल होने आ रहे हैं। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका के पास पैसा और डॉलर बनाने की मशीन है और उसे लगता है कि उसने बैंकों और इस पूंजीवादी तंत्र को बचा लिया है।

वास्तव में यही वह टिप्पणी थी जो मैं पहले करना चाहता था। हम ब्राजील, भारत, चीन और बोलीविया के दिलचस्प पक्ष का समर्थन करने के लिए अपना हाथ उठा रहे थे। वेनेजुएला और बोलिवर गठबंधन के देश इस पक्ष का मजबूती से समर्थन करते हैं। पर क्योंकि उन्होंने हमें वहां बोलने नहीं दिया, इसलिए अध्यक्ष महोदय, कृपया इसको मिनट्स में न जोड़ा जाए।

मुझे फ्रेंच लेखक हर्वे कैंफ से मिलने का सौभाग्य मिला है। उनकी एक पुस्तक है- ‘हाउ द रिच आर डेस्ट्राॅइंग न प्लेनेट’, मैं यहां पर उस पुस्तक की अनुशंसा करना चाहता हूं। यह किताब स्पेनी और फ्रेंच भाषा में उपलब्ध है। और निश्चय ही अंग्रेजी में भी उपलब्ध होगी। ईसा मसीह ने कहा है कि एक ऊंट का तो सुई के छेद में से निकल जाना आसान है, पर एक अमीर आदमी का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाना मुश्किल है। यह ईसा मसीह ने कहा है।

ये अमीर लोग इस दुनिया को, इस ग्रह को नष्ट कर रहे हैं। क्या उन्हें लगता है कि वे इसे नष्ट कर कहीं और जा सकते हैं? क्या उनके पास किसी और ग्रह पर जाने और बसने की योजना है? अभी तक तो क्षितिज में दूर-दूर तक इसकी कोई संभावना नजर नहीं आती। यह किताब मुझे हाल ही में इग्नेशियो रेमोनेट से मिली है, जो शायद इस सभागार में ही कहीं मौजूद हैं। ‘प्रस्तावना’ की समाप्ति पर क्रैम्फ एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कहते हैं, मैं उसे यहां पढ रहा हूं- ‘‘इस दुनिया में पाये जाने वाले संसाधनों के उपभोग में हम तब तक कमी नहीं ला सकते जब तक हम शक्तिशाली कहे जाने वाले लोगों को कुछ कदम नीचे आने के लिए मजबूर नहीं करते और जब तक हम यहां फैली हुई असमानता का मुकाबला नहीं करते। इसलिए ऐसे समय में, जब हमें सचेत होने की जरूरत है, हमें ‘थिंक ग्लोबली एण्ड ऐक्ट लोकली’ के उपयोगी पर्यावरणीय सिद्धांत में यह जोड़ने की जरूरत है कि ‘कंज्यूम लेस एण्ड शेयर बेटर’।’’

मुझे लगता है कि यह एक बेहतर सलाह है जो फ्रेंच लेखक हर्वे कैंफ हमें देते हैं।

अध्यक्ष महोदय, इसमें कोई संदेह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन इस शताब्दी की सबसे विध्वंसक पर्यावरणीय समस्या है। बाढ, सूखा, भयंकर तूफान, हरीकेन, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्रों के जलस्तर और अम्लीयता में वृद्धि, और गरम हवाएं- ये सभी उस वैश्विक संकट को और तेज कर रहे हैं, जो हमें चारों तरफ से घेरे हुए है। वर्तमान में इंसानों के जो क्रियाकलाप हैं, उन्होंने इस ग्रह में जीवन के लिए और स्वयं इस ग्रह के अस्तित्व के लिए एक खतरा पैदा कर दिया है। लेकिन इस योगदान में भी हम गैर-बराबरी के शिकार हैं।

मैं याद दिलाना चाहता हूं कि पचास करोड़ लोग, जो इस दुनिया की जनसंख्या का 7 प्रतिशत हैं, मात्र 7 प्रतिशत, वे पचास करोड़ लोग -7 प्रतिशत अमीर लोग- 50 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। जबकि इसके विपरीत 50 प्रतिशत गरीब लोग, मात्र और मात्र 7 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए जवाबदेह हैं।

इसलिए संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन से एक ही जवाबदेही और जिम्मेदारी की अपेक्षा करना मुझे आश्चर्य में डाल देता है। यूएसए जल्द ही 30 करोड़ की जनसंख्या के आंकड़े पर पहुंच जाएगा, वहीं चीन की जनसंख्या लगभग यूएसए से पांच गुनी है। यूएसए दो करोड़ बैरल रोज के हिसाब से तेल की खपत करता है, जबकि चीन की खपत 50 से 60 लाख बैरल प्रतिदिन की है। इसलिए आप संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन को एक ही तराजू पर नहीं तौल सकते।

यहां पर बात करने के लिए बहुत सारे मुद्दें हैं, और मैं उम्मीद करता हूं कि राज्यों और सरकारों के प्रतिनिधि हम सब लोग इन मुद्दों और इनसे जुड़ी सच्चाइयों पर बात करने के लिए बैठ सकेंगे।

अध्यक्ष महोदय, आज इस ग्रह का 60 प्रतिशत पारिस्थितिकी तंत्र क्षतिग्रस्त हो चुका है, भूमि के ऊपरी धरातल का 20 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका है। हम जंगलों के खत्म होते जाने, भूमि परिवर्तन, रेगिस्तानों के बढते जाने, शुद्ध पेयजल की उपलब्धता में गिरावट, समुद्री संसाधनों के अत्यधिक उपभोग, जैव विविधता में कमी और प्रदूषण में बढोतरी- इन सबके संवेदनहीन गवाह रहे हैं। हम भूमि की पुनरुत्पादन क्षमता से भी 30 प्रतिशत आगे बढकर उसका उपभोग कर रहे हैं। हमारा ग्रह अपनी वह क्षमता खोता जा रहा है जिसे तकनीकी भाषा में ‘स्वयं के नियमन की क्षमता’ कहा जाता है। रोज हम उतने अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन कर रहे हैं जिन्हें फिर से नवीनीकृत करने की क्षमता हम में नहीं है। पूरी मानवता को एक ही समस्या आक्रांत किये हुए है और वह है मानव जाति के अस्तित्व की समस्या। इतना अपरिहार्य होने के बावजूद ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ के अंतर्गत दूसरी बार प्रतिबद्धता जताने में भी हमें दो साल लग गए। और आज जब हम इस आयोजन में शिरकत कर रहे हैं, तो भी हमारे पास कोई वास्तविक और सार्थक समझौता नहीं है।

सच्चाई यह है कि आश्चर्यजनक रूप से और एकाएक जो दस्तावेज हमारे सामने पेश हुआ है, हम उसे स्वीकार नहीं करेंगे। यह हम वेनेजुएला, बोलिवर गठबंधन और अल्बा (ए.एल.बी.ए.) देशों की तरफ से कह रहे हैं। हमने पहले भी कहा था कि ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ और कन्वेंशन के वर्किंग ग्रुप से बाहर के किसी भी मसौदे को हम स्वीकार नहीं करेंगे। क्योंकि उनसे जुड़े मसौदे और दस्तावेज ही वैध और जायज हैं, जिन पर हम इतने सालों से इतनी गहराई से बात करते आ रहे हैं।

और अब, जब पिछले कुछ घंटों से न आप सोये हैं और न ही आपने कुछ खाया है, यह ठीक नहीं होगा कि मैं, आपके अनुसार, इन्हीं पुरानी चीजों में से किसी दस्तावेज को आपके सामने पेश करूं। प्रदूषण फैलाने वाली गैसों के उत्सर्जन में कमी का लक्ष्य वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है, पर आज मुझे ऐसा लग रहा है कि इस लक्ष्य को पाने और दूरगामी सहयोग के महारे प्रयास असफल हो गए हैं। कम से कम हाल फिलहाल तो ऐसा ही है।

इसका कारण क्या है? मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि इसका कारण इस ग्रह के सबसे शक्तिशाली देशों का गैर जिम्मेदाराना व्यवहार और उनमें राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी का होना है। यहां पर किसी को अपमानित महसूस करने या नाराज होने की जरूरत नहीं है। महान जोस गेर्वासियो आर्तिगास के शब्दों में कहूं तो ‘‘जब मैं सच कहता हूं तो न मैं किसी को आघात पहुंचा रहा होता हूं और न ही किसी से डरता हूं’’। पर वास्तव में यहां अपने पदों को गैर जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल किया गया है, लोग अपनी बातों से पीछे हटे हैं, भेदभाव किया गया है, और समाधान के लिए एक अमीरपरस्त रवैया अपनाया गया है। यह रवैया ऐसी समस्या के साथ है जो हम सबकी साझी है, और जिसका समाधान हम सब मिलकर ही निकाल सकते हैं।

एक तरफ दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता और अमीर देश हैं; दूसरी तरफ हैं भूखे और गरीब लोग, जो बिमारियों और प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होने के लिए अभिशप्त हैं। राजनैतिक दकियानूसीपन और स्वार्थ ने पहले को दूसरे के प्रति असंवेदनशील बना दिया है। जिन दलों के बीच समझौता होना है, वे मौलिक रूप में ही असमान हैं। इसलिए अध्यक्ष महोदय, उत्सर्जन की जिम्मेदारी के आधार पर और आर्थिक, वित्तीय और तकनीकी दक्षता के आधार पर ऐसा नया और एकमात्र समझौता अनिवार्य हो गया है, जो ‘कन्वेंशन’ के सिद्धांतों के प्रति बिना शर्त सम्मान रखता हो।

विकसित देशों को अपने उत्सर्जन में वास्तविक कटौती के संदर्भ में बाध्यकारी, स्पष्ट और ठोस प्रतिबद्धता निर्धारित करनी चाहिए। साथ ही उन्हें गरीब देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने का उत्तरदायित्व भी अपने ऊपर लेना चाहिए ताकि वे गरीब देश जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी खतरों से बच सकें। ऐसे देशों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए जो सबसे कम विकसित हैं और जो द्वीपों के रूप में बसे हुए हैं।
अध्यक्ष महोदय, आज जलवायु परिवर्तन एकमात्र समस्या नहीं है जिसका ये मानवता सामना कर रही है। और भी कई अन्याय और उत्पीड़न हमें घेरे हुए हैं। ‘सहस्राब्दी लक्ष्यों’ और सभी तरह की आर्थिक शिखर बैठकों के बावजूद अमीर और गरीब के बीच की खाई बढती जा रही है। जैसा कि सेनेगल के राष्ट्रपति ने सच ही कहा कि इन सभी समझौतों और बैठकों में सिर्फ वादे किये जाते हैं, कभी न पूरे होने वाले वादे; और यह दुनिया विनाश की तरफ बढती रहती है।

इस दुनिया के 500 सबसे अमीर लोगों की आय सबसे गरीब 41 करोड़ 60 लाख लोगों से ज्यादा है। दुनिया की आबादी का 40 प्रतिशत गरीब भाग यानी 2.8 अरब लोग 2 डॉलर प्रतिदिन से कम में अपनी जिंदगी गुजर-बसर कर रहे हैं। और यह 40 प्रतिशत हिस्सा दुनिया की आया का पांच प्रतिशत ही कमा रहा है। हर साल 92 लाख बच्चे पांच साल की उम्र में पहुंचने से पहले ही मर जाते हैं और इनमें से 99.9 प्रतिशत मौतें गरीब देशों में होती हैं। नवजात बच्चों की मृत्युदर प्रति एक हजार में 47 है, जबकि अमीर देशों में यह दर प्रति हजार में 5 है। मनुष्यों के जीवन की प्रत्याशा 67 वर्ष है, कुछ अमीर देशों में यह प्रत्याशा 79 वर्ष है, जबकि कुछ गरीब देशों में यह मात्र 40 वर्ष ही है। इन सबके साथ ही साथ 1.1 अरब लोगों को पीने का पानी मयस्सर नहीं है, 2.6 अरब लोगों के पास स्वास्थ्य और स्वच्छता की सुविधाएं नहीं हैं। 80 करोड़ से अधिक लोग निरक्षर हैं और 1 अरब 2 करोड़ लोग भूखे हैं। ये है हमारी दुनिया की तस्वीर।

पर फिर सवाल यही है कि इसका कारण क्या है? आज जरूरत है इस कारण पर बात करने की; यह वक्त अपनी जिम्मेदारियों से भागने या समस्या को नजरंदाज करने का नहीं है। इस भयानक परिदृश्य का कारण निस्संदेह सिर्फ और सिर्फ एक हैः पूंजी का विनाशकारी उपापचयी तंत्र और इसका मूर्त रूप- पूंजीवाद।

