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Wednesday, October 31, 2012

प्रहसन


डाकिये की ओर से: क्या वक़्त था कि जब गांव के बड़े से घर में एक भी घड़ी नहीं थी। और घड़ी की जरूरत भी नहीं थी। छत पर सोए हुए सुबह सूरज की चैंधियाती हुई धूप पड़ी तो जगना हुआ। धूप चापाकल से सरका तो साढ़े आठ का बजना मालूम हुआ। प्राइमरी स्कूल की घंटी बजी याने 9:50। भंसा घर के घर पर धूप चढ़ी तो साढ़े तीन। 

क्या वक्त था कि पटना में हर वक्त रेडियो चलता रहता था। काम कोई नहीं रूकते थे। जीवन संगीतमय लगता था। आज रेडियो शौक से सुनते हैं या बोर होकर। शौक से सुनो तो भी एफ एम पर वही हर-हर-कच-कच। उन दिनों यह जीवन का अंग था। स्टूल पर ऐंड़ी उचकाकर मर्तबान से कटहल अचार उतार रहे हों या शेविंग कर लेने के बाद अपने गालों पर नज़रों का ज़ूम करके देखना कि अबकी कहां कहां ब्लेड लगी है। मैथ गज़ल सुने बिना नहीं बनता था। मां कंघी करते हुए रेडियो के साथ ही दबी आवाज़ में गाती - ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें। गोया तब सारा समय रेडियो से तय होता था। विविध भारती से आवाज़ छन ऐसे आती जैसे जून के महीने में गीले उजले बालू पर कोई भीगा घड़ा रखा हो और उसके मुंह पर उजले कपड़े की दो तीन तह रखे हों। उसी से आवाज़ छन कर आती हो। उन दिनों रेडियो प्रस्तोता हीरो थे। हम आवाज़ों की नकलें करते। 

 बाद में ए आई आर के कैंटीन और न्यूज़ रूम में उन्हीं आवाज़ों से सीधे सीधे मिलता, काम करता, चाय पीता। आवाज़ का जादू टूटता। क्लेयर नाग, शुभ्रा शर्मा, आशा निवेदी, आशुतोष जैन। और पीस टू कैमरा देते वो पटना दूरदर्शन वाले संवाददाता जो अपने नाम पर विशेष पाॅज़ देते - सुधांशु रंजन, दूरदर्शन समाचार, पटना। 

 बीप की चार छोटी और एक लंबी आवाज़.... - ये आकाशवाणी है अब राजेंद्र चुघ से समाचार सुनिए। यानि सुबह के 7:45। अगर यही रात को तो 8:45। 8:45, यानि उससे ठीक पहले हवामहल। अक्सर हवामहल का क्लाईमैक्स कट जाता। तब वैसी ही कोफ्त होती जैसे उन दिनों सिनेमा शुरू होने से पहले कितने रील की है यह देखने से छूट जाता। हवामहल का वो सिग्नेचर काॅमेडी भरा सिग्नेचर ट्यून। उन्हीं दिनों उस पर एक प्रहसन सुना जो कि श्रोताओं में सुपरहिट है। सिबाका गीतमाला की तरह। पिछले दिनों आकाशवाणी दिल्ली से ‘इक्वेरियम के मछली’ सुनते वक्त वो प्रहसन उदयपुर की ट्रेन की बहुत याद आई। 

 आप भी सुनिए यह स्वस्थ, गुदगुदाने वाला प्रहसन।

 


