Wednesday, October 31, 2012

प्रहसन


डाकिये की ओर से: क्या वक़्त था कि जब गांव के बड़े से घर में एक भी घड़ी नहीं थी। और घड़ी की जरूरत भी नहीं थी। छत पर सोए हुए सुबह सूरज की चैंधियाती हुई धूप पड़ी तो जगना हुआ। धूप चापाकल से सरका तो साढ़े आठ का बजना मालूम हुआ। प्राइमरी स्कूल की घंटी बजी याने 9:50। भंसा घर के घर पर धूप चढ़ी तो साढ़े तीन। 

क्या वक्त था कि पटना में हर वक्त रेडियो चलता रहता था। काम कोई नहीं रूकते थे। जीवन संगीतमय लगता था। आज रेडियो शौक से सुनते हैं या बोर होकर। शौक से सुनो तो भी एफ एम पर वही हर-हर-कच-कच। उन दिनों यह जीवन का अंग था। स्टूल पर ऐंड़ी उचकाकर मर्तबान से कटहल अचार उतार रहे हों या शेविंग कर लेने के बाद अपने गालों पर नज़रों का ज़ूम करके देखना कि अबकी कहां कहां ब्लेड लगी है। मैथ गज़ल सुने बिना नहीं बनता था। मां कंघी करते हुए रेडियो के साथ ही दबी आवाज़ में गाती - ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें। गोया तब सारा समय रेडियो से तय होता था। विविध भारती से आवाज़ छन ऐसे आती जैसे जून के महीने में गीले उजले बालू पर कोई भीगा घड़ा रखा हो और उसके मुंह पर उजले कपड़े की दो तीन तह रखे हों। उसी से आवाज़ छन कर आती हो। उन दिनों रेडियो प्रस्तोता हीरो थे। हम आवाज़ों की नकलें करते। 

 बाद में ए आई आर के कैंटीन और न्यूज़ रूम में उन्हीं आवाज़ों से सीधे सीधे मिलता, काम करता, चाय पीता। आवाज़ का जादू टूटता। क्लेयर नाग, शुभ्रा शर्मा, आशा निवेदी, आशुतोष जैन। और पीस टू कैमरा देते वो पटना दूरदर्शन वाले संवाददाता जो अपने नाम पर विशेष पाॅज़ देते - सुधांशु रंजन, दूरदर्शन समाचार, पटना। 

 बीप की चार छोटी और एक लंबी आवाज़.... - ये आकाशवाणी है अब राजेंद्र चुघ से समाचार सुनिए। यानि सुबह के 7:45। अगर यही रात को तो 8:45। 8:45, यानि उससे ठीक पहले हवामहल। अक्सर हवामहल का क्लाईमैक्स कट जाता। तब वैसी ही कोफ्त होती जैसे उन दिनों सिनेमा शुरू होने से पहले कितने रील की है यह देखने से छूट जाता। हवामहल का वो सिग्नेचर काॅमेडी भरा सिग्नेचर ट्यून। उन्हीं दिनों उस पर एक प्रहसन सुना जो कि श्रोताओं में सुपरहिट है। सिबाका गीतमाला की तरह। पिछले दिनों आकाशवाणी दिल्ली से ‘इक्वेरियम के मछली’ सुनते वक्त वो प्रहसन उदयपुर की ट्रेन की बहुत याद आई। 

 आप भी सुनिए यह स्वस्थ, गुदगुदाने वाला प्रहसन।

 


Saturday, September 29, 2012

नीली झील और बुरी बात (करतार सिंह दुग्गल )

इस शहर में रहने के लिए मुझे फ्लैट मिला था,कोई करे भी क्या देश तेजी से तरक्की कर रहा है,हर शहर में भीड़ बढ़ गयी है,छोटे छोटे कस्बे बड़े बड़े शहर बन चुके है.दस दिन बाद किसी गली से गुजरो तो गली पहचानी नही जाती.दोबारा किसी पिकनिक की जगह पे जाओगे या बाँध बन चुका होता है या बिजलीघर बन चुका होता है.जहाँ नज़र उठाओ नज़र धुंए की चिमनियो से टकरा कर रह जाती है,हर शहर के साथ लगती ज़मीं लोग बेचते जा रहे है।

