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Wednesday, May 9, 2012

कठघरे में आपा और मंटो

डाकिए की ओर से:   मौके पर सही साथ मिला है। हाल ही में इस्मत आपा की आत्मकथा कागज़ी है पैरहन का अंग्रेजी अनुवाद हुआ है। हाथी रूपी समाज के सूंड़ में लाल चींटी के रूप में घुसे मंटो और इस्मत एक ही पहलू के दो सिक्के थे। मंटो थोड़ा ज्यादा था। बकौल मंटो कुछ लोग मुझे प्रगतिशील कहते और जो नहीं कह पाते तो इस्मत चुगताई भी। मंटो ने इस्मत को भी बड़े अलहदा ढंग से याद किया है इस दिलचस्पी के साथ कि लोग हमारा नाम यों  जोड़ते हैं जैसे बंबई में राजकपूर और नरगिस। बहरहाल खत किसी के नाम लिखे लिखाए हों तो आलसी डाकिया छज्जे पर फेंकने भर से गुरेज नहीं करता। शुक्रिया हिन्दुस्तान समाचार पत्र का जिसने इस्मत चुगताई की आत्मकथा कागज़ी है पैरहन किताब के मार्फत इस्मत आपा की 'लिहाफ' और मंटो की 'बू' पर फहाशी का मुकदमा चला। पेश है वो तस्वीर जो मंटो अपने लक्ष्य को लेकर किस हद तक स्पष्ट था यह ज्ञात होता है। वैसे मेरे एक मित्र सुशील कुमार छौक्कड़ ने जब फेसबुक पर यह संदेश डाला कि "मंटो का सौवां जन्मदिन 11 मई को और कोई हलचल नहीं, अफसोस" तो कार्टूनिस्ट काजल कुमार ने सही लिखा कि "न वोट, न गुट तो मंटो कौन?"
*****

