Showing posts with label Play. Show all posts
Showing posts with label Play. Show all posts

Monday, September 9, 2013

राख से कांच मैला नहीं होता


नाटक मंच पर खेलने की चीज़ नहीं. वह जीने की सक्रिय कला है. हर परिचित, पुरानी चीज़ को नए सिरे से छूने की अपेक्षा है, ताकि हम उसे आज का, इस क्षण का धड़कता सत्य दे सकें.... हक़ीक़त ही तो नाटक है.....सिर्फ़ उसे समकालीन दृष्टि से पहचानने की आवश्यकता है.
  -----चीड़ों पर चांदनी, निर्मल वर्मा (ब्रेख्त के बारे में)

देह कितनी भाषाएं जानती है? इतनी उसकी भंगिमाएं होती हैं जो हम जानते भी नहीं। और कई बार जब लगता है कि अब इससे जुड़ी सारी बातें जान चुके हैं तभी किसी माध्यम में उससे संबंधित एक नया प्रयोग देखते हैं। देखकर हैरान हो जाते हैं और यह चमत्कार सा लगने लगता है।

शनिवार शाम एसआरसी में देह की इसी एक अनोखी भाषा से साक्षात्कार हुआ। नाटक - एन इवनिंग विद लाल देद के माध्यम से। कश्मीरी, हिन्दी, अंग्रेजी की मिली जुले संवाद में यह मीता वशिष्ठ द्वारा एक घंटे का बिना अंतराल सोलो प्रदर्शन था।

चौदहवीं सदी में कश्मीर में एक रहस्यमयी और चमत्कारी लड़की लल्लेश्वरी का प्रादुर्भाव हुआ। कहा जाता कि वह पानी पर चलती है और उसके पैर नहीं भींगते। तेरह बरस में विवाह हुआ।  उसने अपने आध्यात्मिक और गृहस्थ जीवन में भी सामंजस्य बिठाने का भरसक प्रयास किया, मगर असफल रही। उसकी भाषा कविता शिल्प में होती थी।

मीता ने तत्कालीन कश्मीरी पहनावे, शारीरिक भाषा और स्टेज पर प्रकाश के अंधेरे उजाले के मिश्रण से लल्लेश्वरी का अद्भुत दृश्य उकेरा।

परदा उठते ही एक बारीक सी प्रकाश रेखा मंच की सतह से लगभग चार इंच ऊपर पड़ती है। अंधेरे हाॅल में सिर्फ दो आंखे अब-डब करती काश्मीरी बोलती दिखाई जाती है। और जब रोशनी पूरी फैलती है तो अभिनेत्री सर के बल उल्टा लेटी हुई दिखाई देती है।

शुरू के पांच सात मिनट तक कुछ समझ में नहीं आता। लेकिन धीरे धीरे लगता है जैसे हमसे कोई कुछ खास बातें कहना चाह रहा है। हमारा दिल उससे कनेक्ट होता है और फिर नेटवर्क कट जाता है। हम या तो जुड़ने को फिर से तड़पते हैं या तुड़ने को।

दिन आया, सूरज आया
सूरज गया, चांद रहा
कुछ न रहा तो कुछ न रहा
मगर चित्त न रहा तो रहा क्या



मैं नाची र्निवसना.....
एक जगह जब ऐसा कहा जाता है तो अभिनेत्री अपने माथे पर का फेरन उतार फेंकती है, अपने बाल खोल बिखरा कर झूमकर नाचती है। मुझे लगा कि शायद कला के इस डूबे पल में अगर र्निवस्त्र भी हो जाया जाए तो कथन जस्टिफाई हो जाएगा।



बाद के दिनों में कहते हैं लल्लेश्वरी ने कपड़े पहनने छोड़ दिए। उसकी पहचान का एक एक कपड़ा व्यापारी ने जब उसे एक दिन ऐसे देखा तो उसे एक वस्त्र दिया। लल्लेश्वरी ने उस कपड़े तो बीचोंबीच दो टुकड़े में फाड़ एक दाहिने कंधे और एक बायीं कंधे पर लिया। रास्ते में जो उसे श्रद्धा से देखते या उसके इस रूप को बुरा नहीं मानते तो दायें कंधे पर के कपड़े पर वह एक गांठ बना लेती और जो उसे गालियां देते, बुरी नज़र से देखते तो बायीं कंधे पर के कपड़े पर एक गांठ लगा देती। शाम को उसी कपड़े के व्यवसायी के पास वो दोनों कपड़े का वज़न करवाती है। संयोग से दोनों गांठों का वज़न बराबर निकलता है।

नाटक खत्म होते होते लगा जैसे किसी चीज़ के प्रति सम्मोहित हो रहा हूं, वो कुछ है, पर पता नहीं क्या है।
हाॅल में कम दर्शक थे। मेरे कुछ सवाल थे जो मीता से पूछने थे मगर कृतज्ञता ज्ञापन के बाद वो मंच पर नहीं रूकी और फिर उसके बाद सामने भी नहीं आईं।

शाम ढ़ले जब कमरे पर लौट रहा था तो एक उदासी ने घेर लिया और देर रात तक बुरी तरह उदास रहा।

Wednesday, August 14, 2013

आत्मकथा


कला क्या है? क्या यह सबके लिए साध्य है? कलाकार कितने सच्चे होते हैं? कितने ही बने हुए। रचनाओं में कितना यथार्य होता है और कितनी कल्पना? कल्पना और भोगा हुआ सच मिला देने पर जो रचना तैयार होती है क्या वह संगी साथी के साथ न्याय कर पाती है? क्या लेखक एक घाघ होता है? एक ही जीवन में कोई कितना बदल सकता है? आज़ादी की लड़ाई के खातिर जेल जाने वाला आदमी आगे चलकर अपने हर काम की कीमत कैसे वसूलने लगता है? संयम क्या है? रचना में निष्पक्ष रहना, अभिव्यक्ति को बचा ले जाना। लेखक क्या पाठकों द्वारा अपनी आत्मकथा के माध्यम से खुद को बहुत ही दुखी जताकर सहानूभूति लेना चाहता है। क्या लेखक का श्रम आत्मकथा के बहाने सिम्पैथी बटोरने के कार्य में निवेश करना है? क्या लेखक लिख कर बदला लेता है ? क्या लेखक के लिए लिखना एक प्रतिशोधात्मक कार्य है, क्योंकि वो यहीं घालमेल कर अपने लोगों से बदला ले सकता है। जो समाज के नज़रों में प्रतिष्ठित है, कैसे वह अपने लोगों के नज़रों में गुनहगार है।

उपरोक्त सवालों से कल शाम गुज़रना हुआ आत्मकथा नाटक के माध्यम से। यह मेरे अब तक के देखे गए नाटक में सबसे महीन, सबसे उम्दा नाटक था। एहसास के धरातल पर संबंधों की गहन पड़ताल करने के साथ साथ लेखकीय कर्म और उपन्यास में समाहित तत्वों पर जिरह करती हुई इस नाटक को लिखा है महेश एलकुंचवार ने। महेश का लिखा यह नाटक कई बातों के लिए सोचने पर मजबूर कर देता है। बुनावट बहुत बारीक है। इंडिया हैबीटैट सेंटर के आधुनिक मंच पर इसे देखना और भी शानदार अनुभव रहा। कुछ नाटक ऐसे होते हैं जहां सिनेमा बैकफुट पर चला जाता है। पूरे नाटक में अभिनय, संवाद, लाइटिंग की टाइमिंग कमाल की रही। रिसर्चर प्रदान्या के मुख पर शिक्षा के लोकतांत्रिक प्रभाव से आए आत्मविश्वास का तेज़ देखने लायक है। वहीं लेखक की पत्नी उत्तरा और उत्तरा की बहन वासंती के संवाद से नारी मन का गहन विषलेषण करती है।
नाटक का प्रभाव इस कदर तारी रहा कि लगा कला प्रश्न भी करती है, उत्तर भी देती है और संवाद भी करती चलती है। इसका इतना तो प्रभुत्व होता ही है कि मालिकाना हक के साथ कुछ बातें निष्कर्षतः बताकर जिज्ञासा शांत करती है। कुछ आपके दिमाग में खाौलने के लिए छोड़ जाती है जो नींद में खलल का बायस बनता है और रात करवट काटते बीतती है।