यहां मैं मुक्ति के महान मीमांसक लियानार्डो बाॅफ का एक संक्षिप्त उद्धरण देना चाहता हूं। लियानार्डो बाॅफ, एक ब्राजीली, एक अमरीकी, इस विषय पर कहते हैं कि ‘‘इसका कारण क्या है? आह, इसका कारण वह सपना है जिसमें लोग खुशी या प्रसन्नता पाने के लिए अंतहीन उन्नति और भौतिक संसाधनों का संग्रह करना चाहते हैं, विज्ञान और तकनीक के माध्यम से इस पृथ्वी के समस्त संसाधनों का असीम शोषण करना चाहते हैं।’’ और यहीं पर वे चाल्र्स डार्विन और उनके ‘प्राकृतिक वरण’ को उद्धृत करते हैं, ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ को। पर हम जानते हैं कि सबसे शक्तिशाली व्यक्ति सबसे कमजोर की राख पर ही जिंदा रहता है। ज्यां जैक रूसो ने जो कहा था, वह हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि मजबूत और कमजोर के बीच में स्वतंत्रता ही दमित और उत्पीडि़त होती है। इसीलिए ‘साम्राज्य’ हमेशा स्वतंत्रता की बात करते हैं। उनके लिए यह स्वतंत्रता है दमन की, आक्रमण की, दूसरों को मारने की, दूसरों के उन्मूलन और उनके शोषण की। उनके लिए यही स्वतंत्रता है। रूसो बचाव के लिए एक मुहावरे का इस्तेमाल करते हैं- ‘‘मुक्त करता है तो केवल कानून और नियम’’।

यहां कुछ ऐसे देश हैं जो नहीं चाहते कि कोई भी दस्तावेज सामने आए। जाहिर तौर पर इसलिए कि वे कोई नियम या कानून नहीं चाहते, कोई मानक नहीं चाहते। ताकि इन कानूनों और मानकों के अभाव में वे अपना खेल जारी रख सकें- शोषण की स्वतंत्रता का खेल दूसरों को कुचलने की स्वतंत्रता का खेल। इसलिए हम सभी को यहां और सड़कों पर इस बात के लिए प्रयास करना चाहिए, इस बात के लिए दबाव बनाना चाहिए कि हम किसी न किसी प्रतिबद्धता पर एकमत हो सकें, कोई न कोई ऐसा दस्तावेज सामने आए जो धरती के सबसे शक्तिशाली देशों को भी मजबूर कर सके।

अध्यक्ष महोदय, लियानार्डो बाॅफ पूछते हैं कि… क्या आपमें से कोई उनसे मिला है? मैं नहीं जानता कि बाॅफ यहां आ सकते हैं या नहीं? हाल में मैं पेराग्वे में उनसे मिला था। हम हमेशा उनको पढते रहे हैं… क्या सीमित संसाधनों वाली धरती एक असीमित परियोजना को झेल सकती है? असीमित विकासः पूंजीवाद का ब्रह्मवाक्य है, एक विध्वंसक पैटर्न है और आज हम इसे झेल रहे हैं। आइए, इसका सामना करें। तब बाॅफ हमसे पूछते हैं कि हम कोपेनहेगन से क्या उम्मीद कर सकते हैं? कम से कम एक ईमानदार स्वीकारोक्ति कि हम इस व्यवस्था को जारी नहीं रखेंगे और एक सरल प्रस्ताव कि आओ इस ढर्रे को बदल दें। हमें यह करना होगा लेकिन बिना किसी झंझलाहट, बिना झूठ, बिना दोहरे प्रावधानों के। बिना किसी मनमाने दस्तावेजों के हम इस ढर्रे को बदलें। पूरी ईमानदारी से, सबके सामने और सच के साथ।

अध्यक्ष महोदय, हम वेनेजुएला की तरफ से पूछते हैं कि हम कब तक इस अन्याय और असमानता को जारी रखेंगे? कब तक हम मौजूदा वैश्विक अर्थ तंत्र और सर्वग्रासी बाजार व्यवस्था को बर्दाश्त करते जायेंगे? कब तक हम एचआईवी एड्स जैसी भयानक महामारियों के सामने पूरी मनुष्यता को बिलखने के लिए छोड़ देंगे? कब तक हम भूखे लोगों को खाना नहीं मिलने देंगे या उनके बच्चों को भूखों मरने देंगें? कब तक लाखों बच्चों की मौत उन बिमारियों के चलते बर्दाश्त करते रहेंगे, जिनका इलाज संभव है? आखिर कब तक हम दूसरे लोगों के संसाधनों पर ताकतवरों द्वारा कब्जा करने के लिए जारी सशस्त्र हमलों में लाखों लोगों को कत्ल होते हुए देखते रहेंगे?

इसलिए हमलों और युद्धों को बंद किया जाए। साम्राज्यों से, जो पूरी दुनिया को दबाने और शोषण करने में लगे हुए हैं, हम दुनिया के लोग चीखकर कहते हैं कि इन्हें बंद किया जाए। साम्राज्यवादी सैन्य हमले और सैन्य तख्तापलट अब और नहीं! आइए एक ज्यादा न्यायपूर्ण और समानतामूलक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था बनाएं, आइए गरीबी मिटा दें, आइए तुरंत इस विनाशकारी उत्सर्जन को रोक दें, आइए पर्यावरण के इस क्षरण को समाप्त करें और जलवायु परिवर्तन के भीषण दुष्परिणामों से इस धरती को बचावें। आइए, पूरी दुनिया को ज्यादा आजाद और एकताबद्ध करने के महान उद्देश्य के साथ खुद को जोड़ लें।

अध्यक्ष महोदय, लगभग दो शताब्दियों पहले महान सीमोन बोलिवर ने कहा था कि ‘अगर प्रकृति हमारा विरोध करती है तो हमें उससे लड़ना होगा और उसे अपनी सेवा में लाना होगा’। यह राष्ट्रों के मुक्तिदाता, आने वाली नस्लों की चेतना के अग्रदूत महान साइमन बोलिवर का कहना था। बोलिवेरियन वेनेजुएला से, जहां हमने लगभग 10 साल पहले आज जैसे ही एक दिन अपने इतिहास की भीषणतम जलवायु त्रासदी (वर्गास त्रासदी) का सामना किया था, उस वेनेजुएला से जहां क्रांति ने सबको न्याय देने का प्रयास किया है, हम कहना चाहते हैं कि ऐसा करना सिर्फ समाजवाद के रास्ते से संभव है।

समाजवाद, वह दूसरा भूत जिसकी कार्ल माक्र्स ने चर्चा की थी, जो यहां भी चला आया है, दरअसल यह तो उस पहले भूत का विरोधी है। समाजवाद यही दिशा है, इस ग्रह के विनाश को रोकने का यही रास्ता है। मुझे कोई शक नहीं है कि पूंजीवाद नर्क का रास्ता है, दुनिया की बर्बादी का रास्ता है। यह हम वेनेजुएला की तरफ से कह रहे हैं जो समाजवाद के कारण अमेरिकी साम्राज्य के कोप का सामना कर रहा है।

अल्बा के सदस्य देशों की तरफ से बोलिवेरियन गठबंधन की तरफ से हम आह्वान करते हैं, और मैं भी पूरे आदर के साथ अपनी अंतरात्मा से इस ग्रह के सभी लोगों का आह्वान करता हूं, हम सभी सरकारों और पृथ्वी के सभी लोगों से कहना चाहते हैं, साइमन बोलिवर का सहारा लेते हुए कि यदि पूंजीवाद का विनाशक चरित्र हमारा विरोध करता है, हम इसके विरुद्ध लडेंगे और इसे जीतेंगे; हम मनुष्यता के खत्म हो जाने तक इंतजार में नहीं बैठे रह सकते। इतिहास हमें एकताबद्ध होने के लिए और संघर्ष के लिए पुकार रहा है।

यदि पूंजीवाद विरोध करता है, हम इसके खिलाफ युद्ध के लिए प्रतिबद्ध हैं, और यह युद्ध मानव जाति की मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करेगा। यीशु, मुहम्मद, समानता, प्रेम, न्याय, मानवता- सच्ची और सबसे गहरी मानवता का झंडा उठाए हम लोगों को यह करना है। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो इस ब्रह्मण्ड की सबसे विलक्षण रचना, मनुष्य, का अंत हो जाएगा, मानव जाति विलुप्त हो जाएगी।

यह ग्रह करोड़ों वर्ष पुराना है, यह ग्रह करोड़ों वर्ष हमारे वजूद के बिना ही अस्तित्व में रहा है। स्पष्ट है यह अपने अस्तित्वं के लिए हम पर निर्भर नहीं है। सारतः बिना धरती के हमारा अस्तित्व संभव नहीं है और हम इसी ‘धरती मां’ को नष्ट कर रहे हैं, जैसा इवो मोरेल्स कह रहे थे, जैसा दक्षिण अमेरिका से हमारे देशज भाई कहते हैं।

अंत में, अध्यक्ष महोदय, मेरे खत्म करने से पहले कृपया फिदेल कास्त्रो को सुनिए, जब वे कहते हैं: ‘एक प्रजाति खात्मे के कगार पर हैः मनुष्यता’।

रोजा लग्जमबर्ग को सुनिए जब वे कहती हैं: ‘समाजवाद या बर्बरतावाद’।

उद्धारक यीशु को सुनिए जब वे कहते हैं: ‘गरीब सौभाग्यशाली हैं क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है’।

अध्यक्ष महोदय, देवियों और सज्जनों, हम इस धरती को मनुष्यता का मकबरा बनने से रोक सकते हैं। आइए, इस धरती को स्वर्ग बनाएं। एक स्वर्ग जीवन के लिए, शांति के लिए, पूरी मनुष्यता की शांति और भाईचारे के लिए, मानव प्रजाति के लिए।

अध्यक्ष महोदय, देवियों और सज्जनों, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! दोपहर के भोजन का आनंद उठाइए।

----- 22 दिसंबर, 2009  को कोपेनहेगन में ‘जलवायु परिवर्तन’ पर ह्यूगो शावेज का सन्देश

Sunday, April 14, 2013

मैं अमरीकी सरकार पर आतंकवाद की हिफाजत करने और एक पूर्णतः मानवद्रोही भाषण देने का अभियोग लगाता हूं

डाकिए की ओर से: एक घटना है कि एक पादरी बाइबल लेकर एक अनजान जगह आता है। और कई साल बाद वहां के हर ग्रामीण के हाथ में बाइबल होता है और वहां के सारी ज़मीन का मालिक पादरी बन जाता है। ह्यूगो शावेज फ्रियास ने साम्राज्यवाद के विरूद्ध यह संबोधन 20 सितंबर 2006 को काराकास में हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मेलन में दिया था। शावेज एक जननेता। वे हमारे साथ हमेशा रहेंगे। शावेज, एक शेर को डाकिए का सलाम।
*****


अध्यक्ष महोदया, महामहिम राज्याध्यक्ष, सरकारों के प्रमुख और दुनिया की सरकारों के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिगण आप सबको शुभ दिवस!

सबसे पहले आपसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि जिसने भी यह किताब नहीं पढ़ी है, इसे जरूर पढ़ ले। अमरीका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के बहुत ही सम्मानित बुद्धिजीवी नोम चोम्सकी की ताज़ा रचना मैंने पढ़ी - ‘वर्चस्व या अस्तिव रक्षा ? दुनिया पर प्रभुत्व कायम करने की अमरीकी कोशिश।’ यह किताब 20वीं सदी के दौरान जो कुछ हुआ और जो आज भी हो रहा है, हमारे भूमण्डल के ऊपर जो गम्भीर खतरे मंडरा रहे हैं, अमरीकी साम्राज्यवाद के जिस वर्चस्ववादी मंसूबे ने मानव जाति के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है, उन सबको समझने में यह काफी मददगार है। डेमोक्लीज की तलवार की तरह हमारे ऊपर लटक रहे इस खतरे के प्रति हम लगातार अमरीका और पूरी दुनिया की जनता को चेतावनी दे रहे है। और उनका आह्वान कर रहे हैं।

मैं इसका एक अध्याय यहां पढ़ना चाहता था, लेकिन समय के अभाव में मैं केवल आपसे पढ़ने का अनुरोध भर कर रहा हूं। यह काफी प्रवाहमय है। अध्यक्ष महोदया, यह वास्तव में बहुत अच्छी किताब है और आप जरूर इससे वाकिफ होंगी। यह अंग्रेजी, जर्मन, रशियन और अरबी में छपी है। देखिए, मेरे ख्याल से संयुक्त राज्य अमरीका के हमारे भाई-बहनों को तो सबसे पहले इसे पढ़ना चाहिए क्येांकि खतरा उनके घर में है। शैतान उनके घर में, खुद उनके घर के भीतर है।

