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Wednesday, August 22, 2012

पैकेज


डाकिए की ओर से: हाल ही में मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी से गुज़र रहा था और मन्नू की विनम्रता के आगे निहाल था। लेकिन मेरी समस्या दूसरी थी। उसमें जहां जहां उनके पति राजेन्द्र यादव की बुराईयां, झूठ और गलतियां सामने आ रही थी मुझे न जाने क्यों राजेन्द्र यादव के प्रति दिल में एक हमदर्दी पैदा होती जा रही थी। कुछ तो है उनमें खास ऐसा मुझे लगा और आगे चलकर यही मन्नू ने भी लिखा। दूसरों की जिंदगी में झांकने की बीमारी पैदाइशी लेकर आया हूं सो हर पेचीगदी और उलझी हुई चीज में माथा खपाना आदत हो गई है। यह वैसा ही है जैसा लव ट्रेंगल में आप रूचि लेते हैं। कई बार यह त्रिकोण जिंदगी और इसी परिस्थितियां बनाती हैं तो कई बार अपना स्वभाव और आदतें।

वैसे हिन्दी साहित्य में राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी एक मिसाल लगते हैं जहां राजेंद्र ने पूरा जीवन ही साहित्य को समर्पित किया वहीं मन्नू ने दोनों फ्रंट यानि परिवारिक जिम्मेदारी और लेखन कार्य दोनों मोर्चे पर जमकर लड़ीं। इन दोनों की जोड़ी डाकिए को इसलिए भी आकर्षित करती है क्योंकि दोनों ही ने लेखन में ईमानदारी का दामन थामे रखा। आश्चर्य यह भी होता है कि दोनों के पर्याप्त पाठकवर्ग होने के बावजूद इनके रिश्तों की खटास कागज़ पर भी सम्मानित तरीके से आई और मर्यादित तरीके से दोनों ने अपना पक्ष भी रखा। सार्वजनिक तौर पर भी एक दूसरे का सम्मान किया। इससे उनका यह जीवन भी साहित्य की एक अच्छी और स्वस्थ विधा में शामिल हो गई। इसे एक उपलब्धि भरी गर्वित लेखकीय यात्रा कह सकते हैं।

कहीं से बहुत ही अस्पष्ट छपाई में राजेन्द्र यादव लिखित मुड़ मुड़ के देखता हूं का एक टुकड़ा हाथ लगा। उसमें कई कंफेशन हैं और कई चिंताएं और सवाल भी जो डाकिए के उधेड़बुन से मेल खाती लगीं। आप जानते हैं सबसे अच्छी और प्रिय किताब वही होती है जो हमें वैसे ही मनःस्थिति से मेल खाती लगती है। हमें जानी हुई बात ही बताती है। सो आपसे बांट रहा हूं। भरी जुकाम में पढ़ी गई एक सीधी सपाट रीडिंग में कई विराम की गलतियां होंगी कई उतार चढ़ाव की सो अग्रिम क्षमा के साथ आपके समक्ष प्रस्तुत है :-



और अब मन्नू भंडारी की बीबीसी के साथ बातचीत के एक हिस्से को बीबीसी पर ही सुनी जा सकती है : यहाँ

Thursday, June 16, 2011

खूब पहचान लो असरार हूँ मैं...





डाकिए की ओर से: सुबह मजाज़ की सोहबत में गुज़री, तो हैंगओवर सा हो गया, पर ये नशा ज़रूरी था। अभी चिठ्ठी डालने निकला तो सोचा क्यों न यही खत आप तक भी पहुंचाया जाए। वैसे भी एक नज़र फेसबुक पर डाली तो लोहा गर्म लगा। कुरजां (जयपुर से नई मैगज़ीन) में भी अलसुबह इनके बारे में विस्तार से जाना। लेकिन फिलहाल यहां एक छोटा सा पोस्टकार्ड डाल रहा हूं। खत और भी आएंगे और तारकोवोस्की की डायरी भी चलती रहेगी, मगर फिलहाल यह फुहार...
*****
मजाज़ लखनवी हकीकत में उस असरार का नाम है जिसे जमाना उसकी मौत के बाद भी समझने की कोशिश में मुब्तला है। उर्दू के तमाम शायरों में अगर सबसे शायराना जिंदगी किसी की रही तो ये मजाज़ ही थे। उर्दू अदब की दुनिया में ये किस्से पहले ही अमर हो चुके हैं कि एक ज़माने में कुंवारी लड़कियां अपने बेटों के नाम मजाज़ के नाम पर रखने की कसमें खातीं थीं। मजाज़ के लिए लड़कियों में लाॅटरी निकाली जाती थीं और उनकी नज्में गल्र्स होस्टल के तकियों में दबी मिलती थीं लेकिन मजाज़ ताजिंदगी जिन्स-ए-उल्फत (प्यार) के तलबगार ही रहे। एक दफा अलीगढ़ विश्वविद्यालय में ही इस्मत चुगताई ने उनसे कहा कि लड़कियां मजाज़ से मुहब्बत करती हैं, इस पर मजाज़ ने तपाक से कहा - ‘और शादी पैसे वालों से कर लेती हैं‘।

जिं़दगी में सब कुछ बदलता रहा लेकिन हाजि़रजवाबी का ये असासा हर दौर में मजाज़ के साथ रहा। जब इस्मत चुगताई ने उनसे पूछा कि मजाज़ तुम्हारी जिंदगी को बर्बाद लड़की ने किया या शराब ने तो मजाज़ ने कहा कि मैंने दोनों को बराबर का हक दिया है। मजाज़ के ऐसे कई लतीफे जिन्हें बाद में मजाज़ीफे कहा जाने लगा, आज भी लखनऊ की आबो-हवा में बिखरे पड़े हैं। लेकिन इनके पीछे की तल्खी यह है कि इन्हें कहने वाला पूरी जिंदगी बेहद दुखी रहा। 