44 में दिसम्बर के महीने में सम्मन मिला कि हमें जनवरी में कोर्ट में हाजिर होना है। सब कह रहे थे जेल-वेल नहीं, बस जुर्माना हो जाएगा। और हम बड़े जोश से लाहौर के लिए गर्म कपड़े तैयार करवाने लगे।
सीमा बहुत छोटी और कमजोर थी और बड़ी ऊंची आवाज से रोती थी। चाइल्ड स्पेशलिस्ट को दिखाया तो उसने कहा, बिल्कुल तन्दुरुस्त है, यूं ही गुल मचाती है। उसे लाहौर की सर्दी में ले जाना ठीक न था। एकदम इतनी सर्दी न ङोल सकेगी। तो हमने बच्चाी को अलीगढ़, सुल्ताना जाफरी की अम्मा के पास छोड़ा और लाहौर रवाना हो गए। देहली से शाहिद अहमद देहलवी और वह कातिब जिन्होंने किताबत की थी, साथ हो गए थे, क्योंकि बादशाह सलामत ने उन्हें भी मुलजिम करार दिया था। यह मुकद्दमा अदबे-लतीफ पर नहीं, बल्कि उस किताब पर चला था, जो शाहिद अहमद देहलवी ने छापी थी। हमें सुल्ताना लेने आ गई। वह उन दिनों लाहौर रेडियो स्टेशन पर काम करती थी और लुकमान साहब के यहां रहती थी। उनकी बड़ी शानदार कोठी थी। बीवी-बच्चाे मैके गए हुए थे, इसलिए बस अपना ही राज था। मंटो भी पहुंच गए थे और पहुंचते ही हमारी खूब दावतें हुईं। ज्यादातर तो मंटों के दोस्त थे, मगर मुङो भी अजूबा जानवर समझकर देखने आ जाते थे। हमारी एक दिन पेशी हुई, कुछ भी न हुआ। बस जज ने नाम पूछा और यह कि मैंने यह कहानी लिखी है या नहीं। मैंने इकबाले-जुर्म किया कि लिखी है। बस। बड़ी ना-उम्मीदी हुई। सारे वक्त कुछ हमारे वकील साहब बोलते रहे। हम चूंकि आपस में खुसर-फुसर कर रहे थे, कुछ पल्ले नहीं पड़ा। उसके बाद दूसरी पेशी पड़ गई और हम आजाद होकर गुलर्छे उड़ाने लगे। मैं, मंटो, शाहिद तांगे में बैठकर खूब शॉपिंग करते फिरे। कश्मीरी दोशाले और जूते खरीदे। जूतों की दुकान पर मंटो के नाजुक सफेद पैर देखकर मुङो बड़ा रश्क आया। अपने भद्दे पैर को देखकर मोर की तरह मातम को जी चाहा।
‘मुङो अपने पैरों से घिन आती है,’ मंटो ने कहा।
‘क्यों? इतने खूबसूरत हैं।’ मैंने बहस की।
‘मेरे पैर बिल्कुल जनाने हैं।’
‘मगर जनानियों से तो इतनी दिलचस्पी है आपको!’
‘आप तो उल्टी बहस करती हैं। मैं औरत से मर्द की हैसियत से प्यार करता हूं। इसका मतलब यह तो नहीं कि खुद जनाना बन जाऊं।’
‘हटाइए भी जनाने और मर्दाने की बहस को, इनसानों की बात कीजिए। पता है नाजुक पैरोंवाले मर्द बड़े हिस्सास और जहीन होते हैं। मेरे भाई अजीम बेग चुगताई के पैर भी बड़े खूबसूरत हुआ करते थे। मगर..।’
.. लाहौर कितना खूबसूरत था! आज भी वैसा ही शादाब कहकहे लगाता हुआ, बाहें फैलाकर आनेवालों को समेट लेनेवाला। टूटकर चाहनेवाले बे-तकल्लुफ जिंदा-दिलों का शहर, पंजाब का दिल। तब मेरे दिल से बेसाख्ता शहंशाह बर्तानिया के हक में दुआइया कलमे निकलने लगे कि उन्होंने हम पर मुकदमा चलाकर लाहौर में ऐश करने का सुनहरा मौका दिया। हम दूसरी पेशी का बड़ी बेकरारी से इंतजार करने लगे। चाहे फांसी भी हो तो कोई परवा नहीं, अगर लाहौर में हुई तो यकीनन शहादत का रुतबा पाएंगे और लाहौरवाले बड़ी धूम से हमारे जनाजे उठाएंगे। दूसरी पेशी नवम्बर के खुशगवार मौसम में पड़ी, यानी 1946 ई. में। शाहिद अपनी फिल्म में उलङो हुए थे। सीमा की आया बहुत होशियार थी और अब सीमा बहुत मोटी-ताजी और तंदुरुस्त थी। इसलिए मैंने उसे बंबई में छोड़ा और खुद हवाई जहाज से देहली और वहां से शाहिद अहमद देहलवी और उनके कातिब के साथ रेल में गई। कातिब साहब से बड़ी शर्मिदगी होती थी, वह बेचारे मुफ्त में घसीट लिए गए। बड़े शामोश, मिस्कीन से थे। हमेशा आंखें झुकीं, चेहरे पर उकताहट, उन्हें देखकर एहसासे-जुर्म एकदम उभर जाता था। मेरी किताब की किताबत में फंस गए। मैंने उनसे पूछा- 
‘आपकी क्या राय है? क्या हम मुकद्दमा हार जाएंगे?’
‘मैं कुछ कह नहीं सकता, मैंने कहानी नहीं पढ़ी।’
‘मगर कातिब साहब, आपने किताबत की है।’
‘मैं अलफाज जुदा-जुदा देखता हूं और लिख देता हूं। उनके मानी पर गौर नहीं करता।’
‘कमाल है! और छपने के बाद भी नहीं पढ़ते?’
‘पढ़ता हूं, कहीं गलती तो नहीं रह गई।’
‘अलग-अलग अलफाज!’
‘जी हां!’ उन्होंने नदामत से सर झुका लिया। थोड़ी देर बाद बोले-
‘एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानेंगी!’
‘नहीं।’
‘आप कियां (के यहां) इमला की बहुत गलतियां होती हैं।’
‘हां, वो तो होती हैं। अस्ल में सीन, से और साद में गड़बड़ा जाती हूं। जो, जाद, जे, जाल में भी बहुत कनफ्यूजन होता है। यही हाल छोटी हे, बड़ी हे और दोचश्मी हे का है।’
‘आपने तख्तियां नहीं लिखीं?’
‘बहुत लिखीं। और मुस्तकिल इन्हीं गलतियों पर बहुत मार खाई मगर..।’
‘दरअस्ल जैसे मैं अलफाज पर ध्यान देता हूं, मानी की तरफ तवज्जह नहीं देता, इसी तरह आप अपनी बात कहने में ऐसी उतावली होती हैं कि हरूफ पर तवज्जह नहीं देतीं।’
‘ऊंह!’ अल्लाह कातिबों को जीता रखे, वो मेरी आबरू रख लेंगे। मैंने सोचा और टाल दिया।
