Monday, June 27, 2011

डायरी के पन्ने : आंद्रेई तारकोवस्की - 2


डाकिए की ओर से: एक नज़र में तारकोवस्की का हाल भी हमारे देश के महान फिल्मकार ऋत्विक घटक जैसा ही था। जब फिल्में बनाते सरकार विद्रोह या बकवास करार देकर प्रतिबंध लगाती। दोनों जगह यह साजिश थी। जैसे ऋत्विक घटक के जाने के बाद सिनेमा के छात्रों को उनकी बनाई फिल्में देखने को कहा जाता है। तारकोवस्की ने अपनी डायरी में मठाधीशों और सरकारी अधिकारियों को जमकर कोसा है। यहां यह सवाल भी उठता है कि देश में विषय वाइज विशेषज्ञ होना चाहिए अन्यथा इज्जत नहीं मिलती। उदाहरणार्थ हमारे यहां स्पोटर्स में खिलाडि़यों ज्यादा जानकार नेता होते हैं। देखिए चीजें कैसे लिंक्ड हो जाती हैं और कहां से कहां चली जाती हैं। 


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1973 
5 फरवरी
यूगोस्लाविया द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समारोह में रूबल्योव को ग्रैंड प्राइज प्राप्त हुआ। 
नजायज़ मानी गई इस फिल्म रूबल्योव को यह चैथा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। 

17 जून,
रूबल्योव को स्वीडर में दिखाया जा रहा है, एंडरसन के बताए अनुसार बर्गमन ने कहा उन्होंने इतनी बढि़या फिल्म आज तक नहीं देखी। 

उसे पूरी तरह खोलना होगा, उससे सीधे सीधे भिड़ना होगा, उसकी तरफ दूर से नहीं आया जा सकेगा, छिलका निकाल फेंकना होगा, उसे अपने ही ढंग से पढ़ो, कलाकार के एकांत की ट्रेजेडी ही सर्वोपरि है और सत्य को समझने के लिए उसकी कीमत चुकाना भी।

1975 
3 जुलाई
कोई योजना कैसे परिपक्व होती है ?

निस्संदेह यह अत्यंत भेदभरी और अत्यंत दुग्र्राह्य प्रक्रिया है। हमारे बंधन से छुटी वह अचेतन में आज़ाद जारी रहती है, और तंतःकरण की दीवारों पर निश्चिमत रूप धारण करती है। फिर अंतःकरण का रूप ही उसे विलक्षण बनाता है, दरअसल सिर्फ अंतःकरण ही उसके उस बिंब की प्रच्छन्न गर्भावधि तय करता है जो सामान्य नज़रों से नहीं देखा जा सकता। 

1976
8 फरवरी 
मेरा पूरा यकीन है कि समय उत्क्रमणीय है, किसी भी हालत में वह सीधी रेखा में नहीं चलता। 

13 सितंबर
हम या तो एक दूसरे के गुणों को कम आंकते हैं या फिर बढ़ा चढ़ा कर बताते है। बहुत कम लोग दूसरों का आकलन उनकी योग्यता के आधार पर करने के काबिल होते हैं। यह कोई खास तरह की प्रतिभा होती है, सचमुच यहां तक कह सकता हूं कि केवल कुछ एक महान लोग ही इस योग्य होते हैं। 

1977
28 दिसंबर
कमज़ोरी महान चीज़ है, ताकत गौण है। जब मनुष्य जन्म लेता है त बवह कमज़ोर और कोमल होता है। जब मरता है तब मजबूत और कठोर होता है। 
जब एक पेड़ उगता है तब वह लचीला और मुलायम होता है, और जब वह सूख कर कड़क होता है तब मर जाता है। कठोरता और ताकत मृत्यु के सहचर हैं। 
नमनशीलता और कमज़ोरी ‘होने‘ की ताज़गी के निशान हैं। जो कड़ा हो गया वह कभी सफल नहीं होगा।  (लाओ-त्से)

1978
13 अप्रैल
वाकई... मैं दि मास्टर एंड मार्गारिता पर फिल्म क्यों नहीं बना रहा ? क्योंकि वह किसी प्रतिभाशाली लेखक का उन्यास है ? हालांकि, सवाल गद्य कैसा क्य है यह नहीं, विषयवस्तु का निरूपण कैसा और क्या है इसका नहीं नहीं, कथानक का नहीं, भाषा का भी नही !

मध्य-युग और नवजागरण की सारी चित्रकला की और संगीत कला की, अंततः एक ही, वही की वही, विषयवस्तु रही। द्यूरर, क्रोनेच, ब्रूघेल, बाख, हांदेल, लिओनार्दो, माइकलएंजेलो आदि सभी की...