उर्दू के जाॅन कीट्स कहे जाने वाले असराल उल हक मजाज़ की पैदाइश 1911 में रूदौली कस्बे में हुई थी। मजाज़ की शायरी को मुकाम अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में मिला। यहां उस दौर में मशहूर शायरों की एक पूरी जमात थी जिनमें मोईन अहसन जज्बी, अली सरदार जाफरी और जांनिसार अख्तर भी शमिल थे। लेकिन इन सबमें जो नाम सबसे ज्यादा मकबूल हुआ वह मजाज़ लखनवी का ही था। अलीगढ़ मुसमिल यूनिवर्सिटी का तराना भी मजाज़ का ही लिखा हुआ है। मजाज़ प्रगतिशीलता के सारे तत्वों के स्वाभाविक समर्थक थे। असल में नाजुक तबीयत वाले मजाज़ हर उस व्यक्ति से नजदीकी महसूस करते थे जिसे उसका बुनियादी हक नहीं मिला। यही निकटता उन्हें प्रगतिशीलता की राह पर ले गई। स्त्री मुक्ति और नारीवाद के जिस आंदोलन की बात आज होती है उसे मजाज़ 30 के दशक में ही अपनी नज्मों के ज़रिए कह रहे थे। कम लोग जानते हैं कि मजाज़ साहब के पुश्तैनी घर में आज लड़कियों का स्कूल चल रहा है। 

मजाज़ तरक्कीपसंद शायरों में होते हुए भी अपनी रूमानियत के चलते अलग ही नज़र आते हैं। फैज अहमद फैज उनके बारे में लिखते हैं - मजाज़ की इंकलाबियत आम इंकलाबी शायरों से अलग है। आम इंकलाबी शायर इंकलाब को लेकर गरजते हैं, सीना कूटते हैं इंकलाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते। वो इंकलाब की भीषणता को देखते हैं उसके हुस्न को नहीं पहचानते। 

मजाज़ की शायरी अल्फाज की कारीगरी से नहीं बनती, वहां भावों की सहज आमद है। इसलिए रूमानी शायरी में तो वो कीट्स का दर्जा रखते ही हैं। तरक्कीपसंद शायरी में ज़रा भी बनावटी नहीं लगते। मजाज़ की शायरी की गहरी समझ रखने वाले मोहसिन जमाल कहते हैं - अगर मजाज़ को उतनी लंबी उम्र मिली होती जितनी उनके साथ के बाकी शायरों को मिली तो इसमें कोई शक नहीं कि मजाज़ का नाम ग़ालिब इकबाल के बाद मकाम पाता। मजाज़ को याद करते हुए उनकी भतीजी सहबा अली कहती हैं - मजाज़ साहब की सरलता का अगर लोगों ने गलत फायदा न उठाया होता तो हम इतनी जल्दी उस बड़े शायर से महरूम न होते। जोश मलीहाबादी ने एक बार मजाज़ को सामने घड़ी रखकर पीने की सलाह दी तो मजाज़ ने कहा - आप घड़ी रख के पीते हैं, मैं घड़ा रख के पीता हूं। इस बेतहाशा शराबनोशी ने मजाज़ को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया। कई बार वो पागलपन के दौरे के शिकार हो चुके थे। 

मजाज़ की मौत के बाद उन पर जितना लिखा पढ़ा गया उतना किसी और शायर पर नहीं लिखा गया। 2006 में भारत सरकार ने उनकी याद में एक डाक टिकट भी ज़ारी किया। लखनऊ में मजाज़ की खस्ताहाल कब्र पर एक शेर लिखा है ‘‘अब इसके बाद सुबह है और सुबह-ए-नौ मजाज़, हम पर है खत्म शामे गरीबाने लखनऊ...''

 साभार: तहलका, उत्तराखंड संस्करण, फरवरी, 2011

Friday, April 1, 2011

उथों अगे फ़राक दियां मंज़लां सन...

एक पंजाबी कविता जिसका संशिप्तीकरण-भावानुवाद सा कुछ करने का प्रयास किया है, यकीन करिए ये भावानुवाद के पश्चात हिंदी में तो नहीं किन्तु अपनी मूल भाषा, पंजाबी, में उत्कृष्ट लगती हैं. तथापि आपसे भावानुवाद बाटने का लोभ संवरण नहीं हो पाया तो नहीं हो पाया. चूँकि अनुवाद केवल कुछ ही पंक्तियों का है सम्पूर्ण कविता का नहीं, और चूँकि इस कविता के पीछे एक कहानी चलती है अतः प्रस्तावना की आवश्यकता पड़ी...

..कहानी यूँ है कि एक लड़की जो शायद गाड़ी में या पैदल किसी स्थान से अपने घर जा रही हैं, उसके साथ उसका बेटा भी है इतने में उसे अपने नैनिहाल का कोई (दूर का शायद) भाई (वीर) मिलता है, लड़की पहली नज़र में ही बिछड़े हुए वीर को पहचान जाती है, लड़की पाठकों को उस 'वीर' के माध्यम से अपनी व्यथा बताती है, कि किस तरह उसके पिताजी ने अपनी मृत्यु के समय लडकी का विवाह लड़की से उम्र में काफी सयाने पुरुष से करने का वचन दे दिया. क्यूंकि मुसीबत के समय में उस सयाने पुरुष ने ही लड़की के पिताजी का हाथ थामा था. इस निर्णय से लड़की के 'नैनिहाल' वाले प्रसन्न नहीं होते फलतः लड़की से भी नाराज़ हो जाते हैं. किन्तु लड़की बताती है कि इसमें उसका कोई दोष नहीं. क्यूंकि पिताजी कि अंतिम आज्ञा का पालन करना ही उसका फ़र्ज़ था, यद्यपि उसके पति का उसके साथ विवाह होने से पूर्व पिछली पत्नी से एक बच्चा भी था तो भी.

जाते जाते लड़की अपने बिछड़े हुए वीर को और अपने नैनिहाल को दुआएं देती है....