शैतान कल यहां भी आया था। (हंसी और तालियां) कल शैतान यहीं था। ठीक इसी जगह। यह टेबुल जहां से मैं बोल रहा हूं, वहां अभी भी सल्फर की बदबू आ रही है। कल, बहनों-भाइयों ठीक इसी सभागार में संयुक्त राज्य अमरीका का राष्ट्रपति जिसे मैं शैतान कह रहा हूं, आया था और ऐसे बोल रहा था, जैसे वह दुनिया का मालिक हो। कल उसने जो भाषण दिया था, उसे समझने के लिए हमें किसी मनोचिकित्सक की मदद लेनी पड़ेगी। 

साम्राज्यवाद के प्रवक्ता के रूप में वह हमें अपने मौजूदा वर्चस्व को बनाए रखने, दुनिया की जनता के शोषण और लूट की योजना को नुस्खा देने आया था। इस पर पर तो अल्फ्रेड हिचकाॅक की एक डरावनी फिल्म तैयार हो सकती है। मैं उस फिल्म का नाम भी सुझा सकता हूं - ‘‘शैतान का नुस्खा।’’ मतलब अमरीकी साम्राज्यवाद, और यहां चोम्सकी इस बात को गहरी और पारदर्शी स्पष्टता के साथ कहते हैं कि अमरीकी साम्राज्यवाद अपीन वर्चस्ववादी प्रभुत्व की व्यवस्था को मजबूत बनने की उन्माद भरी कोशिशें कर रहा है। हम ऐसा होने नहीं देंगे, हम उन्हें विश्वव्यापी तानाशादी लादने नहीं देंगे।

दुनिया के इस जालिम राष्ट्रपति का भाषण मानवद्वेष से भरा हुआ था, पाखण्ड से भरा हुआ था। यही वह साम्राज्ञी पाखण्ड है जिसके सहारे वे हर चीज पर नियंत्रण कायम करना चाहते हैं। वे हम सबके ऊपर अपने द्वारा गढ़े गए लोकतंत्र के नमूने को थोपना चाहते हैं, अभिजात्यों का फर्जी लोकतंत्र और इतना ही नहीं, एक बहुत ही मौलिक लोकतांत्रिक नमूना जो विस्फोटों, बमबारियों, घुसपैठों और तोप के गेलों के सहारे थोपा जा रहा है, क्या ही सुंदर लोकतंत्र है! हमें अरस्तू और प्राचीन यूनानियों के लोतंत्र के सिद्धांतों का पुनरावलोकन करना होगा यह समझने के लिए कि यह किस प्रकार के लोकतंत्र का नमूना है जो समुद्री बड़ों, आक्रमणों, घुसपैठों और बमों के ज़रिए आरोपित किया जा रहा है।

अमरीकी राष्ट्रपति ने इस छोटे से सभागार में कल कहा था कि ‘आप जहां भी जाओ, आपको उग्रवादी यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि आप हिंसा और आतंक, मुसीबतों से छुटकारा पा सकते हैं और अपना सम्मान फिर से हासिल कर सकते हैं।’ वह जिधर भी देखता है, उसे उग्रवादी दिखाई देते हैं। मुझे यकीन है कि वह आपकी चमड़ी के रंग को देखता है भाई और सोचता है कि आप एक उग्रवादी हो। अपनी चमड़ी के रंग के चलते ही बोलीविया के माननीय राष्ट्रपति इवो मोरालेस जो कल यहां आए थे, एक उग्रवादी हैं। साम्राज्यवादियों को हर जगह उग्रवादी दिखाई देते हैं। नहीं, ऐसा नहीं कि हमलोग उग्रवादी हैं। हो ये रहा है कि दुनिया जाग रही है और हर जगह जनता उठ खड़ी हो रही है। मुझे ऐसा लगता है कि श्रीमान् साम्राज्यवादी तानाशाह कि आप अपने बाकी के दिन एक दुःस्वप्न में गुजारेंगे, क्योंकि आप चाहे जिधर भी देखेंगे हम अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ उठ खड़े हो रहे होंगे। हां, वे हमें उग्रवादी कहते हैं क्योंकि हम दुनिया में सम्पूर्ण आज़ादी की मांग करते हैं जनता के बीच समानता की मांग करते हैं और राष्ट्रीय सम्प्रभुता के सम्मान की मांग करते हैं। हम साम्राज्य के खिलाफ, वर्चस्व के ताने-बाने के खिलाफ उठ खड़े हो रहे हैं। 

आगे राष्ट्रपति ने कहा कि ‘‘आज हम सारे मध्यपूर्व की समूची जनता से सीधे-सीधे कहना चाहेंगे कि मेरा देश शांति चाहता है।’’ यह पक्की बात है। अगर हम ब्रोंक्स की सड़कों से गुजरें, यदि हम न्यूयार्क, वाशिंगटन, सान दियेगो, कैलीफोर्निया, सन फ्रांसिस्को की गलियों से होकर गुज़रें और उन गलियों के लोगें से पूछें तो यही जवाब मिलेग कि अमरीका की जनता शांति चाहती है। फर्क यह है कि इस देश की, अमरीका की सरकार शांति नहीं चाहती। युद्ध का भय दिखाकर हमारे ऊपर अपने शोषण और लूट और प्रभुत्व का प्रतिमान थोपना चाहती है। यही थोड़ा सा फर्क है।

जनता शांति चाहती है लेकिन इराक में हो क्या रहा है? और लेबनान और फिलिस्तीन में क्या हुआ? और सौ सालों तक लातिन अमरीका और दुनियाभर में क्या हुआ? और वेनेजुएला के खिलाफ धमकी और ईरान के खिलाफ नई धमकी? लेबनान की जनता से उसने कहा, ‘‘आप में से बहुतों ने अपने घर और अपने समुदायों को जवाबी गोलाबारी में फंसते देखा।’’ क्या सनकीपन है? दुनिया के सामने सफेद झूठ बोलने की कैसी महारत है? बेरूत के ऊपर एक एक सेंटीमीटर की नाप-जोख करके गिराए गए बम क्या ‘‘जवाबी गोलाबारी’’ थी! मेरे ख्याल से राष्ट्रपति उन पश्चिमी फिल्मों की बात कर रहा है जिसमें वे कमर की ऊंचाई से दूसरे पर अंधाधंुध गोलियां चलाते हैं और बीच में फंस कर कोई मर जाता है। 
साम्राज्यवादी गोलाबारी, फासीवादी गोलाबारी! हत्यारी गोलाबारी! साम्राज्यवादियों और इजरायल के द्वारा फिलिस्तीन और लेबनान की निर्दोष जनता के खिलाफ नरसंहारक गोलाबारी, यही सच है। अब वे कहते हैं कि तबाह किए गए घरों को देखकर परेशान हैं।

आज सुबह मैं अपने भाषण की तैयारी के दौरान कुछ भाषणों को देख रहा था। अपने भाषण में अमरीकी राष्ट्रपति ने अफगानिस्तान की जनता को, लेबनान की जनता को, ईरान की जनता को सम्बोधित किया। कोई भी, अमरीकी राष्ट्रपति को उन लोगों को सम्बोधित करते हुए सुनेगा तो वह अचरज में पड़ जाएगा। वे लोग उससे क्या कहेंगे? यदि वे लोग उससे कुछ कह पाते तो उसे भला क्या कहते? मुझे इसका कुछ अंदाजा है क्योंकि मैं उन लोगों की, दक्षिण के लोगों की आत्मा से परिचित हूं। यदि दुनियाभर के वे लोग अमरीकी साम्राज्यवाद से एक ही आवाज़ में बोलें, तो दबे-कुचले लोग कहेंगे - साम्राज्यवादी वापस जाओ! यही वह चीख होगी जो पूरी दुनिया में गूंज उठेगी। 

अध्यक्ष महोदया, साथियों.... और दोस्तों.... पिछले साल हमलोग ठीक इसी सभागार में आए, पिछले आठ वर्षों से हमलोग यहां जुटते हैं और हम सबने कुछ बातें कही थीं जा आज पूरी तरह सही साबित हुई है। मेरा विश्वास है कि इस जगह बैठे हुए लोगों में से कोई भी नहीं होगा जो संयुक्त राष्ट्र संघ की व्यवस्था के समर्थन में खड़ा होग। हमें इस बात को ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिए कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद जिस संयुक्त राष्ट्र संघ का उद्भव हुआ था, वह किसी काम का नहीं रहा। हां, ठीक है कि यहां आना और भाषण देना और एक-दूसरे से साल में एक बार मिलना-जुलना, इतना काम तो होता है। लंबे दस्तावेज़ तैयार करना, अपने विचार व्यक्त करना और अच्छे भाषण सुनना, जैसा कल इवो ने और लूला ने दिया था, हां इसके लिए यह ठीक है और भी कई अच्छे भाषण भी, जैसा अभी-अभी श्रीलंका के राष्ट्रपति और चिली के राष्ट्रपति ने दिया। लेकिन हमने इस मंच को महज एक विचार मंडल में बदल दिया है जिसमें आज पूरी दुनिया जिन भयावह सच्चाइयों से रूबरू है उन्हें रत्ती भर भी प्रभावित करने का कोई दम नहीं है। इसलिए हम यहंा एक बार फिर आज यानि 20 सितंबर, 2006 को संयुक्त राष्ट्र संघ की पुनस्र्थापना का प्रस्ताव रखते हैं। पिछले साल अध्यक्ष महोदया, हमने चार निम्न प्रस्ताव रखे थे, जिन्हें मैं महसूस करता हूं कि राज्याध्यक्षों, सरकार के प्रमुखों, राजदूतों और प्रतिनिधियों द्वारा स्वीकृति दिया जाना अत्यंत जरूरी है। हमने इन प्रस्तावों पर विचार-विमर्श भी किया है। 

पहला - विस्तार। कल लूला ने यही बात कही थी, सुरक्षा परिषद् के स्थाई और साथ ही अस्थाई पदों को भी विकसित, अविकसित और तीसरी दुनिया के देशों के बीच से नए सदस्यों के लिए खुला रखना जरूरी है। यह पहली प्राथमिकता है। 

दूसरा - दुनिया के टकरावों का समाना करने और उन्हें हल करने के लिए प्रभावी तौर-तरीके अपनाना। वाद-विवाद और निर्णय लेने के पारदर्शी तौर-तरीके। 

तीसरा - वीटो की गैरजनवादी प्रणाली तत्काल समाप्त करना। सुरक्षा परिषद् के निर्णयों के ऊपर वीटो के अधिकार का प्रयोग हमारे ख्याल से एक बुनियादी सवाल है और हम सब इसे हटाने की मांग करते हैं। इसका ताजा उदाहरण है अमरीकी संरकार द्वारा अनैतिक वीटो जिसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के एक प्रस्ताव को बाधित करके इजरायली सेना को लेबनान की तबाही की खुली छूट दे दी और हम विवश देखते रहे। 
चैथा - जैसा कि हम हमेशा कहते रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव की भूमिका और उसके अधिकारों को मजबूत बनाना जरूरी है। कल हमने महासचिव का भाषण सुना जिनका कार्यकाल जल्दी ही खत्म होने जा रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले दस वर्षों के दौरान दुनिया पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो गई है तथा भूख, गरीबी, हिंसा और मानवाधिकारों के हनन जैसी दुनिया की गंभीर समस्याएं लगातार विकट होती गई हैं। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की व्यवस्था के पतन और अमरीकी साम्राज्यवाद के मंसूबों का भयावह परिणाम है।

अध्यक्षा महोदया, इसके सदस्य के रूप में अपनी-अपनी हैसियत को समझते हुए कई साल पहले वेनेजुएला ने फैसला किया था कि हम संयुक्त राष्ट्र संघ के भीतर अपनी आवाज़, अपने विनम्र विचारों के ज़रिए यह लड़ाई लडें़गे। हम एक स्वतंत्र आवाज़ हैं, स्वाभिमान के प्रतिनिधि हैं, शांति की तलाश में हैं और एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के निरूपण की मांग करते हैं जो दुनियाभर की जनता के उत्पीड़न और वर्चस्ववादी आक्रमणों की भत्र्सना करे। इसी को ध्यान में रखते हुए वेनेजुएला ने अपना नाम प्रस्तुत किया है। बोलिवर की धरती ने सुरक्षा परिषद् के अस्थायी पद के उम्मीदवार के रूप में अपना नाम प्रस्तुत किया है। निश्चय ही आप सब जानते हैं अमरीकी सरकार ने एक खुला आक्रमण छेड़ दिया है ताकि वह सुरक्षा परिषद् के खुले पद को स्वतंत्र चुनाव के ज़रिए हासिल करने में वेनेजुएला की राह में बाधा खड़ी करे। वे सच्चाई से डरते हैं। साम्राज्यवादी सच्चाई और स्वतंत्र आवाज़ से भयभीत हैं। वे हम पर उग्रवादी होने की तोहमत लगाते हैं। 