इसमें आदिम स्त्रोतों को धंुधला करने जैसी कोई बात नहीं। यहां बात है दक्षता की, और वस्तु की, और फिर कलाकार ही उस्ताद है, क्योंकि उसे मालूम है किससे क्या बनाना है। 

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पुस्तक : अनंत में फैलते बिम्ब : तारकोवोस्की का सिनेमा
साभार : संवाद प्रकाशन, हिंदी अनुवाद.

पुनःश्च:- आज एस पी सिंह की पुण्यतिथि है। पत्रकारिता के इस पारखी पत्रकार को डाकिए का सलाम। कुछ आलेख यहां और एक यहाँ पढ़ा जा सकता है।

Tuesday, June 21, 2011

दोस्त, महुआ और लड़कियां…

 

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साल का आखिरी दिन।

कल सारी दुपहर बाहर बितायी।

बहुत अच्छे दोस्त, जिनके साथ भीतर का बुझा, तुडा-मुडा बचपन मुद्द्त बाद धूप में आया। दोपहर को जिन पी। सर्दियों की धूप, जिन, हँसी और दूर से सुनाई देती मवेशियों की घंटियाँ। पीछे भीमबेटका की चट्टानें। मैं कुछ दूर टहलने निकल गया। बहुत बडे काले पत्थरों पर लेटा, वे अब भी दोपहर की धूप से गर्म थे। एक टूटा हुआ भग्न किले की फ़ाँक जैसा आकाश। नीचे दूर अथाह जंगल। पेडों का झूमता नीला सागर, हवा में हौले-हौले हिलोरें लेता हुआ।

हल्का-सा अँधेरा, शाम। महुआ के लिये एक जने को गाँव भेजा, तो वह वहीं अटक गया। मनजीत ने टहनियाँ, घास, पत्ते इकट्ठा करके ढेर बनाया। कुछ ही देर में आग की लपटें उठने लगीं। आग का देखना भी कैसा जिद्दी नशा है, आँखें उठती नहीं। मैं अपनी अधूरी लिखी कहानी के बारे में सोचने लगा। क्या कहानी का अंत आग से सुलगाकर सुलझाया जा सकता है?

       चिन्ता शुरु ही हुयी थी कि जीप आ पहुँची, गाँव से लाया हुआ ताज़ा महुआ। गाडी की हैडलाईट्स में वह स्कल्पचर देखा, जो स्वामी और मनजीत ने जोडकर बनाया था। पत्थरों के ठूँठ पर बाँस की चिप्पियाँ, आकाश के क्षितिज पर एक सलीब की तरह खडी हुयी, जिनके नीचे मनजीत बावा बिल्कुल एक क्राइस्ट की तरह दिखाई दे रहा था।

       महुआ खत्म ! सब एक बार फ़िर शुरु। नीचे गाँव में पहुँचे, महुआ की तलाश में। आखिर देवराज की सलाह पर हम ’मेन रोड’ से हटकर कहीं बहुत भीतर खेतों के बीच चलते रहे। कहाँ रुकें, कब रुकें, कुछ पता नहीं। अचानक सरदारजी ने मेरा कन्धा पकडकर ऊपर की ओर संकेत किया।

       सारा आकाश तारों से अटा था। भोपाल के आसपास इतने तारे उग सकते हैं, यह चमत्कार सा जान पडा। फ़िर महुआ आया। हल्का गुनगुना-सा, गर्म भट्टी से ताज़ा-ताज़ा निकला हुआ। किन्तु मैं अब तक होश से चिपका था और उसे छोडना नहीं चाहता था। बहुत देर तक आकाश को देखता रहा। तारे, पूरा चमकता आकाश। दूर-दूर तक फ़ैले खेत। महुआ में भीगे दोस्त, गाँव के झोपडे, पता नहीं कितनी देर वहाँ बैठे रहे।

      वापस लौटते हुये जितेन्द्र नींद में बेहोश, खुर्राटों में लथपथ। मैं कुछ दूर हलकी नींद में तैरकर किनारे पर आया, तो भीतर एक याद कचोटने लगी, जो सारी शाम भीतर थी और अब ठिठुरते हुये बाहर निकल आयी थी। पहली बार पता चला, कि हिन्दुस्तान में ऎसे सुखद दिनों में लडकियों का न होना सबसे खाली चीज़ है जिसे कोई नहीं भर सकता, न महुआ, न तारे, न आग। ये सब अपने में सुंदर हैं – लेकिन कितने अधूरे और सूखे ! शायद इसीलिये हम इतना हँसते हैं, पीते हैं, थककर सो जाते हैं।

     आज वर्ष का अन्तिम दिन है, किन्तु वह मेरे लिये कल पूरा हो गया।

 

३१ दिसम्बर, १९८१, निर्मल वर्मा की डायरी ’धुंध से उठती धुन’ से साभार…

Thursday, June 16, 2011

खूब पहचान लो असरार हूँ मैं...





