Wednesday, January 4, 2012

कविता के पन्नों मे नया साल: कोबायाशी इस्सा-2

(पिछली पोस्ट से जारी)
     कोबायाशी इस्सा साहब की जो बात उनको दूसरे समकालीन हाइकू के महारथियों से अलग करती थी, वह थी उनकी कविता की बच्चों जैसी अद्भुत सरलता और साधारणता। गहरी दार्शनिक गुत्थियों मे गंभीरता के साथ उलझने की बजाय वो ज्यादातर अपने आस-पास की चीजों को कविता का विषय बनाते थे और उनके तमाम हाइकू उनके इसी खिलंदड़ेपन और ह्यूमर की बानगी नजर आते हैं। कोई भी चीज उनकी कविता के परिधि से परे नही थी और उनकी उपहासात्मक नजर विषयों मे पवित्रता का फ़र्क नही देखती थी। लगातार संघर्षों से जूझते उनके जीवन ने अपने दुखों का भी मजाक बनाने की कला विकसित कर ली थी। वो खुद ही कविता के बहाने अपनी मुफ़लिसी, बीमारी, पियक्कड़ी, आलसीपन और शक्लो-सूरत का मजाक उडाते ही थे बल्कि उनकी मजे लेने की शैली चपेट मे अक्सर देवता और धार्मिक व्यक्ति भी आ जाते थे। मगर जिंदगी के प्रति इतना उपहासात्मक रवैया रखने के बावजूद उनकी तमाम उम्र विषमताओं से जूझते हुए ही बीती।
    खुद को ’शिनानो-प्रांत का भिक्षुक’ कहलाना पसंद करने वाले इस्सा की कविता मे अतिशय विद्वत्ता, विशिष्टता और पवित्रता जैसी ’असाधारणताओं’ के प्रति निषेध-भाव ही देखने को मिलता है। अपनी जिंदगी की तरह वो अपनी कविता को भी आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से करीब और और फलतः जमीन से जुड़ा हुआ बनाये रखते हैं। तमाम ’काव्योचित’ विषयों (तब की जापानी कविता जिन विषयों के इर्द-गिर्द घूमती थी) के प्रति नकार का भाव ही था कि वो बेहद उपेक्षणीय और साधारण सी चीजों को अपनी कविता का केंद्र बनाते थे। पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी उनकी कविता मे बेहद प्रभावी और सजीव रूप से उपस्थित होते थे। एक स्रोत के मुताबिक अपने जीवनकाल मे उन्होने 54 हाइकु घोंघे पर, 200 मेढक पर, 230 जुगनू पर, 150 मच्छर पर, 90 मक्खियों पर लिख डाले। कविता मे साधारणता और मानवीयता का यही आग्रह उन्हे हाइकु के दूसरे मास्टरों से अलग खड़ा करता है।
  खैर, यहाँ इस्सा के नये साल पर कुछ और उम्दा हाइकु का हिंदी तर्जुमा पेशे-खिदमत है।

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गोदाम के पिछवाड़े
तिरछा चमकता है
साल का पहला सूरज


 
(अपने जीवन के उत्तरार्ध मे उनके गाँव मे आग लग जाने से उनका घर साजो-सामान सहित जल कर खाक हो गया था। फलतः जिंदगी के बाकी तमाम दिन उन्हे जरा सी गोदाम मे रह कर गुजारने पड़े थी, जहाँ कि सूरज की रोशनी भी थोड़ी सी ही आती थी। यह हाइकु संभवतः उन्होने इसी परेशानी पर तंज कसते हुए लिखा था।)
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थोक मे अभिनंदन करता
साल की पहली बारिश का
टपकता हुआ घर

 
(अपने घर की दुर्दशा के बहाने वो अपनी आर्थिक खस्ताहाली पर भी व्यंग्य करने से नही चूकते हैं।)
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खूब है ये भी साल
भिनभिनाती आपस मे
द्वार पर मक्खियाँ


(इस्सा के हाइकु मे पशुओं-पौधों-कीड़ों की उपस्थिति बड़ी मानवीय और मूर्त होती थी, वहीं अपने अहसास उजागर करने के रूपक भी।)
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दीवार मे छेंद
कितना सुंदर तो है
मेरे साल का पहला आकाश


(यह इस्सा के तीखे हास्यबोध और जिंदगी के प्रति फ़क्कडपन का बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ टूटे घर मे भी वो ऐसी सकारात्मकता खोज लेते हैं कि जिंदगी से कोई शिकायत न हो।)
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झोपड़ी के मच्छर
इस कम्बख्त साल भी
उड़ायेंगे दावत


(यह हाइकु भी इस्सा के खुद का मजाक उड़ाने की आदत की बानगी है। अपनी कठिन जिंदगी और रहने की दिक्कतों के बहाने मच्छरों की लाटरी खुल जाने की बात करना उनके स्वभाव के खिलंदड़ेपन की निशानी ही होगी।)
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निकल आये पंख
उड़ गया मेरा रुपिया
खतम हुआ साल