घर चाहे छोटा था पर एक  अच्छी बात थी गोल कमरे की खिड़की से झील दिखायी देती थी.खिड़की में जा के खड़े हो जाओ तो आँखों में ठण्ड सी पड़ जाती थी,नीली  झील के सीने पे तैरती नावें,नावों में बैठे मछेरों  के गीत,अक्सर झील से मीठी-मीठी हवा आ रही होती..ठंडी और मीठी.झील के गिर्द हरे खेतों की सुगंध से भरी हुई।
इए घर में आये बहुत दिन नहीं हुए थे कि  हमने महसूस किया की बच्चू अक्सर चिड़चिड़ाया रहता था,
कई बार उसे गुस्सा आ जाता तो गुस्से में ऐसी हरकत कर बैठता की हमे भी कई बार शर्मिन्दा  होना पड़ता,उसको  भी बाद में बहुत परेशानी होती.
बच्चू के बिगड़ रहे मिजाज़ से हम दोनों बहुत परेशान थे,सोच-सोच के हम दोनों इस नतीजे पर पहुंचे की एक तो  उसके चिडचिडे  होने का कारन ये घर था-पहली मंजिल का फ्लैट,जिसमे रहते बच्चा दबा-दबा घुटा-घुटा जकड़ा हुआ सा महसूस करता.धरती से स्पर्श टूट गया था,दूसरा कारन उसकी बहन जो हर जगह हाज़िर  होती .एक तो दिलचस्प उम्र ,कही हंस रही होती,कहीं खेल रही होती,कही उसे प्यार किया जा रहा होता,बच्चू को शायद लगता कि  उसकी जायदाद बांटी जा रही है.
कारन कोई भी  हो,बच्चू का बात -बात पे खीझ उठना हमें बिलकुल पसंद नहीं था.हमनें उसे अपने पास बिठा कर कई बार समझाया भी.फैसला ये हुआ कि  जब भी उसका मूड बिगड़ रहा होगा हम उसे "बुरी बात" कह के याद दिला दिया  करेंगे कि उसे गुस्सा आ रहा है फिर  भी अगर उससे अपने गुस्से पे काबू ना हो तो गोल कमरे की खिड़की में खड़े हो के सामने नीली झील को देखा करेगा..झील के झिलमिला रहे पानी को,झील में तैर रही नावों को झील के आगे -पीछे खेतों को...ऐसे करके उसका गुस्सा ठंडा हो जायेगा।

यह तरकीब बहुत कामयाब रही.कई बार हमने देखा बच्चू को हम याद दिलाते "बुरी बात" तो वह संभल जाता.कई बार उसे जब ज्यादा गुस्सा आता तो वह गोल कमरे की खिड़की में खड़ा हो कर सामने झील को देखता छम-छम आंसू बहा रहा होता.कई बार ऊँचा-ऊँचा रो के मन की भडास निकाल लेता।

बच्चू के लिए प्रयोग की तरकीब हम पर खुद बहुत सही रही पति  -पत्नी में जिसे क्रोध आता नीली झील का जादू अवश्य काम आता।
एक दिन हमने देखा लूमड़ी की तरह शिकार ढूंढ़ती बिट्टी शरारत से कमरे में इधर-उधर घूम रही थी.फिर उसकी नज़र बच्चू की सियाही की दवात पर पड़ी.हमारे  देखते-देखते उसने दवात उसकी कापी पर उल्टा दी.बच्चू को ये देख के जैसे आग लग गयी.गुस्से में बिट्टी की तरफ बढ़ा की तिपायी साफ़ करती माँ ने याद दिला दिया "बुरी बात"..उन्ही कदमो से बच्चू गोल कमरे की खिड़की में जा खड़ा हुआ.सामने नीली झील को देखता आंसू गालो पर लुड़कते रहे।

बहुत दिन नही गुजरे थे  इक दिन स्कूल से वापिस आके बच्चू देखता है कि उसकी सबसे प्यारी कहानियों  की किताब से बिट्टी ने  तस्वीरे अलग कर दी थी.बाकी किताब अलग.बच्चू दांत पीस के रह गया.जब -जब किताब देखता उसका गुस्सा भड़क उठता .माँ को बार-बार याद दिलाना  पड़ता "बुरी बात" ,"बुरी बात".उस रात अकेले  गोल कमरे में खड़े हुए उसे साँझ हो गयी.उस रात बच्चू से खाना नहीं खाया गया।

मेरी पत्नी का ख़्याल था कि बिट्टी के लिए अलग और बच्चू के पढ़ने के लिए अलग कमरा होना चाहिये पर इस फ्लैट में ये सब कहाँ संभव था.इस फ्लैट में तो बस एक खिड़की थी.सामने  झील पे खुलती .नीली झील का नजारा सुबह और होता,दोपहर में और शाम ढले और.नयी दुल्हन की तरह रूप बदलती हर रंग में सुंदर लगती।

एक शाम हम चाय पी रहे थे,छुट्टी का दिन था.सो के उठे हम आराम से गप्पे मार रहे थे.चाय भी पी रहे थे.बच्चू बाहर खेलने गया हुआ था.कुछ देर बाद वह अपना बैट ले के आ गया और हमारे पास खड़ा हमारी बाते सुनने लगा.एक मक्खी बार-बार चाय की केतली पे आ बैठती .बच्चू  उसे बैट से उडाता वह फिर बैठ जाती,हम बच्चू  को मना कर रहे थे की ऐसे मत करो मेज़ बर्तनों से भरी है.मक्खी फिर आयी बच्चू ने उसे उड़ाने के लिए बैट घुमाया इस बार चाय की केतली माँ की झोली में गिरी,गर्म चाय,माँ के कपड़ो का सत्यानास हो गया.माँ गुस्से में कडक पड़ी..केतली के टूट जाने से मुझे भी क्रोध आया. बच्चू पे गरज पड़ा.वैसे के वैसे खड़े बच्चू ने पहले अपनी माँ की तरफ देख के कहा "बुरी बात" फिर मेरी तरफ देख के कहा "बुरी बात" 
फिर हम तीनों हंसने लगे.कुछ देर बाद बच्चू ने माँ के जला पैर और इतनी खूबसूरत केतली को टुकड़े-टुकड़े देख बच्चू को जैसे अपने आप पे गुस्सा आ गया और वह कितनी देर गोल कमरे की खिडकी पर खड़ा रहा।