Wednesday, August 22, 2012

पैकेज


डाकिए की ओर से: हाल ही में मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी से गुज़र रहा था और मन्नू की विनम्रता के आगे निहाल था। लेकिन मेरी समस्या दूसरी थी। उसमें जहां जहां उनके पति राजेन्द्र यादव की बुराईयां, झूठ और गलतियां सामने आ रही थी मुझे न जाने क्यों राजेन्द्र यादव के प्रति दिल में एक हमदर्दी पैदा होती जा रही थी। कुछ तो है उनमें खास ऐसा मुझे लगा और आगे चलकर यही मन्नू ने भी लिखा। दूसरों की जिंदगी में झांकने की बीमारी पैदाइशी लेकर आया हूं सो हर पेचीगदी और उलझी हुई चीज में माथा खपाना आदत हो गई है। यह वैसा ही है जैसा लव ट्रेंगल में आप रूचि लेते हैं। कई बार यह त्रिकोण जिंदगी और इसी परिस्थितियां बनाती हैं तो कई बार अपना स्वभाव और आदतें।

वैसे हिन्दी साहित्य में राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी एक मिसाल लगते हैं जहां राजेंद्र ने पूरा जीवन ही साहित्य को समर्पित किया वहीं मन्नू ने दोनों फ्रंट यानि परिवारिक जिम्मेदारी और लेखन कार्य दोनों मोर्चे पर जमकर लड़ीं। इन दोनों की जोड़ी डाकिए को इसलिए भी आकर्षित करती है क्योंकि दोनों ही ने लेखन में ईमानदारी का दामन थामे रखा। आश्चर्य यह भी होता है कि दोनों के पर्याप्त पाठकवर्ग होने के बावजूद इनके रिश्तों की खटास कागज़ पर भी सम्मानित तरीके से आई और मर्यादित तरीके से दोनों ने अपना पक्ष भी रखा। सार्वजनिक तौर पर भी एक दूसरे का सम्मान किया। इससे उनका यह जीवन भी साहित्य की एक अच्छी और स्वस्थ विधा में शामिल हो गई। इसे एक उपलब्धि भरी गर्वित लेखकीय यात्रा कह सकते हैं।

कहीं से बहुत ही अस्पष्ट छपाई में राजेन्द्र यादव लिखित मुड़ मुड़ के देखता हूं का एक टुकड़ा हाथ लगा। उसमें कई कंफेशन हैं और कई चिंताएं और सवाल भी जो डाकिए के उधेड़बुन से मेल खाती लगीं। आप जानते हैं सबसे अच्छी और प्रिय किताब वही होती है जो हमें वैसे ही मनःस्थिति से मेल खाती लगती है। हमें जानी हुई बात ही बताती है। सो आपसे बांट रहा हूं। भरी जुकाम में पढ़ी गई एक सीधी सपाट रीडिंग में कई विराम की गलतियां होंगी कई उतार चढ़ाव की सो अग्रिम क्षमा के साथ आपके समक्ष प्रस्तुत है :-



और अब मन्नू भंडारी की बीबीसी के साथ बातचीत के एक हिस्से को बीबीसी पर ही सुनी जा सकती है : यहाँ

Wednesday, July 18, 2012

एक बार और समझा दो राजेश! मृत्यु बेसिक इंस्टिंक्ट है. हम खामखाँ पसीने पसीने हो रहे हैं



सीन - 1
बाहर/गैराज के सामने/दिन

काका के बेटे उससे मसला सुझलाने आते हैं। गाड़ी में आते हैं। तकरार बढ़ती है और बेटे को निराश होकर लौटना पड़ता है लेकिन गाड़ी स्टार्ट नहीं होती तो काका उसे ठीक करते है। गाड़ी एक झटके से स्टार्ट होती है, स्केलेटर दबता है और आगे बढ़ती है। शीशे के सामने काका का हाथ आता है - फिफ्टी रूपीज़ प्लीज़।
------- (अवतार)

सीन - 2
अंदर/ अमिताभ का कमरा/दिन

काका अमिताभ के कहते हैं - मैं तो तुम्हारी भलाई करने आया था रे। इनको आपस में लड़वाने और तेरे कारखाने का फायदा कराने। मगर इन मज़लूमों के झोपड़े देखो। कई कई शाम खाना नहीं पकता। उनके साथ रहते रहते मुझे उनसे प्यार हो गया है। पता नहीं चला मैं कब उनका हो गया, वो कब मेरे हो गए।
------- (नमकहराम)