(साल के आखिर मे सारा उधार चुकता करने मे गाँठ के पैसे खतम हो जाने पर इस्सा को अचरज होता है कि इतनी मेहनत से कमाया पैसा कितनी जल्दी ’उड़’ गया, कि नये साल का स्वागत करने के लिये उनके पास धेला भी नही बचा।)
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नही खड़ी कर पाया हवेली
जिसने नही चखी शराब
गम मे खतम हुआ साल


(अपनी पियक्कड़ी का बचाव करते हुए इस्सा मजाक करते हैं कि अमीर बनने के लिये ’पीना’ भी जरूरी शर्त है, मगर बहाने से इशारा भी करते हैं कि दारू नही मिलने की वजह से उनका साल द्खद तरीके से खतम हो रहा है।)
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साल का अंत
मेरे मृत्यु-ग्रह की घंटी
भी बजती सी

 
(ताजिंदगी अपने प्रियजनों (पहले माँ, दादी, पिता फिर बीवी और बच्चे) की मौत से जूझते इस्सा की कविता मे मृत्यु बड़ी सहजता मगर अपरिहार्यता के संग नजर आती है।)
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एक नया साल
वही पुरानी बकवास
बकवास के ढेर पर इकट्ठी होती


(अपनी आर्थिक मुश्किलों से जूझते इस्सा कुढ़ते भी हैं कि साल बदलने के बावजूद परेशानियाँ यथावत रहती हैं, संग ही जिंदगी की एकरसता पर कटाक्ष भी करते हैं।)
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एक और नया साल
जब तलक नही घिसता है
बारिश रोकने का पत्थर


(यहाँ पर इस्सा अपने नये घर की खुशी ही व्यक्त करना चाहते हैं कि जब तक उनका घर बारिश रोकने मे सक्षम है उन्हे वक्त बीतने की कोई फ़िकर नही है।)
**** 
बुद्ध पर है मुझे भरोसा
अब अच्छा हो या बुरा
जाते साल को विदा


(बौद्ध-भिक्षु रहे इस्सा की कविता पर बौद्ध-दर्शन का असर साफ़ दिखता है. जो शायद उनकी जिंदगी के प्रति धैर्यपूर्ण रवैये की भी वजह रही है।)


 (चित्र: उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्द जापानी पेंटर उतागावा हिरोशिगे की मशहूर कलाकृति ’फ़ुजी और अश्तका पहाड़ पर बर्फ़बारी के बाद मौसम’. साभार-गूगल)

Tuesday, January 3, 2012

कविता के पन्नों मे नया साल: कोबायाशी इस्सा-1



केंचुली बदलते कैलेंडर के बहाने कविताओं के पन्ने पलटते हुए अगला नाम आता है कोबायाशी इस्सा का। जापान के अठारहवीं शताब्दी के इस अद्भुत संत कवि के हाइकु जापान के साहित्यिक इतिहास मे कुछ वैसा ही मुकाम रखते हैं जैसा हिंदुस्तान मे कबीर की साखियों का है। हाइकु के चार स्तंभों मे ’बाशो’, ’बुसान’ और ’शिकी’ के साथ ही उनका नाम भी शामिल है। अपने जीवन काल मे कोई 20000 हाइकु लिखने वाले इस्सा की लोकप्रियता वक्त से संग बढ़ती ही गयी है। नये साल के मौके पर उनके चुनिंदा हाइकु की ओर चलने से पहले उनसे कुछ और तअर्रुफ़ करते हैं।

कोबायाशी इस्सा (1763-1827) का 64 साल का जीवन लगातार उथलपुथल से भरा रहा। गरीब किसान परिवार मे पैदाइश, कम उम्र मे माँ का गुजर जाना, सौतेली माँ का सौतेला बरताव, बीवी से अनबन, कमउम्र मे बच्चों की मौत और ताजिंदगी गरीबी से जद्दोजहद ने उनकी जिंदगी के साथ कविता पर भी गहरा असर डाला। मगर उम्दा प्रतिभाओं को तमाम विपरीत हालातों मे ही पनाह मिलती है। जगह-जगह छोटे-मोटे काम कर जीविका कमाते हुए वो शहर-शहर भटकते रहे। अपने जीवन के उत्तरार्ध मे बौद्ध-भिक्षु बन गये इस्सा कैलीग्राफी और ड्राइंग मे भी खासा दखल रखते थे। उनके हाइकु रोजमर्रा की छोटी-छोटी और बड़ी सामान्य सी घटनाओं से निकलते हैं और जीवन की इन साधारणताओं को गहरी दार्शनिक और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति देते हैं।

बचपन मे ही अपनी माँ को फिर अपनी प्यारी दादी को भी खो देने वाला यह बच्चा अपने अनुशासन-पसंद कठोर पिता और सौतेली माँ के बुरे बर्ताव के बीच पिसता हुआ बड़ा एकाकी होता गया। लोगों से मेलजोल के बजाय इधर-उधर जंगलों मे घूमता हुआ पेड़-पौधों-पक्षियों के संग अपना निपट अकेलापन बाँटता रहा। कविता की प्रतिभा इसी अंतस्‌ के अकेलेपन से छन-छन के बाहर आता रहा। बचपन का लिखा एक हाइकु एक बानगी है-
उतर आओ नीचे
खेलो मेरे संग
ओ अनाथ गौरैया!