' भाई' तुम कुजाह के तो नहीं?
तुम्हारा नाम शरीफ तो नहीं?
आगे से ही सोच रही हूँ दिखता बिलकुल उस सा है. .
आज का शुभ दिन, दिन न होकर मानो कोई किस्सा है.
खुदा कहीं नहीं है माना,
फिर-भी यहीं कहीं है जाना....
...तूने भी मुझको देखो तो, अब जाकर पहचाना है.
नियामत... ! याद है बचपन की, या अब भी कुछ याद आना है?
हाँ, आखिर, चलते कुओं में ही तो पानी रहता है.
मिलते रहने से ही आखिर रिश्तों का मानी रहता है. (वीर के उसे भूल जाने पर)
कभी वहाँ (नैनिहाल) जा जा कर भी मेरा मन नहीं भरता था,
अब वो सपने में भी आए तो उससे मन डरता था.
क्यूँ कर आखिर मेरी मामी भी मुझसे नाराज़ है.
प्रायश्चित का मूल वही है बढ़ता जाता ब्याज है.
बोलो तो, नानी के घर से कोई भला कुछ तोलेगी ?
लेकिन बाप के आगे आखिर कोई लड़की क्या बोलेगी?
और फिर सोचो, शरम का ताला, इसको कैसे खोलेगी ?
मेरे बाप का हाथ तो आखिर 'इन्होने' ही थामा था,
जाते-जाते उनके मुंह में 'इनका' नाम ही आना था.
ठीक है बेशक 'उनका' मेरा उम्र का कोई मेल नही.
लेकिन फिर भी वचन पिता का, वचन पिता का, खेल नहीं.
और फिर बाप की जो न माने वो भी क्या इंसान हुए?
बाप को भी तो अपने बच्चे मानो अपना प्राण हुए.
प्राण गए थे प्रण को लेकर लेकिन प्रण के प्राण रहे,
मैंने भी तब ये सोचा कि इन प्राणों का मान रहे.
मुझको यहीं उतरना है, तू भी आता अच्छा होता,
एक रात भूली बहना के घर खाता अच्छा होता.
ठीक है !तू, 'जीते रहना' ,
जीने से मिलना होता है.
मेरी ओर से उनसे (नैनिहाल वालों से) कहना,
अब भी कोई, उन्हें सोच के, कभी-कभी तो रोता है.



वीर तूं कुंजाह दा ऐ?
तेरा नां शरीफ़ ऐ?
अगे इ में आखदी सी लगदा ते उहो ऐ?
अज केहा नेक दिहाड़ा ,
रब्ब णे भरा मेल दित्ता ऐ,
मुंडिया! इह तक तेरा मामा ऐ,
मेनू तूं सिंझानिया ना होवे दा,
कदे निक्के हुंदे असी रल के खेडदे सां,
मेरा नां निआमते वे,
महिर नूर दीन दी में दोह्त्री आं,
मिलदिया दे साक णे ते वाहनदिया दे खूह णे,
कदे वरा-वरा उथे जा के रह आवीदा सी,
अज्ज उहना थांवां नूं वेखने नूं सहक्दी आं,
मेरे उतों पता इ जे मामी साडे नाल अफ्सोसी ऐ,
वीर दस इस विच मेरा की कसूर सी?
नानकिया नालो मेनू अग्गे थां किहडी सी?
मापिया दे अग्गे पर धीयाँ नहीं बोलदीयां,
वज्जे होए शर्मां दे जन्दरे ना खोलदीयां.
ओहना नूं जमीयां तों अग्गे शेय किहडी ऐ?
उहना दा उह बुरा कदे नहीं मंग सकदे,
थुडां दी धरेमिया ' च तिलक इंज पईदा ऐ ,
अखिया पियो नू जदो हार दे गईआं सन,
दुखां दियां साडे उते वाईं झुल पईआं सन,
नानके वी कन्नी खिसकान लग पाए सन,
तक के ते,
खिदने ड़ी थावें मुर्झान लग पए सन,
असी कच्ची आवी सी ते अग्ग पाई बुझदी सी,
उस वेले जडो कोई गल वी ना सुझ्दी सी,
हर शैय छड गयी,
ऐस दे पियु मेरे पियु दी बांह नप्प लई,
मरण लगा ऐस नूं जबान ओह दे गया.
में ते लै के बह गयी सां ऐस ख़्याल नू,
जग लायी सोंकण दे पीते होए दूध दे हंगाल नू,
मेरा सब्र कबूल कर लित्ता ऐ,
मेनू ऐ चन्न जेहा पुत दे दित्ता ऐ,
लै फेर में ते इत्थे लह बहिणा ऐ,
तुमीं की होयिया अज्ज इथे लह बहों खां,
इक रात भूली होई भैण दे वी कोल कल रहो खां,
हछा जग जीवंदियाँ दे मेले ने,
मेरे वलों सबनां नू बहुत-बहुत पुछना.

-शरीफ़ कुंजाही(गुजरात के कस्बे कुंजाह में १९१५ में जन्म हुआ,उर्दू और फारसी में भी लिखते हैं)




चलते चलते दो और भावानुवाद (मूल भाषा:पंजाबी)

बादल उड़े तो गुम आसमान देखा,
पानी उतरा तो अपना मकान देखा.

जहाँ पहुँच के उसका निशान देखा.

उसके सामने ये जग विराना था,
उसकी आँखों में ऐसा जहाँ देखा.

हमारे हाल की खबर वो रखता है,
सारी उम्र जिसको अनजान देखा.

काम वही 'मुनीर' मुश्किल था,
जिसे शुरू में बड़ा आसान देखा.

-मूल लेखक : मुनीर नियाज़ी(१९२८ में खानपुर जिला हुशियारपुर में जन्मे आजकल लाहौर में रहते हैं)


एक पूरा कमरा किताबों से भरा हुआ,
एक खाली टोकरी रोटियों वाली,
क्या 'ज्ञान' लूँ इन किताबों से,
जिससे मेरी टोकरी रोटियों से भर जाए,
जिससे मुझे और किताबें बेचने का कोई तनाव न हो?

-मूल लेखक : शाइस्ता हबीब (१९४९ में सियालकोट में जन्मीं  उर्दू में कविता रचती हैं  रेडियो पकिस्तान में प्रोडियूसर हैं)






मधानियाँ

Sunday, March 20, 2011

सूबेदारनी

...गतांक से जारी.
कुमाऊंनी मासिक 'पहरू' के फरवरी अंक में प्रकाशित 'महेंद्र मटियानी' रचित कहानी 'सूबेदारनी' का भावानुवाद श्री भगवान लाल साह द्वारा - अंतिम भाग


उनकी छुट्टी से वापिस जाने के बाद भी उनका कहना शरीर के अन्दर तक गुदा हुआ जैसा हो गया था... सूबेदारनी बनने की जल्दी सरसराने वाली हुई सारे अंग में, चेतना को भी दबा देने वाली हुई हो ! वो सरसराहट ... होश हवास सब गुम जैसे हो जाने वाले हुए.
फ़िर हो... सास ससुर हर छुट्टी में कहने वाले हुए... जोर भी देने वाले हुए... खासकर देवेन्द्र के हुए से पहले.."बच्चे! इस बहू को भी साल-छह महीने अपने साथ घुमा लाता? इसके साथ की दो-दो, तीन-तीन बार पलटन घूम के आ गयीं हैं... इसका भी मन करता होगा... हमारे हाथ पैर आज भी चलने फिरने वाले हैं... यहाँ की तू फिकर मत कर ! सास तो , "जब तक ये ठेकेदारनी की लड़की नहीं आई थी हमारा काम नहीं चलता था क्या?" भी कह देने वाली हुई. फ़िर 'वो' कोई न कोई बहाना बना के टालते रहे. सिर्फ मुझसे ज़रूर कहते थे,"इजा-बोज्यू को कहने दे. तुझको साथ ले जाऊंगा तो जे. सी. ओ. क्वार्टर में ही-ये मेरा भी प्रण है."
परमेश्वर ! मेरे लिए तो मेरी ज़िन्दगी ही आग लग गयी, कहाँ जे. सी. ओ. फैमली क्वार्टर? सब क्वार्टरों के द्वार ढक गए मेरे लिए परमेश्वर ! सब क्वार्टरों के... ! बच्चे की नींद न टूट जाए, कमुली ने अपना 'रोना' भीतर-भीतर ही दबा दिया.