डाकिए की ओर से: सुबह मजाज़ की सोहबत में गुज़री, तो हैंगओवर सा हो गया, पर ये नशा ज़रूरी था। अभी चिठ्ठी डालने निकला तो सोचा क्यों न यही खत आप तक भी पहुंचाया जाए। वैसे भी एक नज़र फेसबुक पर डाली तो लोहा गर्म लगा। कुरजां (जयपुर से नई मैगज़ीन) में भी अलसुबह इनके बारे में विस्तार से जाना। लेकिन फिलहाल यहां एक छोटा सा पोस्टकार्ड डाल रहा हूं। खत और भी आएंगे और तारकोवोस्की की डायरी भी चलती रहेगी, मगर फिलहाल यह फुहार...
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मजाज़ लखनवी हकीकत में उस असरार का नाम है जिसे जमाना उसकी मौत के बाद भी समझने की कोशिश में मुब्तला है। उर्दू के तमाम शायरों में अगर सबसे शायराना जिंदगी किसी की रही तो ये मजाज़ ही थे। उर्दू अदब की दुनिया में ये किस्से पहले ही अमर हो चुके हैं कि एक ज़माने में कुंवारी लड़कियां अपने बेटों के नाम मजाज़ के नाम पर रखने की कसमें खातीं थीं। मजाज़ के लिए लड़कियों में लाॅटरी निकाली जाती थीं और उनकी नज्में गल्र्स होस्टल के तकियों में दबी मिलती थीं लेकिन मजाज़ ताजिंदगी जिन्स-ए-उल्फत (प्यार) के तलबगार ही रहे। एक दफा अलीगढ़ विश्वविद्यालय में ही इस्मत चुगताई ने उनसे कहा कि लड़कियां मजाज़ से मुहब्बत करती हैं, इस पर मजाज़ ने तपाक से कहा - ‘और शादी पैसे वालों से कर लेती हैं‘।

जिं़दगी में सब कुछ बदलता रहा लेकिन हाजि़रजवाबी का ये असासा हर दौर में मजाज़ के साथ रहा। जब इस्मत चुगताई ने उनसे पूछा कि मजाज़ तुम्हारी जिंदगी को बर्बाद लड़की ने किया या शराब ने तो मजाज़ ने कहा कि मैंने दोनों को बराबर का हक दिया है। मजाज़ के ऐसे कई लतीफे जिन्हें बाद में मजाज़ीफे कहा जाने लगा, आज भी लखनऊ की आबो-हवा में बिखरे पड़े हैं। लेकिन इनके पीछे की तल्खी यह है कि इन्हें कहने वाला पूरी जिंदगी बेहद दुखी रहा। 

उर्दू के जाॅन कीट्स कहे जाने वाले असराल उल हक मजाज़ की पैदाइश 1911 में रूदौली कस्बे में हुई थी। मजाज़ की शायरी को मुकाम अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में मिला। यहां उस दौर में मशहूर शायरों की एक पूरी जमात थी जिनमें मोईन अहसन जज्बी, अली सरदार जाफरी और जांनिसार अख्तर भी शमिल थे। लेकिन इन सबमें जो नाम सबसे ज्यादा मकबूल हुआ वह मजाज़ लखनवी का ही था। अलीगढ़ मुसमिल यूनिवर्सिटी का तराना भी मजाज़ का ही लिखा हुआ है। मजाज़ प्रगतिशीलता के सारे तत्वों के स्वाभाविक समर्थक थे। असल में नाजुक तबीयत वाले मजाज़ हर उस व्यक्ति से नजदीकी महसूस करते थे जिसे उसका बुनियादी हक नहीं मिला। यही निकटता उन्हें प्रगतिशीलता की राह पर ले गई। स्त्री मुक्ति और नारीवाद के जिस आंदोलन की बात आज होती है उसे मजाज़ 30 के दशक में ही अपनी नज्मों के ज़रिए कह रहे थे। कम लोग जानते हैं कि मजाज़ साहब के पुश्तैनी घर में आज लड़कियों का स्कूल चल रहा है। 