बच्चों सी सरलता लिये और देशज भाषा के कलेवर मे सजी उनकी कविता उनकी मुश्किल जिंदगी का बेबाक आइना है। जापान की हाइकु की विधा की यह खासियत भी है कि उनका विषय और शैली बेहद सरल होते हुए भी वो भावों की गहराई लिये होते हैं। आमतौर पर हाइकु का मुख्य विषय प्रकृति होती है और इसी के बहाने उनमे जिंदगी के तमाम दार्शनिक पहुलुओं पर गहरी टिप्पणियाँ छुपी होती हैं। खैर हाइकु और इस्सा साहब की कुछ बातें और भी करेंगे मगर अभी उनके कुछ हाइकु के हिंदी तर्जुमे से परिचित होते हैं जो खासकर साल के बदलाव के इस मुकाम पर मौजूँ बैठते हैं।

****
साल का पहला सपना
मेरे गाँव का घर
आँसुओं से धुला


(साल के पहले आँसुओं मे भरे सपने की गहरी भावुकता और घर से बिछड़ने की यातना से भरा यह हाइकु उनके अपने गाँव से 17 साल लंबी जुदाई से उपजा था जैसा कि उनकी जिंदगी के बारे मे बताने वाले कई स्रोत इशारा करते हैं।)

****
लकड़ी उतराती पानी मे
कभी इधर कभी उधर
खतम होता है साल


(जिंदगी के दिशाहीन क्षणिक अस्तित्व की तरफ़ टिप्पणी करते इस हाइकु मे शायद उनके अपने ताजिंदगी भटकते रहने पर भी इशारा है)
****
गढ़ रही है
साल का पहला आकाश,
चाय की भाप

(चाय यहाँ नये साल के उत्सव का भी एक पहलू है। एक मजेदार बात यह भी है कि कवि के तखल्लुस ’इस्सा’ का जापानी मतलब भी चाय-का-कप जैसा कुछ होता है)
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खतम हुआ साल
कब आयेगी मेरी बारी
ओ मंदिर की घंटी


(यहाँ मंदिर की घंटी अंतिम-संस्कार के वक्त बजायी जाने वाली घंटी है। किसी गहन दुख के वक्त लिखा गया यह हाइकु इस्सा के कष्टमय जीवन का एक इशारा भर है।)
****
उसका पति भी था संग
जब साल था नया
विधवा तितली

 
(साल ही नही बल्कि हमारे साथ के चीजें भी वक्त के साथ पुरानी पड़ती जाती हैं और हमारा साथ छोड़ देती हैं, इतनी कि फिर तकलीफ़देह अकेली जिंदगी और बरहना होती जाती है, यह इस्सा ने अपनी जिंदगी से खूब समझा था।)
***
बाड़ से बँधा
कुल तीन हाथ चौड़ा
साल का पहला आकाश

 
(शहरी गरीब इलाकों मे रहने की जगह की तंगी अपने हिस्से की जमीन ही नही आसमान को भी छोटा कर देती है, इस्सा को इसका अच्छा तजुर्बा रहा था।)
******
अपनी झोपड़ी मे तो
दोपहर से होता है शुरू
साल का पहला दिन

 
(साल के सबसे पवित्र दिन मे भी छायी सुस्ती के बहाने इस्सा अपने आलसीपन का एक भर नमूना पेश करते हैं)
***
कलाई का बना तकिया
अब खतम हो ये साल
चाहे ना हो खतम

(हमारे जैसे आलसियों के लिये एंथम सरीखा यह हाइकु इस्सा साहब की ’फक्कड़-फ़िलासफी’ के सबसे बेहतरीन नमूनों मे से एक है। गौरतलब है कि इस्सा साब का यह हाइकू उनके पीने के शौक की ओर भी इशारा करता है।)
******
जाड़े की सर्द हवाएँ
बहा कर लाती मृत्यु
और नजदीक, हर साल

 
(अपनी दादी की 33वीं पुण्यतिथि पर लिखा यह हाइकु जीवन से उनकी विरक्ति का एक उदाहरण है। गौरतलब है कि तमाम जिंदगी भर अपने निकटस्थ प्रियजनों के बिछोह को सहते रहे इस्सा की कविताओं मे मृत्यु बार-बार दस्तक देती है।)
********

कृमशः

(पहला चित्र: कोबायाशी इस्सा
दूसरा चित्र: होकुसाइ की प्रसिद्ध पेंटिंग ’गस्ट’)

पोस्ट के लिये हाइकु और इस्सा संबंधी जानकारी के लिये ’बैरंग’ निम्न स्रोतों का आभारी है:

Sunday, January 1, 2012

कविता के पन्नों मे नया साल: राबर्ट फ़िशर


यह एक मजेदार अंग्रेजी कविता है राबर्ट फ़िशर की। नेट पर ही कहीं मिली मुझे और पढ़ते हुए बड़ा मजा आया। मुख्यरूप से बाल कविता के कलेवर मे इस कविता की खास बात यह लगी कि यह किसी भी उम्र मे आपके बचपन के विस्मृत तंतुओं को स्पर्श करती है और आपकी एक सहज सी बरबस मुस्कान इस कविता का असल हासिल है। प्रस्तुत है हिंदी तर्जुमा नये साल की अशेष शुभकामनाओं के संग!