.. पेशी के दिन हम कोर्ट में हाजिर हुए और वह गवाह पेश हुए जिन्हें यह साबित करना था कि मंटो की ‘बू’ और मेरा ‘लिहाफ फुहश’ हैं। मेरे वकील ने मुङो समझा दिया कि जब तक मुझसे बराहे-रास्त सवाल न किया जाए, मैं मुंह न खोलूं। वकील खुद जो मुनासिब समङोगा करेगा।
पहले ‘बू’ का नंबर आया।
‘ये कहानी फुहश है?’ - मंटो के वकील ने पूछा।
‘जी हां,’ गवाह बोला।
‘किस लफ्ज से आपको मालूम हुआ कि फुहश है?’
गवाह : ‘लफ्ज ‘छाती’।’
वकील : ‘माइ लॉर्ड, लफ्ज छाती फुहश नहीं है।’
जज : ‘दुरुस्त।’
वकील : ‘लफ्ज छाती फुहश नहीं है?’
गवाह : ‘नहीं, मगर यहां मुसन्निफ ने औरत के सीने को छाती कहा है।’
मंटो एकदम से खड़ा हो गया और बोला-
‘औरत के सीने को छाती न कहूं तो क्या मूंगफली कहूं?’
कोर्ट में कहकहा पड़ा। मंटो भी हंसने लगा। ‘अगर मुलजिम ने फिर इस किस्म का छिछोरा मजाक किया तो कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट के जुर्म में बाहर निकाल दिया जाएगा या माकूल सजा दी जाएगी।’ मंटो को उसके वकील ने चुपके-चुपके समझाया और वह समझ गया। बहस चलती रही और घूम-फिरके गवाहों को बस एक ‘छाती’ मिलता था जो फुहश साबित न हो पाता था। ‘लफ्ज छाती फुहश है, घुटना या कुहनी क्यों फुहश नहीं?’ मैंने मंटो से पूछा।
‘बकवास!’ मंटो भड़क उठा। बहस चलती रही। हम लोग उठकर बरामदे में डगर-डगर करती बेंचों पर जा बैठे। अहमद नदीम कासमी एक टोकरा माल्टे लाए थे। उन्होंने नफासत से माल्टे खाने की तरकीब बताई। माल्टे को आम की तरह पिलपिलाकर छोटा सा सुराख कर लो और मजे से चूसते रहो। टोकरा भर माल्टे हम बैठे-बैठे चूस गए। माल्टों से पेट भरने के बजाय और शिद्दत से भूख जाग उठी। लंच ब्रेक में किसी होटल पर धावा बोला दिया। सीमा की पैदाइश के सिलसिले में मैं बहुत बीमार रही थी, सारी चर्बी छट गई थी, गुरग्गन खानों का परहेज नहीं रहा था। मुर्गी इतनी कवी-हेकल थी कि बिल्कुल गिद्ध या चील के टुकड़े लग रहे थे। मोटी-मोटी, काली मिर्च छिड़ककर गर्म-गर्म कुल्चों के साथ और पानी की जगह कंधारी अनार का रस। बे-इख्तियार जी से मुकद्दमा चलानेवालों के लिए दुआ निकल रही थी।
 ..
कोर्ट में बड़ी भीड़ थी। कई असहाब हमें राय दे चुके थे कि हम मुआफी मांग लें। वो जुर्माना हमारी तरफ से अदा करने को तैयार थे। मुकद्दमा कुछ ठंडा पड़ता जा रहा था। ‘लिहाफ’ को फुहश साबित करनेवाले हमारे गवाह हमारे वकील की जिरह से कुछ बौखला से रहे थे। कहानी में कोई लफ्ज काबिले-गिरफ्त नहीं मिल रहा था। बड़े सोच-विचार के बाद एक साहब ने फरमाया कि ये जुमला ‘..आशिक जमा कर रही थीं,’ फुहश है।
‘कौन सा लफ्ज फुहश है? जमा या आशिक? वकील ने पूछा।’
‘लफ्ज आशिक!’ गवाह ने जरा तकल्लुफ से कहा।
‘माई लॉर्ड लफ्ज आशिक बड़े-बड़े शुअरा ने बड़ी फरावानी से इस्तेमाल किया है और नातों में इस्तेमाल किया गया है। इस लफ्ज को अल्लाहवालों ने बड़ा मुकद्दस मुकाम दिया है।’
‘मगर लड़कियों का आशिक जमा करना बड़ी मायूब बात है,’ गवाह ने फरमाया।
‘क्यों?’
‘इसलिए, क्योंकि..ये शरीफ लड़कियों के लिए मायूब बात है।’
‘जो लड़कियां शरीफ नहीं उनके लिए मायूब नहीं?’
‘अ..नहीं।’
‘मेरी मुवक्किल ने उन लड़कियों का जिक्र किया है जो शरीफ नहीं होंगी। क्यों साहब, बकौल आपके, गैर-शरीफ लड़कियां आशिक जमा करती हैं?’
‘जी हां।’
‘उनका जिक्र करना फुहाशी नहीं। मगर एक शरीफ खानदान की तालीमयाफ्ता औरत का उनके बारे में लिखना काबिले-मलामत है,’ गवाह साहब जोर से गरजे।
‘तो शौक से मलामत फरमाइए, मगर कानून की गिरफ्त के काबिल नहीं।’
मुआमला बिल्कुल फुसफुसा हो गया।
‘अगर आप लोग मुआफी मांग लें तो हम आपका सारा खर्चा भी देंगे और..’ एक साहब न जाने कौन थे, चुपके से मेरे पास आकर बोले।
‘क्यों मंटो साहब, मुआफी मांग लें! जो रुपए मिलेंगे, मजे से चीजें खरीदेंगे।’ मैंने मंटो से पूछा।
‘बकवास,’ मंटो ने अपनी मोरपंखी आंखें फैलाकर कहा।
‘मुङो अफसोस है, यह सरफिरा मंटो राजी नहीं।’
‘मगर आप! अगर आप ही..।’
‘नहीं, आप नहीं जानते। यह शख्स बड़ा फित्तीन है। बंबई में मेरा रहना दूभर कर देगा। इसके गुस्से से वह सजा बदजर्हा बेहतर होगी जो मुङो मिलनेवाली है।’ वह साहब उदास हो गए क्योंकि हमें सजा नहीं मिली। जज साहब ने मुङो कोर्ट के पीछे एक कमरे में तलब किया और बड़े तपाक से बोले, ‘मैंने आपकी कहानियां पढ़ी हैं और वो फुहश नहीं। और न ‘लिहाफ’ फुहश है। मगर मंटो की तहरीरों में बड़ी गलाजत भरी होती है।’
‘दुनिया में भी गलाजत भरी है,’ मैं मखनी आवाज में बोली।
‘तो क्या जरूरी है कि उसे उछाला जाए!’
‘उछालने से वह नजर आती है और सफाई की तरफ ध्यान जा सकता है।’
जज साहब हंस दिए।
न मुकदमा चलने से परेशानी हुई थी, न जीतने की खुशी हुई। बल्कि गम ही हुआ कि अब फिर लाहौर की सैर खुदा जाने कब नसीब होगी।