कहानी यहां है। लेखक राजध्यक्ष और उत्तरा पति पत्नी हैं। लेखक को एस्ट्रोनोमी में भी खासी दिलचस्पी है। नाटक के अंत में लेखक रिसर्चर को आसमान के तारे दिखाता हुआ बताता है कि वो देवयानी तारा मंडल देख रही हो, वो हमसे इतना दूर है कि उसका प्रकाश हम तक आने में बीस लाख वर्ष लग जाते हैं। आज वो तारा अपनी उम्र पूरी कर चुका होगा और उसका प्रकाश हम तक आ रहा है जिससे हमें यह भ्रम होता है कि वो देवयानी तारा आज भी हमारे बीच है। साथ रहने वाले दो लोगों के बीच भी कई बार ऐसी ही दूरी आ जाती है कि उसका प्रकाश तो हम तक आता रहता है लेकिन वो हमारे बीच नहीं रहता। जीवन के हर क्षण को जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए, तोड़ने की नहीं।

किसी की यादें किस तरह आपको खाती हैं इस सीन को बेहद प्रभावी ढंग से एक सीन में दिखलाया गया है जब मंच पर अंधेरा होता है, एक कोने की मद्धम पीली रोशनी का प्रकाश सिर्फ लेखक के चेहरे पर पड़ रहा है। वह कोई हरकत नहीं कर रहा और उत्तरा और वासंती उनके उपन्यास की पात्र उर्मिला और वसुधा बनकर उसके चारों और घूमते हुए अपने किरदार की छटपटाहट बयान करती है।

यहां एक उत्तरा मारक संवाद कहती है कि हम झूठे लोग अपनी जिंदगी में सच्चे हैं मगर जिस उपन्यास को मानकर पाठक उस किरदार को सच्चा समझ रहा है दरअसल वही झूठा है।

इस पूरे सीन में लाइट के ज़रिए उत्तरा और वासंती पर शरीर पर पीली धारियां रेंगती दिखाई जाती है जिसका संवादों के बीच पड़ता प्रभाव दर्शकों के मन पर रेंग जाता है।

घटनाओं के कई वर्जन होते हैं। उन्हें भी दिखाया गया है। जब लेखक की पत्नी उत्तरा को वासंती के ज़रिए उसके और लेखक के बीच प्रेम संबंधों का पता चलता है तो.....
उत्तरा: वासंती, तुम घर छोड़ कर चली जाओ
वासंती:    नहीं दीदी, मैं आपको छोड़ कर नहीं जाऊंगी
उत्तरा (दुगने तीव्रता से):    वासंती,घर छोड़ कर जाओ
वासंती:    नहीं दीदी
(वासंती के स्वर में याचना और अपने किए पर पछतावा है)
उत्तरा (चीखते हुए):    घर छोड़ कर चली जाओ
यह कहते हुए उत्तरा माचिस की तीली सुलगाती है और उसे वासंती के चेहरे के समीप ले आती है।
वासंती उत्तरा के क्रोध के डर से कांपने लगती है। उसके हथेलियों की उंगलियां आपस में गुंथ जाती हैं, आंखें फट कर चौड़ी हो जाती है और माचिस की लौ में परिणाम का डर वासंती की आंखों में दिखता है।
वासंती:    मैं चली जाती हूं।

....और भाव भंगिमा में डूबे संवाद के मार्फत नाटक सफल हो उठता है।

तो इस तरह आत्मकथा पर यह एक त्वरित प्रतिक्रिया है। यहां यह स्वीकारोक्ति भी है कि कला और संबंधों की पड़ताल में डाकिया का अंतिम पंक्ति लिखे जाने तक का अतिसीमित ज्ञान।

Monday, June 17, 2013

ऑपरेशन थ्री स्टार


एक बार गधी ने पूछा कि ओ गधे इश्क करता है
मैं जानू पक्का तू मुझको घूरे मुझपे मरता है
तो गधे की तो भई खुली लाॅटरी
बोला मेरी जानम, तू एक हुक्म दे, कदमों में तेरे मर जाऊं हरदम
तो गधी ये बोली, मैं तेरा बायोडाटा लूंगी
मैं  thought करूंगी उस पर तभी लाइन क्लियर मैं दूंगी
तो गधा ये बोला बायोडाटा तो मेरा है ऐसा कि
फट जाए बड़े बड़ों की एटम बम के जैसा
मैं पाया जाता चरता हूं
हां मैदानों के अंदर
और साथ पार्लियामेंट की हर एक सीट के बैठा ऊपर
IAS भी मैं हूं आज का
IPS भी मैं हूं
और
देश चलाते उन मदारियों का
सर्कस भी मैं हूं
मिली जुली सरकार बनाता और गधों को लेकर
फिर झाड़ दुलत्ती झगड़ा करता आप में रो रोकर
तो गधी ने दी एक broad smile 
और बोली यूं बल खाकर,
कि हनीमून मनाएंगे इंडिया गेट पर जाकर
उन मरे जवानों को देंगे सेल्यूट कि जो बस कट गए,
जो आंख मूंद कर 100 करोड़ की आबादी से घट गए

मुल्क की ले ली भईया
बात अलबेली भईया
के देखो Nationality 
चीखती मर गई दैया।

बजते डफली और मंच पर तीस से चालीस कलाकारों द्वारा कोरस में गाए जाने वाले इस गीत को लिखा - पीयूष मिश्रा ने।

इंडिया हैबिटैट सेंटर में दिनांक 15 और 16 जून को डारियो फो द्वारा लिखित प्ले 'The Accidental Death of an Anarchist' का मंचन किया गया। मूल इतावली से अंग्रेजी में अडेप्टेशन के बाद इसका हिन्दी रूपांतरण अमिताभ श्रीवास्तव ने ऑपरेशन थ्री स्टार के शीर्षक से किया है।

कहानी पुलिस कस्टडी में होने वाले मौत को लेकर है कि कैसे निर्दोष लोगों को आतंकवादी बता कर पुलिस कभी इनकाउंटर तो कभी आत्महत्या बता कर मामले को रफा दफा करती है। यही वजह है कि बकौल निर्देशक अरविंद गौर - जब हमने यह नाटक गुज़रात में करने की कोशिश की तो इसे बैन कर दिया गया।




Our task as intellectuals, as persons, who mount the pulpit or the stage, and who, most importantly, address to young people, our task is not just to teach them method….. a technique or a style: we have to show them what is happening around us. They have to be able to tell their own story. A theatre, a literature, an artistic expression that does not speak for its own time has no relevance -----– Dario Fo



इसी आधार पर चलते हुए अस्मिता थियेटर गु्रप सही मायने में सीधे जनता से इटरेक्शन करती वाली गु्रप है। जिनके प्ले के मूल में जनसरोकार, करंट अफेयर्स और जन जागरूकता के मुद्दे होते हैं। नाटक के बीच में यह वैसे संवादों को इंसर्ट करती है जिससे पब्लिक की शार्ट टर्म मेमोरी की जंग छुड़ाती है। कम सुविधा और महज पचास रूपए के टिकट में यह बहुत प्रतिबद्ध नज़र आती है। और यही वजह है कि अरविंद कहते हैं - हमने ऐसे ही बीस साल चला लिए।