फिर हमने सुना हमारे घर के सामने बच्चो के लिए सिनेमाघर बनने वाला था.नीचे लायेबरैरी और अजायबघर.पहली मंजिल पे सिनेमा,दूसरी मंजिल पर क्लब और छत पर बच्चो  के लिए पूल ..बच्चू सुन के खिल गया.हम भी बहुत खुश हुए.देखते ही देखते नीव भरनी शुरू हो गयी.नीली झील के आगे पीछे की सारी ज़मीं टुकड़े-टुकड़े कर के  बिक गयी.कैलाश कालोनी बन गयी.जहाँ बच्चो के आकर्षण के लिए बहुत कुछ बन गया.क्लब का मेंबर बनने वाले बच्चों में बच्चू सबसे पहला था.
स्कूल से आके सिनेमा या कल्ब..बच्चू का बहुत मन लग गया.घर आ के घंटो कलब की कहानियां कहता रहता.अकेले बैठे किताबें पढता  रहता.बच्चू के ढ़ेरों दोस्त बन गये,कभी ये जा रहा होता कभी वो अ रहे होते।

एक दिन शाम को जब में घर लौटा तो दोनों बच्चे रो रहे हे.बिट्टी ने बच्चू की कोई चीज़ छेड़ी तो बच्चू ने उसे चांटा मार दिया,बिट्टी के रोने से माँ ने बच्चू को मारा.दोनों बच्चे मार से रो रहे थे.माँ बेटे के क्रोध के बारे में सोच कर मुझे भी गुस्सा आने लगा.कितनी देर बाद मुझे भूली हुई खिडकी की याद आयी.मैं भागता हुआ जल्दी-जल्दी गोल कमरे की तरफ गया.नीली झील कहीं भी नहीं थी.ना नीली झील,ना झील में तैरती नावें,ना नावों में बैठे मछेरों के गीत.कुछ भी नहीं..बस नई बसी कालोनी.झील कही नहीं भी थी।

फिर अक्सर घर में शोर शराबा रहता.बिट्टी  रो रही होती,बच्चू चिल्ला रहा होता,माँ ख़फ़ा हो रही होती मुझे गुस्सा आ रहा होता...

Wednesday, August 22, 2012

पैकेज


डाकिए की ओर से: हाल ही में मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी से गुज़र रहा था और मन्नू की विनम्रता के आगे निहाल था। लेकिन मेरी समस्या दूसरी थी। उसमें जहां जहां उनके पति राजेन्द्र यादव की बुराईयां, झूठ और गलतियां सामने आ रही थी मुझे न जाने क्यों राजेन्द्र यादव के प्रति दिल में एक हमदर्दी पैदा होती जा रही थी। कुछ तो है उनमें खास ऐसा मुझे लगा और आगे चलकर यही मन्नू ने भी लिखा। दूसरों की जिंदगी में झांकने की बीमारी पैदाइशी लेकर आया हूं सो हर पेचीगदी और उलझी हुई चीज में माथा खपाना आदत हो गई है। यह वैसा ही है जैसा लव ट्रेंगल में आप रूचि लेते हैं। कई बार यह त्रिकोण जिंदगी और इसी परिस्थितियां बनाती हैं तो कई बार अपना स्वभाव और आदतें।

वैसे हिन्दी साहित्य में राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी एक मिसाल लगते हैं जहां राजेंद्र ने पूरा जीवन ही साहित्य को समर्पित किया वहीं मन्नू ने दोनों फ्रंट यानि परिवारिक जिम्मेदारी और लेखन कार्य दोनों मोर्चे पर जमकर लड़ीं। इन दोनों की जोड़ी डाकिए को इसलिए भी आकर्षित करती है क्योंकि दोनों ही ने लेखन में ईमानदारी का दामन थामे रखा। आश्चर्य यह भी होता है कि दोनों के पर्याप्त पाठकवर्ग होने के बावजूद इनके रिश्तों की खटास कागज़ पर भी सम्मानित तरीके से आई और मर्यादित तरीके से दोनों ने अपना पक्ष भी रखा। सार्वजनिक तौर पर भी एक दूसरे का सम्मान किया। इससे उनका यह जीवन भी साहित्य की एक अच्छी और स्वस्थ विधा में शामिल हो गई। इसे एक उपलब्धि भरी गर्वित लेखकीय यात्रा कह सकते हैं।

कहीं से बहुत ही अस्पष्ट छपाई में राजेन्द्र यादव लिखित मुड़ मुड़ के देखता हूं का एक टुकड़ा हाथ लगा। उसमें कई कंफेशन हैं और कई चिंताएं और सवाल भी जो डाकिए के उधेड़बुन से मेल खाती लगीं। आप जानते हैं सबसे अच्छी और प्रिय किताब वही होती है जो हमें वैसे ही मनःस्थिति से मेल खाती लगती है। हमें जानी हुई बात ही बताती है। सो आपसे बांट रहा हूं। भरी जुकाम में पढ़ी गई एक सीधी सपाट रीडिंग में कई विराम की गलतियां होंगी कई उतार चढ़ाव की सो अग्रिम क्षमा के साथ आपके समक्ष प्रस्तुत है :-



और अब मन्नू भंडारी की बीबीसी के साथ बातचीत के एक हिस्से को बीबीसी पर ही सुनी जा सकती है : यहाँ

Monday, August 13, 2012

एक कविता सुरजीत पातर की..