--------कागज़ी है पैरहन, इस्मत चुगताई

आभार : हिंदुस्तान

Saturday, December 31, 2011

कविता के पन्नों मे नया साल: जेनिफ़र स्वीनी


अभी जब एक साल से दूसरे साल तक सत्ता-हस्तांतरण का वक्त नजदीक आता जा रहा है।ऐसे मे गुनगुनी धूप मे बैठ कर चाय की चुस्कियों के संग गुजर गये साल पर आत्मचिंतन करना सबसे स्वाभाविक और आरामदायक काम होता है। खैर, नया कैलेंडर टांगने से पहले पुराने हो गये इस कैलेंडर पर लगी तमाम उम्मीदों, खुशी, भरोसे, डर, आशंकाओं, कसमों की चिप्पियाँ साल के कुल जमा-हासिल की एक बानगी होती हैं। गुजरते साल के ऐसे ही हासिलों और आने वाले साल से बावस्ता उम्मीदों की इबारत को कविता के चश्मे से परखने की कोशिश हम भी करते हैं। सो आइये अगले कुछ दिनों मे देखते हैं कि कोई कवि वक्त के इस मुकाम को कितनी अलहदा नजरों से परख पाता है। इस सिलसिले मे सबसे पहले पेश है जेनिफ़र स्वीनी की एक अंग्रेजी कविता का हिंदी मे तर्जुमा। अमेरिका की इस युवा कवियत्री को कम उम्र मे ही कई अवार्ड्स से नवाजा जा चुका है। उनके कविता संकलन ’हाउ टु लीव ऑन ब्रेड एंड म्यूजिक’ (पेरुगिया प्रेस) की इस कविता मे जिंदगी की कुल गणित के टुकड़े बिखरे से नजर आते हैं।


बीत गये साल के लिये चंद कतरनें

मैने पाया है कि
औसतन विषम संख्या वाले साल
ज्यादा बेहतर रहे हैं मेरे लिये

मै उस दौर मे हूँ जहाँ मुझे हर मिलने वाला
लगता है उस जैसा
जिसे मै पहले से जानती हूँ

पतझड़ का मौसम बिना हिचकिचाहट के
मुझे धकेल देता है उन चीजों की स्मृतियों मे
जो कभी हुई ही नही मेरी जिंदगी मे

केंचुली बदलता है आसमान
और मुझे नही पता कि इसकी वजह ग्लोबल-वार्मिंग है
या कि वायुमंडल बस खुद को तैयार करता है
कि सह सके और ज्यादा नयी चमकदार यंत्रणायें

मेरे अंदर हिलोरें मारती है
आइसलैंड जाने की बेताब ख्वाहिश

तमाम बुरी चीजों के बावजूद
अभी भी हम भरे हुए हैं विचारों से
जो कि उतने ही संभव हैं
जितने कि वंध्या फ़ल

मुझे सख्त अफ़सोस होता है
कि मुझे ही समझाना होगा
नर्सरी के बच्चों को
कि सूर्यास्त और प्रदूषण के बीच रिश्ता क्या है

और क्या पता है तुम्हे
कि शुक्र-ग्रह पर हमारी उम्र
अभी एक साल से भी कम की होगी

तब यहाँ दो आसमान थे
एक जिसमे भरते थे हम अपनी उड़ान
तो दूसरे मे हम दफ़्न करते खुद को

शुक्र है कि अभी भी
मेरी दिलचस्पी कामुक विलासिता की चीजों मे नही,
मसलन बाथरूम के ऐशो-आराम के सामान

हम साथ-साथ ही हुआ करते थे हर वक्त
कहानी मे

और उसकी शादी के दिन
उसके सीने मे गड़ा पत्थर
कुछ-कुछ तो पिघल सा गया था

कभी-कभी लगता है मुझे
कि जैसे परिंदे उड़ जाते हैं मेरे अंदर से
अनंत की ओर।





(प्रथम चित्र: अमेरिकन कवियत्री- जेनिफ़र के स्वीनी)
(द्वितीय चित्र: The Key -अब्स्ट्रैक्ट-एक्सप्रेशनिज्म के अगुआ ख्यात अमेरिकन पेंटर जैक्सन पोलॉक)

Saturday, July 16, 2011

अदब या तो अदब है, वर्ना बहुत बड़ी बेअदबी



डाकिए की ओर से: दिल्ली, बारिश और शनिवार... कुनैन की गोलियां। अफीम की आदत। कड़वाहट चबाने का लत गोया इससे निकला रस मीठा होता है। बेर खाने के बाद का पानी पीना जैसे। 

ऐसे में गालिबन मंटो। कहते हैं मंटो बड़ा जटिल इंसान था। लेकिन उसे पढते हैं तो लगता है वो बहुत सीधा था। एक बच्चे जितना मासूम और सीधा लेकिन हम उसका यह सीधापन झेल नहीं सके तो साजिश के तहत उसे काॅम्पलेक्स करार दे दिए।

मंटो के मजामीन हाथ लगे हैं। दस्तावेज का चौथा हिस्सा जिसमें मुदकमे, पत्र और निबंध हैं और जिसकी शुरूआत कुछ यूं होती है -


जब कोई ईमानदान नागरिक रात को सो नहीं पाता 
जब कोई देशभक्त उदास हो जाता है
जब कोई काबिल जवान इम्प्लायमेंट एक्सचेंज की सीढि़यों पर दिन गुजारता है
जब कोई बुद्धिजीवी किसी कारण किसी का पिछलग्गू बन जाता है 
जब कोई लेखक इनाम और खिताब के मोह में दर दर भटकता है
जब कोई व्यक्ति अदालत के बरामदे में बचपन से बुढापे में पहंुच जाता है
जब कोई मरीज़ अस्पताल के दालान में बिस्तर लगाता है
जब कोई स्मगलर समाज में रूत्बा पाता है 
जब कोई मुलाजिम ताल्लुकात की सीढि़यां चढ़कर ऊपर पहंुचता है 
दोस्तों, 
तब सआदत हसन मंटो ये मज़ामीन लिखता है।

सच भी है, इस हिस्से में उन दिनों की दास्तां है जब लगातार मुकदमे से मंटो परेशां हो गया था। लिखने से ज्यादा उसे सफाई देनी पड़ रही थी। उसे सरोकार याद दिलवाए जा रहे थे और औकात बताई जा रही थी। हैरानी होती है जो कहानी में बेदर्दी से खाल उतारता था वो किस कदर हस्सास नज़र रखता था।

यहां पाठकों से रू ब रू होता मंटो। कुछ सवालों का जवाब देता हुआ...

