Friday, May 31, 2013

h.e.p.p.u.l.l.h.a


डाकिए की ओर से: एक अज़ीज़ दोस्त ने बड़ा जेनुइन खरा माल भेजा है। एक्टर श्याम पर मंटो का संस्मरण। फिल्मी दुनिया के इन लोगों पर मंटो ने जो मंज़रनामा लिखा जो आगे चलकर मीनाबाज़ार के नाम से पब्लिश हुआ। इसे पढ़ा है दास्तानगोई वाले महमूद फारूखी ने। साभार: The Big Indian Picture Curtsey: TBIP - http://thebigindianpicture.com

Monday, May 27, 2013

साहेब, बीवी और मंटो


बीती शनिवार इंडिया हेबिटेट सेंटर में सक्षम थियेटर द्वारा ‘साहेब, बीवी और मंटो' खेली गई। इसके तहत मंटो के आओ सिरीज़ में से छह का मंचन किया गया जिसमें आओ ताश खेलें, आओ झूठ बोलें, आओ बहस करें, आओ अखबार पढ़े और आओ चोरी करें शामिल था। मैं थोड़े देर से पहुंचा, नाटक खुले आसमान के नीचे खेला जा रहा था। भीषण गर्मी में जहां लोग नाटक का पम्फलेट लेकर ही उसे पंखा बनाए देख रहे थे वहीं उसकी रिकाॅडिंग कर रही दूरदर्शन का कैमरा भी लगा हुआ था। लगी हुई लाईट्स के कारण सभी के ओठों के ऊपर माथे के किनारे और बाहों पर नन्हीं नन्हीं पसीने की बूंदें हर कुछ देर पर उभर आती थीं।

कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा था कि लगता मंटो भी यहीं कहीं आसपास ही है। उसके नाटक के किरदार बहुत बोलते हैं। नाटक देखते देखते सोचने लगा क्या उसने अपने समय में सोचा होगा कि यहां दिल्ली में ही औसतन हर तीसरे दिन उसका कोई न कोई नाटक खेला जाता है। मंटो ने ये नाटक तब लिखे थे जब आकाशवाणी सिविल लाइन्स में हुआ करती थी। एक ड्रामा उसने अपने आर्टिस्टों के नज़्र की थी। नाटक लिख लिए जाने के बाद उसे कोई कोई अच्छा या बुरा कहने वाला नहीं था सो वह खुद ही नाटक सुनकर उसके गुण और दोष समझा करता था। अपनी फेमस कहानी हतक को उसने उसने शानदार रेडियो नाटक में ढ़ाला है।

कभी कभी लगता है कुछ खास नहीं चाहिए लिखने के लिए। खासकर एक बड़े वर्ग यानि आम जनता का हाले दिल लिखने के लिए जिसमें बस संवदेना भरी हो, जो लोगों के जज्बातों पर दिल का कान लगा कर सुनता है वह राइटर हो सकता है। मगर ऐसा होना ही कठिन है। जो नाटक शनिवार को खेले गए वे मजाहिया नाटक थे, उनमें जुमलों, तुनकमिज़ाजी और टाइमिंग का खेल था, मगर मंटो ने आओ सीरिज़ के बाहर नाटक लिखे हैं वे खासा बेचैनी से भरे हुए हैं। उनको अगर पढ़ें तो वह लगता है जैसे उसने स्टूडियो वालों को नाटक का बनी बनाई शूटिंग स्क्रिप्ट पकड़ा दी हो। अमूमन जब तक नाटक खेले या अभिनीत नहीं किए जाते उसके दमदार होने का पता नहीं चलता। हालांकि कुछ अपवाद हैं जिनमें मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन, तुगलक़ आदि हैं। लेकिन मंटो के नाटक को अगर सिर्फ पढ़ें तो वह साऊंड रिकाॅर्डिस्ट को अच्छे कमांड देता हुआ चलता है जिससे हम पढ़ते वक्त ही घटित होता हुआ सुन पाते हैं। बहरहाल....

किशोर, लाजवंती, नारायण और चोर बने नाटक के निर्देशक सुनील रावत ने अच्छा अभिनय किया। चोर बहुत कोमल हृदय का था मगर उसकी नफीस उर्दू वाले संवाद और उसे डिलीवर करना खासा मेहनत का काम है।

लगे हाथों वहीं दूसरे हाॅल में तारब खान की पेंटिग प्रदर्शनी भी देख आया जो समझ में तो सारी आ गई मगर कुछ प्रभावित नहीं कर सकी। बिना खरीदे पेंटिंग देख कर वहां से खाली हाथ निकलना भी बुरा लगता है। कोई भी पेंटिंग बीस हज़ार से कम की नहीं थी, एक जो थोड़ी सी ठीक लगी अस्सी हज़ार की थी।

Monday, May 20, 2013

Cut...Cut...Cut


खराब काम अच्छे से करना। कट.... कट... कट... का टास्क यही था। मतलब काम इतने खराब तरीके से करो कि डायरेक्टर को हर वाक्य पर कट... कट.... कट.... बोलना पड़े। किरदार की गलतियों से हास्य उभरे और डायरेक्टर की परेशानी दिखे। हम कबाड़ी स्क्रिप्ट राइटर हैं। दो टके के आदमी। लेकिन जब जीवन और करियर ही दांव पर लगा है तो अपनी बेतरतीबी में बेहतरीन हैं। कुछ कुछ जावेद अख्तर के लिखे उस गीत जैसा - हम लोगों को समझ सको तो समझो दिलबर जानी, उल्टी सीधी जैसी भी है अपनी यही कहानी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी।

कट...कट...कट.... कल एसआरसी में इसी थीम को लेकर खेला गया। पाईरोट्स ट्रूपर्स की लगातार यह दूसरी प्रस्तुति थी सो जो ज्यादातर किरदार जो ग़ालिब इन न्यू डेल्ही में थे वही इसमें भी थे। मगर सीन जुदा, कथन जुदा और अलहदा प्रस्तुति के साथ। एम सईद आलम को छोड़कर जो ग़ालिब बने थे (वे कल टिकट खिड़की पर टिकट काट रहे थे, शायद परसों वाले प्ले के हाऊसफुल जाने से उत्साहित हो गए हों)

हास्य नाटक को साधना बहुत कठिन है। इसके लिए जुमले शानदार होने चाहिए। उनमें नवीनता और ह्यूमर होनी चाहिए। पाईरोट्स के पास अंजू और हरीश छाबड़ा जैसे अच्छे कलाकार हैं। उनके बीच का तालमेल भी बेजोड़ है। भाषा पर भी अच्छी पकड़ है।

नाटक के दो सीन ने खास तौर से प्रभावित किया। दरअसल यह प्रोगात्मक थे। एक सीन पूरा म्यूट एक्सप्रेशन में निकाला गया। और सबसे ज्यादा सुंदर प्रयोग था जब स्टेज को ही कहानी का स्टेज बनाकर नाटक पेश किया जा रहा होता है। मतलब नाटक के अंदर एक नाटक स्टेज पर खेला जा रहा है। और इसके लिए पूरे स्टेज में आधे पर रोशनी की जाती है और एक चौथाई हिस्से को ड्रेसिंग रूम बनाया जाता है। ड्रेसिंग रूम में हल्का अंधेरा है और वहां जो कुछ घट रहा है वह मुख्य मंच पर हो रही घटनाओं पर दहला बैठता है। वहां किरदार अपने नाटक का पार्ट खेलने के लिए तैयार होते, गलतियां करते दिखते हैं और यह भी मुख्य नाटक का ही एक अहम हिस्सा है।