अब घर को लौटना बहुत मुश्किल है..
कौन पहचान पायेगा हमें..
माथे पर मौत जो दस्तखत कर गयी है..
चेहरे पर छोड़ गये है निशां मेरे यार..
शीशे में दिखता है कोई और-और
आँखों में कोई चमक है..
किसी ढह चुके घर से आती है रोशनी सी..

डर जायेगी मेरी माँ..
मेरा पुत्र..मुझसे बड़ी उम्र का..?
किस साधू का श्राप लगा है इसे..?
किस जलन की मारी ने कर दिया जादू टोना..
डर जाएगी मेरी माँ..
अब घर को लौटना अच्छा नहीं...

इतने डूब चुके सूरज..
इतने मर चुके खुदा..
जीती जागती माँ को देख कर..
उसके या खुद के प्रेत होने का होगा भ्रम..
जब मिलेगा कोई दोस्त पुराना..
बहुत याद आयेगा अपने अंदर से..
मर चुका मोह..
रोना आयेगा अपने पर और फिर याद आयेगा..
आँसू तो रखे रह गये मेरे दूसरे कोट की जेब में..

जब हाथ रखेगी सर पर मेरे ईसरी..
देगी असीस कोई..
किस तरह बताऊंगा मैं..
कि इस सर में छुपे हुए है ख़्याल किस तरह के..
अपनी ही लाश ले जाता आदमी..
पति की चिता पर खाना पकाती कोई हैमलिट
जाड़ों में लोगो की चिता की आग सेंकने वाला खुदा..
जिन आँखों से देखे है मैंने दुखांत..
किस तरह मिलाऊँगा ऑंखें..
अपने बचपन की तस्वीर से..

शाम को जब मढ़ी का दिया जलेगा..
गुरद्वारे शंख बजेगा..
वह बहुत याद आयेगा..
वह कि जो मर गया..
वह कि जिस की मौत का..
इस भरी नगरी में सिर्फ़ मुझको पता है..

अगर किसी ने अब मेरे मन की तलाशी ले ली..
तो रह जाउंगा बहुत अकेला ..
किसी दुश्मन देश के जासूस की तरह..
अब घरों में बसना आसान नहीं..
माथे पर मौत जो दस्तखत कर गयी है..
चेहरे पर छोड़ गये है निशां मेरे यार..
शीशे में दिखता है कोई और-और...

(मूल पंजाबी से अनुदित)

Wednesday, July 18, 2012

एक बार और समझा दो राजेश! मृत्यु बेसिक इंस्टिंक्ट है. हम खामखाँ पसीने पसीने हो रहे हैं



सीन - 1
बाहर/गैराज के सामने/दिन

काका के बेटे उससे मसला सुझलाने आते हैं। गाड़ी में आते हैं। तकरार बढ़ती है और बेटे को निराश होकर लौटना पड़ता है लेकिन गाड़ी स्टार्ट नहीं होती तो काका उसे ठीक करते है। गाड़ी एक झटके से स्टार्ट होती है, स्केलेटर दबता है और आगे बढ़ती है। शीशे के सामने काका का हाथ आता है - फिफ्टी रूपीज़ प्लीज़।
------- (अवतार)

सीन - 2
अंदर/ अमिताभ का कमरा/दिन

काका अमिताभ के कहते हैं - मैं तो तुम्हारी भलाई करने आया था रे। इनको आपस में लड़वाने और तेरे कारखाने का फायदा कराने। मगर इन मज़लूमों के झोपड़े देखो। कई कई शाम खाना नहीं पकता। उनके साथ रहते रहते मुझे उनसे प्यार हो गया है। पता नहीं चला मैं कब उनका हो गया, वो कब मेरे हो गए।
------- (नमकहराम)

सीन - 3
अंदर/ क्लिनीक/ दिन

काका: मैं तो तुझे मेरी उमर लग जाए का आर्शीवाद भी नहीं दे सकता बहन। ------- (आनंद)

सीन - 4
कुछ फौजी लड़ाई पर जा रहे हैं। फटे पुराने कपड़ों में ह्वील चेयर लुढ़कता काका आते हैं। पृष्ठभूमि में गीत बजता है - देखो वीर जवानों अपने खून पे ये इल्ज़ाम न आए, मां न कहे कि वक्त पड़ा तो देश के बेटा काम न आए।                  (फिल्म - याद नहीं)