"हवालदार मेजर चंदर सिंह कारगिल में शहीद" कलेजे को नोच लेने वाली उस खबर की बिजली गिरे चार महीने हो जाते हैं अब. अपर इस्कूल के हेड मास्टर साब ने जब दस बातें इधर उधर की कर के अखबार दिखाया तो चार अक्षर ही दिखने वाले हुए अखबार में-'हवालदार मेजर चंदर सिंह कारगिल में शहीद'. ए हो ! छपे हुए अक्षर भी कैसे यम दूत जैसे खड़े हो जाते हैं सामने में... अक्षरों में भी पूरी चेतना को बहा ले जाने की सामर्थ्य हुई क्या उसी दिन जाना... अक्षर जैसे राक्षश के खून से रंगे दांत... पूरी सृष्टि में महाकाल का हाहाकार हो गया... भादो की अमावस्या का जैसा अन्धकार झप्प छूटा जैसे आकाश से. सूरज की किरणों से अन्धकार बहना उसी दिन देखा... उसी दिन महसूस किया. कण कण सी आँखों में मन-मन के नेत्र उसी दिन से बहने शुरू हुए...
एक डेढ़ महीने तक दुनिया भर का मेला जैसा लगा रहता था. आज ये आ रहे हैं... काल वो आ रहे हैं, इसी में रह पड़े... महीने दो महीने तक तो पर्वत की हवा और गंगा की धारा भी "हवालदार मेजर चंदर अमर रहे" कहती बहीं... सूरज की रोशनी और चाँद की चांदनी "चंदर तेरा यह बलिदान..." कह के ऊऋण हुईं. हवलदार की लाश आए के बाद उनकी अर्थी उठे तक की वो जै-जै (जय-जय) कार आज भी कानों से प्राणों तक गुंजायमान होती रहती है. बस एक कसक हृदय में कठफोड़वे की तरह टकोर मारती रहती है... अब मुझे सूबेदारनी कहो...
साथी-संगीनें कहती हैं हवालदार की लाश पर भी एक ही रोना था मेरा,".. अब मुझे सूबेदारनी कौन बनाएगा? मुझे सूबेदारनी बनाए बिना कहाँ जा रहे हो?"

तीन दिन हो गए उनकी पलटन के सूबेदार रतन सिंह आए हुए थे. बहुत देर तक हवालदार की बातों में ही लगे रहे. सारी दुनिया का उदेग (नैराश्य) जैसे कन्धों में बोझ सा उठा के लाये होंगे... हारे जुआरी जैसे थके-उदास-पिटे... कह रहे थे ससुर जी से,"काका ! चंदर मुझसे कहता था, मेरा कोई दादा (बड़ा भाई) नहीं है रतन दा' फ़िर तुम्हारे मिलने के बाद वो कमी भी पूरी हो गयी.. काका, मेरी तकदीर भी देखो ! आज पहली बार चंदर की देहरी आया भी तो रतन दा, आओ भेटों कहने के लिए भी नही रह गया." प्राणों को चीथड़े कर देने वाली टकटकी लगाने वाले हुए सूबेदार,"बहू, तीन चार दिनों में नायब सूबेदार मिलने वाला था चंदर सिंह को... नायब सूबेदार मिलते ही छुट्टी में आने का प्रोग्राम था उसका.. मुझसे कह रहा था कि घर वालों को भी नहीं बता रखा.बस कंधे में स्टार लगा के धम्म करके खड़ा हो जाना है सूबेदारनी के मुह के सामने.. कहता था, रतन दा ! आज तक मैं कभी वर्दी में घर नहीं गया, न वर्दी में फोटो दी घर वालों को. एक ही प्रण है की आपकी बहू के सामने वर्दी में जाऊँगा तो कन्धों में स्टार लगा के... अब वर्दी में घर जाने का मुहर्त आ रहा है दाज्यू(बड़े भाई). तुम्हारे आशीर्वाद और इष्ट की महर से. कहते कहते जाने- कितने जन्मों का रोना एक क्षण में डाल दिया रतन सिंह ने "... फ़िर क्या कहा जाए बहू कर्मों का?" आगे को आवाज़ ही नहीं रही मुंह में.
क्या कह रहे होंगे रतन सिंह भी? धोती(महिला  द्वारा घर में पहनने वाली साड़ी को कुमाउनी में धोती कहते हैं.) को मुंह में दबा के भागी भीतर को मैं.. भीतर का रोना धरती-आकाश के अंदर  से जैसा फूटा भीतर भगवान के थान (घर में बना छोटा मंदिर) में पहुंच कर... परमेश्वर ! मेरा न ये लोक रहा, न परलोक... मेरा सत धर्म तो नहीं बिगाड़ते परमेश्वर ! सत धर्म तो रहने देते... ऐसा क्या बिगाड़ा था मैंने किसी का... मेरे लिए तो भगवान ! विधवा होने का रोना नहीं रह गया और सत धरम जाने का संताप बड़ा हो गया...
हवालदार कौनसे जन्म का बैर निभा/चुकता कर गए होंगे? मेरा सत धर्म बिगाड़ कर... हे विधाता? ब्याह तो किया मैंने सूबेदार चंदर सिंह के साथ और विधवा ठहरी मैं हवलदार मेजर चंदर की... तुमने मुझे कहीं का नहीं रख छोड़ा परमेश्वर. ये पाप का बोझा लेकर कहाँ जो मरुँ मैं... कहाँ जो मरुँ...
कम हो रहा ठहरा कहने को अन्वार(देवेन्द्र के लिए) भी रख दिया कोख में, कि ताल-खाई में कूद कर इस पाप लोक से मुक्ति पाना भी मुश्किल कर दिया... हे परमेश्वर... हे विधाता... हे भगवान.. में कहाँ जो मरुँ?
..मेरा प्रायश्चित कैसे होग?