एक संयोग ऐसा पैदा किया गया है कि स्टेज पर जब उनका अपना खेला जा रहा नाटक खत्म होता है तभी मुख्य प्ले की भी समाप्ति होती है। और इसे करने में सारे किरदार अपने नाटक की घटिया प्रस्तुति को शानदार मानकर निर्देशक और लेखक (एम् सईद आलम) को सामने न लाकर खुद ही बारी बारी से अपना परिचय देते चलते हैं। यह प्रयोग भी अच्छा है।

कल के नाटक के दर्शक भी अच्छे थे। वरना तो दुनिया के सारे प्रोजेक्टस् वो थियेटर रूम में फोन पर ही निपटाने का इरादा रखते हैं। ना मीडियम समझते हैं न उनसे मुताल्लिक कोई नोलेज रखते हैं (संदर्भ - ग़ालिब इन न्यू डेल्ही)। कई तो बस इसलिए चले आते हैं कि संडे का दिन है, एम बी ए किया हुआ लड़का है, गर्लफ्रेंड के साथ कोपरनिकस मार्ग से गुज़रना हुआ तो टाइम काटने के लिए थियेटर का टिकट ले लिया और प्ले के दौरान किरदारों के संवाद को रिपीट करना और समझ न आए तो फोन पर बात करना या गर्लफ्रेंड से ही बातें शुरू कर देते हैं।

इस तरह शुरूआती ढ़ीली पकड़ के बाद प्ले ने रफ्तार और लय दोनों पकड़ी और अंत तक आते आते यह छा गया।

Sunday, May 19, 2013

ग़ालिब नई दिल्ली में!

क्या हो जब मिर्ज़ा असदुल्ला खां ‘ग़ालिब’ पुर्नजन्म लेकर अपना महबूब शहर दिल्ली आएं! क्या हो कि जब वह अपनी खास वेशभूषा में मोरी गेट पर अपना माल असबाब लेकर खड़े हों और बस कंडक्टरों को भोगल, आश्रम, निज़ामुद्दीन, बोर्डर चिल्लाता देखें। कैसे लगे उन्हें जब यह पता चले कि अब बल्लीमारान में बस तो क्या एक पूरा आदमी तक नहीं जा सकता। वो ग़ालिब जो एक एक हर्फ के उच्चारण पर किसी से समझौता नहीं करता, बात नहीं करता वो तू, तड़ाक, रे, बे, ले के शहर में आ जाए। वो ग़ालिब जो कई रिक्शा इसलिए छोड़ दे कि चालक उसे सवारी जगह सवार मानने से इंकार कर दे।

लेखक और निर्देशक एम. सईद आलम ने चचा से कुछ ऐसी ही छूट लेते हुए एक काॅमेडी नाटक ग़ालिब इन न्यू डेल्ही का मंचन कल शाम एसआरसी में किया। हमने जब भी ग़ालिब का तसव्वुर किया है जाने अनजाने नसीरूद्दीन शाह का चलना फिरना, उठना, देखना हमारे मन में बसा है। सईद आलम बहुत प्रतिभाशाली हैं। यह बात उन्होंने ग़ालिब का किरदार निभाकर भी साबित किया। पहले इस किरदार को कई बार टाॅम अल्टर ने निभाया है।

ग़ालिब चलते हैं तो लगता है मुहल्ले की कोई भन्नाई, मिनमिनाई खाला चल रही हो, कि बदन में ऊर्जा तो बहुत भरी हो मगर करने को कोई काम न हो। जैसे जूट के दड़बे में कोई बिल्ली घुस आई हो। बहुत ज्यादा दिमागी और विटी होना भी आम और दकियानूस समाज में सर्वाइवल के लिए खासा मुश्किल पैदा करता है। ग़ालिब यही लगे, रचनात्मकता और तरल बुद्धि के उदाहरण। उच्चारित किया गया हरेक अल्फाज़ का स्पष्ट और बेदाग उच्चारण।

कहानी कुछ इस तरह रही कि जब ग़ालिब अपनी हवेली जाने को नई दिल्ली आते हैं तो पाते हैं यहां सब कुछ बदल चुका है। हर राज्य के लोग यहां आकर रोज़गार कर रहे हैं। किरायों का बोलबाला है। उन्हें एक रूममेट के साथ रूम शेयर करना पड़ता है। पिछले जन्म में वाजिब वजीफा न मिलने का दर्द इस जन्म में भी चला आया है। वो अपनी दीवान को सही इज्जत दिलवाने के लिए लड़ रहे हैं। लोग इसके लिए उनको आज के ज़माने की तरकीबें अपना कर पब्लिसिटी स्टंट करने की सलाह देते हैं।

और इसी क्रम में उजागर होती है आज के असली दिल्ली की हकीकत। लोगों का स्वार्थ, कमीनगिरी, लोगों का उल-जुलूल व्यवहार।

अन्य मुख्य किरदारों ने भी बहुत सही अभिनय किया। रूममेट और पंजाबी आॅटो रिक्शा ड्राईवर बने हरीश छाबड़ा ने अपनी मौलिक अभिनय से दिल जीत लिया। मिसेज चड्ढ़ा बनी अंजू छाबड़ा भी शानदार रही।

लेकिन जो कमाल रहे वो ग़ालिब थे। किरदार को जैसे घोल कर पी गए थे। छोटे छोटे कदमों में बुढ़ापे की थरथराहट में हिलते कांपते स्टेज नापते ग़ालिब। शानदार जुमले उछालते ग़ालिब, लोगों के दुख से सहानुभूति रखते ग़ालिब और तमीज़ से मज़ाक उड़ाते ग़ालिब।

पाईरोट्स ट्रूपस् द्वारा मंचित यह नाटक बहुत सफल रहा। फिर भी इस बेहतरीन नाटक में जो कहीं कहीं सीन में कुछ लम्हे की कमजोरी आई उसमें गालिब का विज्ञापन ऐजेंसी जाना, कुछऐक जगह संवाद में सैफ और करीना के उदाहरण को पेश करना रहा। ये इसके कसावट को कमज़ोर करते हैं। एक स्तरीय नाटक में इन मसाले उदाहरणों से बचा जाना चाहिए।

नाटक का सबसे पहले सीन में पानवाले ने अपने बेजोड़ अदायगी से पूरे क्रम को बांधने की शुरूआत कर दी थी।
स्टेज संवाद और अभिनय का खेल होता है। यहां चुप्पी भी संवाद का हिस्सा होती है। इस पर शरीर की उपस्थिति और लाईट्स भी बोलते हैं। यहां पाॅज का भी महत्व होता है, गौर से देखा जाए तो भवहें उठाने का भी। अभिनय और खासकर हास्य नाटक टाईमिंग और मौलिक एक्सप्रेशन का खेल होता है। दो शब्दों के बीच प्र्याप्त विराम से भी हास्य उपजता है। किरदार और संवाद लेखक ज़हीन हो तो स्तरीय शब्दों के चयन से भी हास्य निकल आता है। ग़ालिब और उनके रूममेट ने ये बखूबी किया है तभी इस हाऊसफुल शो में उनके लिए दर्शकों में कई मिनट कर खड़े होकर तालियां बजाईं। दर्शकों की उन तालियों में शानदार और जीवंत अभिनय के सम्मान में ईमानदारी की खनखनाहट थी।

Thursday, May 2, 2013

जब ज़ुल्मो सितम के कोहे गरां...