इसी तरह सीन 5, 6, 7, 8, 9 और 10।

सभी सीन तेज़ी से एक दूसरे में मर्ज होते हैं।  शोर्ट डिजोल्व होता है। एक तस्वीर उभरती है। 

नीचे ग्राफिक उभरता है - राजेश खन्ना

*****

कैसे कहूं तुम मेरे भीतर कैसे और कितने रूपों में जिंदा हो। ऐसा ही कि ऊपर के सारे सीन स्मृति के आधार पर लिखी है। गलतियां होंगी उनके ब्यौरे में मगर उनमें तुम साबुत बचे हो।

तब हमारे घर में टी वी नहीं था। विविध भारती पर किसी न किसी रूप में तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती। कुछ था उन संवाद अदायगी में जो मुझमें कनेक्ट हो गया। तुम्हारा बाबू मोशाय बोलना ऐसा था कि मुझे ही बुला रहे हो अमिताभ तो किरदार का बहाना था। चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाए गाना आता तो मैं कल्पना करता हीरो के चहरे पर क्या भाव आते होंगे !

क्या सुनते थे कहानियां कि तुम्हारी उजली फियेट पर लड़कियों के लिपस्टिक के निशान भरे रहते थे। वो क्या था कि तुम्हारी आवाज़ और उदासी दिल को इतनी छूती थी ? कि तुम अभिनय करके निकल लेते थे और हम आज तक रोना पसंद करते हैं। बड़ा हुआ तो जाना दरअसल तुममें कोई एक्स फैक्टर नहीं था। न तो तुम नाचना जानते थे न ही कोई और गुण। मगर फिर क्या ? सिर्फ सादादिली से आंखों और चेहरे से अभिनय करना ? फिर क्यों छोटे बालों में तुम्हारी आखों की पलकें देख लगता था कि तुम्हें भगवान ने नहीं बल्कि लड़कियों ने ही अपने हाथों से पैदा किया है। हल्की चांदनी रातों में, देर शाम के झुटपुटे में, खिड़की से आती ताज़ी हवा में, खुले बालों में, ढ़ीले कपड़े पहन, रूमानी ख्याल में गुम, प्यार से अपने गोद में किसी बेजान दिल पर पेंसिल से एक तिलनुमा निशान उकेरा होगा जिससे तुम पैदा हुए- दिल के राजकुमार।

तुम्हारे बारे में एक बार पढ़ा था कि तुमने एक बार समंदर किनारे मगरूर होकर लड़कियां छेड़ी थीं। पता चला कि तुम भी आदमी ही थे मेरी तरह। खूब शराब पीने वाले। तुम्हारे जाने के साथ साथ अपनी भी ईच्छा लिख रहा हूं कि मैं भी अपनी कमज़ोरियों के साथ याद किया जाना चाहूंगा।

निंश्चित रहना कि कल जो गुमनाम है उसमें भी बचा रखूंगा तुम्हारे लिए प्यार।

दर्द और नशे का एक आनंदमयी अवतार मेरे अमर प्रेम।

Wednesday, May 9, 2012

कठघरे में आपा और मंटो

डाकिए की ओर से:   मौके पर सही साथ मिला है। हाल ही में इस्मत आपा की आत्मकथा कागज़ी है पैरहन का अंग्रेजी अनुवाद हुआ है। हाथी रूपी समाज के सूंड़ में लाल चींटी के रूप में घुसे मंटो और इस्मत एक ही पहलू के दो सिक्के थे। मंटो थोड़ा ज्यादा था। बकौल मंटो कुछ लोग मुझे प्रगतिशील कहते और जो नहीं कह पाते तो इस्मत चुगताई भी। मंटो ने इस्मत को भी बड़े अलहदा ढंग से याद किया है इस दिलचस्पी के साथ कि लोग हमारा नाम यों  जोड़ते हैं जैसे बंबई में राजकपूर और नरगिस। बहरहाल खत किसी के नाम लिखे लिखाए हों तो आलसी डाकिया छज्जे पर फेंकने भर से गुरेज नहीं करता। शुक्रिया हिन्दुस्तान समाचार पत्र का जिसने इस्मत चुगताई की आत्मकथा कागज़ी है पैरहन किताब के मार्फत इस्मत आपा की 'लिहाफ' और मंटो की 'बू' पर फहाशी का मुकदमा चला। पेश है वो तस्वीर जो मंटो अपने लक्ष्य को लेकर किस हद तक स्पष्ट था यह ज्ञात होता है। वैसे मेरे एक मित्र सुशील कुमार छौक्कड़ ने जब फेसबुक पर यह संदेश डाला कि "मंटो का सौवां जन्मदिन 11 मई को और कोई हलचल नहीं, अफसोस" तो कार्टूनिस्ट काजल कुमार ने सही लिखा कि "न वोट, न गुट तो मंटो कौन?"
*****