नये साल की कसमें: राबर्ट फ़िशर

ठान लिया है मैने
अब से बिल्ली को खिड़की से बाहर नही फ़ेकूँगा
बहन के बिस्तर मे मेढ़क भी नही छोड़ा करूँगा अब
और भइया के जूतों के फ़ीते भी आपस मे नही बाँधा करूँगा
पापा की टीन की छत से नही लगाऊँगा छलांग
बुआ का अगला जनमदिन याद रखूँगा अबकी बार
और हफ़्ते मे एक बार तो जरूर करूँगा अपने कमरे की सफ़ाई
मम्मी के बनाये खाने पर नाक-भौँ भी नही सिकोड़ूँगा
(उफ़्फ़! फ़िर वही बैंगन की सड़ी सी सब्जी!)
मम्मी से तमीज से पेश आऊँगा
अब अपनी नाक नही खोदूँगा, जब तक बस चलेगा
और तह कर के रखा करूँगा अपने कपड़े
कंघी भी करूँगा बालों मे
अब से मैं सीखूँगा ’प्लीज’ बोलना और ’थैंक यू’ भी
(भले ही झूठ-मूठ बोलना पड़े)
अब से चिल्लाना और इधर-उधर थूकना बन्द
और गाली देना तो एकदम बन्द
हर दिन करूँगा अपनी डायरी मे नोट
स्कूल मे सबकी मदद करने की भरसक कोशिश करूँगा
बूढ़ी औरतों को हाथ पकड़ कर सड़क पार करा दिया करूँगा
(भले ही उन्हे नही करनी हो सड़क पार)
तभी सोया करूँगा जब उल्लू सोने जाते हैं
और सुबह चिड़ियों के संग उठ जाया करूँगा
और अपने पीछे से दरवाजा बंद करना याद रखूँगा
अब टूथपेस्ट को एकदम नीचे से दबा कर निकालूँगा पेस्ट
और ऐसी जगह रहूँगा जहाँ मुसीबतें मेरे पास ही ना फटकें
अब सब कुछ नये सिरे से शुरू करूँगा
बदल दूँगा खुद को
एक अच्छा बच्चा बन कर दिखाऊँगा
और अपनी बुरी आदतें हमेशा के लिये छोड़ दूँगा
वैसे यह सब इस साल से शुरू करूँ या अगले साल से?
शुरू करूँ भी या....??

(चित्र: आभार गूगल)

Saturday, December 31, 2011

कविता के पन्नों मे नया साल: जेनिफ़र स्वीनी


अभी जब एक साल से दूसरे साल तक सत्ता-हस्तांतरण का वक्त नजदीक आता जा रहा है।ऐसे मे गुनगुनी धूप मे बैठ कर चाय की चुस्कियों के संग गुजर गये साल पर आत्मचिंतन करना सबसे स्वाभाविक और आरामदायक काम होता है। खैर, नया कैलेंडर टांगने से पहले पुराने हो गये इस कैलेंडर पर लगी तमाम उम्मीदों, खुशी, भरोसे, डर, आशंकाओं, कसमों की चिप्पियाँ साल के कुल जमा-हासिल की एक बानगी होती हैं। गुजरते साल के ऐसे ही हासिलों और आने वाले साल से बावस्ता उम्मीदों की इबारत को कविता के चश्मे से परखने की कोशिश हम भी करते हैं। सो आइये अगले कुछ दिनों मे देखते हैं कि कोई कवि वक्त के इस मुकाम को कितनी अलहदा नजरों से परख पाता है। इस सिलसिले मे सबसे पहले पेश है जेनिफ़र स्वीनी की एक अंग्रेजी कविता का हिंदी मे तर्जुमा। अमेरिका की इस युवा कवियत्री को कम उम्र मे ही कई अवार्ड्स से नवाजा जा चुका है। उनके कविता संकलन ’हाउ टु लीव ऑन ब्रेड एंड म्यूजिक’ (पेरुगिया प्रेस) की इस कविता मे जिंदगी की कुल गणित के टुकड़े बिखरे से नजर आते हैं।


बीत गये साल के लिये चंद कतरनें

मैने पाया है कि
औसतन विषम संख्या वाले साल
ज्यादा बेहतर रहे हैं मेरे लिये

मै उस दौर मे हूँ जहाँ मुझे हर मिलने वाला
लगता है उस जैसा
जिसे मै पहले से जानती हूँ

पतझड़ का मौसम बिना हिचकिचाहट के
मुझे धकेल देता है उन चीजों की स्मृतियों मे
जो कभी हुई ही नही मेरी जिंदगी मे

केंचुली बदलता है आसमान
और मुझे नही पता कि इसकी वजह ग्लोबल-वार्मिंग है
या कि वायुमंडल बस खुद को तैयार करता है
कि सह सके और ज्यादा नयी चमकदार यंत्रणायें

