Thursday, August 18, 2011
अफसानानिगार और जिंसी मसाइल-1
Friday, July 22, 2011
जैसे में मिसफिट हूँ दुनियाँ के लिए.
हाँ पर ख़त के ख़त्म हो जाने पर मुझे डाकिया ही समझना. बस ये ज़रूर कहूँगा...
देके ख़त मुंह देखता है नामावर,
कुछ तो पैग़ाम-ए-ज़बानी और है
हुआ तो नहीं...
भविष्य में कभी ?
लगता तो नहीं...
तो इस वक्त के लिए इतना काफी नहीं खुश रहने के लिए?
अधूरे ग़म सबसे ज़्यादा परेशान करते हैं. ग़मों में डूबे रहना कहीं बेहतर है उससे.
...तो कई बार ऐसा हुआ है परेशान होने कि स्थितयों में और परेशानिया मोल लीं हैं.
१)अबरू की कटारी को दो आब और ज़्यादा.
२)संता बंता का वो चुटकुला जिसमें आप पसीना सुखाने को धूप में खड़े होते हो.
३)छोड़ी गयी पत्नी के बार बार पति के पैरों में नाक रगड़ने की तरह.
४) आत्महत्या का विचार टाल देने की तरह.
मैं उन स्थितियों से गुज़रा हूँ, जहाँ पर मैं दौड़ में पीछे, बहुत पीछे छूट जाने की दशा में भी प्रथम तीन में अपना स्थान बनाने की सामर्थ्य रखता था. कम से कम मैं तो यही समझता था. और यही अति-आत्मविश्वास, अल्प- आत्मविश्वास बन गया. कपूर के गलनांक और वाष्पांक एक होने की तरह प्योर-आत्मविश्वास की स्थिति आई ही नहीं कभी. और मैं जीत जाऊँगा सोचते सोचते मैं हारता रहा (हारता गया नहीं. )
पर हर हार....
..ख़ुशी नहीं कहूँगा पर वो देती रही जिसकी मुझे जिन्दा रहने के लिए निहायत ज़रूरत थी. यकीन कीजिये आपको किसी चीज़ की ताउम्र ज़रूरत होती है, लेकिन वो क्या चीज़ है आपको पता नहीं होता. और ये वो चीज़ तो यक़ीनन नहीं ही है जो आपको पता है. (शायद ऐसा पहले भी किसी ने कहा हो. पर अभी मैं उससे प्रभावित होकर नहीं कह रहा हूँ.)
बहरहाल तसल्ली की बात ये है कि ना चाहते हुए भी आपको एक दिन मर जाना है, आप सब चीज़ जानते हो, चीज़ों के गुज़र जाने को तठस्थ होकर देखते हो, मानो गीता के 'निष्काम कर्म' को हृदयस्थ कर लिया हो.
पर फ़िर...
उसके गुज़र जाने पर...
..आप फफ़क फफ़क कर रोते हो. ऐसे कि दोनों होठों के बीचे मैं लार की पतली पतली रेखाएं बनती बिगडती हों. इंजॉय !
...बस यही तो आप चाहते हो. मैं स्त्री मनोविज्ञान को तो फ़िर भी समझता हूँ (ओवर कौनफिड्न्स जो कपूर की तरह है पर अभी दिल के ख़ुश रखने को... कम से कम तुम्हारे होने तक...) पर दुःख के मनोविज्ञान को नहीं समझ पाया हूँ. ना ना ! यकीन करो बेशक जब दुःख के मज़े लेने शुरू किये थे, तब ये सब सोचता था, अब तो इन सब से ऊपर उठ चुका हूँ, इस सेल्फ पिटी से...
गुर्जिएफ़ की तरह मेरा भी ख्याल है कि आप जिस रास्ते जा रहे हो ज़रूरी नहीं की वो सही हो पर आपको इसका पता कभी नहीं लगेगा, क्यूंकि जो इस राते से गुज़रे वो तो गुज़र गए. तो इसलिए मुझे आपके रास्ते पर यकीन नहीं हो आता...
और रास्ता तो वैसे भी द्वि-आयामी होगा...
यकीं तो मुझे इस बात पर भी नहीं है ख़ैर....
जिस दिन मुझे पता चल जाएगा कि मुझे क्या चाहिए ? उस दिन मैं वाकई दुखी हो जाऊँगा. और ये होगी दुखों कि पूर्ण समाधी,
परम दुःख.
कुछ ऐसा जो कुंडली जागृत करने के ठीक विपरीत होगा. सब कुछ सुला देना. पर वो मौत नहीं होगी.
हँसी आ रही सोच कर कि 'नथिंग इज़ परफेक्ट.'
दोस्तों यकीन रखो ज़िन्दगी एक ही है. मैं चीज़ों को प्रभावित कर सकता हूँ पर मैं चीज़ नहीं हो सकता. मेरे होने तक और मेरे होने से ही आप, फूल, पत्ते, कम्प्यूटर, और लास्ट बट नॉट लीस्ट ये ग़म हैं. आप सब मेरे लिये एक सपने का हिस्सा हैं और अगर आप लोग वाकई में हैं (जो मैं नहीं मानता) तो आप लोगों के लिए भी यही लागू होता है. बड़ी मतलबी से बात है ये पर मैं इसमें चाह कर भी झूठ नहीं ढूंढ पाया. मतलबी पर इमोशनली हौन्टिंग. ग़ालिब ने बेशक ये बात पहले भी कही है पर में उससे कम से कम इस वक्त तो प्रभावित हुए बिना उए बात कह रहा हों.हाँ अगर वो नहीं होता तो मुझे शब्द ढूँढने पड़ते...