(मेरी खुद की भूमिका लंबी हो गई। माफी)

*****

मेरे मज़मून का उनवान अदबे-जदीद है। लुत्फ की बात यह है कि मैं इसका मतलब ही नहीं समझता लेकिन यह जमाना ही कुछ ऐसा है कि लोग उसी चीज़ के मुताल्लिक बातें करते हैं जिनका मतलब उनकी समझ में नहीं आता। पिछले दिनों गांधी जी ने आगा खां के महल में मरन ब्रत रखा। जब लोगों की समझ में न आया कि वह किस तरह जिंदा रह सके हैं तो एक नारंगी पैदा कर दी गई। यह नारंगी भी कुछ दिनों बाद नाकाबिले फहम हो गई। बाज आदमियों ने कहा कि नारंगी नहीं थी, मौसंबी थी। बाज ने कहा: नहीं मौसंबी, नारंगी हर्गिज नहीं थी, माल्टा था। बात बढ़ती गई। फिर इसकी सारी जातें गिनवा दी गई। फिर डाक्टरों ने इनमें से हर एक की विटामिन गिनवाई। गिजाइयत को कैलोरीज में तकसीम किया गया। एक बरस में पिचहत्तर बरस के बुड्डे को कितनी कैलोरीज की जरूरत होती है, इस पर बहस की गई और साहिब, गांधी जी की यह नारंगी या मौसंबी जो कुछ भी थी, वह सआदत हसन मंटो बन गई। यह मेरा नाम हैं लेकिन बाज लोग अदबे-जदीद अलमारूफ नए अदब, यानी तरक्कीपसंद अदब को सआदत हसन मंटो भी कहते हैं और जिन्हें सिन्फे करख्त पसंद नहीं, वो उसे इस्मत चुगताई भी कह लेते हैं। 

जिस तरह मैं यानी सदादत हसन मंटो अपने आपको नहीं समझता, तरक्कीपसंद लिट्रेचर भी उन लोगों की समझ से भी ऊंचा है हो इसको समझने की कोशिश करते हैं।

मैं चीजों को नाम रखने को बुरा नहीं समझता। मेरा अपना नाम अगर न होता तो वो गालियां किसे दी जातीं जो अब तक हजारों और लाखों की तादाद में मैं अपने नक्कादों से वुसूल कर चुका हूं। नाम हो तो गालियां और शाबाशियां देने और लेने में बहुत सहूलत पैदा हो जाती है लेकिन अगर एक ही चीज के बहुत से नाम हों तो उलझाव पैदा होना जरूरी है।

सबसे बड़ा उलझाव इस तरक्कीपसंद अदब के बारे में पैदा हुआ है हालांकि पैदा नहीं होना चाहिए था - अदब या तो अदब है, वर्ना बहुत बड़ी बेअदबी। 

मैं दूसरों की तरफ से जवाब नहीं दूंगा। अपने मुताल्लिक अर्ज करना चाहता हूं कि दुनिया का नक्शा बदल रहा है लेकिन अगर मैंने उसके मुताल्लिक कुछ लिखा है तो मेरा भी हुलिया बदल जाएगा। डरपोक आदमी हूं, जेल से बहुत डर लगता है। यह जिदंगी जो बसर कर रहा हूं, जेल से कम तकलीफदेह नहीं है। अगर इस जेल के अंदर एक और जेल पैदा हो जाए और मुझे उसमें ठूंस दिया जाए तो चुटकियों में मेरा दम घुट जाएगा। जिंदगी से मुझे प्यार है। हरकत का दिलदादा हूं। चलते-फिरते सीने में गोली खा सकता हूं लेकिन जेल में खटमल की मौत नहीं मरना चाहता। यहां इस प्लेफार्म पर यह मज़मून सुनाते सुनाते आप सबसे मार खा लूंगा और उफ तक नहीं करूंगा लेकिन हिंदू मुस्लिम फसाद में अगर कोई मेरा सिर फोड़ दे तो मेरे खून की हर बूंद रोती रहेगी। मैं आर्टिस्ट हूं, ओछे ज़ख्म और भद्दे घाव मुझे पसंद नहीं। जंग के बारे में कुछ लिखूं और दिल में पिस्तौल देखने और छूने की हसरत दबाए किसी तंगो तारीक कोठरी में मर जाऊं, ऐसी मौत से तो यही बेहतर है कि लिखना विखना छोड़कर डेरी फार्म खोल लूं और पानी मिला दूध बेचना शुरू कर दूं। 

मुझे चुस्त वर्दी पहनने का शौक नहीं है। पीतल और तांबे के मतगों और कपड़े के रंगीन बिल्लों से मुझे कोई दिलचस्पी नहीं। होटलों में डांस करके, क्लबों में शराब पीकर और टैक्सियों में चूना-कत्था लगी लड़कियों के साथ घूमकर मैं वार ऐफर्ट की मदद नहीं करना चाहता। इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प मशागिल मुझे मयस्सर हैं। मिसाल के तौर पर यह मश्ग़ला क्या बुरा है कि मैं हर रोज़ बंबई सैंट्रल से गोरेगांव और गोरेगांव से बंबई सैंट्रल तक बर्की ट्रेन में सैकड़ों वर्दीपोश फौजियों को देखता हूं जो फतह-ओ-नुसरत को ओर ज्यादा करीब लाने के लिए शराब के नशे में मदहोश या तो टांगे पसारे सो रहे होते हैं या निहायत ही बदनुमा औरतों से, मेरी मौजूदग से गाफिल, निहायत ही वाहियात किस्म का रोमांस लड़ाने में मसरूफ होते हैं। 