1 मई विश्व श्रमिक दिवस के मौके पर कल श्रीराम सेंटर में नादिरा जहीर बब्बर द्वारा लिखित और अनिल शर्मा द्वारा निर्देशित नाटक सक्कुबाई का मंचन हुआ। मित्र संगठन इन दिनों अपने सालाना प्रदर्शन के तहत पांच दिनों में पांच नाटक का मंचन करेगा। इसी कड़ी में कल सक्कुबाई का प्रदर्शन हुआ। आज प्रेमचंद लिखित बड़े भाई साब खेली जाएगी।

सक्कुबाई मराठी हैं। घर में काम करने वाली बाई। मूल नाम शकंुतलता। नाटक एक घंटे पैंतीस मिनट का है जो कि पूर्णतः एक मोनिका मिश्रा द्वारा एकल प्रदर्शन है। इतने संवाद वो भी मिमिक्री, हाव भाव के साथ याद रखना, इसे काफी कठिनाई से साधना पड़ता है। देखकर लगा लंबी अवधि के एकल प्रदर्शन में अगर कहानी और संवाद कसे हुए न हों तो इस तरह के प्रयोग दर्शकों का मन उखाड़ सकते हैं। यह बोरिंग हो ही सकता है इस तरह के नाटकों पर दोबारा हाथ आजमाना और भी रिस्की  हो सकता है।

सक्कुबाई के रोल में मोनिका मिश्रा ने काबिले तारीफ अंदाज से सबको बांधा। सक्कुबाई में एक बेहद आम सी घर घर काम करने वाली औरत की जीवनी उसी की जबानी सुनाई और दिखाई है। उसे जैसे जैसे अपने अतीत के लोग याद आते हैं वो उसकी आवाज़ में उसकी मिमिक्री भी करती चलती है। इससे देखने में नयापन रहता है और ताजगी आती है। नाटक वन रूम सेट में संपन्न होता है। वो बारिश वाले दिन अपने मालिक के यहां काम करने आई हुई है जहां मालकिन आज नहीं लौटेगी और साहब देर से आएंगे और कल जापान के लिए निकलेंगे। सक्कुबाई को आज वहां कोई काम नहीं है लेकिन उसे जल्दी जाने की अनुमति नहीं मिलती। फिर वो वहीं घर के छोटे मोटे काम करते हुए अपनी स्मृतियां हमसे साझां करती है।

मोनिका मिश्रा अच्छी कलाकार हैं। बोल्ड भी। एक बिहारी होकर मराठी भाषा ओढ़ना भी जीभ की अच्छी कसरत है। नाटक में समाज के लोगों के दोहरे मापदंड को भी अच्छे से दिखाया गया है। शकंुतला की मां भी यही काम करती थी। चैदह साल की उम्र के आसपास उससे उसके छोटे मामा बलात्कार करते हैं। वो और उसकी आई अलग रहने चले जाते हैं। जीवन के संघर्ष चलते रहते हैं। सक्कु की शादी यशवंत से हो जाती है। सक्कु नदी की तरह है। वर्तमान में जीने वाली। जीवन को वैसे का वैसा स्वीकार कर खुश रहने वाली। सक्कु हाड़ तोड़ मेहनत करती है। जो मिलता है उसमें संतुष्ट रहती है। पति प्यार से बात कर ले तो दिलो जां न्योछावर कर देती है। नादिरा का सक्कु को इस चरित्र में लिखना, सक्कु का नायिका होने के कारण थोड़ा अतिरेक भी हो सकता है। यशवंत को आगे चलकर एड्स हो जाता है और अंत में सक्कु और उसकी बेटी साईनी रह जाते हैं।

नाटक का अंत नाटकीय हो गया। साईनी की किताब छपती है और टिपिकल फिल्मी अंदाज में स्टेज पर सक्कु को बुलवाया जाता है। सक्कु वहां साईंनी की कविता पढ़ती है और इससे नाटक खत्म होता है।

अंत में सक्कुबाई, सक्कुबाई सक्कुबाई मराठी गाने पर डांस करती है।

सक्कुबाई समाज में हर जगह है। उसे उसकी सही कीमत नहीं मिलती, न ही सम्मान ही। समाज हिकारत की नज़र से देखता है।

सक्कुबाई फुर्तीली है, कलाकार है। सक्कुबाई नदी है। लहरें है। हर जगह है और गौण है। उनका योगदान अब हमारे घर चलाने भर है इसलिए उनका योगदान नगण्य है।

यही कारण है कि सक्कुबाई अपनी तात्कालिक जीवंतता के कारण लंबे समय तक याद नहीं रहेगी। यह वेग में सरलता से आती तो है लेकिन  जल्दी ही भुला भी दी जाएगी।

इस संगठन के अन्य नाटकों में 3 मई को जाति ही पूछो साधु की, 4 मई को असगर वजाहर लिखित जिस लाहौर नहीं देख्या ओ जम्यां नईं और 5 मई को इस संगठन की अंतिम प्रस्तुति ताजमहल का टेंडर खेला जाएगा।

मुझे अभी भी तलाश है एक ऐसे नाटक की जो मेरा दिमाग झकझोर दे।

Tuesday, April 30, 2013

अपनों के बिना कैसा अपना !


रेहन पर रग्घू नाटक का पोस्टर

देह की भाषा क्या होती है? और भंगिमा ? कोई सच्चा कलाकार काठ के खोखले धम धम करते स्टेज पर भी नंगे पैर चले तो नवजात शिशु सा लगता है। चलना वो जो बेआवाज़ हो और देह की भाषा किरदार मुताबिक।

गत शनिवार और रविवार एस आर सी यानि श्रीराम सेंटर में काशीनाथ सिंह द्वारा लिखा गया उपन्यास रेहन पर रघ्घू का मंचन हुआ। वैश्विक उदासीकरण से जूझते इस कहानी का मुख्य पात्र रघुनाथ है जो कि एक कॉलेज में पढ़ाता है. निम्न मध्यमवर्गीय मानसिकता के साथ बढ़ा रघुनाथ अपने बच्चों के फैसलों से बड़ा क्षुब्ध है। वह अंत में इतना दुखी हो जाता है कि खुद को अक्सर निपूता मानने लगता है।

सीन - 1

रघुनाथ अपने कॉलेज के प्रिंसिपल से मिलने उसके घर पर आता है। और प्रिंसिपल रघुनाथ को बेइज्जती इसलिए करता है कि उसके बड़े बेटे ने जाति से बाहर लाला की बेटी से शादी कर ली। मंच पर रम का रंग है। प्रिंसिपल उसे अपनी बातों की चोट देते हुए रघुनाथ का कुरता खोल कर लुढ़का देता है। समाज का दकियानूस ठेकेदार प्रिंसिपल और उसे मान कर चलने वाला रघुनाथ दोनों के बेजोड़ भाव भंगिमा। सीन इतना टेंस हो जाता है कि दर्शकों में आत्मबोध जागता है और तालियां अपने आप बज उठती हैं।