मजाज़ तरक्कीपसंद शायरों में होते हुए भी अपनी रूमानियत के चलते अलग ही नज़र आते हैं। फैज अहमद फैज उनके बारे में लिखते हैं - मजाज़ की इंकलाबियत आम इंकलाबी शायरों से अलग है। आम इंकलाबी शायर इंकलाब को लेकर गरजते हैं, सीना कूटते हैं इंकलाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते। वो इंकलाब की भीषणता को देखते हैं उसके हुस्न को नहीं पहचानते। 

मजाज़ की शायरी अल्फाज की कारीगरी से नहीं बनती, वहां भावों की सहज आमद है। इसलिए रूमानी शायरी में तो वो कीट्स का दर्जा रखते ही हैं। तरक्कीपसंद शायरी में ज़रा भी बनावटी नहीं लगते। मजाज़ की शायरी की गहरी समझ रखने वाले मोहसिन जमाल कहते हैं - अगर मजाज़ को उतनी लंबी उम्र मिली होती जितनी उनके साथ के बाकी शायरों को मिली तो इसमें कोई शक नहीं कि मजाज़ का नाम ग़ालिब इकबाल के बाद मकाम पाता। मजाज़ को याद करते हुए उनकी भतीजी सहबा अली कहती हैं - मजाज़ साहब की सरलता का अगर लोगों ने गलत फायदा न उठाया होता तो हम इतनी जल्दी उस बड़े शायर से महरूम न होते। जोश मलीहाबादी ने एक बार मजाज़ को सामने घड़ी रखकर पीने की सलाह दी तो मजाज़ ने कहा - आप घड़ी रख के पीते हैं, मैं घड़ा रख के पीता हूं। इस बेतहाशा शराबनोशी ने मजाज़ को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया। कई बार वो पागलपन के दौरे के शिकार हो चुके थे। 

मजाज़ की मौत के बाद उन पर जितना लिखा पढ़ा गया उतना किसी और शायर पर नहीं लिखा गया। 2006 में भारत सरकार ने उनकी याद में एक डाक टिकट भी ज़ारी किया। लखनऊ में मजाज़ की खस्ताहाल कब्र पर एक शेर लिखा है ‘‘अब इसके बाद सुबह है और सुबह-ए-नौ मजाज़, हम पर है खत्म शामे गरीबाने लखनऊ...''

 साभार: तहलका, उत्तराखंड संस्करण, फरवरी, 2011

Monday, June 6, 2011

डायरी के पन्ने : आंद्रेई तारकोवस्की - 1


डाकिये कि ओर से:  ये अजीब है कि हर युग में प्रतिभाशाली को कष्ट उठाने पड़े हैं. मातृभूमि भी कई बार छोडनी पड़ी है. इस दर्द के साथ सर्वोत्कृष्ट काम करना और फिर भी गरीबी रहना एक और भी अजीब स्थिति है. 

आंद्रेई तारकोवस्की को सिनेमा का मास्टर माना जाता है. सोलारिस, आंद्रेई रुब्ल्योब, मिरर, स्टाकर, नास्टेल्जिया और द सेक्रिफाइस बनाने वाले इस महान रूसी फिल्कार को सिनेमा की नई दृश्य-भाषा देने के लिए डाकिए का सलाम। 

यहां पेश है 1970 से 1986 तक की उनकी डायरी के महत्वपूर्ण अंश जो मैं यहां एडिट कर दे रहा हूं।

 विभिन्न कडि़यों के तहत लंबी चलेगी और आशा है आप सब जुड़े रहेंगे। 


1970

27 अगस्त

ओवचिन्निकोव द्वारा रचित जापान के शानदार शब्दचित्रों को नोवी मीर में पढ़ रहा हूं। विलक्षण! सूक्ष्म और प्रखर। मैं कितना भाग्यवान कि ओसाका जाने से पूर्व उन्हें पढ़ पाया।

14 सितंबर

दाॅस्तोएवस्की दो मोमबत्तियों की रोशनी में पढ़ते थे। उन्हें लैंप पसंद नहीं थे। काम के दौरान बेहद धूम्रपान करते। यदा कदा खूब कड़क चाय पीते। स्ताराया रूस्स्या से आरंभ हुआ उनका जीवन शुरू से ही ऊब और नीरसता से भरा था। उनका प्रिय रंग - - सागर की लहरों का था, अपनी नायिकाओं को उन्होंने प्रायः उसी रंग में सजाया है। 