मेरे अंदर हिलोरें मारती है
आइसलैंड जाने की बेताब ख्वाहिश

तमाम बुरी चीजों के बावजूद
अभी भी हम भरे हुए हैं विचारों से
जो कि उतने ही संभव हैं
जितने कि वंध्या फ़ल

मुझे सख्त अफ़सोस होता है
कि मुझे ही समझाना होगा
नर्सरी के बच्चों को
कि सूर्यास्त और प्रदूषण के बीच रिश्ता क्या है

और क्या पता है तुम्हे
कि शुक्र-ग्रह पर हमारी उम्र
अभी एक साल से भी कम की होगी

तब यहाँ दो आसमान थे
एक जिसमे भरते थे हम अपनी उड़ान
तो दूसरे मे हम दफ़्न करते खुद को

शुक्र है कि अभी भी
मेरी दिलचस्पी कामुक विलासिता की चीजों मे नही,
मसलन बाथरूम के ऐशो-आराम के सामान

हम साथ-साथ ही हुआ करते थे हर वक्त
कहानी मे

और उसकी शादी के दिन
उसके सीने मे गड़ा पत्थर
कुछ-कुछ तो पिघल सा गया था

कभी-कभी लगता है मुझे
कि जैसे परिंदे उड़ जाते हैं मेरे अंदर से
अनंत की ओर।





(प्रथम चित्र: अमेरिकन कवियत्री- जेनिफ़र के स्वीनी)
(द्वितीय चित्र: The Key -अब्स्ट्रैक्ट-एक्सप्रेशनिज्म के अगुआ ख्यात अमेरिकन पेंटर जैक्सन पोलॉक)

Tuesday, December 13, 2011

अप्रीत की प्रथम कविता (2006 - 20.....)

{ जब हम नहीं जानते थे कि पैच अप , ब्रेक अप क्या होता है, गल्फ़्रेंड बायफ़्रेंड सरीखे शब्द भावनाओं की तौहीन थे सौ मीटर के रास्ते में बस इक हाथ को निहारा जाता था, और उन सभी को कोसा जाता था जिन्हे उन्हें छूना नसीब होता था । बैठक की खिड़की देर तक आक्यूपाईड रहती थी , और अल्मोड़ा हमारा फ़ेवरेट शहर होने का कारण भी था   }


जब हमने जीवन पाया यह ,
था यह जीवन सांसो का खजाना ।
था जीवन भर साथ निभाना ,
नियति का यह खेल पुराना ।

जीवन इक नाटक बन बैठा,
और तुम थी बचपन विदिशा का ।
बिन जाने , बिन पहचाने ,
मुझको भी था मंचन दिखलाना ।

जब नवयौवन दहलीज पे आया,
जीवन था रंगो का जमाना ।
जब तक ना मिले थे हम,
जग को हमने झूठा जाना ।

आंख हमारी थी सराय,
जीवन जीने का था बहाना ।
चेहरा देख तुम्हे ढूंढा था,
ह्र्दय समझ था तुमको पाना ।

शायद आँखे उलझ गई थी,
पर जल्दी ही समझ गई थी ।
कि भीड़ बीच ही वह मन होगा ,
काया का वह कुंदन होगा ।
 
फिर क्षण वह तुम्हें साथ लाया,
संसार
ज्ञान से जान ना पाया ।
तुम्हे समझ कर इक पथ राही,
तुम्हें छोड़ कर मैं मुड़ आया ।
 
पर जैसे खुद को खो चुका था,
साया यह तन हो चुका था ।

तब कली तने को सींच रही थी ,
और राह पथिक को खींच रही थी ।

आज भी जाओ , आज भी देखो,
क्षण वह आज भी वही खड़ा है ।
आज भी तीर सा नयन तुम्हारा ,
आंख पे मेरी तिरछा पड़ा है ।

प्रेम को देनी पड़ी परीक्षा,
मोहित मन की काली इच्छा ,।
तुम्हे भूल जब निकल गया पर,
मुड़ा कहीं जब तुम्हें ही पाया ।

पर शूल मध्य भी पुष्प खिले हैं ,
शैल पे भी पीपल निकले हैं,।
तुमने मुझको , मैंने तुमको,
बिन कहे सब कुछ समझाया ।

यह मेरी विनती तुमसे है,
मैं जो तुमको अब बतलाऊं ।
लज्जित मेरा अहम तो होगा,
अब काँपू तो काँप ही जाऊं ।

श्वेत पंख जब उग आएंगे,
ना वियोग में प्राण गंवाना ।
साथ तुम्हारे सदा रहूंगा,
तुम बिन मुझको कुछ ना पाना।

प्रेम पारायण पल्लव हूं तो,
पहली पावन बेला बन जाना ।
तुम जीवन तरुणता मेरी.
साख पे तुम ही पुष्प खिलाना।

बन जाऊं जब नयन सृदश मैं,
दृश्य जगत यह तुम बन जाना ।
नैनों में रसधार बहाना,
मुझको प्रेम का सार बताना ।