44 में दिसम्बर के महीने में सम्मन मिला कि हमें जनवरी में कोर्ट में हाजिर होना है। सब कह रहे थे जेल-वेल नहीं, बस जुर्माना हो जाएगा। और हम बड़े जोश से लाहौर के लिए गर्म कपड़े तैयार करवाने लगे।
सीमा बहुत छोटी और कमजोर थी और बड़ी ऊंची आवाज से रोती थी। चाइल्ड स्पेशलिस्ट को दिखाया तो उसने कहा, बिल्कुल तन्दुरुस्त है, यूं ही गुल मचाती है। उसे लाहौर की सर्दी में ले जाना ठीक न था। एकदम इतनी सर्दी न ङोल सकेगी। तो हमने बच्चाी को अलीगढ़, सुल्ताना जाफरी की अम्मा के पास छोड़ा और लाहौर रवाना हो गए। देहली से शाहिद अहमद देहलवी और वह कातिब जिन्होंने किताबत की थी, साथ हो गए थे, क्योंकि बादशाह सलामत ने उन्हें भी मुलजिम करार दिया था। यह मुकद्दमा अदबे-लतीफ पर नहीं, बल्कि उस किताब पर चला था, जो शाहिद अहमद देहलवी ने छापी थी। हमें सुल्ताना लेने आ गई। वह उन दिनों लाहौर रेडियो स्टेशन पर काम करती थी और लुकमान साहब के यहां रहती थी। उनकी बड़ी शानदार कोठी थी। बीवी-बच्चाे मैके गए हुए थे, इसलिए बस अपना ही राज था। मंटो भी पहुंच गए थे और पहुंचते ही हमारी खूब दावतें हुईं। ज्यादातर तो मंटों के दोस्त थे, मगर मुङो भी अजूबा जानवर समझकर देखने आ जाते थे। हमारी एक दिन पेशी हुई, कुछ भी न हुआ। बस जज ने नाम पूछा और यह कि मैंने यह कहानी लिखी है या नहीं। मैंने इकबाले-जुर्म किया कि लिखी है। बस। बड़ी ना-उम्मीदी हुई। सारे वक्त कुछ हमारे वकील साहब बोलते रहे। हम चूंकि आपस में खुसर-फुसर कर रहे थे, कुछ पल्ले नहीं पड़ा। उसके बाद दूसरी पेशी पड़ गई और हम आजाद होकर गुलर्छे उड़ाने लगे। मैं, मंटो, शाहिद तांगे में बैठकर खूब शॉपिंग करते फिरे। कश्मीरी दोशाले और जूते खरीदे। जूतों की दुकान पर मंटो के नाजुक सफेद पैर देखकर मुङो बड़ा रश्क आया। अपने भद्दे पैर को देखकर मोर की तरह मातम को जी चाहा।
‘मुङो अपने पैरों से घिन आती है,’ मंटो ने कहा।
‘क्यों? इतने खूबसूरत हैं।’ मैंने बहस की।
‘मेरे पैर बिल्कुल जनाने हैं।’
‘मगर जनानियों से तो इतनी दिलचस्पी है आपको!’
‘आप तो उल्टी बहस करती हैं। मैं औरत से मर्द की हैसियत से प्यार करता हूं। इसका मतलब यह तो नहीं कि खुद जनाना बन जाऊं।’
‘हटाइए भी जनाने और मर्दाने की बहस को, इनसानों की बात कीजिए। पता है नाजुक पैरोंवाले मर्द बड़े हिस्सास और जहीन होते हैं। मेरे भाई अजीम बेग चुगताई के पैर भी बड़े खूबसूरत हुआ करते थे। मगर..।’
.. लाहौर कितना खूबसूरत था! आज भी वैसा ही शादाब कहकहे लगाता हुआ, बाहें फैलाकर आनेवालों को समेट लेनेवाला। टूटकर चाहनेवाले बे-तकल्लुफ जिंदा-दिलों का शहर, पंजाब का दिल। तब मेरे दिल से बेसाख्ता शहंशाह बर्तानिया के हक में दुआइया कलमे निकलने लगे कि उन्होंने हम पर मुकदमा चलाकर लाहौर में ऐश करने का सुनहरा मौका दिया। हम दूसरी पेशी का बड़ी बेकरारी से इंतजार करने लगे। चाहे फांसी भी हो तो कोई परवा नहीं, अगर लाहौर में हुई तो यकीनन शहादत का रुतबा पाएंगे और लाहौरवाले बड़ी धूम से हमारे जनाजे उठाएंगे। दूसरी पेशी नवम्बर के खुशगवार मौसम में पड़ी, यानी 1946 ई. में। शाहिद अपनी फिल्म में उलङो हुए थे। सीमा की आया बहुत होशियार थी और अब सीमा बहुत मोटी-ताजी और तंदुरुस्त थी। इसलिए मैंने उसे बंबई में छोड़ा और खुद हवाई जहाज से देहली और वहां से शाहिद अहमद देहलवी और उनके कातिब के साथ रेल में गई। कातिब साहब से बड़ी शर्मिदगी होती थी, वह बेचारे मुफ्त में घसीट लिए गए। बड़े शामोश, मिस्कीन से थे। हमेशा आंखें झुकीं, चेहरे पर उकताहट, उन्हें देखकर एहसासे-जुर्म एकदम उभर जाता था। मेरी किताब की किताबत में फंस गए। मैंने उनसे पूछा- 