9 जून

किसी भी किस्म की प्रशंसा का एक लक्षण यह कि अंततः वह ग्लानि में, हताशा में, यहां तक कि किसी-न-किसी हैंग ओवर में, बल्कि अपराध - भावना में जा डुबाती है। 

मैंने कहा है कि मेरा काम है कि सोवियत सिनेमा के उच्च स्तर को कायम रखूं, न कि सामयिक अथवा प्रासंगिक के पीछे भागूं। 

1973

27 जनवरी 

जिंदगी कितनी उदास है! मुझे उस शख्स़ होता है जो अपना काम राज्य से इज़ाज़त लिए बगैर कर सकते हैं। यों तो हर कोई, प्रायः हर जगह, आज़ादी से काम कर सकता है, केवल रंगमंच और सिनेमा को छोड़कर (मैं टेलीविज़न को शामिल नहीं कर रहा, क्योंकि मैं उसे कला नहीं मानता)। बेशक उन्हें पगार नहीं मिलती, लेकिन अपना काम तो कर सकते हैं।

सत्ताधारी कितने स्थूलबुद्धि हैं! क्या उन्हें साहित्य, कला, संगीत, चित्रकला, सिनेमा की सचमुच जरूरत महसूस होती है ? बेशक कतई नहीं। उलटे, उनके बगैर जीवन कितना आसान होगा ! (ऐसा वे सोचते होंगे)

मैं काम करना चाहता हूं, बस। और कुछ नहीं। काम ! यह बेशक बेतुका उन्माद और अपराध है, कि इतालवी समीक्षकों, समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने जिस निर्देशक को प्रतिभावान कहा उसे यहां बेरोज़गार रहने पर मज़बूर किया जा रहा है। 

दरअसल, मेरे ख्याल से जैसे तैसे उच्च पदों पर जा पहुंचे औसत लोगों ही की ये करतूतें मेरे खिलाफ हो सकती हैं। बेशक, औसत दर्जे के लोग कलाकारों को झेल नहीं पाते, और अधिकारीगण तो निर्विवाद रूप से घटिया स्तर ही के हैं। 

सबसे सुंदर पेड़ कौन सा है ? चिरबेल का। उसे ही पूरा विकसित होने में खूब लंबा समय लगता है। कौन जल्दी बढ़ता है ? - - बांस या पहाड़ी पीपल ? पहाड़ी पीपल बहुत सुंदर पेड़ है।

ज़रा सा और जानिये - यहाँ.
पुस्तक : अनंत में फैलते बिम्ब : तारकोवोस्की का सिनेमा
साभार : संवाद प्रकाशन, हिंदी अनुवाद. 

Thursday, April 21, 2011

सड़क

शहर की एक सड़क उसके ड्राइंग रूम के ठीक बीच में से निकलती थी.इस लिए उसका घर हर वक़्त बसों,ट्रकों,कारों और स्कूटरों के शोर से भरा रहता.वह अक्सर ड्राइंग रूम में पड़े सामान की धूल झाड़ता रहता पर पलक झपकते ही वह फिर से धूल से भर जाते.कोई महिमान आ जाये तो उसे बिठाने के लिए ड्राइंग रूम में जगह नहीं मिलती क्यूंकि अक्सर औरतें,बच्चें,बूढ़े सोफे पर बैठे बस का इंतज़ार करते रहते.
उसने अपने पिता से कई बार कहा -इस शहर के इन्तज़ामियों से कहा जाये कि वह सडक उनके ड्राइंग रूम से हटा के दूसरी और बना ले.पर उसके पिता यह कह के चुप कर जाते कि यह सडक उनके बाप-दादा के जमाने से ही इस ड्राइंग रूम से हो कर गुजरती है.पिता की बात सुनकर वह सोचता कि आखिर उन लोगो ने  ड्राइंग रूम के ठीक बीच में सड़क बनाने की इजाज़त क्यों दी.क्या दुनिया में कोई और भी घर है जिसके ड्राइंग रूम के ठीक बीच में से शहर की इतनी मसरूफ़ सड़क निकलती हो.
कई बार उसके जी में आया कि वह सडक खोद के उसका नामों-निशान मिटा दे.पर जब भी वह कुदाली ले के आगे जाता कोई ना कोई बस आ जाती और फिर शुरू हो जाता ट्रैफिक का सिलसिला.इतना कि वह इंतज़ार कर थक जाता और उसे नींद आ जाती.
एक दिन सड़क की खुदायी के लिए अपने दोस्तों को भी बुला लिया.बाहर एक कोने पर सुर्ख कपड़ा टांग दिया जिस पर लिखा था सडक मुरम्मत के लिए बंद है.पर ऊँट परवाह किये बिना कतार दर कतार आते गये और सुबह हो गयी.लाल कपड़ा हवा से एक तरफ गिर गया.ट्रैफिक फिर से शुरू हो गयी.
शाम को वह फिर से मुरम्मत के लिए वाला बोर्ड लगाने ही जा रहा था कि दो नौजवान स्कूटर पर रेस लगाते हुए आये.वह स्कूटरों की चपेट में आते-आते बड़ी मुश्किल से बचा.दोनों एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहे थे.वह निकले ही थे कि दो बसें एक दूसरे से आगे निकलती हुई आ पहुंची.इतने में एक ट्रक आ गया.वह सोफे पर पड़ा सब देख रहा था.आज रात सडक को खोद के रुख मोड़ देना था उसे.पर सुबह तक इंतज़ार के बाद भी ट्रैफिक नहीं थमी तो वह नाश्ते की मेज़ पर आ गया.उसके पिता ने बताया कि आज उसकी शादी का दिन है.
उसकी शादी हो गयी.महिमानों के जाने के बाद दूसरे दिन वह ड्राइंग रूम में आया तो यह देख के हैरान रह गया कि ड्राइंग रूम में लगी एक पुरानी तस्वीर वहाँ नहीं थी.उसने अपनी बीवी से तस्वीर के बारे में पूछा तो वह बोली-मैंने उतार दी,क्या कोई सड़क की तस्वीर भी ड्राइंग रूम में लगाता है?
उस दिन के बाद कोई भी गाड़ी उनके ड्राइंग रूम से नहीं निकली.
(मजहर-उल-इस्लाम की पंजाबी कहानी)