पीयूष अस्मिता से चार साल जुड़े रहे हैं। और इस नाटक में सनकी जोकि मुख्य पात्र है उसका किरदार वही करते थे। मूल नाटक में गीत नहीं है लेकिन हिंदीकरण में उत्तेजना और जागरूकता जगाने वाला गीत उनसे लिखवाया गया। नाटक के बीच बीच में पीयूष के गीत का प्रयोग किया गया है।

कल सुबह से हो रही बारिश में सारे कलाकारों के पैर सूजे हुए थे, बावजूद इसके उन्होंने बढि़या प्रदर्शन किया। हां लंबे लंबे, जटिल संवाद के कारण सनकी का फमबल मारना अखरा। तीनों पुलिस ने बहुत अच्छा काम किया। पत्रकार बनी शिल्पी के चेहरे पर थकावट साफ ज़ाहिर थी।

एक प्रयोग के तहत यह दिखाया गया किरदार मूल नाटक से हटकर 16 दिसंबर और भागलपुर पुलिस कस्टडी में मौत के बारे में दर्शकों को याद कराना नहीं भूलते। यह जुझारू छवि को दर्शाता। परिणाम का वर्जन - टू जिस तेज़ी से दिखाया गया वो भी प्रभावित करने वाला रहा।

अभी फाइन साॅल्यूशन, लोगबाग, रामकली और चुकाएंगे नहीं (फिर से) वगैरह बाकी हैं।

Saturday, June 15, 2013

लाल क़िले का आखिरी मुशायरा


इज्जत से काम करने जाओ तो नहीं मिलता और गलत रास्ते अख्तियार करो तो बाइज्जत मिलता है। एसआरसी में कल साढ़े सात बजे खेले जाने वाले नाटक का नाम लाल किले का आखिरी मुशायरा था। अब मेरे जैसा आदमी जो न ठीक से हिन्दी सीख सका, न उर्दू का ही विद्यार्थी बन पाया और इस तरह अधकचरा ज्ञान पाया, सो नाम सुनकर ही उत्साहित हो गया। मज़ा तो तब आया जब टॉम अल्टर का नाम देखा। थियेटर में इनका बड़ा नाम है। अदब से टिकट लेने काउंटर पर गया तो जबाव मिला - सॉरी सर। आल टिकेट्स हैव बीन आलरेडी सोल्ड आऊट सर टाईप जैसा कुछ। हरी घास पर मुंह तिकोना हो आया। फिर वही पटना वाले लाइन पर आना पड़ा। आम बोलचाल की भाषा में इस तरह के संघर्ष को राष्ट्रीय शब्दावली में जुगाड़ कहते हैं। फिर शुरू हो गई मुहिम गार्ड को पटाने की। कोशिश रंग लाई और जो लाई तो कहां हम ऊपरी माले के बाड़े में प्लास्टिक कुर्सी पर बैठने वाले कौम और कहां एकदम फ्रंट पर तीसरी लाइन में गद्देदार सीट पर उजले साफे में लिपटे रिजव्र्ड पर आसीन हुए। कुछ ही लम्हें बाद लाल मखमली पर्दा जो उठा तो मुखमंडल भी प्रकाशमान हो उठा। देखते क्या हैं कि एक शमां जली हुई है और तीन उजले पर्दे लटके हैं जो नीचे आकर सिमटे हुए हैं। तीन दरबान सावधान विश्राम की मुद्रा में खड़े हैं। ये ऐसे ही डेढ़ घंटे तक रहे। 

मंच पर बारी बारी से कई शायर आते हैं। और फिर इंट्री होती है बहादुर शाह जफर की यानि टॉम अल्टर की। सत्तर साल के बूढ़े जफर को देखते ही अपनी कक्षा नौ की धुंधली सी याद आई जब मास्टर ने सुनाया था -

न था शहर देहली, यह था चमन, कहो किस तरह का था यां अमन
जो ख़िताब था वह मिटा दिया, फ़क़त अब तो उजड़ा दयार है
                               और
न किसी के आंख का नूर हूं न किसी के दिल का करार हूं
जो किसी के काम न आ सके मैं वह एक मुश्‍तेग़ुबार हूँ

न जफ़र  किसी का रक़ीब हूँ न जफ़र  किसी का हबीब हूँ
जो बिगड़ गया वह नसीब हूँ जो उजड़ गया वह दयार हूँ

मेरा रंग-रुप बिगड़ गया मेरा हुस्‍न मुझसे बिछ़ड़ गया
चमन खिजाँ से उजड़ गया मैं उसी की फ़सले-बहार हूँ

तब जफर क्या थे। हिन्दुस्तान का एक बेबस राजा। शायर थे सो शायरी के शौकीन होने के बायस मुशायरा रखते थे। नाटक में दिखाया गया कि आज के मुशायरे का मंच संचालन मिर्जा नौशा यानि ग़ालिब करेंगे और दाग, बालमुकंद, मुंशी, मोमिन और इब्राहिम जौक आदि भी अपनी गज़ल सुनाएंगे। गालिब पर नाटक में समझ में न आने के काबिल शेर कहने का तंज कसा गया। दाग ने गालिब पर ये शेर दागा - 

अपना कहा जो आप ही समझे तो क्या समझे
मज़ा तो तब है जब आप कहें और सब समझे।

चूंकि बादशाह जफर मंच संचालन नहीं कर रहे थे सो शमां अपनी जगह ही रोशन रही और बारी बारी से शायरों के पास नहीं लाई गई। 

जैसा कि उम्मीद थी कि गालिब छा जाएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्होंने हाजिरजवाबी मंच संचालक की भूमिका निभाई। मसलन जब एक शायर की बारी आती है तो गालिब उसके बारे में कहते हैं - साहब ब्रितानिया सरकार में अफसर हैं। ग्यारह सौ रूपए सालाना की तनख्वाह पाते हैं इतने की ही बाज़ार में मेरे नाम कर्ज हैं। वहां नौकरी और यहां शाइरी। सो साहब जादूबयानी करते हैं। मंच लूटी मोमिन ने।

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता।
हाले दिन उनको लिखूं क्योंकर
हाथ दिल से जुदा नहीं होता।

टूटे हाथ से जब मोमिन ये शेर पढ़ते हैं तो और भी शेर और भी मौजू हो उठता है। मोमिन की आवाज़ मधुर और धीमी रखी गई है। वहीं दाग सबसे बुलंद आवाज़ वाले थे। जौक अपने रूतबे के बायस बुलंद रहते थे।

जफर ने जो सुनाया वो तत्कालीन हिन्दुस्तान का हालाते हाज़रा था। उनके बुढ़ापे ने उनकी बादशाहत की बेबसी को और उभारा। 

ऐसा नहीं था कि यह नाटक बहुत रोचक था। बल्कि नाटक अपने कहानी और शिल्प के लिहाज़ से कमज़ोर था। अव्वल जिन्हें उर्दू की थोड़ी भी जानकारी नहीं उनके लिए तो पूर्णतः नीरस था। कई लोग सिर्फ इसलिए बैठे रहे कि शायद सीन बदले और कोई चेंज आए। नाटक में मुशायरे के अलावा और कुछ नहीं था। जबकि होना ये चाहिए था मुशायरे में तब के हालात पर ज्यादा शेर होने चाहिए थे, मुशायरे से कुछ अलग भी होना चाहिए था। नाटक में वैसा कोई तनाव या उत्तेजना भी नहीं थी। बेहद बंधे दायरे में ये नाटक खेला गया। कहने को कहा जा सकता है कि एक रवायत थी जिसे निभाया जा रहा था। लेखक थोड़ी छूट लेते हुए इसे दिलचस्प बना सकता था जिससे नाटक यादगार हो सकती थी। यहां लेखक ये जवाब दे सकता है कि ऐतिहासिक घटनाओं और किरदारों के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते।

पूरे नाटक के दौरान एक बार भी पर्दा नहीं गिरा। एक ही सीन सिक्वेंस डेढ़ घंटे चलना। वहीं चेहरे मंच पर लगातार रहना, थकाता है।

एम सईद आलम बहुत प्रतिभाशाली हैं जिन्होंने ये नाटक निर्देशित किया। मंच सज्जा अच्छी थी लेकिन लाईटिंग और भी अच्छी लेकिन मेकअप कमाल था। ऐसी कि जिन किरदारों को अन्य नाटक में देखा था उसे अंत तक नहीं पहचान पाया। मसलन ग़ालिब - ये हरीश छाबड़ा थे। 

हां सारे किरदारों के उर्दू उच्चारण दुरूस्त थे। मंच पर जब जफर की इंट्री हुई तो दर्शकों ने नाटक से अलग उनके सम्मान में ताली बजाकर उनका स्वागत किया।

अंत में जफर साहब की बात - शेर वो नहीं जिसे सुनकर वाह निकल जाए, शेर वो जिसे सुनकर आह निकल आए।

नोट :-ऊपर लिखे सारे शेर स्मृति आधारित हैं, सो उनमें गलतियां संभव है।

Monday, June 3, 2013

चुकाएंगे नहीं?