चलते चलते


बेडू पाको बारो मासा...
काफल 

बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैता मेरी छैला,
बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैता मेरी छैला.

          

भुण भुण दीन आयो,  नरण बुझ तेरी मैता मेरी छैला,
बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैता मेरी छैला.

आप खांछे पन सुपारी , नरण मैं भी लूँ छ बीडी मेरी छैला,
बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैता मेरी छैला.

अल्मोडा की नंदा देवी, नरण फुल चड़ूनि पाती मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैता मेरी छैला.

त्यार खुटा मा कांटो बुड्या, नरणा मेरी खुटी पीडा मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैता मेरी छैला.

अल्मोडा को लल्ल बजार, नरणा लल्ल मटा की सीढी मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैता मेरी छैला.

Tuesday, February 15, 2011

मंटो को पढ़ते हुए


डाकिए की ओर से: शीन काफ निजाम ने मंटो पर विशेष अध्यन किया है. इत्तेफाक से वे मेरे पसंदीदा शाइर भी हैं। उनकी गज़ल संग्रह 'सायों के साये में' मेरी पसंदीदा है। सन् 2002 के अंधेरे में इस किताब ने बहुत सहारा दिया था। ज्ञातव्य हो कि इसी बरस उन्हें उर्दू अदब के क्षेत्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला है।

*****

मंटो को उर्दू का मोपासाँ कहा गया है लेकिन मुहम्मद हसन अक्करी ने लिखा है:
"अगर मंटो मोपासाँ के बराबर नहीं पहुंच सका तो इस में इतना क़सूर खुद मंटो का न था जितना उस अदबी-रिवायत का, जिसमें वह पैदा हुआ। जिस बात में मंटो ‘मोपासाँ से पीछे रह जाता है, वह मोपासाँ का गद्य है।"

इन परम्पराओं में एक फर्क तो यही है कि एज़रा पाउण्ड शाइरों को मोपासाँ का पढ़ने की सलाह देते हैं जबकि उर्दू में प्रामाणिक या मानक भाषा काव्य की है। दूसरा फर्क यह है कि मोपासाँ को वाल्तेयर और फ्लाबेयर जैसे रचनाकारों का ग़ मिला था और मंटो को मिला था दास्तानवी गद्य, जो श्रव्य-गद्य का लिखित रूप् था। 

मंटो तक पहुंचते-पहुंचते उर्दू कहानी भी वक्त बिताने के बजाय वक्त बचाने का हुनर हो गई थी। वह बताने में छिपाने और छिपाने में बचाने का आर्ट सीख रही थी। फिर मंटो तो पाठक पर भरोसा करने वाला, संवेदनशील लेखक था। कहता था, क्या ही अच्छा होता, अगर आदमी लिखे बगैर अपने खयालात दूसरे तक पहुंचा सकता। विभाजन के बाद पाकिस्तान पहंुच कर वह अफसाने नहीं, लेख लिखता है इसलिए कि वह इस कला-रूप को बहुत संगीन समझता है। वह चाहता था कि कथा-भाषा में कोई लफ्ज गैर जरूरी न हो। पाकिस्तान में वह पहला अफसाना ठण्डा गोश्त लिखता है और दूसरा खोल दो। खोल दो का एक अंश है:

"रंग गोरा है और बहुत खूबसूरत है। मुझ पर नहीं थी अपनी मां पर थी। 
उम्र सत्रह के करीब थी..... मेरी इकलौती बेटी है। "

पहला वाक्य है पर खत्म होता है। दूसरा थी पर तो तीसरा है पर। यह संदेह और विश्वास, आशा और निराशा के बीच झूलते बूढ़े असहाय बाप की मनःस्थिति है, क्रिया-प्रयोग का दोष नहीं। सिराजुद्यीन यह तक भूल गया है क रज़ाकारों ने न उसकी बीवी को देखा है, न वो उसकी बेटी को पहचानते हैं। काहनी लाख उपमा का आर्ट हो, लेकिन उपमा में दो में से एक की जानकारी जरूरी है। कहानी के अंत में, सकीना की हरकत पर सिराजुद्यीन न आंखे बंद करता है, न मुंह फेरता है और न सर पीटता है, बल्कि खुशी से चिल्लाता है। पसीने में गर्क़ तो उस समाज को होना चाहिए न जो सकीना का है! दृष्टव्य है कि सकीना के साथ दुव्र्यवहार भारत के स्वयंसेवकों ने नहीं, पाकिस्तान के रज़ाकारों ने किया है। ठण्डा गोश्त में वह ईशर सिंह - सिक्ख - की इंसानियत को उजागर करता है। पाकिस्तानी समाज को यह नागवार गुज़रता है और मुक़दमा चलता है। 

मंटो के किरदार बुरे हैं, परन्तु वे बुराई के बावजूद अच्छे लगते हैं अच्छाई उन के लिए ओढ़ने की नहीं, बरतने की चीज़ है। ये चरित्र प्यार चाहते हैं, सहानुभूति नहीं। हतक की सौगन्धी ग्राहक के सामने स्वयं को सम्पूर्ण समर्पण के साथ प्रस्तुत करती है, इसलिए कि उसमें प्रेम करने की अहलियत भी है और निबाहने की सलाहियत भी। झूठे-सच को जानते हुए भी उसने दीवार पर चार मर्दों के चित्र टांग रखे हैं। 

मंटो की तवाइफें कोठे पर नहीं, कोठरीनुमा कमरों में रहती हैं। वहां लोग तमीज़ सीखने नहीं, जिस्म की जिजारत के लिए जाते हैं। उनमें फरेबकारी नहीं, शराफत है। शिकायत नहीं, हालात से निपटने की सकत है। 

मंटो के पात्रों के नाम और चीज़ों की हरकत तथा रंग भी ध्यान देने योग्य है। मिसाल में हतक ही को लें। सौगन्धी नाम है पात्र का। उर्दू में सुगन्ध भी इसी तरह लिखा जाएगा। इसे सौ गन्धी भी पढ़ा जा सकता है। कई स्थानों पर वेश्या को सौ गन्धी कहते हैं। अगर इसे सुगन्धि पढ़ें जो उर्द लिपि में संभव है, तो इसका अर्थ होगा पुण्यात्मा, धर्म पर रहना आदि। एक पात्र है माधव, जिसका एक अर्थ वसन्त भी है - अब यह वाक्य देंखे, 