Wednesday, April 13, 2011

अवध की सरज़मीं पर राम की जलवानुमाई है


रामनवमी के मुबारक मौके पर पेशे-खिदमत है नये और बेहतरीन शायर अजमल हुसैन ’माहक’ की यह नज़्म। राम के पैदा होने के जश्न को बयाँ करती नज़्म अवध की उस गंगा-जमुनी तहजीब के शजर की पैदाइश है जो वक्त और सियासत के तमाम थपेड़ों को सहते हुए भी उतना ही हरा-भरा और मजबूत है।




अवध की सरज़मीं पर “राम” की  जलवानुमाई है
हैं “लछमन” साथ में उनके, ये उनके प्यारे भाई हैं।

भरत औ  शत्रुघ्न से भी मुहब्बत है नहीं कमतर
ऐ चारो ही तो “दशरथ” की जनम भर की कमाई हैं।

है माँओं  को मुहब्बत  बेपनाह  अपने पियारे से
वो हैं लख्ते  जिगर, नूरे नज़र, सबके दुलारे से ।

कभी  गोदी में लेतीं  हैं, कभी  झूला झुलातीं  हैं
कभी चूमें  जबीं उनकी, कभी  सीने  लगातीं  हैं।

है प्यारा बचपना उनका,  बड़ी प्यारी सी सूरत है
लबों पर  मुस्कुराहट, शोख़ चेहरा, क्या ये  मूरत है।

सभी के लब पे है जुमला, बड़ा प्यारा है ये लल्ला
चिराग़े खानदाने-सूर्य है,  न्यारा है ये  लल्ला।

न पूंछो कुछ भी “दशरथ” की, मसर्रत का, है क्या आलम
उन्हे  लगता है,  जैसे पा गये हों  वो नया जीवन।

महल मे रंग बरसा है, अजब  मस्ती सी  छाई है
सभी खुश हैं, सभी ने आज, सब को दी बधाई  है ।