‘आपकी क्या राय है? क्या हम मुकद्दमा हार जाएंगे?’
‘मैं कुछ कह नहीं सकता, मैंने कहानी नहीं पढ़ी।’
‘मगर कातिब साहब, आपने किताबत की है।’
‘मैं अलफाज जुदा-जुदा देखता हूं और लिख देता हूं। उनके मानी पर गौर नहीं करता।’
‘कमाल है! और छपने के बाद भी नहीं पढ़ते?’
‘पढ़ता हूं, कहीं गलती तो नहीं रह गई।’
‘अलग-अलग अलफाज!’
‘जी हां!’ उन्होंने नदामत से सर झुका लिया। थोड़ी देर बाद बोले-
‘एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानेंगी!’
‘नहीं।’
‘आप कियां (के यहां) इमला की बहुत गलतियां होती हैं।’
‘हां, वो तो होती हैं। अस्ल में सीन, से और साद में गड़बड़ा जाती हूं। जो, जाद, जे, जाल में भी बहुत कनफ्यूजन होता है। यही हाल छोटी हे, बड़ी हे और दोचश्मी हे का है।’
‘आपने तख्तियां नहीं लिखीं?’
‘बहुत लिखीं। और मुस्तकिल इन्हीं गलतियों पर बहुत मार खाई मगर..।’
‘दरअस्ल जैसे मैं अलफाज पर ध्यान देता हूं, मानी की तरफ तवज्जह नहीं देता, इसी तरह आप अपनी बात कहने में ऐसी उतावली होती हैं कि हरूफ पर तवज्जह नहीं देतीं।’
‘ऊंह!’ अल्लाह कातिबों को जीता रखे, वो मेरी आबरू रख लेंगे। मैंने सोचा और टाल दिया।
.. पेशी के दिन हम कोर्ट में हाजिर हुए और वह गवाह पेश हुए जिन्हें यह साबित करना था कि मंटो की ‘बू’ और मेरा ‘लिहाफ फुहश’ हैं। मेरे वकील ने मुङो समझा दिया कि जब तक मुझसे बराहे-रास्त सवाल न किया जाए, मैं मुंह न खोलूं। वकील खुद जो मुनासिब समङोगा करेगा।
पहले ‘बू’ का नंबर आया।
‘ये कहानी फुहश है?’ - मंटो के वकील ने पूछा।
‘जी हां,’ गवाह बोला।
‘किस लफ्ज से आपको मालूम हुआ कि फुहश है?’
गवाह : ‘लफ्ज ‘छाती’।’
वकील : ‘माइ लॉर्ड, लफ्ज छाती फुहश नहीं है।’
जज : ‘दुरुस्त।’
वकील : ‘लफ्ज छाती फुहश नहीं है?’
गवाह : ‘नहीं, मगर यहां मुसन्निफ ने औरत के सीने को छाती कहा है।’
मंटो एकदम से खड़ा हो गया और बोला-
‘औरत के सीने को छाती न कहूं तो क्या मूंगफली कहूं?’
कोर्ट में कहकहा पड़ा। मंटो भी हंसने लगा। ‘अगर मुलजिम ने फिर इस किस्म का छिछोरा मजाक किया तो कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट के जुर्म में बाहर निकाल दिया जाएगा या माकूल सजा दी जाएगी।’ मंटो को उसके वकील ने चुपके-चुपके समझाया और वह समझ गया। बहस चलती रही और घूम-फिरके गवाहों को बस एक ‘छाती’ मिलता था जो फुहश साबित न हो पाता था। ‘लफ्ज छाती फुहश है, घुटना या कुहनी क्यों फुहश नहीं?’ मैंने मंटो से पूछा।
‘बकवास!’ मंटो भड़क उठा। बहस चलती रही। हम लोग उठकर बरामदे में डगर-डगर करती बेंचों पर जा बैठे। अहमद नदीम कासमी एक टोकरा माल्टे लाए थे। उन्होंने नफासत से माल्टे खाने की तरकीब बताई। माल्टे को आम की तरह पिलपिलाकर छोटा सा सुराख कर लो और मजे से चूसते रहो। टोकरा भर माल्टे हम बैठे-बैठे चूस गए। माल्टों से पेट भरने के बजाय और शिद्दत से भूख जाग उठी। लंच ब्रेक में किसी होटल पर धावा बोला दिया। सीमा की पैदाइश के सिलसिले में मैं बहुत बीमार रही थी, सारी चर्बी छट गई थी, गुरग्गन खानों का परहेज नहीं रहा था। मुर्गी इतनी कवी-हेकल थी कि बिल्कुल गिद्ध या चील के टुकड़े लग रहे थे। मोटी-मोटी, काली मिर्च छिड़ककर गर्म-गर्म कुल्चों के साथ और पानी की जगह कंधारी अनार का रस। बे-इख्तियार जी से मुकद्दमा चलानेवालों के लिए दुआ निकल रही थी।
 ..