"उसे (सौगन्धी को) महसूस होने लगा कि उसे माधव की जरुरत है। "

कुत्ता, इस्लाम की मान्यता के अनुसार त्याज्य है। महाभारत में इन्द्र युधिष्ठिर से कहते हैं, कुत्ते रखने वालों के लिए स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है। अफसाने की रूह में ऐसे अनेक संभावित अर्थ छिपे हैं। इसी तरह सिराजुद्यीन का अर्थ धर्म का दिया है तो सकीना हज़रत इमाम हुसैन, जो कर्बला में शहीद हुए, की बेटी का नाम है। तोता, खुजली वाला कुत्ता, कुत्ते का भौंकना, तोते का चुप रहना आदि अनेक स्थल विचारणीय हैं। 

मंटो कहता था, दुनिया को समझाना नहीं चाहिए उस को खुद समझना चाहिए। कलात्मक समझ पर जब तक भरोसा रहेगा, मंटो जैसे लोग प्रासंगिक रहेंगे। 
उर्दू के विख्यात शायर एवं आलोचक 
साभार : वाक्देवी प्रकाशन 

Sunday, February 6, 2011

ख़त की इबारत

(कभी-कभी कुछ कविताएँ अचानक हमको भिगो जाती हैं...और फिर अकेला छोड़ जाती हैं हमें...पतझड़ की बेमौसम बारिश की तरह....और हम उदासी के गहरे धुंधलके मे शाख से टूटे हुए गीले पत्तों का मूक बिलखना सुनते रहते हैं...देर तलक। कुछ कविताएं थोड़ा सा कह कर इतना अनकहा छोड़ जाती हैं हमारे पास..कि मन देर तक उसी अनकहे के बीहड़ मे अकेला भटकता रहता है..उस अव्यक्त के आइने मे अपनी पहचान के अक्स तलाश करता...जैसे कि माँ बच्चे को रात मे देर तक लोरी सुनाती है..प्यार करती है..दुलारती है..और परियों की कहानी..दूर देश के राजकुमारो, उड़ने वाले घोड़ों की कहानी.....मगर सो जाने के बाद बच्चे के ख्वाबों मे परियाँ नही आतीं..ना राजकुमार..ना उड़ने वाले घोड़े...ख्वाब मे माँ का आँसुओं भरा चेहरा आता है..ख्वाब गीले हो जाते हैं।..व्यस्त दिन बावरे मन को किसी बच्चॆ सा भटकाये रहता है..बाजार मे...रंगीनियों मे..हासिल की जा सकने वाली उपलब्धियों मे..मगर शाम होते-होते मन उसी बच्चे सा खयालों की स्कूल-बस से चुपके से उतर जाता है..बिना बताये..और वापस आ कर उसी टूटी मुँडेर पर उदास सा बैठ जाता है..जहाँ अपना सिसकना सिर्फ़ अपने आप को ही सुनाई देता है..खैर!!..यह एक मेरी पसंदीदा पंजाबी कविता है..सरोद सुदीप की..ज्ञानपीठ के किसी पुराने प्रकाशन मे संकलित..हिंदी रूपांतर डॉ हरभजन सिंह का था...पढ़ें यह बैरंग ख़त..शायद आपको भी पसंद आये..)





इबारत एक पत्र की
 

वैसे तो उदास नही होता मैं
छोटी-छोटी बात पर हँसी आ जाती है
माँ का ख़त आया -बेटा तुम्हारे पाँव बहुत दूर चले गये हैं
तब जलती-जलती सिगरेट जल गयी
 
जहाज आये होंगे, चले गये होंगे
सभी द्वार खुले हैं, एक भी गुजर जाने योग्य नही
कल नींद नही आयी तो न सही
कहीं  न कहीं कोई खुशी बैठी होगी
उसके पास जाओ और कहो:
यह भी एक फ़ालतू भ्रम था

मधुमक्खी एक फूल पर बैठती है,
फिर दूसरे पर, फिर तीसरे पर
और उड़ जाती है
चश्मे ने तुम्हे देखा और उसे तुमने
और बात खुदगर्जी पर आ कर खत्म हो गयी

कल जो पल जाग उठा था
आज बुझ गया है...
बच्चों समेत कबूतरी खा ली गयी
और कबूतर शाम तक
टूटे पंखों के इर्द-गिर्द गुटकूँ, गुटकूँ करता रहा...
सारा ब्रह्माण्ड है, बहुत कुछ जानने योग्य है
किंतु मेरे पास आते-आते एक प्रश्न
कुछ दूरी पर खड़ा हो जाता है
एक मजाक की तरह...

माँ के ख़त का उत्तर लिखने बैठा था
लिफाफे पर मेरा अपना पता लिखा गया है
वैसे तो उदास नही होता मैं...

(चित्र: वाया फ़्लिकर)

Monday, January 31, 2011

पसमंज़र


कत्बा

786

यहाँ सआदत हसन मंटो दफन है.
उसके सीने में फ़न्ने-अफ़सानानिगारी के
सारे अस्रारो-रूमूज़ दफ़्न हैं -
वह अब भी मनों मिट्टी के नीचे सोच रहा है 
कि वह बड़ा अफ़सानानिगार है या ख़ुदा। 

सआदत हसन मंटो 
18 अगस्त, 1954

पसमंज़र

आज की ताज़ा खबर आपने सुनी ?

कोरिया की ?

जी नहीं। 

बेगम जूनागढ़ की ?

जी नहीं। 

क़ल्तो-गारत की किसी नई वारदात की ?

जी नहीं... सआदत हसन मंटो की

क्यों ... ? मर गया ?

जी नहीं। कल गिरफ्तार कर लिया गया। 

फहाशी (अश्लील) के सिलसिले में ?

जी हां... पुलिस ने उसकी खाना-तलाशी भी ली। 

कोकीन या नाजाइज़ शराब वगैरह निकली ?

नहीं... अखबारों में लिखा था कि उसके मकान से कोई नाजाइज चीज़ बरामद नहीं हुई। 

लेकिन उसका वुजूद बज़ाते-खुद (अपने आप में) नाजाइज़ है।

जी हां... कम-अज-कम हुकूमत तो यही समझती है। 

फिर उसे बरामद क्यों न किया गया ?