मैं इस जंग के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा लेकिन जब मेरे हाथ में पिस्तौल होगा और दिल में यह धड़का नहीं रहेगा कि यह खुद ब खुद चल पड़ेगा तो मैं उसे लहराता हुआ बाहर निकल जाऊंगा और अपने असली दुश्मन को पहचानकर या तो सारी गोलियों उसके सीने में खाली कर दूंगा या खुद छलनी हो जाऊंगा। इस मौत पर जब मेरा कोई नक्काद यह कहेगा कि पागल था तो मेरी रूह इन लफ्जों ही को सबसे बड़ा तमगा समझकर उठा लेगी और अपने सीने पर आवेजां कर लेगी।

Monday, June 27, 2011

डायरी के पन्ने : आंद्रेई तारकोवस्की - 2


डाकिए की ओर से: एक नज़र में तारकोवस्की का हाल भी हमारे देश के महान फिल्मकार ऋत्विक घटक जैसा ही था। जब फिल्में बनाते सरकार विद्रोह या बकवास करार देकर प्रतिबंध लगाती। दोनों जगह यह साजिश थी। जैसे ऋत्विक घटक के जाने के बाद सिनेमा के छात्रों को उनकी बनाई फिल्में देखने को कहा जाता है। तारकोवस्की ने अपनी डायरी में मठाधीशों और सरकारी अधिकारियों को जमकर कोसा है। यहां यह सवाल भी उठता है कि देश में विषय वाइज विशेषज्ञ होना चाहिए अन्यथा इज्जत नहीं मिलती। उदाहरणार्थ हमारे यहां स्पोटर्स में खिलाडि़यों ज्यादा जानकार नेता होते हैं। देखिए चीजें कैसे लिंक्ड हो जाती हैं और कहां से कहां चली जाती हैं। 


*****

1973 
5 फरवरी
यूगोस्लाविया द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समारोह में रूबल्योव को ग्रैंड प्राइज प्राप्त हुआ। 
नजायज़ मानी गई इस फिल्म रूबल्योव को यह चैथा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। 

17 जून,
रूबल्योव को स्वीडर में दिखाया जा रहा है, एंडरसन के बताए अनुसार बर्गमन ने कहा उन्होंने इतनी बढि़या फिल्म आज तक नहीं देखी। 

उसे पूरी तरह खोलना होगा, उससे सीधे सीधे भिड़ना होगा, उसकी तरफ दूर से नहीं आया जा सकेगा, छिलका निकाल फेंकना होगा, उसे अपने ही ढंग से पढ़ो, कलाकार के एकांत की ट्रेजेडी ही सर्वोपरि है और सत्य को समझने के लिए उसकी कीमत चुकाना भी।

1975 
3 जुलाई
कोई योजना कैसे परिपक्व होती है ?

निस्संदेह यह अत्यंत भेदभरी और अत्यंत दुग्र्राह्य प्रक्रिया है। हमारे बंधन से छुटी वह अचेतन में आज़ाद जारी रहती है, और तंतःकरण की दीवारों पर निश्चिमत रूप धारण करती है। फिर अंतःकरण का रूप ही उसे विलक्षण बनाता है, दरअसल सिर्फ अंतःकरण ही उसके उस बिंब की प्रच्छन्न गर्भावधि तय करता है जो सामान्य नज़रों से नहीं देखा जा सकता। 

1976
8 फरवरी 
मेरा पूरा यकीन है कि समय उत्क्रमणीय है, किसी भी हालत में वह सीधी रेखा में नहीं चलता। 

13 सितंबर
हम या तो एक दूसरे के गुणों को कम आंकते हैं या फिर बढ़ा चढ़ा कर बताते है। बहुत कम लोग दूसरों का आकलन उनकी योग्यता के आधार पर करने के काबिल होते हैं। यह कोई खास तरह की प्रतिभा होती है, सचमुच यहां तक कह सकता हूं कि केवल कुछ एक महान लोग ही इस योग्य होते हैं। 

1977
28 दिसंबर
कमज़ोरी महान चीज़ है, ताकत गौण है। जब मनुष्य जन्म लेता है त बवह कमज़ोर और कोमल होता है। जब मरता है तब मजबूत और कठोर होता है। 
जब एक पेड़ उगता है तब वह लचीला और मुलायम होता है, और जब वह सूख कर कड़क होता है तब मर जाता है। कठोरता और ताकत मृत्यु के सहचर हैं। 
नमनशीलता और कमज़ोरी ‘होने‘ की ताज़गी के निशान हैं। जो कड़ा हो गया वह कभी सफल नहीं होगा।  (लाओ-त्से)

1978
13 अप्रैल
वाकई... मैं दि मास्टर एंड मार्गारिता पर फिल्म क्यों नहीं बना रहा ? क्योंकि वह किसी प्रतिभाशाली लेखक का उन्यास है ? हालांकि, सवाल गद्य कैसा क्य है यह नहीं, विषयवस्तु का निरूपण कैसा और क्या है इसका नहीं नहीं, कथानक का नहीं, भाषा का भी नही !

मध्य-युग और नवजागरण की सारी चित्रकला की और संगीत कला की, अंततः एक ही, वही की वही, विषयवस्तु रही। द्यूरर, क्रोनेच, ब्रूघेल, बाख, हांदेल, लिओनार्दो, माइकलएंजेलो आदि सभी की...

इसमें आदिम स्त्रोतों को धंुधला करने जैसी कोई बात नहीं। यहां बात है दक्षता की, और वस्तु की, और फिर कलाकार ही उस्ताद है, क्योंकि उसे मालूम है किससे क्या बनाना है। 

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पुस्तक : अनंत में फैलते बिम्ब : तारकोवोस्की का सिनेमा
साभार : संवाद प्रकाशन, हिंदी अनुवाद.