नाटक में सबसे इफेक्टिव रंग उसका लोकधर्मी होना लगता है। वैसे तो सारे फ्लेवर ठीक हैं लेकिन अगर नाटक की कहानी और पात्र रोजमर्रा से जुड़े पब्लिक कंसर्न रखती है तो दर्शक उससे सहज की कनेक्ट हो जाती है। लोकधर्मी नाटक पब्लिक को सही मायने में मंच पर घट  रही तात्कालिकता में बहा ले जाने की क्षमता रखता है। दर्शक उस वक्त न सिर्फ उससे गहरा जुड़ाव महसूस करता है बल्कि वह आंदोलित भी हो सकता है।

एक ऐसा ही नाटक कल यानि रविवार को आई एच सी (इंडिया हैबिटैट सेंटर) में अस्मिता थियेटर ग्रुप की ओर से खेला गया। शीर्षक था - चुकाएंगे नहीं? अस्मिता थियेटर इन दिनों अपना ग्रीष्म कालीन समारोह मना रहा है जिसके अंतर्गत मंटो आधारित पार्टिशन, कोर्ट मार्शल, लोग बाग, रास्ते चुकाएंगे नहीं? खेली जा चुकी है। और आपरेशन थ्री स्टार, फाइनल साॅल्यूशन, मोटेराम का सत्याग्रह, एक मामूली आदमी, अंबेदकर और गांधी और रामकली आदि खेले जाने हैं।

चुकाएंगे नहीं मूलतः एक इटैलियन नाटक है जो कि एक राजनीतिक व्यंग्य है जिसे डारियो फो ने लिखा है। डारियो फो को 1997 का साहित्य नोबोल पुरस्कार मिला है। उन्होंने और उनकी अभिनेत्री पत्नी फ्रांका रामे ने मिलकर आम आदमी को केंद्र में रखकर कुछ बेहद चुटीले प्ले लिखे हैं जोकि राजनीतिक व्यंग्य हैं। रामे अभी पांच-छह रोज़ पहले ही हमसे जुदा हुईं सो अरविंद गौड़ निर्देशित यह नाटक उन्हीं की याद में किया गया। अंग्रेजी से इसे हिंदी में अडेप्ट किया था अमिताभ श्रीवास्तव ने।

पहले के दो दृश्यों में मेरा मन नहीं रमा। लगा किसी भी क्षण सीट छोड़ दूंगा। लेकिन जब इसने रंग पकड़ा तो गहरा होता गया। मुख्य नायिका शिल्पी मारवाहा ने गला बैठे होने के बावजूद भी शानदार अभिनय किया। नाटक के अंत में पीली रोशनी में काले लिबास में पूरा थियेटर गु्रप मंच पर डफली बजाते और नारे लगाते उतर आई और अरविंद गौड़ खुद मुखातिब हुए। कुछ बातें भी हुई मसलन उन्होनें कहा कि एक नाटक के टिकट का दाम पांच सौ रूपए होने को कोई मतलब नहीं बनता। इस तरह तो आप इस विधा को दर्शकों से दूर ले जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि हमारा ये अस्मिता थियेटर गु्रप आपको आगामी 21 जून को आने वाली फिल्म रांझना में भी इसी पब्लिक कंसर्न के मुद्दे को उठाती फिल्म के पृष्ठभूमि में यहां वहां दिखेगी।

बाज़ारीकरण और मुनाफाखोरी के आलम में एक आम आदमी और उसका परिवार किस तरह जूझता है इसका चित्रण नाटक में किया गया है। एक सुपर बाज़ार को लूट कर एक मुहल्ले की गृहणी राशन पानी को गोदामों में छुपाती हैं और छुपाए जाने के इस उपक्रम को गर्भवती होने के नाटक कर अंजाम देती हैं। आदर्शवाद और नैतिकतावादी होने का बोझ लिए एक आम आदमी कितनी तहों में पिसता है! कैस नेताओं और बड़े पुलिस अधिकारियों के पास जाते ही समाजिक समीकरण बदलने लगते हैं। इस असंतुष्ट व्यवस्था में भी कई खाए अघाए लोग ऐसे हैं जो चाहते हैं कि यह चलता रहे क्यों आटा अगर 110 रूपए मिल रही है तो उन्हें कहीं से चालीस पचास हज़ार रूपए आ भी तो रहे हैं।

रूपए का अवमूल्यन हुआ है और इससे कारखाने में काम करने वाले मजदूरों की जिंदगी क्या हो रही है इसका यथार्थ चित्रण किया गया है। रात के सन्नाटे में दो दोस्त मिलकर जबकि मंच पर मद्धिम रोशनी है जब चीनी की बोरी उठाते हैं, उस क्रम में हांफते, पुलिस की डर से गिरते-पड़ते और चीखते हैं तो रोशनी में उड़ रही गर्द को देखकर यकायक दर्शकों में चुप्पी छा जाती है।

जब एक किरदार अपने साथी को हो रहे अन्याय, बढ़ रही महंगाई और अर्थव्यवस्था की पोल खोल रहा होता है तो दरअसल वह हम दर्शकों को आज का इकोनाॅमिक्स बता रहा होता है।

नाटक की कहानी धीरे धीरे इस कदर बांध लेती है कि हर दृश्य के खत्म होने के बाद अगले सीन की उत्सुकता जागती रहती है।

नाटक देखकर मैं सोचने लगा कि हम सुख और सुविधा के कितने आदि हो गए हैं कि अब विरोध करना ही भूल गए हैं।

शिल्पी की इंडिया गेट, जंतर मंतर पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों में और नुक्कड़-नाटकों में उसकी उपस्थिति को लेकर की तारीफ बहुत सुनी थी सो नाटक के बाद मैंने उससे हाथ मिलाया। पीसने से तर उसके चेहरे पर लगता था मोतियों की लडि़या झूल रही हो। हाथ बेहद लचीले थे और बैठे गले से ही अपने होठों को हंसते हुए फैलाकर कहा - थैंक यू सर। मैं शर्मिंदा हुआ और कहा  - सर! नहीं सर नहीं।
उसने कहा - ओ. के. सर ! और हम दोनों हंस पड़े।

Monday, May 27, 2013

साहेब, बीवी और मंटो


बीती शनिवार इंडिया हेबिटेट सेंटर में सक्षम थियेटर द्वारा ‘साहेब, बीवी और मंटो' खेली गई। इसके तहत मंटो के आओ सिरीज़ में से छह का मंचन किया गया जिसमें आओ ताश खेलें, आओ झूठ बोलें, आओ बहस करें, आओ अखबार पढ़े और आओ चोरी करें शामिल था। मैं थोड़े देर से पहुंचा, नाटक खुले आसमान के नीचे खेला जा रहा था। भीषण गर्मी में जहां लोग नाटक का पम्फलेट लेकर ही उसे पंखा बनाए देख रहे थे वहीं उसकी रिकाॅडिंग कर रही दूरदर्शन का कैमरा भी लगा हुआ था। लगी हुई लाईट्स के कारण सभी के ओठों के ऊपर माथे के किनारे और बाहों पर नन्हीं नन्हीं पसीने की बूंदें हर कुछ देर पर उभर आती थीं।

कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा था कि लगता मंटो भी यहीं कहीं आसपास ही है। उसके नाटक के किरदार बहुत बोलते हैं। नाटक देखते देखते सोचने लगा क्या उसने अपने समय में सोचा होगा कि यहां दिल्ली में ही औसतन हर तीसरे दिन उसका कोई न कोई नाटक खेला जाता है। मंटो ने ये नाटक तब लिखे थे जब आकाशवाणी सिविल लाइन्स में हुआ करती थी। एक ड्रामा उसने अपने आर्टिस्टों के नज़्र की थी। नाटक लिख लिए जाने के बाद उसे कोई कोई अच्छा या बुरा कहने वाला नहीं था सो वह खुद ही नाटक सुनकर उसके गुण और दोष समझा करता था। अपनी फेमस कहानी हतक को उसने उसने शानदार रेडियो नाटक में ढ़ाला है।

कभी कभी लगता है कुछ खास नहीं चाहिए लिखने के लिए। खासकर एक बड़े वर्ग यानि आम जनता का हाले दिल लिखने के लिए जिसमें बस संवदेना भरी हो, जो लोगों के जज्बातों पर दिल का कान लगा कर सुनता है वह राइटर हो सकता है। मगर ऐसा होना ही कठिन है। जो नाटक शनिवार को खेले गए वे मजाहिया नाटक थे, उनमें जुमलों, तुनकमिज़ाजी और टाइमिंग का खेल था, मगर मंटो ने आओ सीरिज़ के बाहर नाटक लिखे हैं वे खासा बेचैनी से भरे हुए हैं। उनको अगर पढ़ें तो वह लगता है जैसे उसने स्टूडियो वालों को नाटक का बनी बनाई शूटिंग स्क्रिप्ट पकड़ा दी हो। अमूमन जब तक नाटक खेले या अभिनीत नहीं किए जाते उसके दमदार होने का पता नहीं चलता। हालांकि कुछ अपवाद हैं जिनमें मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन, तुगलक़ आदि हैं। लेकिन मंटो के नाटक को अगर सिर्फ पढ़ें तो वह साऊंड रिकाॅर्डिस्ट को अच्छे कमांड देता हुआ चलता है जिससे हम पढ़ते वक्त ही घटित होता हुआ सुन पाते हैं। बहरहाल....

किशोर, लाजवंती, नारायण और चोर बने नाटक के निर्देशक सुनील रावत ने अच्छा अभिनय किया। चोर बहुत कोमल हृदय का था मगर उसकी नफीस उर्दू वाले संवाद और उसे डिलीवर करना खासा मेहनत का काम है।

लगे हाथों वहीं दूसरे हाॅल में तारब खान की पेंटिग प्रदर्शनी भी देख आया जो समझ में तो सारी आ गई मगर कुछ प्रभावित नहीं कर सकी। बिना खरीदे पेंटिंग देख कर वहां से खाली हाथ निकलना भी बुरा लगता है। कोई भी पेंटिंग बीस हज़ार से कम की नहीं थी, एक जो थोड़ी सी ठीक लगी अस्सी हज़ार की थी।

Monday, May 20, 2013

Cut...Cut...Cut


खराब काम अच्छे से करना। कट.... कट... कट... का टास्क यही था। मतलब काम इतने खराब तरीके से करो कि डायरेक्टर को हर वाक्य पर कट... कट.... कट.... बोलना पड़े। किरदार की गलतियों से हास्य उभरे और डायरेक्टर की परेशानी दिखे। हम कबाड़ी स्क्रिप्ट राइटर हैं। दो टके के आदमी। लेकिन जब जीवन और करियर ही दांव पर लगा है तो अपनी बेतरतीबी में बेहतरीन हैं। कुछ कुछ जावेद अख्तर के लिखे उस गीत जैसा - हम लोगों को समझ सको तो समझो दिलबर जानी, उल्टी सीधी जैसी भी है अपनी यही कहानी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी।

कट...कट...कट.... कल एसआरसी में इसी थीम को लेकर खेला गया। पाईरोट्स ट्रूपर्स की लगातार यह दूसरी प्रस्तुति थी सो जो ज्यादातर किरदार जो ग़ालिब इन न्यू डेल्ही में थे वही इसमें भी थे। मगर सीन जुदा, कथन जुदा और अलहदा प्रस्तुति के साथ। एम सईद आलम को छोड़कर जो ग़ालिब बने थे (वे कल टिकट खिड़की पर टिकट काट रहे थे, शायद परसों वाले प्ले के हाऊसफुल जाने से उत्साहित हो गए हों)

हास्य नाटक को साधना बहुत कठिन है। इसके लिए जुमले शानदार होने चाहिए। उनमें नवीनता और ह्यूमर होनी चाहिए। पाईरोट्स के पास अंजू और हरीश छाबड़ा जैसे अच्छे कलाकार हैं। उनके बीच का तालमेल भी बेजोड़ है। भाषा पर भी अच्छी पकड़ है।

नाटक के दो सीन ने खास तौर से प्रभावित किया। दरअसल यह प्रोगात्मक थे। एक सीन पूरा म्यूट एक्सप्रेशन में निकाला गया। और सबसे ज्यादा सुंदर प्रयोग था जब स्टेज को ही कहानी का स्टेज बनाकर नाटक पेश किया जा रहा होता है। मतलब नाटक के अंदर एक नाटक स्टेज पर खेला जा रहा है। और इसके लिए पूरे स्टेज में आधे पर रोशनी की जाती है और एक चौथाई हिस्से को ड्रेसिंग रूम बनाया जाता है। ड्रेसिंग रूम में हल्का अंधेरा है और वहां जो कुछ घट रहा है वह मुख्य मंच पर हो रही घटनाओं पर दहला बैठता है। वहां किरदार अपने नाटक का पार्ट खेलने के लिए तैयार होते, गलतियां करते दिखते हैं और यह भी मुख्य नाटक का ही एक अहम हिस्सा है।

एक संयोग ऐसा पैदा किया गया है कि स्टेज पर जब उनका अपना खेला जा रहा नाटक खत्म होता है तभी मुख्य प्ले की भी समाप्ति होती है। और इसे करने में सारे किरदार अपने नाटक की घटिया प्रस्तुति को शानदार मानकर निर्देशक और लेखक (एम् सईद आलम) को सामने न लाकर खुद ही बारी बारी से अपना परिचय देते चलते हैं। यह प्रयोग भी अच्छा है।

कल के नाटक के दर्शक भी अच्छे थे। वरना तो दुनिया के सारे प्रोजेक्टस् वो थियेटर रूम में फोन पर ही निपटाने का इरादा रखते हैं। ना मीडियम समझते हैं न उनसे मुताल्लिक कोई नोलेज रखते हैं (संदर्भ - ग़ालिब इन न्यू डेल्ही)। कई तो बस इसलिए चले आते हैं कि संडे का दिन है, एम बी ए किया हुआ लड़का है, गर्लफ्रेंड के साथ कोपरनिकस मार्ग से गुज़रना हुआ तो टाइम काटने के लिए थियेटर का टिकट ले लिया और प्ले के दौरान किरदारों के संवाद को रिपीट करना और समझ न आए तो फोन पर बात करना या गर्लफ्रेंड से ही बातें शुरू कर देते हैं।

इस तरह शुरूआती ढ़ीली पकड़ के बाद प्ले ने रफ्तार और लय दोनों पकड़ी और अंत तक आते आते यह छा गया।

Sunday, May 19, 2013

ग़ालिब नई दिल्ली में!