सीन - 2

उम्रदराज होती बेटी के शादी से इंकार करने के बाद बेहद दुख भरे क्षण में रघुनाथ अपनी पत्नी के करीब आता है और उसे प्यार करने की कोशिश करता है। प्रणय दृश्यों को मंच पर दिखाना ज़रा जटिल है। ऊपर से पड़ती पीली रोशनी में एक दूसरे में गुंथे रघुनाथ और उसकी पत्नी किसी नदी में किनारे खोजते से नज़र आते हैं। एक पल के लिए लगता है वे दोनों एक नाव पर सवार है और दोनों ही पतवार चला रहे हैं। मामला तब गहराता है जब रघुनाथ असफल होता है और अपनी पत्नी के गोद में सर रख कर ज़ार ज़ार रो कर कहता है - मैं बूढ़ा हो गया अब। और पत्नी उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहती है - अब ये सब करने की हमारी उमर नहीं रही।
सवाल उठता है - बुढ़ापा क्या है ? ये यूं अचानक तो नहीं आता? परिस्थितिवश अक्षमता !

सीन - 3
या कि, या कि करते कलाकार और जवाब देता रघुनाथ

कि 'शरीफ' इंसान का मतलब है निरर्थक आदमी; भले आदमी का मतलब है 'कायर' आदमी। जब कोई आपको 'विद्वान' कहे तो उसका अर्थ 'मूर्ख' समझिए, और जब कोई 'सम्मानित' कहे तो 'दयनीय' समझिए।

उन्हें हर जगह यही कहा गया और उनका कोई काम नहीं किया गया! उन्हें हर जगह 'हट-हट' और 'दुर-दुर' किया गया। वे उस 'बकरी' या 'गाय' की तरह हैं जो सिर्फ 'में-में' या 'बाँ-बाँ कर सकती है, मार नहीं सकती! यही उनकी छवि है सबके आगे - मिमियाने घिघियानेवाले मास्टर की। यह उनकी छवि नहीं है - यही हैं वे।


सीन - 4

मंच पर गोले में एक रोशनी उतरती है। रघुनाथ अपने दोनों बच्चों से ज़मीन के बारे में फैसला लेने के लिए फोन करता है। एक असरदार प्रयोग के तहत दिखाया जाता है कि रघुनाथ घुटनों के बल बैठा है उसके ठीक पीछे उसका छोटा बेटा खड़ा है, उसके पीछे बड़ा बेटा खड़ा है। ये वे पीढ़ी है जो अपनी ज़मीन के लिए लड़ना नहीं जानती। उसे बेच कर फ्लैट में शिफ्ट हो जाना चाहती है। अनुमान के मुताबिक रघुनाथ को दोनों बेटे ज़मीन बेच डालने की सलाह देते हैं। प्रत्युत्तर में रघुनाथ के आवाज़ में बेबसी साफ झलकती है लेकिन उससे भी ज्यादा झलकता है बड़े बेटे के पीछे मंच के पर्दे पर असामान्य रूप से बेहद काली उन व्यक्तित्वों की काली परछाई जिसके आगे कई रघुनाथें घुटनों के बल आज बैठ गए हैं।

कुछ और भी प्रयोग अच्छे थे मसलन दो आदमी के फोन पर बात करने में एक तीसरे आदमी का स्टेज के बीचों बीच खड़े होकर दोनों ओर बांहें फैलाकर हाथ से फोन का संकेत बनाना।

रघुनाथ के किरदार में मुकेश भाटी ने बेहतरीन काम किया। एक सत्चरित्र मास्टर और विनम्रता और सादगी लिए अपने परिवार को समाज को समर्पित आदमी। कदम कदम पर वक्त और रिश्तों की दुलत्ती खाता जिसे इस भावना को अपने रोम रोम में समाया था कि अपनों के बिना अपना क्या होता है। प्रिंसिपल के रूप में शाहनवाज खान महज एक ही सीन में छा से गए। एक ताबेदार आदमी जब अपने ही घर में किसी को अपमानित करता है तो लोगों के नाम पर अपनी सारी कुंठा अपनी लानतों के रूप में आवाज़ के उतार चढ़ाव से बखूबी उभारा। इसके अलावा अन्य किरदार केंद्र में न होने के कारण साथी कलाकार ही थे जो औसत या उससे कम ही रहे। रोमांस के अंतरंग पलों को सोनल का पात्र निभाने वाली रीना सैनी ने अपने प्रदर्शन से उत्तेजना जगाई। देवेन्द्र राज अंकुर ने उपन्यास का कुशलता से निर्देशन किया है.


आँगन और लान बड़े-बड़े ओलों और बर्फ के पत्थरों से पट गये और बारजे की रेलिंग टूट कर दूर जा गिरी-धड़ाम ! उसके बाद जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो वह पानी की बूँदें नहीं थीं-जैसे पानी की रस्सियाँ हो जिन्हें पकड़ कोई चाहे तो वहाँ तक चला जाय जहाँ से ये छोड़ी या गिराई जा रही हों। बादल लगातार गड़गड़ा रहे थे- दूर नहीं, सिर के ऊपर जैसे बिजली तड़क रही थी; दूर नही, खिड़कियों से अन्दर आँखों में।

इकहत्तर साल के बूँढे रघुनाथ भौंचक ! यह अचानक क्या हो गया ? क्या हो रहा है ?
उन्होंने चेहरे से बन्दरटोपी हटाई, बदन पर पड़ी रजाई अलग की और खिड़की के पास खड़े हो गए !
खिड़की के दोनों पल्ले गिटक के सहारे खुले थे और वे बाहर देख रहे थे।
घर के बाहर ही कदम्ब का विशाल पेड़ था लेकिन उसका पता नहीं चल रहा था- अँधेरे के कारण, घनघोर बारिश के कारण ! छत के डाउन पाइप से जलधारा गिर रही थी और उसका शोर अलग से सुनाई पड़ रहा था !

ऐसा मौसम और ऐसी बारिश और ऐसी हवा उन्होंने कब देखी थी ? दिमाग पर जोर देने से याद आया-साठ बासठ साल पहले ! वे स्कूल जाने लगे थे- गाँव से दो मील दूर ! मौसम खराब देख कर मास्टर ने समय से पहले ही छुट्टी दे दी थी। वे सभी बच्चों के साथ बगीचे में पहुँचे ही थे कि अंधड़, और बारिश और अंधेरा ! सबने आम के पेड़ों के तनों की आड़ लेनी चाही लेकिन तूफान ने उन्हें तिनके की तरह उड़ाया और बगीचे से बाहर धान के खम्भों में ले जाकर पटका ! किसी के बस्ते और किताब कापी का पता नहीं ! बारिश की बूँदें उनके बदन में गोली के छर्रों की तरह लग रही थीं और वे चीख चिल्ला रहे थे। अंधड़ थम जाने-के बाद-जब बारिश थोड़ी कम हुई तो गाँव से लोग लालटेन और चोरबत्ती लेकर निकले थे ढूँढ़ने !