बन जाऊं जब मैं श्रवण ,
मधुर गीत तब तुम बन जाना ।
सरगम बन के संग लहराना,
साज मेरा तुम ही कहलाना ।

बन जाऊं जब मधुसूदन मैं,
राधिका तुम बन जाना ।
स्वांग रचाकर मुझे नचाना,
सर्व जगत को नृत्य कराना ।

 
बन जाऊं जब ऋतु राज मैं,
हरित श्रंखला तुम बन जाना ।
कोपल बन के तुम लहराना,
अमर प्रेम का राग सुनाना ।


बन जाऊं जब मै मधु,
तुम बन जाना अमृत हाला ।
क्षुधा क्षुधा तब प्रेम बुझाए,
हरि कहें तब मधुशाला ।

बन जाऊं जब वन उपवन मैं,
मधुरलता तब तुम बन जाना ।
आलिंगन तब प्रेम कराए,
साथ शरीर  महकता जाए ।

 
बन जाऊं जब विजय मैं,
विजय श्री तब तुम बन जाना ।
प्रेम नगर अभिषेक कराना,
अभिलाषा का भवन सजाना ।

 
बन जाऊं जब आकुलता मैं,
प्रेम से तुम यह शीश झुकाना ।
सर्व जगत में मान कराना,
पर विजय में पर्व मनाना ।



बन जाऊं जब सोमसुधा मैं,
पन खाली तब तुम बन जाना ।
प्रेम लोक में पान कराना,
मुझे भी कुछ बूंदो से भिगाना ।

 
हो जाऊं जब हर्षित मैं ,
तुम मेरा सयंम बन जाना ।
जीवन का आधार हो कर के,
सब शंकाए निर्रथ कराना ।

बन जाऊं जब मैं अतुल,
तुल्य मेरे तब तुम बन जाना ।
सब से भिन्न प्रेम बन जाना ,
फिर भी अभिन्न ही कहलाना ।

शिव शंकर जब मैं बन जाऊं,
अटल जटाएं तुम बन जाना ।
भगीरथी सम प्रेम बहाना,
जग को मोक्ष द्वार दिखलाना ।

शाख हरी जब मैं बन जाऊं,
शिशिर मेरा तब तुम बन जाना ।
जड़ित रहें तब सभी कलाएं,
घट घट में मधुरस भर जाए ।

शरद ऋतु जन मैं बन जाऊं,
नरम धूप तब तुम बन जाना ।
पेड़ से जब बन पत्र गिरें तो,
मुझको संग संग ले उड़ाना ।

बन जाऊं जब प्रश्न तुम्हारा ,
मौन मेरा तब तुम बन जाना ।
बहलाना कभी औ कभी झुठलाना,
संग सपनों के सपनों में आना ।

 
बन जाऊं जब कमल नयन मैं,
लक्ष्मी पद तब तुम बन जाना ।
शेष पे जब हम संग विराजें,
क्षीर का तब यह सागर साजे ।

भ्रमर गुंज जब मैं बन जाऊं,
कमल सृदश तब तुम बन जाना ।
सकल सरोवर सब गुण गाएं,
कल कल की आवाज सुनाए ।


अधर खुले जब मैं बन जाऊं,
प्यास मेरी तब तुम बन जाना
नाद कंठ में प्रेम बजाए,
सुर गाए और तान सुनाना ।

बन जाऊं जब मुद्रिका मैं,
अनामिका तब तुम बन जाना ।
ह्रास प्रेम सशरीर नहीं हो,
मिलन प्रेम का अधीर नहीं हो।

 
भोर किरन जब मैं बन जाऊं,
संध्याए तब तुम बन जाना ।
दिन रात मिलन यह प्रेम कराए,
क्षितिज लालिमा रंग दिखलाए ।

 
कोमल पद जब मैं बन जाऊं,
झंकार मेरी तब तुम बन जाना ।
प्रेमिल रचना तब कविताएं ,
हो प्रेम रस में सब रचनाएं ।
 
आलिंगन जब मैं बन जाऊं,
स्पृश मेरा तब तुम बन जाना ।
मुख पुष्प सा खिल जाएगा
दर्पण स्वयं से लज्जाएगा ।

रंग बन बन के जब भी बरसूं,
फाल्गुन बन के तुम आ जाना ।
यौवन निखर के खिल आएगा ,
यह प्रेम पर्व तब कहलाएगा ।

अर्चन पर अक्षत बन जाऊं,
नीर मात्र में तुम समाना ।
राम भवन में जब जब राजे
मष्तक पर यह प्रेम विराजे।

मैं बनकर मैं कल बन जाऊं,
हम बनकर तुम आज बनाना ।
उज्जवल सा हर पल सुहाना,
प्रेम हमारा पर सदा पुराना ।

श्वेत अंबर से तुम हो सज्जित,
मुझको पर तुम श्याम रंगाना ।
सब छोड़ चुकी तब हुआ श्वेत रंग,
सब अपना कर अब श्याम रंगाना ।

पूर्ण हृदय से स्नेह करूं जब,
प्रियतम तुम प्रेयसी बन जाना ।
धीर अधीर भले हो जाऊं,
मधु नहीं मैं क्षुधा दीवाना ।