यह बरामद और दरामद का मामला हुकूमत के अपने हाथों में है जिसे चाहे बरामद करे, जिसे चाहे दरामद करे ! सच पूछिए तो यह काम हुकूमतों ही के हाथों में होना चाहिए। वो इसका सलीका जानती हैं।

इसमें क्या शक है...। 

तो क्या खयाल है आपको... ? इस मर्तबा तो मंटो को फांसी की सज़ा जरूर मिलनी चाहिए...

मिल जाए तो अच्छा है। रोज़ का टंटा खत्म हो।

आपने ठीक कहा है। ‘ठंडा गोश्त‘ के बारे में हाई कोर्ट ने उसके खिलाफ जो फैसला दिया है, इसके बाद तो उस कमबख्त को खुद-ब-खुद मर जाना चाहिए था... मेरा मतलब है कि खुदकुशी कर लेनी चाहिए थी। 

अगर वह इस कोशिश में नाकाम रहता...

...तो उस पर यकीनन मुकदमा चलता कि उसने अपनी जान लेने की कोशिश की।

मेरा ख्याल है, यही वजह है कि वह खुदकुशी से बाज़ रहा। वगरना वह बाज़ रहने वाला आदमी नहीं। 
तो आपको मतलब है कि वह फहाशी जारी रखेगा ?

अजी हज़रत ! वह उस पर पांचवां मुकदमा है। अगर उसे बाज़ रहना होता तो पहले मुकदमे के बाद ही ताइब (तौबा करने वाला) होकर कोई शरीफाना काम शुरू कर देता। मिसाल के तौर पर गवर्नमेंट की मुलाज़िमत कर लेता या घी बेचता, या महल्ला पीर गीलानियां के गुलाम अहमद साहिब की तरह कोई दवा ईजार कर लेता। 

जी हां, ऐसे सैकड़ों शरीफाना काम हैं। मगर वह परले दर्जे का हठधर्म है। लिखेगा और जरूर लिखेगा। 

मालूम है आपको, इसका अंजाम क्या होगा ?

कुछ बुरा ही नज़र आता है। 

छः मुकदमे पर पर पंजाब में चल रहे होंगे, दस सिंध में, चार सूबा सरहद में, तीन मशरिकी पाकिस्तान में... वह इनकी ताब न लाकर पागल हो जाएगा। 

दो मर्तबा पागल हो चुका है। 

यह उसकी दूरअंदेशी थी... वह रिहर्सल कर रहा था ताकि सचमुच पागल हो जाए तो पागलखाने में आराम से रहे। 

पागल होकर क्या करेगा ?

पागलों को होशमंद बनाने की कोशिश करेगा। 

यह भी जुर्म है ?

मालूम नहीं। यह तो कोई वकील ही बता सकता है कि ताज़ीराते-पाकिस्तान में इसके लिए कोई दफ़ा मौजूद है या नहीं। 
होनी चाहिए। पागलों को होशमंद बनाना दफा 292 की रोशनी में तो बहुत खतरनाक जुर्म मालूम होता है। 

दफा 292 के बारे में तो अब हाई कोर्ट ने ‘ठंडा गोश्त‘ को फैसला करते हुए साफ तौर पर कह दिया है कि कानून को मुसन्निफ़ की नीयत से कोई वास्ता नहीं। वह नेक हो या बद, कानून को तो सिर्फ यह देखना है मैलान (अभिरूचि) क्या है?

इसलिए तो मैं अर्ज कर रहा था कि पागलों को होशमंद बनाने के फेल में नीयत कैसी भी हो, उसके मैलान को ज़ेरे-ग़ौर करना पड़ेगा, और ज़ाहिर है इस फेल (काम) में मैलान किसी सूरत में भी बेज़रर (जिससे कोई हानि न हो) करार नहीं दिया जा सकता। 

ये कानूनी मूशिगाफियां (बाल की खाल निकालना) हैं। इनसे हमें दूर रहना चाहिए। 

आपने बहुत अच्छा किया जो बर्वक्त तबीह (चेतावनी देना) कर दी क्योंकि ऐसी बातें के मुताल्लिक़ सोचना ही अज़खुद एक बड़ा संगीन जुर्म है। 

लेकिन हज़रत, मैं सोचता हूं, अगर मंटो सचमुच पागल हो गया तो उसके बीवी-बच्चों का क्या होगा ?

उसके बीवी-बच्चे जाएं जहन्नम में। कानून को उनसे क्या वास्ता। 

दुरूस्त है लेकिन हुकूमत क्या उनकी मदद नहीं करेगी ?

हां, हुकूमत की बात जुदा है। मेरा ख्याल है कि उसे मदद करनी चाहिए। और कुछ नहीं तो अखबारों में तो इस बात का ऐलान कर देना चाहिए कि वाह इसके मुताल्लिक गौर कर रही है। 

जब तक गौर होगा, तब तक मामला साफ हो जाएगा। 

ज़ाहिर है। अब तक होता तो ऐसा ही रहा है। 

लानत भेजिए मंटो और उसके बीवी-बच्चों पर। आप यह बताइए, हाई कोर्ट के फैसले का उर्दू अदब पर क्या असर होगा ?

उर्दू अदब पर भी लानत भेजिए। 

नहीं साहिब, ऐसा न कहिए... सुना है अदब कौम को बहुत बड़ा सरमाया होता है। 

होगा भाई... हम तो उसे सरमाया मानते हैं को नकदी की सूरत में बैंक में पड़ा हो।

लाख रूपए की बात कही आपने... तो मोमिन, मीर, अहसन, शौक, सादी, हाफिज वगैरह सब दफ़ा 292 साफ कर देगी ?

करना चाहिए वर्ना उसके वुजूद का मतलब ही क्या है ?

ये जितने अदीब और शाइर बने फिरते हैं अब इनको चाहिए कि होश में आएं और कोई शरीफाना पेश इख्तियार करें।
लीडर बन जाएं। 

सिर्फ मुस्लिम लीग के ?

जी हां, मेरा मतलब यही था। किसी और लीग का लीडर बनना फहश है।

बेहद फहश। 

लीडरी के अलावा और भी शरीफाना पेशे मौजूद हैं... डाकखाने के बाहर बैठकर पाकीज़ा इबारत में खतूतनवीसी (खत लिखना) करें। दीवारों पर इशितहार लिखें। बेरोज़गारों के दफ़्तर में क्लर्क हो जाएं, नया-नया मुल्क बना है... हज़ारों आसामियां खाली हैं, कहीं भी समा जाएं....।

जी हां... इतनी खाली ज़मीन पड़ी है।

हुकूमत सोच रही है कि तवाइफों और रंडियों के लिए रावी के पास एक बस्ती बना दे ताकि शहर की गलाज़त दूर हो। क्यों न इन शायरों, अफसानानिगारों और अदीबों (साहित्यकार) को भी उनमं शामिल कर लिया जाए ?