यह एक हादसा था और हादसा न हो तो जिन्दगी क्या ?
और यह भी एक हादसा ही है कि बाहर ऐसा मौसम है और वे कमरे में हैं।
कितने दिन हो गये बारिश में भीगें ?
कितने दिन हो गए लू के थपेड़े खाए ?
कितने दिन हो गए जेठ के घाम में झुलसे ?
कितने दिन हो गये अंजोरियों रात में मटरगश्ती किए ?
कितने दिन हो गये ठंठ में ठिठुर कर दाँत किटकिटाए ?
क्या ये इस लिये होते है कि हम इनसे बच के रहे ? बच बचा के चले ? या इसलिये कि इन्हें भोगें, इन्हें जिएँ, इनसे दोस्ती करें, बतियाएँ, सिर माथे पर बिठाएँ ?
हम इनसे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये हमारे शत्रु है ! क्यों कर रहे है ऐसा ?
इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएगी ! वे चले जाएगे और इस धरती का वैभव, उसका ऐश्वर्य, इसका सौन्दर्य- ये बादल, ये धूप, पेड़ पौधे, ये फसलें, ये नदी नाले, कछार जंगल पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा ! वे यह सारा कुछ अपनी आँखों में बसा लेना चाहते है। जैसे वे भले चल जाएँ आँखें रह जाएगी; त्वचा पर हर चीज की थाप सोख लेना चाहते हैं जैसे त्वचा केचुल की तरह यहीं छूट जाएगी और उसका स्पर्श उन तक पहुँचाती रहेगी !

उन्हें लग रहा था कि बहुत दिन नहीं बचे है उनके जाने में ! मुमकिन है वह दिन कल ही हो, जब उनके लिए सूरज ही न उगे। लगेगा तो जरूर, लेकिन उसे दूसरे देखेंगे-वे नहीं ! क्या यह सम्भव नहीं है कि वे सूरज को बाँध कर अपने साथ ही लिए जाएँ – न रहे, न उगे, न कोई और देखे ! लेकिन एक सूरज समूची धरती तो नहीं, वे किस चीज को बाँधेगे और किस-किस को देखने से रोकेंगे ?
उनकी बाहे इतनी लम्बी क्यों नहीं हो जातीं कि वे उसमें सारी धरती समेट लें और मरें या जिएँ तो सबके साथ !
लेकिन एक मन और था रघुनाथ का जो उन्हें धिक्कारे जा रहा था- कल तक कहाँ था वह प्यार ? धरती से प्यार की ललक ? यह तपड़ ? कल भी यही धरती थी। ये ही बादल, आसमान, तारे, सूरज चाँद थे ! नदी, झरने सागर, जंगल, पहाड़ थे। ये ही गली, मकान, चौबारे थे ! कहाँ थी यह तड़प ? फुर्सत थी इन्हें देखने की ? आज जब मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पाँव में आ रही है तो बाहर जिन्दगी बुलाती हुई सुनाई पड़ रही है ?

सच-सच बताओं रघुनाथ, तुम्हें जो मिला है उसके बारे में कभी सोचा था कि एक छोटे से गाँव से लेकर अमेरिका तक फैल जाओगे ? चौके में पीढ़ा पर बैठ कर रोटी प्याज नमक खाने वाले तुम अशोक बिहार में बैठ कर लंच और डिनर करोगे ?


वैश्वीकरण के साइड इफैक्ट्स के तहत इन्हीं सवालों और चिंताओं के साथ यह नाटक खत्म होती है और बस में दस रूपए का टिकट लेकर लौटते हुए लगता है अरे यह तो हमारे घर की कहानी थी!

Monday, April 22, 2013

जलवायु नहीं, व्यवस्था बदलो


डाकिए की ओर से:    दिल की बात और माकूल मौजू। ह्यूगो शावेज फ्रियास के साम्राज्यवाद के खिलाफ संदेश की तरह इसे भी टाइप करके लगाता लेकिन थोड़ी देर हो जाती। संयोग से आज पृथ्वी दिवस के मौके पर यह सन्देश इन्टरनेट पर मिल गया। शावेज के इस संदेश को पढ़ें तो लगता है कि कई बार समस्या वहां नहीं होती जहां दिखती है। यह दोगलापन ही है कि हमारे देश में आतंकवाद लाल आतंकवाद। तुम्हारे देश में आतंकवाद पीला आतंकवाद। और अगर अपने हित में है तो वहीं का पीला आतंकवाद हमारे लिए हरा आतंकवाद। बहरहाल..... बात जलवायु की हो रही है। ज़रा शावेज से जानते हैं दुनिया की हकीकत। तिरछी स्पेलिंग का तहे दिल से धन्यवाद। सुंदर अनुवाद के लिए संदीप सिंह सहित अप्रैल अंक, 13 के समकालीन जनमत का भी धन्यवाद।

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अध्यक्ष महोदय, देवियों और सज्जनों, राष्ट्राध्यक्षों और दोस्तों, मैं वादा करता हूं कि उतना लंबा नहीं बोलूंगा जितना कि आज दोपहर यहां बहुत सारे लोग बोले हैं। ब्राजील, चीन, भारत और बोलीविया के प्रतिनिधियों ने यहां अपना पक्ष रखते हुए जो कहा है, मैं भी अपनी बात की शुरूआत वहीं से करना चाहता हूं। मैं उनके साथ ही बोलना चाहता था, पर शायद तब यह संभव नहीं था। बोलीविया के प्रतिनिधि ने यह बात रखी, इसके लिए मैं बोलीविया के राष्ट्रपति कॉमरेड इवो मोरालेस को सलाम करता हूं। तमाम बातों के बीच उन्होंने कहा कि जो दस्तावेज यहां रखा गया है, वह न तो बराबरी पर आधारित है और न ही लोकतंत्र पर।

इससे पहले के सत्र में जब अध्यक्ष यह कह ही रहे थे कि एक दस्तावेज यहां पेश किया जा चुका है, तब बमुश्किल मैं यहां पहुचा ही था। मैंने उस दस्तावेज की मांग भी की, पर वह अभी भी हमारे पास नहीं है। मुझे लगता है कि यहां उस ‘टॉप सीक्रेट’ दस्तावेज के बारे में कोई भी कुछ नहीं जानता है। यहां बराबरी और लोकतंत्र जैसा कुछ भी नहीं है, जैसा कि बोलीवियन कॉमरेड ने कहा था। पर दोस्तों, क्या यह हमारे समय और समाज की एक सच्चाई नहीं है? क्या हम एक लोकतांत्रिक दुनिया में रह रहे हैं? क्या यह दुनिया सबकी और सबके लिए है? क्या हम दुनिया के वर्तमान तंत्र से बराबरी या लोकतंत्र जैसी किसी भी चीज की उम्मीद कर सकते हैं? सच्चाई यह है कि इस दुनिया में, इस ग्रह में हम एक साम्राज्यवादी तानाशाही के अंदर जी रहे हैं। और इसीलिए हम इसकी निंदा करते हैं। साम्राज्यवादी तानाशाही मुर्दाबाद! लोकतंत्र और समानता जिंदाबाद!