पुनःश्च:- आज एस पी सिंह की पुण्यतिथि है। पत्रकारिता के इस पारखी पत्रकार को डाकिए का सलाम। कुछ आलेख यहां और एक यहाँ पढ़ा जा सकता है।

Thursday, June 16, 2011

खूब पहचान लो असरार हूँ मैं...





डाकिए की ओर से: सुबह मजाज़ की सोहबत में गुज़री, तो हैंगओवर सा हो गया, पर ये नशा ज़रूरी था। अभी चिठ्ठी डालने निकला तो सोचा क्यों न यही खत आप तक भी पहुंचाया जाए। वैसे भी एक नज़र फेसबुक पर डाली तो लोहा गर्म लगा। कुरजां (जयपुर से नई मैगज़ीन) में भी अलसुबह इनके बारे में विस्तार से जाना। लेकिन फिलहाल यहां एक छोटा सा पोस्टकार्ड डाल रहा हूं। खत और भी आएंगे और तारकोवोस्की की डायरी भी चलती रहेगी, मगर फिलहाल यह फुहार...
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मजाज़ लखनवी हकीकत में उस असरार का नाम है जिसे जमाना उसकी मौत के बाद भी समझने की कोशिश में मुब्तला है। उर्दू के तमाम शायरों में अगर सबसे शायराना जिंदगी किसी की रही तो ये मजाज़ ही थे। उर्दू अदब की दुनिया में ये किस्से पहले ही अमर हो चुके हैं कि एक ज़माने में कुंवारी लड़कियां अपने बेटों के नाम मजाज़ के नाम पर रखने की कसमें खातीं थीं। मजाज़ के लिए लड़कियों में लाॅटरी निकाली जाती थीं और उनकी नज्में गल्र्स होस्टल के तकियों में दबी मिलती थीं लेकिन मजाज़ ताजिंदगी जिन्स-ए-उल्फत (प्यार) के तलबगार ही रहे। एक दफा अलीगढ़ विश्वविद्यालय में ही इस्मत चुगताई ने उनसे कहा कि लड़कियां मजाज़ से मुहब्बत करती हैं, इस पर मजाज़ ने तपाक से कहा - ‘और शादी पैसे वालों से कर लेती हैं‘।

जिं़दगी में सब कुछ बदलता रहा लेकिन हाजि़रजवाबी का ये असासा हर दौर में मजाज़ के साथ रहा। जब इस्मत चुगताई ने उनसे पूछा कि मजाज़ तुम्हारी जिंदगी को बर्बाद लड़की ने किया या शराब ने तो मजाज़ ने कहा कि मैंने दोनों को बराबर का हक दिया है। मजाज़ के ऐसे कई लतीफे जिन्हें बाद में मजाज़ीफे कहा जाने लगा, आज भी लखनऊ की आबो-हवा में बिखरे पड़े हैं। लेकिन इनके पीछे की तल्खी यह है कि इन्हें कहने वाला पूरी जिंदगी बेहद दुखी रहा। 

उर्दू के जाॅन कीट्स कहे जाने वाले असराल उल हक मजाज़ की पैदाइश 1911 में रूदौली कस्बे में हुई थी। मजाज़ की शायरी को मुकाम अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में मिला। यहां उस दौर में मशहूर शायरों की एक पूरी जमात थी जिनमें मोईन अहसन जज्बी, अली सरदार जाफरी और जांनिसार अख्तर भी शमिल थे। लेकिन इन सबमें जो नाम सबसे ज्यादा मकबूल हुआ वह मजाज़ लखनवी का ही था। अलीगढ़ मुसमिल यूनिवर्सिटी का तराना भी मजाज़ का ही लिखा हुआ है। मजाज़ प्रगतिशीलता के सारे तत्वों के स्वाभाविक समर्थक थे। असल में नाजुक तबीयत वाले मजाज़ हर उस व्यक्ति से नजदीकी महसूस करते थे जिसे उसका बुनियादी हक नहीं मिला। यही निकटता उन्हें प्रगतिशीलता की राह पर ले गई। स्त्री मुक्ति और नारीवाद के जिस आंदोलन की बात आज होती है उसे मजाज़ 30 के दशक में ही अपनी नज्मों के ज़रिए कह रहे थे। कम लोग जानते हैं कि मजाज़ साहब के पुश्तैनी घर में आज लड़कियों का स्कूल चल रहा है। 

मजाज़ तरक्कीपसंद शायरों में होते हुए भी अपनी रूमानियत के चलते अलग ही नज़र आते हैं। फैज अहमद फैज उनके बारे में लिखते हैं - मजाज़ की इंकलाबियत आम इंकलाबी शायरों से अलग है। आम इंकलाबी शायर इंकलाब को लेकर गरजते हैं, सीना कूटते हैं इंकलाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते। वो इंकलाब की भीषणता को देखते हैं उसके हुस्न को नहीं पहचानते। 