उग्रवादी तो वे खुद हैं। 

मैं उन सभी देशों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने वेनुजुएला को समर्थन देने की घोषणा की है, बावजूद इसके कि मतदान गुप्त है और किसी के लिए अपन मत ज़ाहिर करना जरूरी नहीं। लेकिन मैं सोचता हूं कि अमरीका के खुले आक्रमण ने कई देशों को समर्थन के लिए बाध्य कर दिया ताकि वेनेजुएला को, हमारी जनता और हमारी सरकार को नैतिक रूप से बल प्रदान करे। 

मरकोसुर के हमारे भाइयों एवं बहनों ने, मिसाल के लिए एक समूह के तौर पर वेनेजुएला को अपना समर्थन देने की घोषणा की है। अब हम ब्राजील, अर्जेंटीना, उरूग्वे, परागुए के साथ मरकोसुर (लातिन अमरीकी साझा बाज़ार) के स्थायी सदस्य हैं। बोलीविया जैसे कई दूसरे लातिन अमरीकी देशों और सभी कैरीकाॅम (कैरीबियाई साझा बाज़ार) के देशों ने भी वेनेजुएला को अपना समर्थन देने का वचन दिया है। सम्पूर्ण अरब लीग ने वेनेजुएला को समर्थन देने की घोषण की है। मैं अरब दुनिया को, अरब दुनिया के अपने भाइयों को धन्यवाद देता हूं। अफ्रीकी संघ के लगभग सभी देशों ने तथा रूस, चीन और दुनियाभर के अन्य कई देशों ने भी वेनेजुएला को अपना समर्थन देने का वचन दिया है। मैं वेनेजुएला की ओर से, अपने देश की जनता की ओर से और सच्चाई के नाम पर आप सबको तहे दिल से धन्यवाद देता हूं क्योंकि सुरक्षा परिषद् में स्थान पाकर हम न केवल वेनेजुएला की आवाज़, बल्कि तीसरी दुनिया की आवाज़, पूरे पृथ्वी ग्रह की आवाज़ को सामने लाएंगे, वहां हम सम्मान और सच्चाई की हिफाजत करेंगे। अध्यक्ष महोदया, सबकुछ के बावजूद मैं सोचता हूं कि आशावादी होने के आधार हैं। 

जैसा कवि लोग कहते हैं, विकट आशावादी क्योंकि बमों, युद्ध, हमलों, निरोधक युद्धों और पूरी जनता की तबाही के खतरे के बावजूद कोई भी यह देख सकता है कि एक नए युग का उदय हो रहा है। जैसा कि सिल्वो रोड्रिग्ज गाता है - ‘‘जमाना एक नए जीवट को जन्म दे रहा है।’’ वैकल्पिक प्रवृत्तियां, वैकल्पिक विचार और स्पष्ट विचारों वाले नौजवान उभर कर सामने आ रहे हैं। बमुश्किल एक दशक बीता और यह बात साफ तौर पर साबित हो गई कि ‘इतिहास के अंत’ का सिद्धांत पूरी तरह फर्जी है। अमरीकी साम्राज्य और अमरीकी शांति की स्थापना, पूंजीवादी नवउदारवादी माॅडल की स्थापना जो दुःख-दैन्य और गरीबों को जन्म देते हैं - पूरी तरह फर्जी है। यह विचार पूरी तरह बकवास है और इसे कूड़े में फेंक दिया गया है। अब दुनिया के भविष्य को परिभाषित करना ही होगा। पूरी पृथ्वी पर एक नया सवेरा हो रहा है जिसे हर जगह देखा जा सकता है - लातिन अमरीका में, एशिया, अफ्रीका, यूरोप और ओसीनिया में। इस आशावादी नज़रिए पर मैं अच्छी तरह रोशनी डाल रहा हूं ताकि हम अपनी अंतरात्मा और दुनिया की हिफाजत करने का, एक बेहतर दुनिया, एक नई दुनिया के निर्माण के लिए लड़ने का, अपना इरादा पक्का कर लें।

वेजेजुएला इस संघर्ष में शामिल हो गया है और इसलिए हमें धमकियां दी जा रही हैं। अमरीका ने पहले ही एक तख्तापलट की योजना बनाई, उसके लिए पैसे दिए और उसे अंजाम दिया। अमरीका आज भी वेनेजुएला में तख्तापलट की साजिश रचने वालों की मदद कर रहा है और वे लगातार वेनेजुएला के खिलाफ आतंकवादियों की मदद कर रहे हैं। 
राष्ट्रपति मिशेल बैचलेट ने कुछ दिनों पहले माफ करें, कुछ ही मिनटों पहले यहां बताया कि चिली के विदेश मंत्री ओरलांदो लेतेलियर की कितनी भयावह तरीके से हत्या की गई। मैं इसमें इतना और जोड़ दूं कि अपराधी दल पूरी तरह आजाद हैं। उस कुकृत्य के लिए, जिसमें एक अमरीकी नागरिक भी मारा गया था, जो लोग जिम्मेदार हैं वे सीआईए के उत्तरी अमरीकी लोग हैं, सीआईए के आतंकवादी हैं। 

इसके साथ मैं इस सभागार में यह भी याद दिला देना जरूरी समझता हूं कि आज से 30 साल पहले एक हृदयविदारक आतंवादी हमले में क्यूबाना दे एविएसियोन के एक हवाई जहाज को बीच आकाश में उड़ा दिया गया था और 73 निर्दोष नागरिकों कोमोत के घाट उतार दिया गया था। इस महाद्वीप का वह सबसे घिनौना आतंकवादी कहां है जिसने स्वीका किया था कि उस क्यूबाई हवाई जहाज को उड़ाने के षडयंत्र का दिमागी खाका उसी ने तैयार किया था ? वह कुछ सालों तक वेनेजुएला की जेल में था, लेकिन सीआईए के अधिकारियों और वेनेजुएला की तत्कालीन सरकार की मदद से वह फरार हो गया। आजकल वह अमरीका में रह रहा है और वहां की सरकार उसका बचाव कर रही है, इसके बावजूद कि उसने जुर्म का इकबाल किया था और उसे सजा हुई थी। अमरीका दोगली नीति अपनाता है और आतंकवादियों का बचाव करता है। 

इन बातों के ज़रिए मैं यह बताना चाहता हूं कि वेनेजुएला आतंकवाद के खिलाफ, हिंसा के खिलाफ संघर्ष के लिए वचनबद्ध है और उन सभी लोगों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है जो शांति के लिए और एक न्यायपूर्ण दुनिया के लिए संघर्षरत हैं।

मैंने क्यूबाई हवाई जहाज की बात की। लुइस पोसादा कैरिलेस नाम है उस आतंकवादी का। अमरीा में उसकी ठीक उसी तरह हिफाजत की जाती है जैसे वेनेजुएला के भ्रष्ट भगोड़ों की, आतंकवादियों के एक गिरोह की जिसने कई देशों के दूतावासों में बम लगाया था, तख्तापलट के दौरान निर्दोष लोगों की हत्या की थी और इस विनम्र सेवक (शावेज) का अपहरण किया था। वे मेरी हत्या करने ही वाले थे कि खुदा की मेहरबानी, अच्छे सैनिकों का एक समूह सामने आया और जिन्होंने जनता को सड़कों पर उतार दिया। यह चमत्कार ही समझिए कि मैं यहां मौजूद हूं। उस तख्तापलट और आतंकवादी कारनामे के नेता यहीं हैं, अमरीकी सरकार की सुरक्षा में (अभी हाल ही में खबर आयी कि अमरीका ने इस आतंकवादी कैरिलेस को रिहा कर दिया है - अनुवादक) मैं अमरीकी सरकार पर आतंकवाद की हिफाजत करने और एक पूर्णतः मानवद्रोही भाषण देने का अभियोग लगाता हूं।

यहां तक क्यूबा की बात है, हम लोग खुशी-खुशी हवाना गए। कई दिनों तक हमलोग वहां रहे। जी-15 और गुट निरपेक्ष आंदोलन के सम्मेलन के दौरान पारित एक ऐतिहासिक प्रस्ताव और दस्तावेज में नए युग के उदय का स्पष्ट प्रमाण मौजूद था। परेशान न हों। मैं यहां उन सबको पढ़ने नहीं जा रहा हूं। लेकिन पूरी पारदर्शिता के साथ खुले विचार-विमर्श के बाद लिए गए प्रस्तावों का एक संग्रह यहां उपलब्ध है। पचास देशों के राज्याध्यक्षों की उपस्थिति में एक हफ्ते एक हवाना दक्षिण की राजधानी बना हुआ था। हमने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को दुबारा शुरू किया और आपने हमारी यही गुज़ारिश है कि मेरे भाईयों और बहनों, मेहरबानी करके आप लोग गुटनिरपेक्ष आंदोलन को मजबूत बनाने के लिए अपना पूरा सहयोग दें, क्योंकि यह नए युग के उदय और आधिपत्य और साम्राज्यवाद पर लगाम लगाने के लिए बहुत ही जरूरी है। साथ ही आप सब जानते हैं कि हमने फिदेल कास्त्रो को अगले तीन वर्षों के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अध्यक्ष बनाया है और हमें पक्का यकीन है कि साथी अध्यक्ष फिदेल कास्त्रो पूरी दक्षता के साथ अपना पद संभालेंगे। जो लोग फिदेल की मौत चाहते थे, उन्हें निराशा ही हाथ लगी क्योंकि फिदेल अपनी जैतूनी हरे रंग की वर्दी में वापस आ गए हैं और वे अब न केवल क्यूबा के राज्याध्यक्ष हैं बल्कि गुट निरपेक्ष आंदोलन के भी अध्यक्ष हैं। 

अध्यक्ष महोदया, मेरे प्यारे दोस्तों राज्याध्यक्षों, हवाना में दक्षिण का एक बहुत ही मजबूत आंदोलन उठ खड़ा हुआ है। हम दक्षिण के औरत और मर्द हैं। हम इन दस्तावेज़ों, इन धारणाओं और विचारों के वाहक हैं। जिन परचों और पुस्तकों को मैं वहां से अपने साथ लाया हूं - वे आपके लिए रखवा दिए गए हैं। इन्हें भूलिएगा मत। मैं वास्तव में आपसे इन्हें पढ़ने की सिफारिश कर रहा हूं। पूरी विनम्रता के साथ हमलोग इस ग्रह को बचाने, साम्राज्यवाद के खतरे से इसकी हिफाजत करने की दिशा में वैचारिक योगदान करने का प्रयास कर रहे हैं और भगवान ने चाहा तो जल्दी ही यह काम हो जाएगा। इस सदी की शुरूआत में ही यदि खुदा ने चाहा हमलोग खुद भी और अपने बच्चों, अपने पोते-पोतियों के साथ एक शांतिपूर्ण दुनिया का मज़ा ले सकेंगे, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के नवीन और पुनर्निधारित बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप होगी। मेरा विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ किसी अन्य देश में स्थापित होगा, दक्षिण के किसी शहर में। हमने इसके लिए वेनेजुएला की ओर से प्रस्ताव दिया है। आप सबको पता है कि हमारे चिकित्सकों को हवाई जवाज में बंद करके रोक दिया गया है। हमारे सुरक्षा प्रमुख को हवाई जहाज में बंद कर दिया गया। वे उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ में नहीं आने देंगे। एक और दुव्र्यवहार, एक और अत्याचार।
अध्यक्ष महोदया, मेरा आग्रह है कि इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर उसी सल्फ्यूरिक शैतान को जिम्मेदार माना जाए। 

गर्मजोशी भरा आलिंगन। खुदा हम सब की खैर करे।

शुभ दिवस।

साभार: समकालीन जनमत, अप्रैल 13

Friday, February 24, 2012

सागर और रेत - भाग एक

डाकिये की ओर से :प्रस्तुत उद्धरण खलील जिब्रान की क्लासिक 'सेंड एंड फोम' के अपरिपक्व हिंदी अनुवाद है:



_________________________________________


तुम अंधे हो, मैं बहरा और गूंगा.
तो चलो, हाथों को छूकर समझें.

_________________________________________


आपकी प्रासंगिकता इस बात से नहीं है कि आप क्या पाते हैं, अपितु इससे है कि आप क्या पाना चाहते हैं.

_________________________________________


तुम मुझे कान दो, मैं तुम्हें आवाज़ दूँगा.

_________________________________________

Jesus the Son of Man (Khalil Gibran)


मेरा कहा, आधे से ज्यादा तो अर्थहीन ही होता है. लेकिन मैं फिर भी वो अर्थहीन कहता हूँ, जिससे कि बाकी का महत्वपूर्ण भी आप तक पहुंचे.

_________________________________________


‘सत्य’ जानने योग्य तो सदैव ही है, किन्तु आवश्यक्तानुसार ही कहे जाने योग्य है.

_________________________________________


मेरी आत्मा की आवाज़ आपके आत्मा के कानों तक कभी नहीं पहुंच सकती, लेकिन फिर भी चलो बातें करें, कि हम तन्हा न महसूस करें.