Saturday, April 9, 2011

बहारें फिर भी आयेंगी

बहुत पुराने समय की बात है.
भगवान जी ऊपर स्वर्ग में रहते थे.
नीचे सब धुन्धूकार(अन्धेरा)फैला था.सृष्टि की रचना का विचार उनके दिमाग में शोर मचा रहा था.अपने मन में हो रही तोड़-फोड़ पर एकागर हुए वह एक नदी के किनारे घूम रहे था.नदी भरी हुई जोबन में बह रही थी,जरूर पहाड़ों में बारिश हुई होगी.
फूल पौधों के शिखरों पे बैठे पंख फडफडा रहे थे जैसे अभी नदी पार अपने प्यारे दोस्तों को मिलने जाना हो.पंछी गर्दनें हिला के उन्हें कुछ समझाने की कोशिश कर रहे थे.
बादल गरजा.
भगवान की एकाग्रता टूट गयी.उन्होंने खीझ के सभी ऋतुओं को ज़मीं पर भेज दिया और कहा बारी-बारी से सृष्टि पर पहरा दें.
हुक्म में बंधी ऋतुएँ इस सृष्टि पर आ पहुंची.ऋतुएँ लोगो से छेड़खानी करती.लोग इनसे बचने के लिए गुफाओं,छ्परों,कोठियों,घरो और बंगलो तक आ पहुंचे,किसी ऋतू बारिश होती,नदियों में सैलाब आते,गाँव के गाँव बह जाते पर ऋतुओं के लिए ये सब सिर्फ मजाक था.लोगो को अब रेडियो पहले ही बता देता कब बारिश होगी.लोग पानी पे बांध बना के कैदी बना लेटे मन मर्जी से कहीं और भेज देते.
पहले अगर हवा साँस रोक के खड़ी हो जाती तो लोग कहते किसी पापी का हवा पे पहरा लगा है और तडपते रहते इस पहरे के हटाने के लिए.पर अब बिजली के पंखे बिना हवा को पूछे चलते रहते.
पहले अगर बारिश ना होती तो बनस्पती सूख जाती.लोग यज्ञ करते,हवन करते,कहाँ विघ्न पड़ा सोचते पर अब टिऊबवैल लग गये,अब कोई बारिश की परवाह नहीं करता.
ऋतुएं उदास हो गयी भगवान जी पास गयी,
"भगवान जी,धरती पर अब हमारी जरुरत नही,हमें लौट आने दें,"
"यह कैसे हो सकता है?"भगवान जी ने हैरान हो के पूछा.
"आप खुद चल के देख लो चाहे"ऋतुओं ने बिनती की.
भगवान जी एक छोटी सी चिड़िया बन के ऋतुओं की शिकायत की जाँच करने धरती पर आ गये.
शाम का वक़्त था
रुत बहार की थी.
आसमान में बादल घिरे थे.
मोरों ने पंख फैला के नाच-नाच के बादलों को धरती पे उतार आने को कहा.
जंगली फूल एक दूसरे को इशारे कर-कर के मुस्करा रहे थे.
छोटे-छोटे पंछी फूलों के पत्तियों के गीत हवा के आंचल में बांध -बांध कर अपने प्यारे मित्रों को भेज रहे थे.
"ये धरती तो बहुत सुंदर जगह है"भगवान जी ने बहार को कहा.
इतने में एक शहर आ गया.
बहुत भीड़ थी.
बहुत शोर था.
हर कोई खोया-खोया सा था.
सभी लोग जैसे आसमान से गिरे हुए था और किसी के कुछ नहीं लगते थे.कोई किसी को जानता नहीं था.लोग घड़ी बार-बार देखते थे.
"चिड़ियाँ ले लो,रंग बिरंगी चिड़ियाँ"पिंजरे में कितनी चिड़ियों को बंद कर एक आदमी आवाज़ लगा रगा था.
चिड़िया बने भगवान जी ने देखा तो घबरा गये.
जल्दी से उड़ के एक मंदिर में पहुंचे.
"ताज़े मोतियों का हार दो-दो आने"मंदिर के बाहर नंगे पांव वाला फटे कपड़े पहने एक लड़का हार बेच रहा था.
"लो डेढ़ आना,दे हार" मुश्किल से अपना पेट संभाले लाला जी ने कहा.
लड़का सोच में पड़ गया.जैसे पहले ही कम मूल्य बताया था.
"छोड़ो ये भी कोई खाने की चीज़ है,और दो घंटो में इन्होने मुरझा जाना है."उस आदमी ने दलील दी.
बात लड़के को समझ आ गयी.उसने बेबस हो कर डेढ़ आने में हार दे दिया.
लाला जी मन्दिर में जा पहुंचे.
मूर्ती के सामने खड़े हो के आँखे मीचे अंतरध्यान हो के कुछ लेन-देन की बात की.नमस्कार किया और फूलों का हार चरणों में रख दिया.
भगवान जी मंदिर से बाहर आ गये.