मजाज़ की शायरी अल्फाज की कारीगरी से नहीं बनती, वहां भावों की सहज आमद है। इसलिए रूमानी शायरी में तो वो कीट्स का दर्जा रखते ही हैं। तरक्कीपसंद शायरी में ज़रा भी बनावटी नहीं लगते। मजाज़ की शायरी की गहरी समझ रखने वाले मोहसिन जमाल कहते हैं - अगर मजाज़ को उतनी लंबी उम्र मिली होती जितनी उनके साथ के बाकी शायरों को मिली तो इसमें कोई शक नहीं कि मजाज़ का नाम ग़ालिब इकबाल के बाद मकाम पाता। मजाज़ को याद करते हुए उनकी भतीजी सहबा अली कहती हैं - मजाज़ साहब की सरलता का अगर लोगों ने गलत फायदा न उठाया होता तो हम इतनी जल्दी उस बड़े शायर से महरूम न होते। जोश मलीहाबादी ने एक बार मजाज़ को सामने घड़ी रखकर पीने की सलाह दी तो मजाज़ ने कहा - आप घड़ी रख के पीते हैं, मैं घड़ा रख के पीता हूं। इस बेतहाशा शराबनोशी ने मजाज़ को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया। कई बार वो पागलपन के दौरे के शिकार हो चुके थे। 

मजाज़ की मौत के बाद उन पर जितना लिखा पढ़ा गया उतना किसी और शायर पर नहीं लिखा गया। 2006 में भारत सरकार ने उनकी याद में एक डाक टिकट भी ज़ारी किया। लखनऊ में मजाज़ की खस्ताहाल कब्र पर एक शेर लिखा है ‘‘अब इसके बाद सुबह है और सुबह-ए-नौ मजाज़, हम पर है खत्म शामे गरीबाने लखनऊ...''

 साभार: तहलका, उत्तराखंड संस्करण, फरवरी, 2011

Monday, December 6, 2010

मरते-मरते बचें कि बचते-बचते हुए मरते उम्र बीत गई

डाकिये की ओर से : अबकी जो ख़त आपकी बालकनी में फैंक रहा हूँ, उसमें कोई बड़ी बड़ी बातें नहीं, बस एक बड़ी सी दिशा... जरा सा गंभीरता का लबादा उतरने की कोशिश (क्योंकि इसका मार्ग भी इधरईच से होकर जाता है)
***



और बॉस ?"
"बढ़िया..."
"कैसा चल रहा है ?"
"क्या चलना है भैया, जैसी दुनिया की चाह, वैसी हमारी. है की नहीं ?"
"वो तो है.. "
"और तुम्हारा ?"
"हमारा भी वोई..."
"मतलब ?"
"कट रही है बॉस... जित्ती कट जाय."
"इसे कटना कहते हो गुरु तो फिर हमारी जैसी को तो ना जाने क्या ..."
"कटना ही है भैया..."
"सुना है कि उधर भोत जोरदार रहा आपका ?"
"काहे का जोरदार, बस ऐसेई.. दाल रोटी चलती रहे..."
"ऐसेई, कैसे ?
"बस, ऐसेई.. चाय पीयोगे ?"
"हो जाए."
"और ?"
"जिन्दा हैं देख ही रहे हो."
"अंटी?, बच्चे?"
"ठीकठाक.."
"वो अपने बरेली वाले भाईसाब ?"
"डेथ हो गई यार.. तीन-तीन छोटे बच्चे..."
"अरे!"
"और क्या ! कैंसर का क्या कर लोगे?"
"सही बात.. और तेरा गोविन्दपुरा वाला काम?"
"निकाल दिया सेठ ने.. मैनेजर चुगली लगाता रहता था अपनी... हरामी, स्साला..."
"फिर ?"
"फिर क्या? देखते हैं..."
"बोले तो अपने सेठ से बात करूँ ?"
"कित्ते मिलेंगे ?"
"भोत तो नहीं ? पर सुकून वाला आदमी है. पैसे की बात तेरे को करनी होगी. मिलवाने का जिम्मा हमारा..."
"चल, कल्ले बात..."
"बड़ी गर्मी है मची है भेन***..."
"है तो. पर लू-लपेट में न निकलो तो काम नहीं चलता"
"प्याज़ धरा कर जेब में, लू का शर्तिया काट..."
"मंहगा हो गया प्याज़ भी भेन***"
"अबे, एक प्याज़ में कौन सी जायदाद लूट जानी है ?"
"हमने तो एक बात कही, सब मंहगा है. सस्ता क्या है ?"
"सही बात... और ?.. भाभी ?
"स्साला... फिर बीमार. समझ नहीं पड़ता.."
"जे डाक्टर वैद वाला मसला नहीं है. छाया पड़ी है, सलकनपुर वाले बाबा जी कने दरबार में चला चल..."
"वो तो जब दरबार में पुकार लें, तब जाना ही पड़ेगा. आदमी के हाथ में क्या है ?"
"सही कह गए भैया..."
"अच्छा सुन."
"बोल न."'
"कुछ दे यार, सौ, दो सौ,.. बाद में चुकता कर दूंगा.."
"पचास ले ले... अभी इत्ता ही बन पायेगा..."
"चल. जो हो..."
"बीडी पीएगा ?"
"वैसे, वो चाय ले आया है... 
"चाय भी पी और बीडी भी..."
"और ?"
"बस..."
*****

शिक्षा:  चाय-बीडी चल रही है, जीवन चल रहा है. 
        हो सकता है कि आपको लगे कि यूँ ही फ़ालतू बातें कर रहे हैं दोनों जन. पर जीवन तो इन्ही फ़ालतू-सी बातों में बिखरा हुआ है. यह बातें बड़ी कीमती हैं. अगली बार, फूटपाथ या यहाँ - वहां खड़े, बैठे लोगों को जब यूँ बतियाता देखें तो इसे फुरसतिये लोगों की फ़ालतू बातें न मान लें. जीवन यही है. बेहद कीमती कहानियां बोली जा रही हैं इन निरर्थक -से प्रतीत होते संवादों में.
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साभार : इंडिया टुडे, कटाक्ष : ज्ञान चतुर्वेदी. 
(अंक : 8 दिसंबर, 2010)
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