...डुबोया मुझको होने ने.
ये सब कह चुकने के बाद भी चैन नहीं आ रहा. नींद आ रही है पर चैन नहीं. किसी की लिखी हुई बात कई दिनों से ज़ेहन में है...
...बात नहीं एक शब्द.
'मिसफिट'
Saturday, July 16, 2011
अदब या तो अदब है, वर्ना बहुत बड़ी बेअदबी
Monday, June 27, 2011
डायरी के पन्ने : आंद्रेई तारकोवस्की - 2
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Tuesday, June 21, 2011
दोस्त, महुआ और लड़कियां…
साल का आखिरी दिन।
कल सारी दुपहर बाहर बितायी।
बहुत अच्छे दोस्त, जिनके साथ भीतर का बुझा, तुडा-मुडा बचपन मुद्द्त बाद धूप में आया। दोपहर को जिन पी। सर्दियों की धूप, जिन, हँसी और दूर से सुनाई देती मवेशियों की घंटियाँ। पीछे भीमबेटका की चट्टानें। मैं कुछ दूर टहलने निकल गया। बहुत बडे काले पत्थरों पर लेटा, वे अब भी दोपहर की धूप से गर्म थे। एक टूटा हुआ भग्न किले की फ़ाँक जैसा आकाश। नीचे दूर अथाह जंगल। पेडों का झूमता नीला सागर, हवा में हौले-हौले हिलोरें लेता हुआ।
हल्का-सा अँधेरा, शाम। महुआ के लिये एक जने को गाँव भेजा, तो वह वहीं अटक गया। मनजीत ने टहनियाँ, घास, पत्ते इकट्ठा करके ढेर बनाया। कुछ ही देर में आग की लपटें उठने लगीं। आग का देखना भी कैसा जिद्दी नशा है, आँखें उठती नहीं। मैं अपनी अधूरी लिखी कहानी के बारे में सोचने लगा। क्या कहानी का अंत आग से सुलगाकर सुलझाया जा सकता है?
चिन्ता शुरु ही हुयी थी कि जीप आ पहुँची, गाँव से लाया हुआ ताज़ा महुआ। गाडी की हैडलाईट्स में वह स्कल्पचर देखा, जो स्वामी और मनजीत ने जोडकर बनाया था। पत्थरों के ठूँठ पर बाँस की चिप्पियाँ, आकाश के क्षितिज पर एक सलीब की तरह खडी हुयी, जिनके नीचे मनजीत बावा बिल्कुल एक क्राइस्ट की तरह दिखाई दे रहा था।
महुआ खत्म ! सब एक बार फ़िर शुरु। नीचे गाँव में पहुँचे, महुआ की तलाश में। आखिर देवराज की सलाह पर हम ’मेन रोड’ से हटकर कहीं बहुत भीतर खेतों के बीच चलते रहे। कहाँ रुकें, कब रुकें, कुछ पता नहीं। अचानक सरदारजी ने मेरा कन्धा पकडकर ऊपर की ओर संकेत किया।
सारा आकाश तारों से अटा था। भोपाल के आसपास इतने तारे उग सकते हैं, यह चमत्कार सा जान पडा। फ़िर महुआ आया। हल्का गुनगुना-सा, गर्म भट्टी से ताज़ा-ताज़ा निकला हुआ। किन्तु मैं अब तक होश से चिपका था और उसे छोडना नहीं चाहता था। बहुत देर तक आकाश को देखता रहा। तारे, पूरा चमकता आकाश। दूर-दूर तक फ़ैले खेत। महुआ में भीगे दोस्त, गाँव के झोपडे, पता नहीं कितनी देर वहाँ बैठे रहे।
वापस लौटते हुये जितेन्द्र नींद में बेहोश, खुर्राटों में लथपथ। मैं कुछ दूर हलकी नींद में तैरकर किनारे पर आया, तो भीतर एक याद कचोटने लगी, जो सारी शाम भीतर थी और अब ठिठुरते हुये बाहर निकल आयी थी। पहली बार पता चला, कि हिन्दुस्तान में ऎसे सुखद दिनों में लडकियों का न होना सबसे खाली चीज़ है जिसे कोई नहीं भर सकता, न महुआ, न तारे, न आग। ये सब अपने में सुंदर हैं – लेकिन कितने अधूरे और सूखे ! शायद इसीलिये हम इतना हँसते हैं, पीते हैं, थककर सो जाते हैं।
आज वर्ष का अन्तिम दिन है, किन्तु वह मेरे लिये कल पूरा हो गया।
३१ दिसम्बर, १९८१, निर्मल वर्मा की डायरी ’धुंध से उठती धुन’ से साभार…
Thursday, June 16, 2011
खूब पहचान लो असरार हूँ मैं...