क्या हो जब मिर्ज़ा असदुल्ला खां ‘ग़ालिब’ पुर्नजन्म लेकर अपना महबूब शहर दिल्ली आएं! क्या हो कि जब वह अपनी खास वेशभूषा में मोरी गेट पर अपना माल असबाब लेकर खड़े हों और बस कंडक्टरों को भोगल, आश्रम, निज़ामुद्दीन, बोर्डर चिल्लाता देखें। कैसे लगे उन्हें जब यह पता चले कि अब बल्लीमारान में बस तो क्या एक पूरा आदमी तक नहीं जा सकता। वो ग़ालिब जो एक एक हर्फ के उच्चारण पर किसी से समझौता नहीं करता, बात नहीं करता वो तू, तड़ाक, रे, बे, ले के शहर में आ जाए। वो ग़ालिब जो कई रिक्शा इसलिए छोड़ दे कि चालक उसे सवारी जगह सवार मानने से इंकार कर दे।

लेखक और निर्देशक एम. सईद आलम ने चचा से कुछ ऐसी ही छूट लेते हुए एक काॅमेडी नाटक ग़ालिब इन न्यू डेल्ही का मंचन कल शाम एसआरसी में किया। हमने जब भी ग़ालिब का तसव्वुर किया है जाने अनजाने नसीरूद्दीन शाह का चलना फिरना, उठना, देखना हमारे मन में बसा है। सईद आलम बहुत प्रतिभाशाली हैं। यह बात उन्होंने ग़ालिब का किरदार निभाकर भी साबित किया। पहले इस किरदार को कई बार टाॅम अल्टर ने निभाया है।

ग़ालिब चलते हैं तो लगता है मुहल्ले की कोई भन्नाई, मिनमिनाई खाला चल रही हो, कि बदन में ऊर्जा तो बहुत भरी हो मगर करने को कोई काम न हो। जैसे जूट के दड़बे में कोई बिल्ली घुस आई हो। बहुत ज्यादा दिमागी और विटी होना भी आम और दकियानूस समाज में सर्वाइवल के लिए खासा मुश्किल पैदा करता है। ग़ालिब यही लगे, रचनात्मकता और तरल बुद्धि के उदाहरण। उच्चारित किया गया हरेक अल्फाज़ का स्पष्ट और बेदाग उच्चारण।

कहानी कुछ इस तरह रही कि जब ग़ालिब अपनी हवेली जाने को नई दिल्ली आते हैं तो पाते हैं यहां सब कुछ बदल चुका है। हर राज्य के लोग यहां आकर रोज़गार कर रहे हैं। किरायों का बोलबाला है। उन्हें एक रूममेट के साथ रूम शेयर करना पड़ता है। पिछले जन्म में वाजिब वजीफा न मिलने का दर्द इस जन्म में भी चला आया है। वो अपनी दीवान को सही इज्जत दिलवाने के लिए लड़ रहे हैं। लोग इसके लिए उनको आज के ज़माने की तरकीबें अपना कर पब्लिसिटी स्टंट करने की सलाह देते हैं।

और इसी क्रम में उजागर होती है आज के असली दिल्ली की हकीकत। लोगों का स्वार्थ, कमीनगिरी, लोगों का उल-जुलूल व्यवहार।

अन्य मुख्य किरदारों ने भी बहुत सही अभिनय किया। रूममेट और पंजाबी आॅटो रिक्शा ड्राईवर बने हरीश छाबड़ा ने अपनी मौलिक अभिनय से दिल जीत लिया। मिसेज चड्ढ़ा बनी अंजू छाबड़ा भी शानदार रही।

लेकिन जो कमाल रहे वो ग़ालिब थे। किरदार को जैसे घोल कर पी गए थे। छोटे छोटे कदमों में बुढ़ापे की थरथराहट में हिलते कांपते स्टेज नापते ग़ालिब। शानदार जुमले उछालते ग़ालिब, लोगों के दुख से सहानुभूति रखते ग़ालिब और तमीज़ से मज़ाक उड़ाते ग़ालिब।

पाईरोट्स ट्रूपस् द्वारा मंचित यह नाटक बहुत सफल रहा। फिर भी इस बेहतरीन नाटक में जो कहीं कहीं सीन में कुछ लम्हे की कमजोरी आई उसमें गालिब का विज्ञापन ऐजेंसी जाना, कुछऐक जगह संवाद में सैफ और करीना के उदाहरण को पेश करना रहा। ये इसके कसावट को कमज़ोर करते हैं। एक स्तरीय नाटक में इन मसाले उदाहरणों से बचा जाना चाहिए।

नाटक का सबसे पहले सीन में पानवाले ने अपने बेजोड़ अदायगी से पूरे क्रम को बांधने की शुरूआत कर दी थी।
स्टेज संवाद और अभिनय का खेल होता है। यहां चुप्पी भी संवाद का हिस्सा होती है। इस पर शरीर की उपस्थिति और लाईट्स भी बोलते हैं। यहां पाॅज का भी महत्व होता है, गौर से देखा जाए तो भवहें उठाने का भी। अभिनय और खासकर हास्य नाटक टाईमिंग और मौलिक एक्सप्रेशन का खेल होता है। दो शब्दों के बीच प्र्याप्त विराम से भी हास्य उपजता है। किरदार और संवाद लेखक ज़हीन हो तो स्तरीय शब्दों के चयन से भी हास्य निकल आता है। ग़ालिब और उनके रूममेट ने ये बखूबी किया है तभी इस हाऊसफुल शो में उनके लिए दर्शकों में कई मिनट कर खड़े होकर तालियां बजाईं। दर्शकों की उन तालियों में शानदार और जीवंत अभिनय के सम्मान में ईमानदारी की खनखनाहट थी।

Thursday, May 2, 2013

जब ज़ुल्मो सितम के कोहे गरां...





1 मई विश्व श्रमिक दिवस के मौके पर कल श्रीराम सेंटर में नादिरा जहीर बब्बर द्वारा लिखित और अनिल शर्मा द्वारा निर्देशित नाटक सक्कुबाई का मंचन हुआ। मित्र संगठन इन दिनों अपने सालाना प्रदर्शन के तहत पांच दिनों में पांच नाटक का मंचन करेगा। इसी कड़ी में कल सक्कुबाई का प्रदर्शन हुआ। आज प्रेमचंद लिखित बड़े भाई साब खेली जाएगी।

सक्कुबाई मराठी हैं। घर में काम करने वाली बाई। मूल नाम शकंुतलता। नाटक एक घंटे पैंतीस मिनट का है जो कि पूर्णतः एक मोनिका मिश्रा द्वारा एकल प्रदर्शन है। इतने संवाद वो भी मिमिक्री, हाव भाव के साथ याद रखना, इसे काफी कठिनाई से साधना पड़ता है। देखकर लगा लंबी अवधि के एकल प्रदर्शन में अगर कहानी और संवाद कसे हुए न हों तो इस तरह के प्रयोग दर्शकों का मन उखाड़ सकते हैं। यह बोरिंग हो ही सकता है इस तरह के नाटकों पर दोबारा हाथ आजमाना और भी रिस्की  हो सकता है।

सक्कुबाई के रोल में मोनिका मिश्रा ने काबिले तारीफ अंदाज से सबको बांधा। सक्कुबाई में एक बेहद आम सी घर घर काम करने वाली औरत की जीवनी उसी की जबानी सुनाई और दिखाई है। उसे जैसे जैसे अपने अतीत के लोग याद आते हैं वो उसकी आवाज़ में उसकी मिमिक्री भी करती चलती है। इससे देखने में नयापन रहता है और ताजगी आती है। नाटक वन रूम सेट में संपन्न होता है। वो बारिश वाले दिन अपने मालिक के यहां काम करने आई हुई है जहां मालकिन आज नहीं लौटेगी और साहब देर से आएंगे और कल जापान के लिए निकलेंगे। सक्कुबाई को आज वहां कोई काम नहीं है लेकिन उसे जल्दी जाने की अनुमति नहीं मिलती। फिर वो वहीं घर के छोटे मोटे काम करते हुए अपनी स्मृतियां हमसे साझां करती है।