देख उठो जब प्यास किसी की,
उस प्यासे की प्यास बढ़ाना ।
अचरज का यह विषय है जानो,
पर क्षुधा रहस्य न तुमने जाना ।
 

आनंद नव मिलन का तुम्हें हुआ है
पालकी पे दुल्हन हो जाना
पर जब आंखो में पानी आए
नयन नीर है तुम्हें छुपाना


आज पिया की सेज तुम्हीं हो
प्रेम आंगन पर अर्पण हो जाना ।
निज मन की पहचान ना होगी,
यही जगत का चलन पुराना ।

 है हृदय तुम्हारे प्रेम घाट यह ,
तुमने तो बस इतना जाना ।
मुझसे पूछो तो बतलाऊं ,
यहां नगर बसे है एक पुराना ।

 
प्रश्न तुम्हारा समझ गया हूं,
तुमने नगर को वीरान जाना ।
इसमें महल है मन्दिर अनेकों,
मेरा ही पर हर ठिकाना  ।


हर मंदिर में तुम मूरत हो तुम,
अर्चन तुम पूजा भी हो ।
देखो मैं भी वहीं कहीं हूं
ढूंढ सको तो ढूंढ बताना ।


मैं हूं आंखो के भी आगे ,
अधरों पर भी फिर लेता हूं ।
नयन से निकला नयन में तेरे,
इन आंखो का यह मोती मैं हूं।


हृदय तुम्हारे वन उपवन भी,
तभी तो सांसे महक रही हैं ।
यहाँ भी मेरा कार्य वही,
मैं माली बन कर चहक रहा हूं।
 
चारो ओर फिरा पर कहीं ना पाया,
क्या विरह का यहाँ शोक नहीं है?
जब भीगा तो महसूस हुआ ,
मैं पानी बन के बरस रहा हूं ।

प्रियतम का वह लोक कहाँ है ?
कहाँ है वाणी वह प्रियतम की ?
कहाँ बरसता प्रेम है बहता ?
कहाँ हृदय का मेरे, स्वामी रहता ?
 
खुद में ही मैं समा रहा हूं ,
खुद ही के भीतर जा रहा हूं ।

हृदय लोक है यह प्रियतम का,

यह अनोखा दृपण तम का ।

आज बना मैं कलश चौखट पे ,
तुम कोमल पद मुझे छुआना ।
पग रखो धरा पर और हृदय पर,
अमिट छाप यहां छोड़ जाना ।

हृदय के सुर जब उठ बैठे,
हाथ मुझे है तुम्हे थमाना ।
इक इक बंधन का परिचय,
बंधन का यह हर्ष है जाना ।


आज यह जीवन मोड़ बना है,
इस राह है हमको साथ निभाना ।
तुम विश्वास अटल हो मेरा,
पग पग कर आगे बढ़ जाना ।

यह साथ शरीरों का दिखता है ,
हमने ह्र्दय का मेल कराना ।
शरीर अवश्य वर वधू बना है,
हृदय ब्याह है हमें रचाना ।


मैं नव जीवन आरंभ बना था ,
तुम अंतिम क्षण मृत्यु बन जाना ।
जीवन अगली कविता रचता देखो !
इक कली का वह इठलाना ।



"ओ रे लड़की !
कविता कितनी कविता जैसी होती है ना !!  "