_________________________________________


जब दो स्त्रियाँ बात करती हैं, वो कुछ नहीं कहतीं.
जब एक स्त्री बोलती है, वो अपना सम्पूर्ण जीवन वर्णित कर चुकती है.

_________________________________________


केवल मूर्ख ही वाचाल से ईर्ष्या रखता है.

_________________________________________


आप ‘वास्तव’ में अपनी आँखें खोल के तो देखो, हर दृश्य में स्वयं को दृश्यमान पाओगे.
और हर आवाज़ में अपनी ही अंतर्ध्वनि सुनोगे, जो अपने कान ‘वास्तव’ में खुले रख के सुनोगे.

_________________________________________


तब जबकि शब्दों की लहरें हमेशा से ही हमारे ऊपर हैं, तो भी हमारे अंतस की गहराई सदा शांत है.

_________________________________________


सत्य की खोज दो के बिना संभव नहीं; एक, जो कहे; दूसरा, जो समझे.

_________________________________________


आओ चलो आइस-पाइस खेलें...
जो तुम मेरे दिल में छुपो तो तुम्हें ढूँढना मुश्किल कहाँ?
जो तुम अपने ही बनाये आवरण में छुप जाओ तो, क्षमा करना किन्तु, कोई
तुम्हें ढूँढना ही क्यूँ चाहेगा?

_________________________________________


जो एक स्त्री को समझ सके, वो जो बुद्धिजीवियों की आलोचना कर सके या सुलझा सके मौन के रहस्य की गुत्थी,
वो,वही इंसान है जो सुबह एक सुन्दर स्वप्न देख के जागे नाश्ते की मेज में बैठने के लिए.

_________________________________________


हमारे विचार किसी विशेष मत,व्यक्ति अथवा संस्था के प्रति झुके हुए और आरक्षित नहीं होने चाहिए. एक छिपकली की पूँछ और एक कवी की कृति, दोनों ही इसी एक जहान के प्रताप की देन हैं.

_________________________________________


उनकी प्रेरणा और कुछ नहीं, दरअसल, हमारे ह्रदय में अपनी कलम डुबाना ही थी.

_________________________________________


कविता कोई विचार नहीं, वो तो एक गीत है जो रिसते घावों से बह निकला, या एक हँसते चेहरे से.

_________________________________________


कविता ‘खुशी’ और ‘दर्द’ का कारोबार है, चुटकी भर शब्दकोष के साथ.

_________________________________________


मैंने एक लेखक मित्र से कहा, ”आपका महत्त्व आपकी मृत्यु तक नहीं पता लगना.”
लेखक बोले,”हाँ मृत्यु सदा से ही राज़ खोलती आई है. और अगर ऐसा हुआ कि आप
को मेरा महत्त्व मेरी मृत्यु के बाद लगा, तो संभवतः मेरे ह्रदय में उससे
कहीं अधिक था, जितना कि मेरी जुबां पर रहा. और मेरी इच्छाओं में उससे
कहीं अधिक था जितना कि मेरे हाथों में.”

_________________________________________


यदि आप, सहरा के एकांत में भी सौंदर्य-गीत गातें हैं तो आपको श्रोता मिल ही जायेगा.

_________________________________________


प्रेरणा हमेशा गायेगी, प्रेरणा व्याख्या नहीं करती.

_________________________________________


आपकी सोच ही आपकी कविता का ‘गतिरोधक’ है.

_________________________________________


एक महान गायक वो है जो हमारा मौन गुनगुना सके.

_________________________________________


आप गीत कैसे गा कैसे सकते हैं, जबकि आपके मुंह में तो गुड़ भरा है.
आप आशीर्वाद के लिए हाथ कैसे उठायेंगे अगर आपकी मुट्ठी में हीरे-जवाहरात हैं?

_________________________________________


हम सौंदर्य की खोज के वास्ते ही जीते हैं. बाकी सब इंतज़ार के ही रूप हैं.

_________________________________________


कई सारी स्त्रियाँ पुरुष का ह्रदय ‘उधार’ लेती हैं, किन्तु कुछ ही ‘अधिकार’ लेती हैं.

_________________________________________


यदि आप ‘इसका’ अधिकार रखते हैं तो दावा क्या करना ?

_________________________________________


जब पुरुष और स्त्री एक दूसरे का हाथ छूते हैं तो वे दोनों ही शाश्वतता का हृदय छूते हैं

_________________________________________


हर पुरुष दो स्त्रियों से प्रेम करता है, एक; जो उसकी कल्पनाओं की कृति है, दूसरी; अभी तक नहीं जन्मी.

_________________________________________


कितनी बार मैंने उन गलतियों का दोष भी अपने सर मढ़ा है जो कि मैंने की ही नहीं,लेकिन जिससे की अगला व्यक्ति मेरी उपस्थिति में, आरामदेह महसूस करे.

_________________________________________


यदि प्रेम चिर-नूतन नहीं तो आदत बन जाता है और अंततः गुलामी.

_________________________________________


प्रेम वो है जो दो के बीच है, न कि एक-दूसरे से.

_________________________________________


प्रेम प्रकाश का वो शब्द है, जो किरण के पन्नों में रोशनी के हाथों से लिखा हुआ है.

_________________________________________


दोस्ती एक मीठा उत्तरदायित्व है न कि अवसर.

_________________________________________


मेरा घर मुझसे कहता है,”मत जाओ, कि यहीं तो तुम्हारा सुनहरा अतीत है.”
और सड़क कहती है,”आ जाओ, कि मैं ही तुम्हारा भविष्य हूँ.”
और मैं, दोनों से ही कहता हूँ,”न तो मेरा कोई माज़ी है, न ही मेरा भविष्य."
यदि मैं यहाँ रुकूं, मेरे रुकने में ही मेरी गति है और यदि मैं वहाँ जाऊं, मेरे चलना ही मेरी जड़ता. केवल प्रेम और मृत्यु ही बदलाव लाते हैं.”
आश्चर्यजनक है कि खुशी की आकांशा ही मेरे दुखों का मूल है.


_________________________________________


यदि आप मित्र को सभी परिस्थितियों में नहीं समझ पाते तो आप कभी उसे नहीं समझ पायेंगे.

_________________________________________


तुम्हारा दिमाग और मेरा ह्रदय तब तक सहमत नहीं होंगे, जब तक कि तुम्हारा दिमाग ‘सांख्यिकी’ में और मेरा ह्रदय ‘धुंध’ में रहना न छोड़ दें.

_________________________________________


हम एक दूसरे को नहीं समझ पाएंगे जब तक कि हम भाषा को सात शब्दों तक सीमित न करे दें.

_________________________________________


जब आप सूरज से मुंह फेर लेते हैं, आप अपनी ही छाया देखते है.

_________________________________________


मेरे ह्रदय का बाँध कैसे खुलेगा, जब तक टूटेगा नहीं ?

_________________________________________


भेडिये ने भेड़ से अनुग्रहपूर्वक कहा,”क्या आप हमारे मेहमान बनकर हमें अनुग्रहित नहीं करना चाहेंगे ?”
भेड़ ने उत्तर दिया,”हम ज़रूर आपके घर आते यदि वो आपका पेट नहीं होता.”

_________________________________________


मैंने देहरी में ही मेहमान को रोककर कहा, ”नहीं जनाब ! मेहरबानी करके आते वक्त अपने पाँव मत धोइए, जब जाइयेगा तब ज़रूर धोइयेगा.”

_________________________________________


आप वाकई बहुत बड़े दानी हैं यदि देते वक्त आप अपना मुंह दूर फेर लेते हैं,जिससे की ग्रहण करने वाले को लज्जा का अनुभव न हो, और हो भी तो आप कम से कम उसे न देख पाएं.

_________________________________________


दुनिया के सबसे धनवान व्यक्ति और सबसे निर्धन के बीच में एक दिन की भूख और एक घंटे की प्यास भर का अंतर है.

_________________________________________


हम हमेशा आने वाले कल से उधार लेकर बीते हुए कल का उधार चुकाते हैं.

_________________________________________


मुझे भी देव और दानव मिलने आते हैं, पर मैं बड़ी आसानी से उनसे छुटकारा पा जाता हूँ.
जब देव आते हैं, मैं एक पुरानी प्रार्थना करने लगता हूँ.
और जब दानव आता है मैं एक पुराना अपराध कर देता हूँ. दोनों ही मुझे छोड़ के चल देते हैं.

_________________________________________


आप वास्तव में एक क्षमा देने वाला कहलाते हैं, यदि, आप क्षमा कर दें उस कातिल को जिसने खून की एक भी बूँद भी नहीं गिराई, आप क्षमा कर दें उस चोर को जिसने कभी चुराया नहीं और क्षमा कर दें उस झूठे को जिसने झूठ नहीं बोला.

_________________________________________


यदि आपका ह्रदय ज्वालामुखी है तो आप कैसे अपेक्षा रखते हैं कि आपके हाथों में एक फूल खिला रहेगा.

_________________________________________


जो आपकी कमीज़ से अपने गंदे हाथ पोछे तो उसे अपनी कमीज़ ले जाने दो,क्यूंकि उसे इसकी दोबारा आवश्यकता हो सकती है, आपको निश्चित ही नहीं.

_________________________________________


जो मुझसे कमतर हैं वही मुझसे घृणा एवं ईर्ष्या करते,
मुझसे कोई भी नफरत अथवा घृणा नहीं करता, मैं किसी से भी बढ़कर नहीं.
जो मुझसे बढ़कर हैं वही मेरा उत्साहवर्धन करते,
मेरा कभी भी उत्साहवर्धन नहीं हुआ, मैं किसी से भी कमतर नहीं.

_________________________________________


हम सभी कैद में हैं, लेकिन हम में से कुछ एक की कोठरियों में खिड़कियाँ हैं.

_________________________________________


यदि कभी हम एक दूसरे के सामने अपने अपराधों को स्वीकार करने लगे, तो हम
एक दूसरे के ऊपर हसेंगे,
कारण : मौलिकता का अभाव.
यदि कभी हम एक दूसरे के सामने अपने गुणों की बातें करने लगे, तो भी हम
एक दूसरे के ऊपर हसेंगे,
कारण : मौलिकता का अभाव.

_________________________________________


‘सरकार’ आपके और मेरे बीच एक संधि है. आप और मैं ज्यादातर गलत होते हैं.

_________________________________________


दूसरे की गलतियों को उकेरना क्या उससे भी ज्यादा बड़ी गलती नहीं कहलाई ?

_________________________________________


यदि ‘कोई दूसरा व्यक्ति’ आप पर हँसता है, तो आप उसपर दया कर सकते हैं.
(किन्तु) यदि आप उस पर हँसते हैं तो आप अपने को कभी क्षमा नहीं करे पाएंगे.
यदि ‘कोई दूसरा व्यक्ति’ आपको क्षति पहुंचाता है , तो आप उसपर दया कर सकते हैं.
(किन्तु) यदि आप उस को क्षति पहुंचाते है आप अपने को कभी क्षमा नहीं करे पाएंगे.
वास्तव में वो ‘कोई दूसरा व्यक्ति’ आपका ही सबसे सम्वेदनशील भाग है,बस शरीर आपसे अलग है.

_________________________________________


ये क़त्ल हो जाने वाले का सम्मान है की वो कातिल नहीं है.

_________________________________________


मानवता की आशा शांत मन में है, वाचाल दिमाग में नहीं.

_________________________________________


एक छात्र और एक लेखक में एक हरा मैदान है, छात्र उसे पार कर जाए तो वो एक बेहतर इंसान हो जाता है, लेखक उसे पार कर जाए पैगम्बर हो जाता है.

_________________________________________


हम अपनी खुशियाँ और क्षोभ का चुनाव उनका अनुभव करने से बहुत पहले करे लेते हैं.

_________________________________________


उदासी दो बगीचों के बीच कि दीवार है.

_________________________________________


यदि आपकी खुशियाँ अथवा आपके क्षोभ बड़े बन जाएँ तो दुनिया छोटी बन जाती है.

_________________________________________


जब आप अपनी ऊँचाई मैं पहुंच जाओ तो इच्छाओं कि इच्छा करो, भूख कि भूख हो और किसी और भी बड़ी प्यास कि प्यास हो.

_________________________________________


यदि मैं, दर्पण, आपके सामने खड़े हो जाऊं, और आप मुझसे कहें कि आप मुझसे प्रेम करते हो, तो आप उस खुद से प्रेम करते हो जिसका अक्स मुझमें है.

_________________________________________


आप उसे भूल सकते हो कि जिसके साथ आप हँसे, किन्तु उसे कैसे भूलोगे जिसके साथ रोये?

_________________________________________


नमक में कोई न कोई तो आश्चर्य जनक बात रही होगी, कोई रहस्य. वो हमारे आंसुओं में भी है और समुद्र में भी.