बहुत अच्छा ख्याल है, ये लोग वहां खुश रहेंगे। 

लेकिन अंजाम क्या होगा ?

अंजाम की कौन सोचता है... जो होना होगा, हो जाएगा। 

हां... वहां पड़े झक मारते रहेंगे...लोहे को लोहा काटता है, फहाशी को फहाशी काटती रहेगी। 

बड़ा दिलचस्प सिलसिला रहेगा। 

मंटो को तो खासतौर पर वहां अपनी दिलचस्पी का मनभाता सामान मिल जाएगा। 

लेकिन वह कमबख्त उनका मुजरा सुनने के बजाय उन पर लिखेगा। कई सौगंधियां, कई सुल्तानाएं पेश करेगा। 
और कई खुशिया (मंटो के अफसाने खुशिया का पात्र), कई ढोंडू...

मालूम नहीं, कमबख्त को ऐसे गिरे हुए इंसानों को उठाने मंे क्या मज़ा आता है। सारी दुनिया उन्हें ज़लील और हकीर समझती है मग रवह उनको सीने से लगाता है, उनको प्यार करता है। 

उसकी बहन इस्मत ने उसके मुताल्लिक कुछ ठीक ही कहा था कि मंटो को अजीबो-गरीब तहलका डाल देनेवाली और सोतों को चैंका देनेवाली चीज़ों से बड़ी रगबत है। वह सोचता है, अगर बहुत से लोग सफेद कपड़े पहने बैठे हों, और कोई कीचड़ मलकर वहां चला जाए तो सब हक्का-बक्का रह जाएंगे... सब लोग रो-पीट रहे हों, वहां एक ऊंचा कहकहा लगा दो तो सब दम साधकर टुकर-टुकर मुंह देखने लगेंगे। बस धाक बैठ जाएगी, सिक्का जम जाएगा। 

उसका भाई मुम्ताज़ हुसैन कहता है: वह नेकी की तलाश में निकलता है और उसकी एक किरन ऐसे इंसान के पेट से निकालता है कि जिसके बारे में आप इस किस्म की कोई तवक्क़ो ही नहीं रखते। यह है मंटो का कारनामा। 

यह बड़ी लग्व (बहुत बुरी, वाहियात) हरकत है बल्कि फहश हरकत है कि ऐसे इंसान की पेट से रोशनी की एक किरन निकाली जाए जिसमें सिवाय अंतड़ियों और फुज्ले (मल-मूत्र) के और कुछ न हो। 

और कीड़च मल के सफेदपोश लोगों के दरमियान कूद पड़ना...

यह और भी फहश है।

यह इतनी कीचड़ लाता कहां से है ?

मालूम नहीं। कहीं -न-कहीं से ढूंढ निकालता है।

गंदगी का ग़व्वास (गोताखोर) जो ठहरा। 

आइए हम दुआ मांगें कि खुदा हमें उसके लानती वुजूद से निजात दिलाए... इसमें खुद मंटो की भी निजात है:

‘‘ऐ खुदा, ऐ रब्बुलआलमीन... ऐ रहीम, ऐ करीम ! हम दो गुनहगाार बंदे तेरे हुजूर गिड़ड़िाकर दुआ मांगते हैं कि तू सआदत हसन मंटो को जिसके वालिद का नाम गुलाम हसन मंटो हैं और जो बहुत शरीफ, परहेज़गार और खुदातरस आदमी था, इस दुनिया से उठा ले, जहां वह खुशबूंएं छोड़ देता ळै और बदबुओं की तरफ भागता है। नूर में वह अपनी नहीं खोलता लेकिन अंधेरे में ठोकरें खाता फिरता है। सत्र (शरीर का वह भाग जिसको छिपाना जरूरी है) से उसको कोई दिलचस्पी नहीं, वह सिर्फ इंसानों की नंग देखता है। मिठाइयों से उसे कोई रग़बत नहीं, कड़वाहटों पर अलबत्ता जान देता है। घरेलू औरतों की तरफ वह आंख उठाकर भी नहीं देखता लेकिन बेसवाओं से घुल-मिल कर बातें करता है। साफ और शफ्फाफ पानी छोड़ के बदरौओं (गंदी नाली) में नहाता है। जहां रोना है, वहां हंसता है और जहां हंसना है, वहां रोता है। कोयलों की दल्लाली में जो अपना मुंह काला करते हैं, उनकी कालिख साफ हरके हमें दिखाता है। तुझे भूलकर उस शैतान के पीछे मारा-मारा फिरता है जिसने तेरी उदूल-हुक्मी की थी... ऐ रब्बुलआलमीन, उस शरअंगेज (बुराई फैलाने वाले), नाजिसपसंद (ग़लीज, गंदगीपसंद) और शरीर इंसान को इस दुनिया से उठा ले जिसमें वह बदकिरदारों ओर बदअतवारों (कुरीतियां) के नामा-ए-आमाल (कर्मपत्र) की सियाहियां मिटाने की कोशिश में मसरूफ है... ऐ खुदा, वह बहु शरपसंद है। अदालतों के फैसले सुबूत हैं लेकिन ये अर्जी अदालतें हैं, तू उसे इस दुनिया से उठा और अपनी आसमानी अदालत में उसके खिलाफ मुकदमा चला और उसको करार वाकई सज़ा दे। लेकिन देख, उसे अदाएं बहुत आती हैं, ऐसा न हो तुझे उसकी कोई अदा पसंद आ जाए... तू सबकुछ जानने वाला है। हमारी सिर्फ यह दुआ है कि वह इस दुनिया में न रहे। रहे तो हम - जैसा बनकर रहे, हम जो एक दूसरे के ऐबों पर पर्दा डालते हैं।‘‘ 

‘ई दुआ अज-मनो-अज-जुमला जहां आमीन बाद ! 

(यह प्रार्थना अक्षरशः सत्य एवं फलीभूत हो)

--- सआदत हसन मंटो 
साभार : दस्तावेज़, राजकमल प्रकाशन
*****
डाकिये की ओर से : अबकी कुछ कहने की जरुरत ही क्या है ? 
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