मोनिका मिश्रा अच्छी कलाकार हैं। बोल्ड भी। एक बिहारी होकर मराठी भाषा ओढ़ना भी जीभ की अच्छी कसरत है। नाटक में समाज के लोगों के दोहरे मापदंड को भी अच्छे से दिखाया गया है। शकंुतला की मां भी यही काम करती थी। चैदह साल की उम्र के आसपास उससे उसके छोटे मामा बलात्कार करते हैं। वो और उसकी आई अलग रहने चले जाते हैं। जीवन के संघर्ष चलते रहते हैं। सक्कु की शादी यशवंत से हो जाती है। सक्कु नदी की तरह है। वर्तमान में जीने वाली। जीवन को वैसे का वैसा स्वीकार कर खुश रहने वाली। सक्कु हाड़ तोड़ मेहनत करती है। जो मिलता है उसमें संतुष्ट रहती है। पति प्यार से बात कर ले तो दिलो जां न्योछावर कर देती है। नादिरा का सक्कु को इस चरित्र में लिखना, सक्कु का नायिका होने के कारण थोड़ा अतिरेक भी हो सकता है। यशवंत को आगे चलकर एड्स हो जाता है और अंत में सक्कु और उसकी बेटी साईनी रह जाते हैं।

नाटक का अंत नाटकीय हो गया। साईनी की किताब छपती है और टिपिकल फिल्मी अंदाज में स्टेज पर सक्कु को बुलवाया जाता है। सक्कु वहां साईंनी की कविता पढ़ती है और इससे नाटक खत्म होता है।

अंत में सक्कुबाई, सक्कुबाई सक्कुबाई मराठी गाने पर डांस करती है।

सक्कुबाई समाज में हर जगह है। उसे उसकी सही कीमत नहीं मिलती, न ही सम्मान ही। समाज हिकारत की नज़र से देखता है।

सक्कुबाई फुर्तीली है, कलाकार है। सक्कुबाई नदी है। लहरें है। हर जगह है और गौण है। उनका योगदान अब हमारे घर चलाने भर है इसलिए उनका योगदान नगण्य है।

यही कारण है कि सक्कुबाई अपनी तात्कालिक जीवंतता के कारण लंबे समय तक याद नहीं रहेगी। यह वेग में सरलता से आती तो है लेकिन  जल्दी ही भुला भी दी जाएगी।

इस संगठन के अन्य नाटकों में 3 मई को जाति ही पूछो साधु की, 4 मई को असगर वजाहर लिखित जिस लाहौर नहीं देख्या ओ जम्यां नईं और 5 मई को इस संगठन की अंतिम प्रस्तुति ताजमहल का टेंडर खेला जाएगा।

मुझे अभी भी तलाश है एक ऐसे नाटक की जो मेरा दिमाग झकझोर दे।

Tuesday, April 30, 2013

अपनों के बिना कैसा अपना !


रेहन पर रग्घू नाटक का पोस्टर

देह की भाषा क्या होती है? और भंगिमा ? कोई सच्चा कलाकार काठ के खोखले धम धम करते स्टेज पर भी नंगे पैर चले तो नवजात शिशु सा लगता है। चलना वो जो बेआवाज़ हो और देह की भाषा किरदार मुताबिक।

गत शनिवार और रविवार एस आर सी यानि श्रीराम सेंटर में काशीनाथ सिंह द्वारा लिखा गया उपन्यास रेहन पर रघ्घू का मंचन हुआ। वैश्विक उदासीकरण से जूझते इस कहानी का मुख्य पात्र रघुनाथ है जो कि एक कॉलेज में पढ़ाता है. निम्न मध्यमवर्गीय मानसिकता के साथ बढ़ा रघुनाथ अपने बच्चों के फैसलों से बड़ा क्षुब्ध है। वह अंत में इतना दुखी हो जाता है कि खुद को अक्सर निपूता मानने लगता है।

सीन - 1

रघुनाथ अपने कॉलेज के प्रिंसिपल से मिलने उसके घर पर आता है। और प्रिंसिपल रघुनाथ को बेइज्जती इसलिए करता है कि उसके बड़े बेटे ने जाति से बाहर लाला की बेटी से शादी कर ली। मंच पर रम का रंग है। प्रिंसिपल उसे अपनी बातों की चोट देते हुए रघुनाथ का कुरता खोल कर लुढ़का देता है। समाज का दकियानूस ठेकेदार प्रिंसिपल और उसे मान कर चलने वाला रघुनाथ दोनों के बेजोड़ भाव भंगिमा। सीन इतना टेंस हो जाता है कि दर्शकों में आत्मबोध जागता है और तालियां अपने आप बज उठती हैं।

सीन - 2

उम्रदराज होती बेटी के शादी से इंकार करने के बाद बेहद दुख भरे क्षण में रघुनाथ अपनी पत्नी के करीब आता है और उसे प्यार करने की कोशिश करता है। प्रणय दृश्यों को मंच पर दिखाना ज़रा जटिल है। ऊपर से पड़ती पीली रोशनी में एक दूसरे में गुंथे रघुनाथ और उसकी पत्नी किसी नदी में किनारे खोजते से नज़र आते हैं। एक पल के लिए लगता है वे दोनों एक नाव पर सवार है और दोनों ही पतवार चला रहे हैं। मामला तब गहराता है जब रघुनाथ असफल होता है और अपनी पत्नी के गोद में सर रख कर ज़ार ज़ार रो कर कहता है - मैं बूढ़ा हो गया अब। और पत्नी उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहती है - अब ये सब करने की हमारी उमर नहीं रही।
सवाल उठता है - बुढ़ापा क्या है ? ये यूं अचानक तो नहीं आता? परिस्थितिवश अक्षमता !

सीन - 3
या कि, या कि करते कलाकार और जवाब देता रघुनाथ

कि 'शरीफ' इंसान का मतलब है निरर्थक आदमी; भले आदमी का मतलब है 'कायर' आदमी। जब कोई आपको 'विद्वान' कहे तो उसका अर्थ 'मूर्ख' समझिए, और जब कोई 'सम्मानित' कहे तो 'दयनीय' समझिए।

उन्हें हर जगह यही कहा गया और उनका कोई काम नहीं किया गया! उन्हें हर जगह 'हट-हट' और 'दुर-दुर' किया गया। वे उस 'बकरी' या 'गाय' की तरह हैं जो सिर्फ 'में-में' या 'बाँ-बाँ कर सकती है, मार नहीं सकती! यही उनकी छवि है सबके आगे - मिमियाने घिघियानेवाले मास्टर की। यह उनकी छवि नहीं है - यही हैं वे।


सीन - 4

मंच पर गोले में एक रोशनी उतरती है। रघुनाथ अपने दोनों बच्चों से ज़मीन के बारे में फैसला लेने के लिए फोन करता है। एक असरदार प्रयोग के तहत दिखाया जाता है कि रघुनाथ घुटनों के बल बैठा है उसके ठीक पीछे उसका छोटा बेटा खड़ा है, उसके पीछे बड़ा बेटा खड़ा है। ये वे पीढ़ी है जो अपनी ज़मीन के लिए लड़ना नहीं जानती। उसे बेच कर फ्लैट में शिफ्ट हो जाना चाहती है। अनुमान के मुताबिक रघुनाथ को दोनों बेटे ज़मीन बेच डालने की सलाह देते हैं। प्रत्युत्तर में रघुनाथ के आवाज़ में बेबसी साफ झलकती है लेकिन उससे भी ज्यादा झलकता है बड़े बेटे के पीछे मंच के पर्दे पर असामान्य रूप से बेहद काली उन व्यक्तित्वों की काली परछाई जिसके आगे कई रघुनाथें घुटनों के बल आज बैठ गए हैं।