_________________________________________


अगर आप बादलों कि सवारी करें, आप देशों के बीच कोई सीमा रेखा नहीं पाएंगे, आप खेतों के बीच भी सीमाएं नहीं पाएंगे.
अफ़सोस कि आप बादलों में सवारी नहीं कर सकते .


Tuesday, February 14, 2012

पंच प्रेमधुन

     वेलेंटाइन डे मनाने या ना मनाने के आपके तमाम तर्क और ऐतराज हो सकते हैं, लेकिन अगर इसी बहाने कुछ प्यार मे ढली प्यारी धुने गुनगुनाने का इरादा हो तो फ़ितरतन ये शय बुरी नही! प्यार पे पड़ने, ना पड़ने, उससे बाहर निकल आने, फिर से उसी मे जा पड़ने की तमाम वजहें जिंदगी दे सकती है (और आप खुद को जस्टीफ़ाइ भी कर सकते हैं..हर बार) मगर प्रेम नामक इस रहस्यमय तत्व (जिसके गुणो-अवगुणो पर अनंत काल से निष्कर्षहीन वैज्ञानिक-दार्शनिक-सामाजिक अनुसंधान जारी हैं) को अपनी जिंदगी से स्थाई तौर पर बाहर कर पाना संभव नही होता है। क्योंकि हमारी आत्मा भी इसी तत्व से बनी हुई होगी शायद। खैर अगर ढाई अक्षर पढ़ने (और डाकिये की बकवास सुनने) का आपका इरादा ना भी हो तो भी संगीत की कोमल स्वर लहरियों के जादू से बच पाना नामुमकिन होता है। और यह एक ऐसी दुनिया का दरवाजा है जो दुनिया की सारी भाषाओं, भूगोल के परे जा कर खुलता है, अनुभूतियों के आँगन मे। फिर प्रेम भी तो एक अनुभूति है बस। तो भाषाओं और भूगोल की सरहदों से परे सुरों की सीढियाँ चढ़ते हुए इस मौके पर रूबरू होते हैं समंदर पार के कुछ क्लासिक और शुद्ध 24 कैरेट के रोमांस भरे गीतों से। वैसे तो कोई भी गीत बोलों के संग ही अपनी धुन और गायन की कमंद के सहारे आपके दिल मे उतरता जाता है, फिलहाल गानों के लिरिक्स के ’संक्षिप्त और चलताऊ’ भावानुवाद भी इस डाक के साथ मे नत्थी कर दिये गये हैं। रोमांस की यह संगीतमय पेशकश खासकर उन लोगों के लिये जो प्यार के सिर्फ़ सैद्धांतिक पक्ष पर यकीन रखते हैं (या रखने को मजबूर हैं)। ;-)


*********

    अल दी ला (ईटालियन): साठ के दशक के प्रसिद्धतम और गजब के रोमांटिक इस इतालवी गीत को यूं तो कई गायकों ने अपनी आवाज दी है. मगर एमिलिओ पेरिकोली के गाये इस वर्जन की बात जुदा है। पहले प्यार जैसी शुद्ध भावुक और आवेगपूर्ण गीत मे गुइलिओ रपेत्ती के लिखे हुए प्रेमिका की तारीफ़ मे शब्दों के खजाने खोल देने वाले बोल एमिलिओ की लोचदार आवाज के पंखों पर चढ़ कर आपको इस दुनिया से परे प्यार की एक दूसरी ही दुनिया मे ले जाते हैं। यह वर्जन (और वीडियो भी) फ़िल्म ’रोमन एडवेंचर’ का हिस्सा है, मगर गीत की लोकप्रियता कई दशकों के बावजूद अभी तक कायम है। वैसे इस गाने के कोनी फ़्रांकिस और बेट्टी कर्टिस वाले फ़ीमेल वर्जन भी कुछ कम लोकप्रिय नही। 

कभी यकीन नही था खुद पर
कि कह पाऊँगा तुमको ये बात:
दुनिया की सबसे अनमोल चीजों से भी परे, वहाँ हो तुम
सबसे महत्वाकाँक्षी सपनो से भी परे, वहाँ हो तुम
खूबसूरत से भी खूबसूरत चीजों से परे
सितारों से भी परे, वहाँ है तुम्हारी जगह
दुनिया की हर चीज से जुदा, वहाँ जहाँ तुम मेरी हो, हाँ सिर्फ़ मेरी
सबसे गहरे समंदरों से भी परे, वहाँ तुम हो
दुनिया की हदों से भी परे, वहाँ तुम्हारी जगह है
अनंत समय से परे, जिंदगी से परे
वहाँ जहाँ तुम हो, हर चीज से परे
वहाँ तुम हो मेरे लिये !


*********

   तू सेइ रोमांतिका (फ़्रेंच): अब अगली बारी प्रेमी की तारीफ़ की। दालिदा का नाम पिछली सदी के फ़्रांस की सबसे लोकप्रिय गायिकाओं मे से एक है। मूलतः इतालवी इस गीत का यह फ़्रांसीसी वर्जन है जिसे दालिदा ने अपनी अलहदा और खूबसूरत आवाज के पैमाने मे ढाल कर खासा नशीला बना दिया है। दालिदा भी वैसे तो इतालवी मूल की ही थीं मगर उन्होने दस से भी ऊपर भाषाओं मे गाने गाये। किसी शर्माये सकुचाये प्रेमी के मन की गिरहें खोलती प्रेमिका के दिल से छलकते प्यार का सोंधापन दालिदा की आवाज से भी छलका जाता है। वैसे इसका मूल इतालवी वर्जन डिनो वर्दे का लिखा और रोनातो रास्केल का गाया हुआ है।

तुम भी अजब हो, पर जाहिर नही होने देते
और कोई जान भी नही पाता है
अजीब हो तुम, तुम्हारी आँखों मे अगन नही दिखती
मगर तुम्हारे दिल मे छुपी है अगन

कितने रूमानी हो तुम, और आवारा
तुम नही करोगे कुबूल
मगर मै जानती हूँ
सब पता है मुझे
इतने रूमानी हो तुम, तभी मेरा दिल आता है तुम पर
कितनी उदास होती है तुम्हारी आंखें
जब हमारे आसमां का नीलापन होता है कम

बच्चे से खिलखिलाती हँसी या कि बहार का कोई फ़ूल
लकड़ियों मे जलती आग सा कोई गीत
दिल मे ही छुपा लेते हो प्यार
और मेरे सामने जाहिर नही होने देते
डरते हो कि मजाक न बने तुम्हारा
अपनी खुशियों को जाहिर नही होने देते
रखते हो खुद से भी छुपा कर

तुम हो इतने रूमानी कि मै तुम पर जान देती हूँ
तुम्हारे होने से मुझे जिंदगी एक खूबसूरत कविता सी लगती है

तुम छुपाते हो मगर पता है मुझे
तुम्हारे अक्स से बने होते हैं मेरे सब सपने
और जब मै देखती हूँ तुम्हे रूमानी और आवारा
मुझे तुम ही लगते हो वजह
मेरी सारी खुशियों की

कितने रूमानी हो तुम
रूमानी हो मेरे लिये


*********

   केरार इ अमॉर (स्पेनिश): यह मधुर गाना प्रसिद्ध मेक्सिकन गायक होसे होसे के सबसे लोकप्रिय गानों मे शुमार है। रोमांटिक गीतों के राजकुमार की उपाधि से नवाजे गये होसे बीसवी सदी के उत्तरार्ध के सबसे प्रसिद्ध लैटिन गायकों मे से माने जाते हैं। उनकी सौम्य और मोहक आवाज और कर्णप्रिय संगीत से सजा यह गीत प्यार को डिफ़ाइन करने की कोशिश करता है और सच्चे प्यार को हाइलाइट करने की भी। वैसे होसे के गाये रोमांटिक गाने दुनिया के हर कोने मे लोकप्रिय हुए हैं।

हर किसी को मालुम है लगभग
कि कैसे चाहा जाता है किसी को
मगर कुछ ही जानते हैं
कि कैसे किया जाता है प्रेम
एक बात नही है दोनो
चाहना और प्रेम करना
प्यार होता है दर्द, चाह होती है आनंद के लिये
प्यार होता है बढ़ते जाना आगे
निछावर कर दे्ना जीवन प्रेम मे
लालसा रखने वाला जिये जाना चाहता है जबकि,
नही चाहता पीड़ा भोगना
प्रेम मे सो्चा नही जाता कुछ, बस दे देना होता है अपना सब कुछ
कामना रखने वाला भूलना चाहता है सब
नही उठाना चाहता दुख
बहुत जल्द खत्म हो जाती है चाहत
जबकि प्रेम होता है अनंत

प्रेम है आकाश और प्रकाश
प्रेम सम्पूर्णता देता है
समंदर जिसका कोई किनारा नही
प्रेम है कीर्ति और अमन
लालसा है दैहिक, एक अंधे कोने की तलाश
लालसा है छुअन, चुंबन
लालसा है पल भर की आग

सबको आता है चाहना किसी को
किसी किसी को आता है प्रेम करना


*********

   बेबी इट्स कोल्ड आउटसाइड (इंग्लिश): इस कड़ी मे अगली पेशकश एक अमेरिकन युगल गीत है। फ़िल्म ’नेपच्यून’स डाटर’ के इस गीत को 1949 का आस्कर अवार्ड मिला था और यह गीत आस्कर विजेता लोकप्रियतम गीतों मे से शुमार किया जाता है। इसको जॉनी मर्सर और मार्गरेट व्हाइटिंग ने अपनी आवाज दी है। इस गीत मे टीन-एज प्रेम अपने सबसे आम और सहज रूप मे सामने आता है। यहाँ प्यार फ़ैंटेसी भर नही है बल्कि प्यार की कोमल मिठास भरे विलयन मे पिता, भाई, अम्मा, पडोसी और दुनिया भर की भी फ़्रिक्रें घुली हुई हैं। छेड़छाड़ और हलकी शरारत, नजाकत भरे बोलों मे जहाँ लड़के की अपनी प्रेमिका से कुछ देर और रुक जाने की प्यार भरी कामनामय मनुहार है तो लड़की के प्यार मे डूबे दिल और तमाम डरों से घिरे दिमाग के तमाम बहानों के बीच की कशमकश है। टिपिकल बालीवुडिया किस्म के प्रेम मे रचा हुआ यह गाना कितनी भी बार सुने आपको हर बार पहले से अच्छा ही लगता है। क्लासिक का दर्जा प्राप्त इस गाने को तमाम दूसरे कई गायकों ने भी अपनी आवाज दी है।


*********

   ला वियें इन रोज (फ़्रेंच): पोस्ट का आखिरी गाना पिछली सदी के सबसे रोमांटिक और पापुलर गानों मे से एक है। फ़्रेंच गायिका एदिथ पियाफ़ का यह गाना प्रेमधुन के धुनियों के लिये जरूरी खुराक है। सौ टके रोमांस मे डूबे बोलों को एडिथ की विशिष्ट आवाज की कालातीत स्पर्श और खासे नास्टाल्जिक म्यूजिक का साथ एक दैवीय फ़्लेवर देता है कि यह गीत फ़्रांस के सर्वकालिक लोकप्रिय गीतों मे ही नही बल्कि प्रेम की सर्वकालिक लोकप्रिय धुनों मे से एक माना जाता है।

आंखें जो निहारती हैं मुझमे
मुस्कराहट जो खो जाती है होठों पर
अछूती सी छवि है मेरे प्रियतम की
मै हूँ जिसकी

जब वो मुझे बाहों मे भरता है
और हौले से कुछ कहता है कानों मे
मुझे जिंदगी गुलाबों सी रंगीन दिखती है
उसकी प्रेम से पगी बातें
रोजमर्रा की बातें
जादू सा करती जाती है मुझ पर
खुशी से भरता जाता है मेरा दिल
और मै जानती जाती हूँ
कि वो मेरा है और मै उसकी, सारी उमर
उसने बोला है मुझे
जिंदगी भर के संग का वादा किया है मुझसे
मै अपने अंदर महसूसती हूँ
अपना दिल धड़कता हुआ

प्यार की अंतहीन रातों मे
एक खुशी छाती है धीरे-धीरे
और सारा दर्द, सारी चिंताएं गुम होती जाती हैं
खुशी खुशी मर सकते हैं प्रेम मे