और यह जो भेदभाव हम देख रहे हैं, यह उसी का प्रतिबिंब है। यहां कुछ देश हैं, जो खुद को हम दक्षिण के देशों से, हम तीसरी दुनिया के देशों से, अविकसित देशों से श्रेष्ठ और उच्च मानते हैं। अपने महान दोस्त एडवर्डो गेलियानो के शब्दों में कहूं तो ‘हम कुचले हुए देश हैं, जैसे कि इतिहास में कोई ट्रेन हमारे ऊपर से दौड़ गई हो’। इस आलोक में यह कोई बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि दुनिया में बराबरी और लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। और इसीलिए आज फिर से हम साम्राज्यवादी तानाशाही से दो-चार हैं। अपना विरोध दर्ज कराने के लिए अभी दो नौजवान यहां खड़े हो गए थे, सुरक्षा अधिकारियों की सावधानी से मामला सुलझ गया। पर क्या आपको पता है कि बाहर ऐसे बहुत सारे लोग हैं। सच यह है कि उनकी संख्या इस सभागार की क्षमता से बहुत-बहुत ज्यादा है। मैंने अखबार में पढ़ा है कि कोपेनहेगन की सड़कों पर कुछ गिरफ्तारियां हुईं हैं, और कुछ उग्र प्रतिरोध भी दर्ज कराये गए हैं। मैं उन सारे लोगों को, जिनमें से अधिकांश युवा हैं, सलाम करता हूं।

सच यह है कि ये नौजवान लोग आने वाले कल के लिए, इस दुनिया के भविष्य के लिए हमसे कहीं ज्यादा परेशान और चिंतित हैं, और यह सही भी है। इस सभागार में मौजूद हम में से अधिकांश लोग जिंदगी की ढलान पर हैं, जबकि इन नौजवान लोगों को ही आने वाले कल का मुकाबला करना है। इसलिए उनका परेशान होना लाजिमी है।

अध्यक्ष महोदय, महान कार्ल माक्र्स के शब्दों का सहारा लेकर कहूं तो एक भूत कोपेनहेगन को आतंकित कर रहा है। वह भूत को कोपेनहेगन की गलियों को आतंकित कर रहा है और मुझे लगता है कि वह चुपचाप इस कमरे में हमारे चारों तरफ भी टहल रहा है, इस बड़े से हॉल में, हमारे नीचे और आसपास; यह एक भयानक और डरावना भूत है और लगभग कोई भी इसका जिक्र नहीं करना चाहता। यह भूत, जिसका जिक्र कोई भी नहीं करना चाहता, पूंजीवाद का भूत है।

बाहर लोग चीख रहे हैं कि यह भूत पूंजीवाद ही है, कृपया उन्हें सुनिए। बाहर सड़कों पर नौजवान लड़कों और लड़कियों ने जो नारे लिख रखे हैं, उनमें से कुछ को मैंने पढा है। इन्हीं में से कुछ को मैंने अपनी जवानी में भी सुना था। पर इनमें से दो नारों का जिक्र मुझे जरूरी लग रहा है, आप भी उन्हें सुन सकते हैं- पहला, ‘जलवायु को नहीं, व्यवस्था को बदलो (डोंट चेंज द क्लाइमेट, चेंज द सिस्टम)।

इसलिए मैं इसे हम सबके लिए चुनौती के तौर पर लेता हूं। हम सबको सिर्फ जलवायु बदलने के लिए नहीं, बल्कि इस व्यवस्था को, इस पूंजी के तंत्र को बदलने के लिए प्रतिबद्ध होना है। और इस तरह हम इस दुनिया को, इस ग्रह को बचाने की शुरूआत भी कर सकेंगे। पूंजीवादी एक विनाशकारी विकास का मॉडेल है, जो जीवन के अस्तित्व के लिए ही खतरा है। यह संपूर्ण मानव जाति को ही पूरी तरह खत्म करने पर आमादा है।

दूसरा नारा भी बदलाव की बात करता है। यह नारा बहुत कुछ उस बैंकिंग संकट की ओर संकेत करता है, जिसने हाल ही में पूरी दुनिया को आक्रांत कर रखा था। यह नारा इस बात का भी प्रतिबिंब है कि उत्तर के अमीर देशों ने किस हद तक जाकर बड़े बैंकों और बैंकरों की मदद की थी। बैंकों को बचाने के लिए अकेले अमेरिका ने जो मदद की थी, मैं उसके आंकड़े भूल रहा हूं, पर वह जादुई आंकड़े थे। वहां सड़क पर नौजवान लड़के और लड़कियां कह रहे हैं कि जलवायु एक बैंक होती तो इसे जाने कब का बचा लिया गया होता (इफ द क्लाइमेट वॅर अ बैंक, इट वुड हेव वीन सेव्ड ऑलरेडी)।

और मुझे लगता है कि यह सच है। अगर जलवायु दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में से एक होती तो अमीर सरकारों द्वारा इसे अब तक बचा लिया गया होता।

मुझे लगता है कि ओबामा अभी यहां नहीं पहुचे हैं। जिस दिन उन्होंने अफगानिस्तान में निर्दोष नागरिकों को मारने के लिए 30 हजार सैनिकों को भेजा, लगभग उसी दिन उन्हें शांति के लिए नोबल पुरस्कार भी मिला। और अब संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति शांति के नोबल पुरस्कार के साथ यहां शामिल होने आ रहे हैं। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका के पास पैसा और डॉलर बनाने की मशीन है और उसे लगता है कि उसने बैंकों और इस पूंजीवादी तंत्र को बचा लिया है।

वास्तव में यही वह टिप्पणी थी जो मैं पहले करना चाहता था। हम ब्राजील, भारत, चीन और बोलीविया के दिलचस्प पक्ष का समर्थन करने के लिए अपना हाथ उठा रहे थे। वेनेजुएला और बोलिवर गठबंधन के देश इस पक्ष का मजबूती से समर्थन करते हैं। पर क्योंकि उन्होंने हमें वहां बोलने नहीं दिया, इसलिए अध्यक्ष महोदय, कृपया इसको मिनट्स में न जोड़ा जाए।

मुझे फ्रेंच लेखक हर्वे कैंफ से मिलने का सौभाग्य मिला है। उनकी एक पुस्तक है- ‘हाउ द रिच आर डेस्ट्राॅइंग न प्लेनेट’, मैं यहां पर उस पुस्तक की अनुशंसा करना चाहता हूं। यह किताब स्पेनी और फ्रेंच भाषा में उपलब्ध है। और निश्चय ही अंग्रेजी में भी उपलब्ध होगी। ईसा मसीह ने कहा है कि एक ऊंट का तो सुई के छेद में से निकल जाना आसान है, पर एक अमीर आदमी का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाना मुश्किल है। यह ईसा मसीह ने कहा है।