एक औरत बालों में सुंदर फूल लगाये जा रही थी.खुद भी वह बहुत सुंदर थी.
"सर ढक लो जमाना ठीक नहीं."औरत के पीछे आ रही बुढ़िया जो शायद उसकी सास थी ने कहा.
औरत ने सर ढक लिया.
भगवान जी फूल के बारे में सोचने लगे,जरूर उसका दम घुट गया होगा.
इतने में रिमझिम शुरू हो गयी.
चिड़िया बने भगवान जी एक खम्बे के ऊपर बैठने ही लगे थे कि करंट का ऐसा झटका लगा कि पल भर के लिए होश उड़ गये,कच्चा सा हस के एक घर की छत्त पर बैठ गये,
उन्हें फ़िक्र हो रही थी शहर में कहीं पेड़ ही नहीं,पंछी कहाँ बैठते होंगे,घोंसलें कहाँ बनाते होंगे,कहाँ सोते होंगे.
भगवान जी हैरान थे कि किसी ने रिमझिम मौसम की छेड़खानी महसूस नहीं की.ना किसी की आँखों में बादलों की परछाईं नाची.ना कोई नंगे पांव धरा की ख़ुश्बू महसूस करने आया.ना बाल खोल किसी ने मोती पकडे.
भगवान जी अब बहार से नज़रे नहीं मिला पा रहे थे.
वह शहर की तरफ मुँह मोड़ चल पड़े,शहर अब पीछे छूट गया था.
टेढ़ी-मेढ़ी राह पर एक आदमी गुनगुनाता जा रहा था.
सामने गाँव से आते डाकिये ने उसे पहचान के साइक्ल धीरे कर लिया
"बारिश हो रही है,कहो तो में साइक्ल पर छोड़ दूँ.जाना कहाँ है?"डाकिये ने ऐनक ऊपर कर धरती  पर एक पैर रख साइक्ल रोक कर पूछा.
"जाना....जाना तो कहीं भी नही"उसने बिना रुके कहा.
"बारिश आ रही है कपड़े भीग जायेंगे"यह बात उसको कम और अपने खुद के घिसे मैले कपड़ो को ध्यान में रख कर ज्यादा कही.
"आप चलो,अपने ठिकाने पहुँचो"आदमी ने हंस कर कहा.
जाते हुए डाकिया सोच रहा था,भला इसमें हंसने की क्या बात है मैंने तो उसके भले की बात ही कही.
गाँव से दूर कब्रिस्तान की तरफ वो आदमी मुड़ गया.
"क्यों?" चिड़िया बने भगवान जी ने बहार से पूछा.
"शायद सोचता हो कि मरने वालो के बीच में कोई ज़िंदा आदमी हो."
भगवान जी हंस पड़े,
"यहा लोगों को मर कर ही पता चलता है कि कभी वो ज़िंदा भी थे?"भगवान जी ने हैरान हो के पूछा.
वह आदमी तलाब के किनारे पहुंचा
तलाब में निलोफर के फूल खिले हुए थे.
कितना कुछ उस आदमी के मन में खिल गया.कांपते-कांपते उसने मन की अथाह गहराई से कोई गीत गाया.
तलाब में बगुले टहल रहे थे.कुछ बोल भी रहे थे उसे लगा कह रहे है 'अच्छा,'अच्छा'अच्छा'
तलाब में गिरती बारिश की बूंदे पानी को जैसे गुदगुदी कर रही थी.
फिर उसने किनारे पड़ी मिट्टी हाथों में लगाई हाथ हिला-हिला कर तलाब के पानी में परछाईयाँ देखता रहा.हैरान होता रहा जैसे हाथ मिट्टी के बने नृत्य कर रहे थे.जैसे सच ही हो.
फिर हाथ में पानी भर निलोफ़र के फूलों पर फेंका.वह नाच उठे..गाने लगे..
"खूबसूरती में जान मेरी,
बादलों में जान मेरी,
पंछियों में जान मेरी,
पत्तों में जान मेरी,
हवाओं में जान मेरी"
फिर उसने हाथ धो लिए.
तलाब के किनारे खड़े पेड़ से आँखों ही आँखों में जैसे कोई बात की.
तेज़ हवा में पेड़ के पत्ते खड़-खड़ करते कहीं भागे से जा रहे हो जैसे.
चिड़िया बने भगवान जी की तरफ देख के उस आदमी ने सीटी मारी..
भगवान जी हस पड़े
"उन सब के लिए ना सही ऐसे एक के लिए ही ऋतुएं आती रहेंगी,बादल बरसते रह्नेंगे,फूल खिलते रहेंगे,सूरज चढ़ते रहेंगे"
बहार ने"जो आज्ञा"कह कर सर झुका दिया.
चिड़िया बने भगवान जी सोच रहे थे कि स्वर्ग जाये कि ना...

("रब्ब ते रुत्ता"ड़ा.दलीप कौर टिवाणा की कहानी)

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