Wednesday, January 4, 2012

कविता के पन्नों मे नया साल: कोबायाशी इस्सा-2

(पिछली पोस्ट से जारी)
     कोबायाशी इस्सा साहब की जो बात उनको दूसरे समकालीन हाइकू के महारथियों से अलग करती थी, वह थी उनकी कविता की बच्चों जैसी अद्भुत सरलता और साधारणता। गहरी दार्शनिक गुत्थियों मे गंभीरता के साथ उलझने की बजाय वो ज्यादातर अपने आस-पास की चीजों को कविता का विषय बनाते थे और उनके तमाम हाइकू उनके इसी खिलंदड़ेपन और ह्यूमर की बानगी नजर आते हैं। कोई भी चीज उनकी कविता के परिधि से परे नही थी और उनकी उपहासात्मक नजर विषयों मे पवित्रता का फ़र्क नही देखती थी। लगातार संघर्षों से जूझते उनके जीवन ने अपने दुखों का भी मजाक बनाने की कला विकसित कर ली थी। वो खुद ही कविता के बहाने अपनी मुफ़लिसी, बीमारी, पियक्कड़ी, आलसीपन और शक्लो-सूरत का मजाक उडाते ही थे बल्कि उनकी मजे लेने की शैली चपेट मे अक्सर देवता और धार्मिक व्यक्ति भी आ जाते थे। मगर जिंदगी के प्रति इतना उपहासात्मक रवैया रखने के बावजूद उनकी तमाम उम्र विषमताओं से जूझते हुए ही बीती।
    खुद को ’शिनानो-प्रांत का भिक्षुक’ कहलाना पसंद करने वाले इस्सा की कविता मे अतिशय विद्वत्ता, विशिष्टता और पवित्रता जैसी ’असाधारणताओं’ के प्रति निषेध-भाव ही देखने को मिलता है। अपनी जिंदगी की तरह वो अपनी कविता को भी आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से करीब और और फलतः जमीन से जुड़ा हुआ बनाये रखते हैं। तमाम ’काव्योचित’ विषयों (तब की जापानी कविता जिन विषयों के इर्द-गिर्द घूमती थी) के प्रति नकार का भाव ही था कि वो बेहद उपेक्षणीय और साधारण सी चीजों को अपनी कविता का केंद्र बनाते थे। पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी उनकी कविता मे बेहद प्रभावी और सजीव रूप से उपस्थित होते थे। एक स्रोत के मुताबिक अपने जीवनकाल मे उन्होने 54 हाइकु घोंघे पर, 200 मेढक पर, 230 जुगनू पर, 150 मच्छर पर, 90 मक्खियों पर लिख डाले। कविता मे साधारणता और मानवीयता का यही आग्रह उन्हे हाइकु के दूसरे मास्टरों से अलग खड़ा करता है।
  खैर, यहाँ इस्सा के नये साल पर कुछ और उम्दा हाइकु का हिंदी तर्जुमा पेशे-खिदमत है।

****
गोदाम के पिछवाड़े
तिरछा चमकता है
साल का पहला सूरज


 
(अपने जीवन के उत्तरार्ध मे उनके गाँव मे आग लग जाने से उनका घर साजो-सामान सहित जल कर खाक हो गया था। फलतः जिंदगी के बाकी तमाम दिन उन्हे जरा सी गोदाम मे रह कर गुजारने पड़े थी, जहाँ कि सूरज की रोशनी भी थोड़ी सी ही आती थी। यह हाइकु संभवतः उन्होने इसी परेशानी पर तंज कसते हुए लिखा था।)
****
थोक मे अभिनंदन करता
साल की पहली बारिश का
टपकता हुआ घर

 
(अपने घर की दुर्दशा के बहाने वो अपनी आर्थिक खस्ताहाली पर भी व्यंग्य करने से नही चूकते हैं।)
****
खूब है ये भी साल
भिनभिनाती आपस मे
द्वार पर मक्खियाँ


(इस्सा के हाइकु मे पशुओं-पौधों-कीड़ों की उपस्थिति बड़ी मानवीय और मूर्त होती थी, वहीं अपने अहसास उजागर करने के रूपक भी।)
****
दीवार मे छेंद
कितना सुंदर तो है
मेरे साल का पहला आकाश


(यह इस्सा के तीखे हास्यबोध और जिंदगी के प्रति फ़क्कडपन का बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ टूटे घर मे भी वो ऐसी सकारात्मकता खोज लेते हैं कि जिंदगी से कोई शिकायत न हो।)
****
झोपड़ी के मच्छर
इस कम्बख्त साल भी
उड़ायेंगे दावत


(यह हाइकु भी इस्सा के खुद का मजाक उड़ाने की आदत की बानगी है। अपनी कठिन जिंदगी और रहने की दिक्कतों के बहाने मच्छरों की लाटरी खुल जाने की बात करना उनके स्वभाव के खिलंदड़ेपन की निशानी ही होगी।)
****
निकल आये पंख
उड़ गया मेरा रुपिया
खतम हुआ साल


(साल के आखिर मे सारा उधार चुकता करने मे गाँठ के पैसे खतम हो जाने पर इस्सा को अचरज होता है कि इतनी मेहनत से कमाया पैसा कितनी जल्दी ’उड़’ गया, कि नये साल का स्वागत करने के लिये उनके पास धेला भी नही बचा।)
****
नही खड़ी कर पाया हवेली
जिसने नही चखी शराब
गम मे खतम हुआ साल


(अपनी पियक्कड़ी का बचाव करते हुए इस्सा मजाक करते हैं कि अमीर बनने के लिये ’पीना’ भी जरूरी शर्त है, मगर बहाने से इशारा भी करते हैं कि दारू नही मिलने की वजह से उनका साल द्खद तरीके से खतम हो रहा है।)
****
साल का अंत
मेरे मृत्यु-ग्रह की घंटी
भी बजती सी

 
(ताजिंदगी अपने प्रियजनों (पहले माँ, दादी, पिता फिर बीवी और बच्चे) की मौत से जूझते इस्सा की कविता मे मृत्यु बड़ी सहजता मगर अपरिहार्यता के संग नजर आती है।)
****
एक नया साल
वही पुरानी बकवास
बकवास के ढेर पर इकट्ठी होती


(अपनी आर्थिक मुश्किलों से जूझते इस्सा कुढ़ते भी हैं कि साल बदलने के बावजूद परेशानियाँ यथावत रहती हैं, संग ही जिंदगी की एकरसता पर कटाक्ष भी करते हैं।)
****
एक और नया साल
जब तलक नही घिसता है
बारिश रोकने का पत्थर


(यहाँ पर इस्सा अपने नये घर की खुशी ही व्यक्त करना चाहते हैं कि जब तक उनका घर बारिश रोकने मे सक्षम है उन्हे वक्त बीतने की कोई फ़िकर नही है।)
**** 
बुद्ध पर है मुझे भरोसा
अब अच्छा हो या बुरा
जाते साल को विदा


(बौद्ध-भिक्षु रहे इस्सा की कविता पर बौद्ध-दर्शन का असर साफ़ दिखता है. जो शायद उनकी जिंदगी के प्रति धैर्यपूर्ण रवैये की भी वजह रही है।)


 (चित्र: उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्द जापानी पेंटर उतागावा हिरोशिगे की मशहूर कलाकृति ’फ़ुजी और अश्तका पहाड़ पर बर्फ़बारी के बाद मौसम’. साभार-गूगल)

Tuesday, January 3, 2012

कविता के पन्नों मे नया साल: कोबायाशी इस्सा-1



केंचुली बदलते कैलेंडर के बहाने कविताओं के पन्ने पलटते हुए अगला नाम आता है कोबायाशी इस्सा का। जापान के अठारहवीं शताब्दी के इस अद्भुत संत कवि के हाइकु जापान के साहित्यिक इतिहास मे कुछ वैसा ही मुकाम रखते हैं जैसा हिंदुस्तान मे कबीर की साखियों का है। हाइकु के चार स्तंभों मे ’बाशो’, ’बुसान’ और ’शिकी’ के साथ ही उनका नाम भी शामिल है। अपने जीवन काल मे कोई 20000 हाइकु लिखने वाले इस्सा की लोकप्रियता वक्त से संग बढ़ती ही गयी है। नये साल के मौके पर उनके चुनिंदा हाइकु की ओर चलने से पहले उनसे कुछ और तअर्रुफ़ करते हैं।

कोबायाशी इस्सा (1763-1827) का 64 साल का जीवन लगातार उथलपुथल से भरा रहा। गरीब किसान परिवार मे पैदाइश, कम उम्र मे माँ का गुजर जाना, सौतेली माँ का सौतेला बरताव, बीवी से अनबन, कमउम्र मे बच्चों की मौत और ताजिंदगी गरीबी से जद्दोजहद ने उनकी जिंदगी के साथ कविता पर भी गहरा असर डाला। मगर उम्दा प्रतिभाओं को तमाम विपरीत हालातों मे ही पनाह मिलती है। जगह-जगह छोटे-मोटे काम कर जीविका कमाते हुए वो शहर-शहर भटकते रहे। अपने जीवन के उत्तरार्ध मे बौद्ध-भिक्षु बन गये इस्सा कैलीग्राफी और ड्राइंग मे भी खासा दखल रखते थे। उनके हाइकु रोजमर्रा की छोटी-छोटी और बड़ी सामान्य सी घटनाओं से निकलते हैं और जीवन की इन साधारणताओं को गहरी दार्शनिक और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति देते हैं।

बचपन मे ही अपनी माँ को फिर अपनी प्यारी दादी को भी खो देने वाला यह बच्चा अपने अनुशासन-पसंद कठोर पिता और सौतेली माँ के बुरे बर्ताव के बीच पिसता हुआ बड़ा एकाकी होता गया। लोगों से मेलजोल के बजाय इधर-उधर जंगलों मे घूमता हुआ पेड़-पौधों-पक्षियों के संग अपना निपट अकेलापन बाँटता रहा। कविता की प्रतिभा इसी अंतस्‌ के अकेलेपन से छन-छन के बाहर आता रहा। बचपन का लिखा एक हाइकु एक बानगी है-
उतर आओ नीचे
खेलो मेरे संग
ओ अनाथ गौरैया!

बच्चों सी सरलता लिये और देशज भाषा के कलेवर मे सजी उनकी कविता उनकी मुश्किल जिंदगी का बेबाक आइना है। जापान की हाइकु की विधा की यह खासियत भी है कि उनका विषय और शैली बेहद सरल होते हुए भी वो भावों की गहराई लिये होते हैं। आमतौर पर हाइकु का मुख्य विषय प्रकृति होती है और इसी के बहाने उनमे जिंदगी के तमाम दार्शनिक पहुलुओं पर गहरी टिप्पणियाँ छुपी होती हैं। खैर हाइकु और इस्सा साहब की कुछ बातें और भी करेंगे मगर अभी उनके कुछ हाइकु के हिंदी तर्जुमे से परिचित होते हैं जो खासकर साल के बदलाव के इस मुकाम पर मौजूँ बैठते हैं।

****
साल का पहला सपना
मेरे गाँव का घर
आँसुओं से धुला


(साल के पहले आँसुओं मे भरे सपने की गहरी भावुकता और घर से बिछड़ने की यातना से भरा यह हाइकु उनके अपने गाँव से 17 साल लंबी जुदाई से उपजा था जैसा कि उनकी जिंदगी के बारे मे बताने वाले कई स्रोत इशारा करते हैं।)

****
लकड़ी उतराती पानी मे
कभी इधर कभी उधर
खतम होता है साल


(जिंदगी के दिशाहीन क्षणिक अस्तित्व की तरफ़ टिप्पणी करते इस हाइकु मे शायद उनके अपने ताजिंदगी भटकते रहने पर भी इशारा है)
****
गढ़ रही है
साल का पहला आकाश,
चाय की भाप

(चाय यहाँ नये साल के उत्सव का भी एक पहलू है। एक मजेदार बात यह भी है कि कवि के तखल्लुस ’इस्सा’ का जापानी मतलब भी चाय-का-कप जैसा कुछ होता है)
****
खतम हुआ साल
कब आयेगी मेरी बारी
ओ मंदिर की घंटी


(यहाँ मंदिर की घंटी अंतिम-संस्कार के वक्त बजायी जाने वाली घंटी है। किसी गहन दुख के वक्त लिखा गया यह हाइकु इस्सा के कष्टमय जीवन का एक इशारा भर है।)
****
उसका पति भी था संग
जब साल था नया
विधवा तितली

 
(साल ही नही बल्कि हमारे साथ के चीजें भी वक्त के साथ पुरानी पड़ती जाती हैं और हमारा साथ छोड़ देती हैं, इतनी कि फिर तकलीफ़देह अकेली जिंदगी और बरहना होती जाती है, यह इस्सा ने अपनी जिंदगी से खूब समझा था।)
***
बाड़ से बँधा
कुल तीन हाथ चौड़ा
साल का पहला आकाश

 
(शहरी गरीब इलाकों मे रहने की जगह की तंगी अपने हिस्से की जमीन ही नही आसमान को भी छोटा कर देती है, इस्सा को इसका अच्छा तजुर्बा रहा था।)
******
अपनी झोपड़ी मे तो
दोपहर से होता है शुरू
साल का पहला दिन

 
(साल के सबसे पवित्र दिन मे भी छायी सुस्ती के बहाने इस्सा अपने आलसीपन का एक भर नमूना पेश करते हैं)
***
कलाई का बना तकिया
अब खतम हो ये साल
चाहे ना हो खतम