Sunday, December 4, 2011

एक चक्र

पाओलो कोएलो की रचना 'THE ZAHIR' का एक अंश...
एक सुबह एक किसान ने एक मठ के दरवाजे को जोर से खटखटाया.जब दरबान ने दरवाज़ा खोला,किसान ने उसकी और अंगूरों का एक गुच्छा बढाया.
'प्यारे दरबान!ये मेरे खेत के सबसे अच्छे अंगूर है.कृप्या इन्हें मेरी और से उपहार के रूप में स्वीकार करें.'
'अरे क्यों,बहुत-बहुत शुक्रिया.मैं इनको सीधे मठादीश के पास ले जाऊंगा.वो ऐसे उपहार से खुश हो जायेंगे.'
'नहीं ! मैं ये तुम्हारे लिए लाया हूँ.'
'मेरे लिए ? लेकिन मैं तो कुदरत के ऐसे उपहार के लायक नहीं हूँ.'
'जब-जब मैंने दरवाजे पर दस्तक दी है इसे तुम्हीं ने खोला है.जब सूखे से फसल बरबाद हो गयी तब तुम्हीं ने मुझे रोटी और एक ग्लास शराब हर दिन दी है.मैं चाहता हूँ की अंगूरों का ये गुच्छा तुम्हारे लिए सूरज का थोड़ा सा प्यार,वर्ष का सौंदर्य और ईश्वर की चमत्कारी शक्ति तुम तक पहुंचाए.'
दरबान ने अंगूरों को वहां रख दिया,जहाँ वह उनको देख सके और पूरी सुबह उनकी मन ही मन तारीफ़ करने में बिता दी:वह सच में ही प्यारे थे.इसलिए उसने उनको मठादीश को समर्पित करना तय कर लिया.जिसके विवेकशील शब्द उसके लिए वरदान की तरह रहे थे.
अंगूरों से मठादीश बहुत प्रसन्न हुआ लेकिन तभी उसे याद आया की एक मठवासी बीमार है और उसने सोचा,'मैं यह अंगूर उसको दूंगा.कौन जाने कि इससे उसके जीवन में कुछ ख़ुशी आ जाये.'
लेकिन बीमार मठवासी के कमरे में अंगूर ज्यादा देर तक नहीं रहे क्योंकि उसने सोचा-'रसोईये ने मेरा इतना ध्यान रखा है,खाने के लिए मुझे अच्छे से अच्छा भोजन दिया है.मुझे यकीन है कि यह अंगूर उसे खुशी देंगे.'जब रसोईया दोपहर का खाना ले कर आया,तो मठवासी ने अंगूर उसे दे दिए.
'ये तुम्हारे लिए है,तुम प्रकृति के दिए हुए उपहारों के इतने पास रहते हो और तुम ही जान पाओगे कि इनका,ईश्वर की इस देन  का क्या करना है.'
अंगूरों के सौंदर्य पर रसोईया अवाक था,उसने अपने सहायक का ध्यान उनकी निर्दोषता की और दिलाया.वे इतने अच्छे थे कि उनकी सराहना शायद ब्रदर साक्रिस्तान से अधिक और कोई नहीं कर सकताथा,जो पवित्र संस्कार विधि के मुखिया थे जिनको मठवासी सच्चा संत मानते थे.
लेकिन ब्रदर साक्रिस्तान ने वे अंगूर सबसे छोटे एक लड़के को दिए,जो दीक्षा प्राप्त करने नया-नया आया था,ताकि वह समझ सके कि ईश्वरीय कार्य सृष्टि की छोटी से छोटी चीज़ में भी दिखता है.नवदीक्षित हृदय ईश्वर की महिमा से भर उठा.उसने इससे फले अंगूरों का इतना सुंदर गुच्छा पहले कभी नहीं देखा था.साथ ही उसे उस पहले दिन की याद आई जब वह मठ में आया था और उसकी भी जिसने दरवाज़ा खोला था,दरवाज़ा खुलने के संकेत से ही वह वहाँ लोगों के बीच था जो चमत्कारों का मूल्य जानते हैं.
अँधेरा होने से कुछ पहले वह अंगूर दरबान के पास ले गया.'इन्हें कहा कर आनन्द लो.तुम अपना अधिकतर समय यहाँ अकेले बिताते हो,इन अंगूरों से तुम्हें अच्छा लगेगा.'
तब दरबान ने समझ लिया की वह उपहार सच में उसके लिए ही था,उसने एक-एक अंगूर को स्वाद ले कर खाया और खुश होकर सोने चला गया.

Tuesday, November 1, 2011

पानी एक रोशनी है


डाकिए की ओर से: नहीं इसकी जरूरत नहीं थी लेकिन इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। नींद की दो गोलियां खा कर भी यदि गोधूलि बेला तक जागते रहें तो लानत है विज्ञान की तरक्की पर। ऐसे में केदारनाथ सिंह की कविताएं अच्छी हैं जो कंबल के बाहर निकलते और ठंडे होते पैर को गर्म करती हैं। बहुत बेचैनी में एक बेहतर कविता बहुत जिम्मेदारी से कंधे को कुव्वत देता हैं। तो आभार इसका कि जिसने अक्सर ही शरीर के अंदर विलुप्त होती कुछ प्रजाति को खोज निकाला है। 



*****

पानी एक रोशनी है

इन्तज़ार मत करो
जो कहना हो
कह डालो
क्योंकि हो सकता है 
फिर कहने का कोई अर्थ न रह जाए

सोचो 
जहां खड़े हो वहीं से सोचो
चाहे राख से ही शुरू करो
मगर सोचो

उस जगह की तलाश व्यर्थ है 
जहां पहंचकर यह दुनिया 
एक पोस्ते के फूल में बदल जाती है 

नदी सो रही है 
उसे सोने दो
उसके सोने से
दुनिया के होने का अन्दाज मिल रहा है 

पूछो 
चाहे जितनी बातर पूछना पड़े
चाहे पूछने में जितनी तकलीफ हो 
मगर पूछो
पूछो कि गाड़ी अभी कितनी लेट है !

पानी एक रोशनी है 
अंधेरे में यही एक बात है
जो तुम पूरे विश्वास के साथ
कह सकते हो दूसरे से। 

*****

मुक्ति 

मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिला
मैं लिखने बैठ गया हूं

मैं लिखना चाहता हूं ‘पेड़‘
यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है 
मैं लिखना चाहता हूं ‘पानी‘

‘आदमी‘ ‘आदमी‘ - मैं लिखना चाहता हूं 
एक बच्चे का हाथ 
एक स्त्री का चेहरा 

मैं पूरी ताकत के साथ 
शब्दों को फेंकना चाहता हूं आदमी की तरफ 
यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा
मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूं वह धमाका
जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है 

यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा
मैं लिखना चाहता हूं। 

साभार: केदारनाथ सिंह की प्रतिनिधि कविताएं।
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