ये अमीर लोग इस दुनिया को, इस ग्रह को नष्ट कर रहे हैं। क्या उन्हें लगता है कि वे इसे नष्ट कर कहीं और जा सकते हैं? क्या उनके पास किसी और ग्रह पर जाने और बसने की योजना है? अभी तक तो क्षितिज में दूर-दूर तक इसकी कोई संभावना नजर नहीं आती। यह किताब मुझे हाल ही में इग्नेशियो रेमोनेट से मिली है, जो शायद इस सभागार में ही कहीं मौजूद हैं। ‘प्रस्तावना’ की समाप्ति पर क्रैम्फ एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कहते हैं, मैं उसे यहां पढ रहा हूं- ‘‘इस दुनिया में पाये जाने वाले संसाधनों के उपभोग में हम तब तक कमी नहीं ला सकते जब तक हम शक्तिशाली कहे जाने वाले लोगों को कुछ कदम नीचे आने के लिए मजबूर नहीं करते और जब तक हम यहां फैली हुई असमानता का मुकाबला नहीं करते। इसलिए ऐसे समय में, जब हमें सचेत होने की जरूरत है, हमें ‘थिंक ग्लोबली एण्ड ऐक्ट लोकली’ के उपयोगी पर्यावरणीय सिद्धांत में यह जोड़ने की जरूरत है कि ‘कंज्यूम लेस एण्ड शेयर बेटर’।’’

मुझे लगता है कि यह एक बेहतर सलाह है जो फ्रेंच लेखक हर्वे कैंफ हमें देते हैं।

अध्यक्ष महोदय, इसमें कोई संदेह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन इस शताब्दी की सबसे विध्वंसक पर्यावरणीय समस्या है। बाढ, सूखा, भयंकर तूफान, हरीकेन, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्रों के जलस्तर और अम्लीयता में वृद्धि, और गरम हवाएं- ये सभी उस वैश्विक संकट को और तेज कर रहे हैं, जो हमें चारों तरफ से घेरे हुए है। वर्तमान में इंसानों के जो क्रियाकलाप हैं, उन्होंने इस ग्रह में जीवन के लिए और स्वयं इस ग्रह के अस्तित्व के लिए एक खतरा पैदा कर दिया है। लेकिन इस योगदान में भी हम गैर-बराबरी के शिकार हैं।

मैं याद दिलाना चाहता हूं कि पचास करोड़ लोग, जो इस दुनिया की जनसंख्या का 7 प्रतिशत हैं, मात्र 7 प्रतिशत, वे पचास करोड़ लोग -7 प्रतिशत अमीर लोग- 50 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। जबकि इसके विपरीत 50 प्रतिशत गरीब लोग, मात्र और मात्र 7 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए जवाबदेह हैं।

इसलिए संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन से एक ही जवाबदेही और जिम्मेदारी की अपेक्षा करना मुझे आश्चर्य में डाल देता है। यूएसए जल्द ही 30 करोड़ की जनसंख्या के आंकड़े पर पहुंच जाएगा, वहीं चीन की जनसंख्या लगभग यूएसए से पांच गुनी है। यूएसए दो करोड़ बैरल रोज के हिसाब से तेल की खपत करता है, जबकि चीन की खपत 50 से 60 लाख बैरल प्रतिदिन की है। इसलिए आप संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन को एक ही तराजू पर नहीं तौल सकते।

यहां पर बात करने के लिए बहुत सारे मुद्दें हैं, और मैं उम्मीद करता हूं कि राज्यों और सरकारों के प्रतिनिधि हम सब लोग इन मुद्दों और इनसे जुड़ी सच्चाइयों पर बात करने के लिए बैठ सकेंगे।

अध्यक्ष महोदय, आज इस ग्रह का 60 प्रतिशत पारिस्थितिकी तंत्र क्षतिग्रस्त हो चुका है, भूमि के ऊपरी धरातल का 20 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका है। हम जंगलों के खत्म होते जाने, भूमि परिवर्तन, रेगिस्तानों के बढते जाने, शुद्ध पेयजल की उपलब्धता में गिरावट, समुद्री संसाधनों के अत्यधिक उपभोग, जैव विविधता में कमी और प्रदूषण में बढोतरी- इन सबके संवेदनहीन गवाह रहे हैं। हम भूमि की पुनरुत्पादन क्षमता से भी 30 प्रतिशत आगे बढकर उसका उपभोग कर रहे हैं। हमारा ग्रह अपनी वह क्षमता खोता जा रहा है जिसे तकनीकी भाषा में ‘स्वयं के नियमन की क्षमता’ कहा जाता है। रोज हम उतने अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन कर रहे हैं जिन्हें फिर से नवीनीकृत करने की क्षमता हम में नहीं है। पूरी मानवता को एक ही समस्या आक्रांत किये हुए है और वह है मानव जाति के अस्तित्व की समस्या। इतना अपरिहार्य होने के बावजूद ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ के अंतर्गत दूसरी बार प्रतिबद्धता जताने में भी हमें दो साल लग गए। और आज जब हम इस आयोजन में शिरकत कर रहे हैं, तो भी हमारे पास कोई वास्तविक और सार्थक समझौता नहीं है।

सच्चाई यह है कि आश्चर्यजनक रूप से और एकाएक जो दस्तावेज हमारे सामने पेश हुआ है, हम उसे स्वीकार नहीं करेंगे। यह हम वेनेजुएला, बोलिवर गठबंधन और अल्बा (ए.एल.बी.ए.) देशों की तरफ से कह रहे हैं। हमने पहले भी कहा था कि ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ और कन्वेंशन के वर्किंग ग्रुप से बाहर के किसी भी मसौदे को हम स्वीकार नहीं करेंगे। क्योंकि उनसे जुड़े मसौदे और दस्तावेज ही वैध और जायज हैं, जिन पर हम इतने सालों से इतनी गहराई से बात करते आ रहे हैं।

और अब, जब पिछले कुछ घंटों से न आप सोये हैं और न ही आपने कुछ खाया है, यह ठीक नहीं होगा कि मैं, आपके अनुसार, इन्हीं पुरानी चीजों में से किसी दस्तावेज को आपके सामने पेश करूं। प्रदूषण फैलाने वाली गैसों के उत्सर्जन में कमी का लक्ष्य वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है, पर आज मुझे ऐसा लग रहा है कि इस लक्ष्य को पाने और दूरगामी सहयोग के महारे प्रयास असफल हो गए हैं। कम से कम हाल फिलहाल तो ऐसा ही है।

इसका कारण क्या है? मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि इसका कारण इस ग्रह के सबसे शक्तिशाली देशों का गैर जिम्मेदाराना व्यवहार और उनमें राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी का होना है। यहां पर किसी को अपमानित महसूस करने या नाराज होने की जरूरत नहीं है। महान जोस गेर्वासियो आर्तिगास के शब्दों में कहूं तो ‘‘जब मैं सच कहता हूं तो न मैं किसी को आघात पहुंचा रहा होता हूं और न ही किसी से डरता हूं’’। पर वास्तव में यहां अपने पदों को गैर जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल किया गया है, लोग अपनी बातों से पीछे हटे हैं, भेदभाव किया गया है, और समाधान के लिए एक अमीरपरस्त रवैया अपनाया गया है। यह रवैया ऐसी समस्या के साथ है जो हम सबकी साझी है, और जिसका समाधान हम सब मिलकर ही निकाल सकते हैं।