सीन - 3
अंदर/ क्लिनीक/ दिन

काका: मैं तो तुझे मेरी उमर लग जाए का आर्शीवाद भी नहीं दे सकता बहन। ------- (आनंद)

सीन - 4
कुछ फौजी लड़ाई पर जा रहे हैं। फटे पुराने कपड़ों में ह्वील चेयर लुढ़कता काका आते हैं। पृष्ठभूमि में गीत बजता है - देखो वीर जवानों अपने खून पे ये इल्ज़ाम न आए, मां न कहे कि वक्त पड़ा तो देश के बेटा काम न आए।                  (फिल्म - याद नहीं)

इसी तरह सीन 5, 6, 7, 8, 9 और 10।

सभी सीन तेज़ी से एक दूसरे में मर्ज होते हैं।  शोर्ट डिजोल्व होता है। एक तस्वीर उभरती है। 

नीचे ग्राफिक उभरता है - राजेश खन्ना

*****

कैसे कहूं तुम मेरे भीतर कैसे और कितने रूपों में जिंदा हो। ऐसा ही कि ऊपर के सारे सीन स्मृति के आधार पर लिखी है। गलतियां होंगी उनके ब्यौरे में मगर उनमें तुम साबुत बचे हो।

तब हमारे घर में टी वी नहीं था। विविध भारती पर किसी न किसी रूप में तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती। कुछ था उन संवाद अदायगी में जो मुझमें कनेक्ट हो गया। तुम्हारा बाबू मोशाय बोलना ऐसा था कि मुझे ही बुला रहे हो अमिताभ तो किरदार का बहाना था। चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाए गाना आता तो मैं कल्पना करता हीरो के चहरे पर क्या भाव आते होंगे !

क्या सुनते थे कहानियां कि तुम्हारी उजली फियेट पर लड़कियों के लिपस्टिक के निशान भरे रहते थे। वो क्या था कि तुम्हारी आवाज़ और उदासी दिल को इतनी छूती थी ? कि तुम अभिनय करके निकल लेते थे और हम आज तक रोना पसंद करते हैं। बड़ा हुआ तो जाना दरअसल तुममें कोई एक्स फैक्टर नहीं था। न तो तुम नाचना जानते थे न ही कोई और गुण। मगर फिर क्या ? सिर्फ सादादिली से आंखों और चेहरे से अभिनय करना ? फिर क्यों छोटे बालों में तुम्हारी आखों की पलकें देख लगता था कि तुम्हें भगवान ने नहीं बल्कि लड़कियों ने ही अपने हाथों से पैदा किया है। हल्की चांदनी रातों में, देर शाम के झुटपुटे में, खिड़की से आती ताज़ी हवा में, खुले बालों में, ढ़ीले कपड़े पहन, रूमानी ख्याल में गुम, प्यार से अपने गोद में किसी बेजान दिल पर पेंसिल से एक तिलनुमा निशान उकेरा होगा जिससे तुम पैदा हुए- दिल के राजकुमार।

तुम्हारे बारे में एक बार पढ़ा था कि तुमने एक बार समंदर किनारे मगरूर होकर लड़कियां छेड़ी थीं। पता चला कि तुम भी आदमी ही थे मेरी तरह। खूब शराब पीने वाले। तुम्हारे जाने के साथ साथ अपनी भी ईच्छा लिख रहा हूं कि मैं भी अपनी कमज़ोरियों के साथ याद किया जाना चाहूंगा।

निंश्चित रहना कि कल जो गुमनाम है उसमें भी बचा रखूंगा तुम्हारे लिए प्यार।

दर्द और नशे का एक आनंदमयी अवतार मेरे अमर प्रेम।

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