कोर्ट में बड़ी भीड़ थी। कई असहाब हमें राय दे चुके थे कि हम मुआफी मांग लें। वो जुर्माना हमारी तरफ से अदा करने को तैयार थे। मुकद्दमा कुछ ठंडा पड़ता जा रहा था। ‘लिहाफ’ को फुहश साबित करनेवाले हमारे गवाह हमारे वकील की जिरह से कुछ बौखला से रहे थे। कहानी में कोई लफ्ज काबिले-गिरफ्त नहीं मिल रहा था। बड़े सोच-विचार के बाद एक साहब ने फरमाया कि ये जुमला ‘..आशिक जमा कर रही थीं,’ फुहश है।
‘कौन सा लफ्ज फुहश है? जमा या आशिक? वकील ने पूछा।’
‘लफ्ज आशिक!’ गवाह ने जरा तकल्लुफ से कहा।
‘माई लॉर्ड लफ्ज आशिक बड़े-बड़े शुअरा ने बड़ी फरावानी से इस्तेमाल किया है और नातों में इस्तेमाल किया गया है। इस लफ्ज को अल्लाहवालों ने बड़ा मुकद्दस मुकाम दिया है।’
‘मगर लड़कियों का आशिक जमा करना बड़ी मायूब बात है,’ गवाह ने फरमाया।
‘क्यों?’
‘इसलिए, क्योंकि..ये शरीफ लड़कियों के लिए मायूब बात है।’
‘जो लड़कियां शरीफ नहीं उनके लिए मायूब नहीं?’
‘अ..नहीं।’
‘मेरी मुवक्किल ने उन लड़कियों का जिक्र किया है जो शरीफ नहीं होंगी। क्यों साहब, बकौल आपके, गैर-शरीफ लड़कियां आशिक जमा करती हैं?’
‘जी हां।’
‘उनका जिक्र करना फुहाशी नहीं। मगर एक शरीफ खानदान की तालीमयाफ्ता औरत का उनके बारे में लिखना काबिले-मलामत है,’ गवाह साहब जोर से गरजे।
‘तो शौक से मलामत फरमाइए, मगर कानून की गिरफ्त के काबिल नहीं।’
मुआमला बिल्कुल फुसफुसा हो गया।
‘अगर आप लोग मुआफी मांग लें तो हम आपका सारा खर्चा भी देंगे और..’ एक साहब न जाने कौन थे, चुपके से मेरे पास आकर बोले।
‘क्यों मंटो साहब, मुआफी मांग लें! जो रुपए मिलेंगे, मजे से चीजें खरीदेंगे।’ मैंने मंटो से पूछा।
‘बकवास,’ मंटो ने अपनी मोरपंखी आंखें फैलाकर कहा।
‘मुङो अफसोस है, यह सरफिरा मंटो राजी नहीं।’
‘मगर आप! अगर आप ही..।’
‘नहीं, आप नहीं जानते। यह शख्स बड़ा फित्तीन है। बंबई में मेरा रहना दूभर कर देगा। इसके गुस्से से वह सजा बदजर्हा बेहतर होगी जो मुङो मिलनेवाली है।’ वह साहब उदास हो गए क्योंकि हमें सजा नहीं मिली। जज साहब ने मुङो कोर्ट के पीछे एक कमरे में तलब किया और बड़े तपाक से बोले, ‘मैंने आपकी कहानियां पढ़ी हैं और वो फुहश नहीं। और न ‘लिहाफ’ फुहश है। मगर मंटो की तहरीरों में बड़ी गलाजत भरी होती है।’
‘दुनिया में भी गलाजत भरी है,’ मैं मखनी आवाज में बोली।
‘तो क्या जरूरी है कि उसे उछाला जाए!’
‘उछालने से वह नजर आती है और सफाई की तरफ ध्यान जा सकता है।’
जज साहब हंस दिए।
न मुकदमा चलने से परेशानी हुई थी, न जीतने की खुशी हुई। बल्कि गम ही हुआ कि अब फिर लाहौर की सैर खुदा जाने कब नसीब होगी।

--------कागज़ी है पैरहन, इस्मत चुगताई

आभार : हिंदुस्तान

Friday, March 16, 2012

यह कौन नहीं चाहेगा...

डाकिए की ओर से: गलती हुई यह सोचालय पर पोस्ट हो गई। ग़लती का एहसास घंटे भर बाद हुआ। यह हमारी अनामत कब थी? कविता का ट्रीटमेंट अच्छा लगा था, ज्यादा तामझाम भी नहीं। बीच की धुन एक लय को पकड़ती हुई। शुक्रिया हमारे दफ्तर के स्क्रिट रायटर कपिल शर्मा का जिन्होंने यह उपलब्ध करवाई। कवि वीरेन डंगवाल हैं। प्रतिक्रिया कुछ नहीं कि कोरस में गाना अब अच्छा लगता है। गुलाल का शहर याद आता है। और झूम कर वो सीन याद आता है जब पीयूष मिश्रा हमारे दिल की बात बताते हुए सरफरोशी की तमन्ना को रीडिफाइंड करते हैं तो एक एक्सट्रा मग्न होकर ताली बजाता है। अपने कालखण्ड के दुख की जब लत आम जनता को लग जाए तो जश्न मनाना भी क्या अनुकूलन है ! 




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