(हमारे जैसे आलसियों के लिये एंथम सरीखा यह हाइकु इस्सा साहब की ’फक्कड़-फ़िलासफी’ के सबसे बेहतरीन नमूनों मे से एक है। गौरतलब है कि इस्सा साब का यह हाइकू उनके पीने के शौक की ओर भी इशारा करता है।)
******
जाड़े की सर्द हवाएँ
बहा कर लाती मृत्यु
और नजदीक, हर साल

 
(अपनी दादी की 33वीं पुण्यतिथि पर लिखा यह हाइकु जीवन से उनकी विरक्ति का एक उदाहरण है। गौरतलब है कि तमाम जिंदगी भर अपने निकटस्थ प्रियजनों के बिछोह को सहते रहे इस्सा की कविताओं मे मृत्यु बार-बार दस्तक देती है।)
********

कृमशः

(पहला चित्र: कोबायाशी इस्सा
दूसरा चित्र: होकुसाइ की प्रसिद्ध पेंटिंग ’गस्ट’)

पोस्ट के लिये हाइकु और इस्सा संबंधी जानकारी के लिये ’बैरंग’ निम्न स्रोतों का आभारी है:

Sunday, January 1, 2012

कविता के पन्नों मे नया साल: राबर्ट फ़िशर


यह एक मजेदार अंग्रेजी कविता है राबर्ट फ़िशर की। नेट पर ही कहीं मिली मुझे और पढ़ते हुए बड़ा मजा आया। मुख्यरूप से बाल कविता के कलेवर मे इस कविता की खास बात यह लगी कि यह किसी भी उम्र मे आपके बचपन के विस्मृत तंतुओं को स्पर्श करती है और आपकी एक सहज सी बरबस मुस्कान इस कविता का असल हासिल है। प्रस्तुत है हिंदी तर्जुमा नये साल की अशेष शुभकामनाओं के संग!


नये साल की कसमें: राबर्ट फ़िशर

ठान लिया है मैने
अब से बिल्ली को खिड़की से बाहर नही फ़ेकूँगा
बहन के बिस्तर मे मेढ़क भी नही छोड़ा करूँगा अब
और भइया के जूतों के फ़ीते भी आपस मे नही बाँधा करूँगा
पापा की टीन की छत से नही लगाऊँगा छलांग
बुआ का अगला जनमदिन याद रखूँगा अबकी बार
और हफ़्ते मे एक बार तो जरूर करूँगा अपने कमरे की सफ़ाई
मम्मी के बनाये खाने पर नाक-भौँ भी नही सिकोड़ूँगा
(उफ़्फ़! फ़िर वही बैंगन की सड़ी सी सब्जी!)
मम्मी से तमीज से पेश आऊँगा
अब अपनी नाक नही खोदूँगा, जब तक बस चलेगा
और तह कर के रखा करूँगा अपने कपड़े
कंघी भी करूँगा बालों मे
अब से मैं सीखूँगा ’प्लीज’ बोलना और ’थैंक यू’ भी
(भले ही झूठ-मूठ बोलना पड़े)
अब से चिल्लाना और इधर-उधर थूकना बन्द
और गाली देना तो एकदम बन्द
हर दिन करूँगा अपनी डायरी मे नोट
स्कूल मे सबकी मदद करने की भरसक कोशिश करूँगा
बूढ़ी औरतों को हाथ पकड़ कर सड़क पार करा दिया करूँगा
(भले ही उन्हे नही करनी हो सड़क पार)
तभी सोया करूँगा जब उल्लू सोने जाते हैं
और सुबह चिड़ियों के संग उठ जाया करूँगा
और अपने पीछे से दरवाजा बंद करना याद रखूँगा
अब टूथपेस्ट को एकदम नीचे से दबा कर निकालूँगा पेस्ट
और ऐसी जगह रहूँगा जहाँ मुसीबतें मेरे पास ही ना फटकें
अब सब कुछ नये सिरे से शुरू करूँगा
बदल दूँगा खुद को
एक अच्छा बच्चा बन कर दिखाऊँगा
और अपनी बुरी आदतें हमेशा के लिये छोड़ दूँगा
वैसे यह सब इस साल से शुरू करूँ या अगले साल से?
शुरू करूँ भी या....??

(चित्र: आभार गूगल)

Saturday, December 31, 2011

कविता के पन्नों मे नया साल: जेनिफ़र स्वीनी


अभी जब एक साल से दूसरे साल तक सत्ता-हस्तांतरण का वक्त नजदीक आता जा रहा है।ऐसे मे गुनगुनी धूप मे बैठ कर चाय की चुस्कियों के संग गुजर गये साल पर आत्मचिंतन करना सबसे स्वाभाविक और आरामदायक काम होता है। खैर, नया कैलेंडर टांगने से पहले पुराने हो गये इस कैलेंडर पर लगी तमाम उम्मीदों, खुशी, भरोसे, डर, आशंकाओं, कसमों की चिप्पियाँ साल के कुल जमा-हासिल की एक बानगी होती हैं। गुजरते साल के ऐसे ही हासिलों और आने वाले साल से बावस्ता उम्मीदों की इबारत को कविता के चश्मे से परखने की कोशिश हम भी करते हैं। सो आइये अगले कुछ दिनों मे देखते हैं कि कोई कवि वक्त के इस मुकाम को कितनी अलहदा नजरों से परख पाता है। इस सिलसिले मे सबसे पहले पेश है जेनिफ़र स्वीनी की एक अंग्रेजी कविता का हिंदी मे तर्जुमा। अमेरिका की इस युवा कवियत्री को कम उम्र मे ही कई अवार्ड्स से नवाजा जा चुका है। उनके कविता संकलन ’हाउ टु लीव ऑन ब्रेड एंड म्यूजिक’ (पेरुगिया प्रेस) की इस कविता मे जिंदगी की कुल गणित के टुकड़े बिखरे से नजर आते हैं।


बीत गये साल के लिये चंद कतरनें

मैने पाया है कि
औसतन विषम संख्या वाले साल
ज्यादा बेहतर रहे हैं मेरे लिये

मै उस दौर मे हूँ जहाँ मुझे हर मिलने वाला
लगता है उस जैसा
जिसे मै पहले से जानती हूँ

पतझड़ का मौसम बिना हिचकिचाहट के
मुझे धकेल देता है उन चीजों की स्मृतियों मे
जो कभी हुई ही नही मेरी जिंदगी मे

केंचुली बदलता है आसमान
और मुझे नही पता कि इसकी वजह ग्लोबल-वार्मिंग है
या कि वायुमंडल बस खुद को तैयार करता है
कि सह सके और ज्यादा नयी चमकदार यंत्रणायें

मेरे अंदर हिलोरें मारती है
आइसलैंड जाने की बेताब ख्वाहिश

तमाम बुरी चीजों के बावजूद
अभी भी हम भरे हुए हैं विचारों से
जो कि उतने ही संभव हैं
जितने कि वंध्या फ़ल

मुझे सख्त अफ़सोस होता है
कि मुझे ही समझाना होगा
नर्सरी के बच्चों को
कि सूर्यास्त और प्रदूषण के बीच रिश्ता क्या है

और क्या पता है तुम्हे
कि शुक्र-ग्रह पर हमारी उम्र
अभी एक साल से भी कम की होगी

तब यहाँ दो आसमान थे
एक जिसमे भरते थे हम अपनी उड़ान
तो दूसरे मे हम दफ़्न करते खुद को

शुक्र है कि अभी भी
मेरी दिलचस्पी कामुक विलासिता की चीजों मे नही,
मसलन बाथरूम के ऐशो-आराम के सामान

हम साथ-साथ ही हुआ करते थे हर वक्त
कहानी मे

और उसकी शादी के दिन
उसके सीने मे गड़ा पत्थर
कुछ-कुछ तो पिघल सा गया था

कभी-कभी लगता है मुझे
कि जैसे परिंदे उड़ जाते हैं मेरे अंदर से
अनंत की ओर।





(प्रथम चित्र: अमेरिकन कवियत्री- जेनिफ़र के स्वीनी)
(द्वितीय चित्र: The Key -अब्स्ट्रैक्ट-एक्सप्रेशनिज्म के अगुआ ख्यात अमेरिकन पेंटर जैक्सन पोलॉक)

Monday, June 6, 2011

डायरी के पन्ने : आंद्रेई तारकोवस्की - 1


डाकिये कि ओर से:  ये अजीब है कि हर युग में प्रतिभाशाली को कष्ट उठाने पड़े हैं. मातृभूमि भी कई बार छोडनी पड़ी है. इस दर्द के साथ सर्वोत्कृष्ट काम करना और फिर भी गरीबी रहना एक और भी अजीब स्थिति है. 

आंद्रेई तारकोवस्की को सिनेमा का मास्टर माना जाता है. सोलारिस, आंद्रेई रुब्ल्योब, मिरर, स्टाकर, नास्टेल्जिया और द सेक्रिफाइस बनाने वाले इस महान रूसी फिल्कार को सिनेमा की नई दृश्य-भाषा देने के लिए डाकिए का सलाम। 

यहां पेश है 1970 से 1986 तक की उनकी डायरी के महत्वपूर्ण अंश जो मैं यहां एडिट कर दे रहा हूं।

 विभिन्न कडि़यों के तहत लंबी चलेगी और आशा है आप सब जुड़े रहेंगे। 


1970

27 अगस्त

ओवचिन्निकोव द्वारा रचित जापान के शानदार शब्दचित्रों को नोवी मीर में पढ़ रहा हूं। विलक्षण! सूक्ष्म और प्रखर। मैं कितना भाग्यवान कि ओसाका जाने से पूर्व उन्हें पढ़ पाया।

14 सितंबर

दाॅस्तोएवस्की दो मोमबत्तियों की रोशनी में पढ़ते थे। उन्हें लैंप पसंद नहीं थे। काम के दौरान बेहद धूम्रपान करते। यदा कदा खूब कड़क चाय पीते। स्ताराया रूस्स्या से आरंभ हुआ उनका जीवन शुरू से ही ऊब और नीरसता से भरा था। उनका प्रिय रंग - - सागर की लहरों का था, अपनी नायिकाओं को उन्होंने प्रायः उसी रंग में सजाया है। 

9 जून

किसी भी किस्म की प्रशंसा का एक लक्षण यह कि अंततः वह ग्लानि में, हताशा में, यहां तक कि किसी-न-किसी हैंग ओवर में, बल्कि अपराध - भावना में जा डुबाती है। 

मैंने कहा है कि मेरा काम है कि सोवियत सिनेमा के उच्च स्तर को कायम रखूं, न कि सामयिक अथवा प्रासंगिक के पीछे भागूं। 

1973

27 जनवरी 

जिंदगी कितनी उदास है! मुझे उस शख्स़ होता है जो अपना काम राज्य से इज़ाज़त लिए बगैर कर सकते हैं। यों तो हर कोई, प्रायः हर जगह, आज़ादी से काम कर सकता है, केवल रंगमंच और सिनेमा को छोड़कर (मैं टेलीविज़न को शामिल नहीं कर रहा, क्योंकि मैं उसे कला नहीं मानता)। बेशक उन्हें पगार नहीं मिलती, लेकिन अपना काम तो कर सकते हैं।

सत्ताधारी कितने स्थूलबुद्धि हैं! क्या उन्हें साहित्य, कला, संगीत, चित्रकला, सिनेमा की सचमुच जरूरत महसूस होती है ? बेशक कतई नहीं। उलटे, उनके बगैर जीवन कितना आसान होगा ! (ऐसा वे सोचते होंगे)

मैं काम करना चाहता हूं, बस। और कुछ नहीं। काम ! यह बेशक बेतुका उन्माद और अपराध है, कि इतालवी समीक्षकों, समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने जिस निर्देशक को प्रतिभावान कहा उसे यहां बेरोज़गार रहने पर मज़बूर किया जा रहा है। 

दरअसल, मेरे ख्याल से जैसे तैसे उच्च पदों पर जा पहुंचे औसत लोगों ही की ये करतूतें मेरे खिलाफ हो सकती हैं। बेशक, औसत दर्जे के लोग कलाकारों को झेल नहीं पाते, और अधिकारीगण तो निर्विवाद रूप से घटिया स्तर ही के हैं। 

सबसे सुंदर पेड़ कौन सा है ? चिरबेल का। उसे ही पूरा विकसित होने में खूब लंबा समय लगता है। कौन जल्दी बढ़ता है ? - - बांस या पहाड़ी पीपल ? पहाड़ी पीपल बहुत सुंदर पेड़ है।

ज़रा सा और जानिये - यहाँ.
पुस्तक : अनंत में फैलते बिम्ब : तारकोवोस्की का सिनेमा
साभार : संवाद प्रकाशन, हिंदी अनुवाद. 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...