कुछ और भी प्रयोग अच्छे थे मसलन दो आदमी के फोन पर बात करने में एक तीसरे आदमी का स्टेज के बीचों बीच खड़े होकर दोनों ओर बांहें फैलाकर हाथ से फोन का संकेत बनाना।

रघुनाथ के किरदार में मुकेश भाटी ने बेहतरीन काम किया। एक सत्चरित्र मास्टर और विनम्रता और सादगी लिए अपने परिवार को समाज को समर्पित आदमी। कदम कदम पर वक्त और रिश्तों की दुलत्ती खाता जिसे इस भावना को अपने रोम रोम में समाया था कि अपनों के बिना अपना क्या होता है। प्रिंसिपल के रूप में शाहनवाज खान महज एक ही सीन में छा से गए। एक ताबेदार आदमी जब अपने ही घर में किसी को अपमानित करता है तो लोगों के नाम पर अपनी सारी कुंठा अपनी लानतों के रूप में आवाज़ के उतार चढ़ाव से बखूबी उभारा। इसके अलावा अन्य किरदार केंद्र में न होने के कारण साथी कलाकार ही थे जो औसत या उससे कम ही रहे। रोमांस के अंतरंग पलों को सोनल का पात्र निभाने वाली रीना सैनी ने अपने प्रदर्शन से उत्तेजना जगाई। देवेन्द्र राज अंकुर ने उपन्यास का कुशलता से निर्देशन किया है.


आँगन और लान बड़े-बड़े ओलों और बर्फ के पत्थरों से पट गये और बारजे की रेलिंग टूट कर दूर जा गिरी-धड़ाम ! उसके बाद जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो वह पानी की बूँदें नहीं थीं-जैसे पानी की रस्सियाँ हो जिन्हें पकड़ कोई चाहे तो वहाँ तक चला जाय जहाँ से ये छोड़ी या गिराई जा रही हों। बादल लगातार गड़गड़ा रहे थे- दूर नहीं, सिर के ऊपर जैसे बिजली तड़क रही थी; दूर नही, खिड़कियों से अन्दर आँखों में।

इकहत्तर साल के बूँढे रघुनाथ भौंचक ! यह अचानक क्या हो गया ? क्या हो रहा है ?
उन्होंने चेहरे से बन्दरटोपी हटाई, बदन पर पड़ी रजाई अलग की और खिड़की के पास खड़े हो गए !
खिड़की के दोनों पल्ले गिटक के सहारे खुले थे और वे बाहर देख रहे थे।
घर के बाहर ही कदम्ब का विशाल पेड़ था लेकिन उसका पता नहीं चल रहा था- अँधेरे के कारण, घनघोर बारिश के कारण ! छत के डाउन पाइप से जलधारा गिर रही थी और उसका शोर अलग से सुनाई पड़ रहा था !

ऐसा मौसम और ऐसी बारिश और ऐसी हवा उन्होंने कब देखी थी ? दिमाग पर जोर देने से याद आया-साठ बासठ साल पहले ! वे स्कूल जाने लगे थे- गाँव से दो मील दूर ! मौसम खराब देख कर मास्टर ने समय से पहले ही छुट्टी दे दी थी। वे सभी बच्चों के साथ बगीचे में पहुँचे ही थे कि अंधड़, और बारिश और अंधेरा ! सबने आम के पेड़ों के तनों की आड़ लेनी चाही लेकिन तूफान ने उन्हें तिनके की तरह उड़ाया और बगीचे से बाहर धान के खम्भों में ले जाकर पटका ! किसी के बस्ते और किताब कापी का पता नहीं ! बारिश की बूँदें उनके बदन में गोली के छर्रों की तरह लग रही थीं और वे चीख चिल्ला रहे थे। अंधड़ थम जाने-के बाद-जब बारिश थोड़ी कम हुई तो गाँव से लोग लालटेन और चोरबत्ती लेकर निकले थे ढूँढ़ने !

यह एक हादसा था और हादसा न हो तो जिन्दगी क्या ?
और यह भी एक हादसा ही है कि बाहर ऐसा मौसम है और वे कमरे में हैं।
कितने दिन हो गये बारिश में भीगें ?
कितने दिन हो गए लू के थपेड़े खाए ?
कितने दिन हो गए जेठ के घाम में झुलसे ?
कितने दिन हो गये अंजोरियों रात में मटरगश्ती किए ?
कितने दिन हो गये ठंठ में ठिठुर कर दाँत किटकिटाए ?
क्या ये इस लिये होते है कि हम इनसे बच के रहे ? बच बचा के चले ? या इसलिये कि इन्हें भोगें, इन्हें जिएँ, इनसे दोस्ती करें, बतियाएँ, सिर माथे पर बिठाएँ ?
हम इनसे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये हमारे शत्रु है ! क्यों कर रहे है ऐसा ?
इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएगी ! वे चले जाएगे और इस धरती का वैभव, उसका ऐश्वर्य, इसका सौन्दर्य- ये बादल, ये धूप, पेड़ पौधे, ये फसलें, ये नदी नाले, कछार जंगल पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा ! वे यह सारा कुछ अपनी आँखों में बसा लेना चाहते है। जैसे वे भले चल जाएँ आँखें रह जाएगी; त्वचा पर हर चीज की थाप सोख लेना चाहते हैं जैसे त्वचा केचुल की तरह यहीं छूट जाएगी और उसका स्पर्श उन तक पहुँचाती रहेगी !

उन्हें लग रहा था कि बहुत दिन नहीं बचे है उनके जाने में ! मुमकिन है वह दिन कल ही हो, जब उनके लिए सूरज ही न उगे। लगेगा तो जरूर, लेकिन उसे दूसरे देखेंगे-वे नहीं ! क्या यह सम्भव नहीं है कि वे सूरज को बाँध कर अपने साथ ही लिए जाएँ – न रहे, न उगे, न कोई और देखे ! लेकिन एक सूरज समूची धरती तो नहीं, वे किस चीज को बाँधेगे और किस-किस को देखने से रोकेंगे ?
उनकी बाहे इतनी लम्बी क्यों नहीं हो जातीं कि वे उसमें सारी धरती समेट लें और मरें या जिएँ तो सबके साथ !
लेकिन एक मन और था रघुनाथ का जो उन्हें धिक्कारे जा रहा था- कल तक कहाँ था वह प्यार ? धरती से प्यार की ललक ? यह तपड़ ? कल भी यही धरती थी। ये ही बादल, आसमान, तारे, सूरज चाँद थे ! नदी, झरने सागर, जंगल, पहाड़ थे। ये ही गली, मकान, चौबारे थे ! कहाँ थी यह तड़प ? फुर्सत थी इन्हें देखने की ? आज जब मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पाँव में आ रही है तो बाहर जिन्दगी बुलाती हुई सुनाई पड़ रही है ?

सच-सच बताओं रघुनाथ, तुम्हें जो मिला है उसके बारे में कभी सोचा था कि एक छोटे से गाँव से लेकर अमेरिका तक फैल जाओगे ? चौके में पीढ़ा पर बैठ कर रोटी प्याज नमक खाने वाले तुम अशोक बिहार में बैठ कर लंच और डिनर करोगे ?


वैश्वीकरण के साइड इफैक्ट्स के तहत इन्हीं सवालों और चिंताओं के साथ यह नाटक खत्म होती है और बस में दस रूपए का टिकट लेकर लौटते हुए लगता है अरे यह तो हमारे घर की कहानी थी!
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...