एक तरफ दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता और अमीर देश हैं; दूसरी तरफ हैं भूखे और गरीब लोग, जो बिमारियों और प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होने के लिए अभिशप्त हैं। राजनैतिक दकियानूसीपन और स्वार्थ ने पहले को दूसरे के प्रति असंवेदनशील बना दिया है। जिन दलों के बीच समझौता होना है, वे मौलिक रूप में ही असमान हैं। इसलिए अध्यक्ष महोदय, उत्सर्जन की जिम्मेदारी के आधार पर और आर्थिक, वित्तीय और तकनीकी दक्षता के आधार पर ऐसा नया और एकमात्र समझौता अनिवार्य हो गया है, जो ‘कन्वेंशन’ के सिद्धांतों के प्रति बिना शर्त सम्मान रखता हो।

विकसित देशों को अपने उत्सर्जन में वास्तविक कटौती के संदर्भ में बाध्यकारी, स्पष्ट और ठोस प्रतिबद्धता निर्धारित करनी चाहिए। साथ ही उन्हें गरीब देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने का उत्तरदायित्व भी अपने ऊपर लेना चाहिए ताकि वे गरीब देश जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी खतरों से बच सकें। ऐसे देशों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए जो सबसे कम विकसित हैं और जो द्वीपों के रूप में बसे हुए हैं।
अध्यक्ष महोदय, आज जलवायु परिवर्तन एकमात्र समस्या नहीं है जिसका ये मानवता सामना कर रही है। और भी कई अन्याय और उत्पीड़न हमें घेरे हुए हैं। ‘सहस्राब्दी लक्ष्यों’ और सभी तरह की आर्थिक शिखर बैठकों के बावजूद अमीर और गरीब के बीच की खाई बढती जा रही है। जैसा कि सेनेगल के राष्ट्रपति ने सच ही कहा कि इन सभी समझौतों और बैठकों में सिर्फ वादे किये जाते हैं, कभी न पूरे होने वाले वादे; और यह दुनिया विनाश की तरफ बढती रहती है।

इस दुनिया के 500 सबसे अमीर लोगों की आय सबसे गरीब 41 करोड़ 60 लाख लोगों से ज्यादा है। दुनिया की आबादी का 40 प्रतिशत गरीब भाग यानी 2.8 अरब लोग 2 डॉलर प्रतिदिन से कम में अपनी जिंदगी गुजर-बसर कर रहे हैं। और यह 40 प्रतिशत हिस्सा दुनिया की आया का पांच प्रतिशत ही कमा रहा है। हर साल 92 लाख बच्चे पांच साल की उम्र में पहुंचने से पहले ही मर जाते हैं और इनमें से 99.9 प्रतिशत मौतें गरीब देशों में होती हैं। नवजात बच्चों की मृत्युदर प्रति एक हजार में 47 है, जबकि अमीर देशों में यह दर प्रति हजार में 5 है। मनुष्यों के जीवन की प्रत्याशा 67 वर्ष है, कुछ अमीर देशों में यह प्रत्याशा 79 वर्ष है, जबकि कुछ गरीब देशों में यह मात्र 40 वर्ष ही है। इन सबके साथ ही साथ 1.1 अरब लोगों को पीने का पानी मयस्सर नहीं है, 2.6 अरब लोगों के पास स्वास्थ्य और स्वच्छता की सुविधाएं नहीं हैं। 80 करोड़ से अधिक लोग निरक्षर हैं और 1 अरब 2 करोड़ लोग भूखे हैं। ये है हमारी दुनिया की तस्वीर।

पर फिर सवाल यही है कि इसका कारण क्या है? आज जरूरत है इस कारण पर बात करने की; यह वक्त अपनी जिम्मेदारियों से भागने या समस्या को नजरंदाज करने का नहीं है। इस भयानक परिदृश्य का कारण निस्संदेह सिर्फ और सिर्फ एक हैः पूंजी का विनाशकारी उपापचयी तंत्र और इसका मूर्त रूप- पूंजीवाद।

यहां मैं मुक्ति के महान मीमांसक लियानार्डो बाॅफ का एक संक्षिप्त उद्धरण देना चाहता हूं। लियानार्डो बाॅफ, एक ब्राजीली, एक अमरीकी, इस विषय पर कहते हैं कि ‘‘इसका कारण क्या है? आह, इसका कारण वह सपना है जिसमें लोग खुशी या प्रसन्नता पाने के लिए अंतहीन उन्नति और भौतिक संसाधनों का संग्रह करना चाहते हैं, विज्ञान और तकनीक के माध्यम से इस पृथ्वी के समस्त संसाधनों का असीम शोषण करना चाहते हैं।’’ और यहीं पर वे चाल्र्स डार्विन और उनके ‘प्राकृतिक वरण’ को उद्धृत करते हैं, ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ को। पर हम जानते हैं कि सबसे शक्तिशाली व्यक्ति सबसे कमजोर की राख पर ही जिंदा रहता है। ज्यां जैक रूसो ने जो कहा था, वह हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि मजबूत और कमजोर के बीच में स्वतंत्रता ही दमित और उत्पीडि़त होती है। इसीलिए ‘साम्राज्य’ हमेशा स्वतंत्रता की बात करते हैं। उनके लिए यह स्वतंत्रता है दमन की, आक्रमण की, दूसरों को मारने की, दूसरों के उन्मूलन और उनके शोषण की। उनके लिए यही स्वतंत्रता है। रूसो बचाव के लिए एक मुहावरे का इस्तेमाल करते हैं- ‘‘मुक्त करता है तो केवल कानून और नियम’’।

यहां कुछ ऐसे देश हैं जो नहीं चाहते कि कोई भी दस्तावेज सामने आए। जाहिर तौर पर इसलिए कि वे कोई नियम या कानून नहीं चाहते, कोई मानक नहीं चाहते। ताकि इन कानूनों और मानकों के अभाव में वे अपना खेल जारी रख सकें- शोषण की स्वतंत्रता का खेल दूसरों को कुचलने की स्वतंत्रता का खेल। इसलिए हम सभी को यहां और सड़कों पर इस बात के लिए प्रयास करना चाहिए, इस बात के लिए दबाव बनाना चाहिए कि हम किसी न किसी प्रतिबद्धता पर एकमत हो सकें, कोई न कोई ऐसा दस्तावेज सामने आए जो धरती के सबसे शक्तिशाली देशों को भी मजबूर कर सके।

अध्यक्ष महोदय, लियानार्डो बाॅफ पूछते हैं कि… क्या आपमें से कोई उनसे मिला है? मैं नहीं जानता कि बाॅफ यहां आ सकते हैं या नहीं? हाल में मैं पेराग्वे में उनसे मिला था। हम हमेशा उनको पढते रहे हैं… क्या सीमित संसाधनों वाली धरती एक असीमित परियोजना को झेल सकती है? असीमित विकासः पूंजीवाद का ब्रह्मवाक्य है, एक विध्वंसक पैटर्न है और आज हम इसे झेल रहे हैं। आइए, इसका सामना करें। तब बाॅफ हमसे पूछते हैं कि हम कोपेनहेगन से क्या उम्मीद कर सकते हैं? कम से कम एक ईमानदार स्वीकारोक्ति कि हम इस व्यवस्था को जारी नहीं रखेंगे और एक सरल प्रस्ताव कि आओ इस ढर्रे को बदल दें। हमें यह करना होगा लेकिन बिना किसी झंझलाहट, बिना झूठ, बिना दोहरे प्रावधानों के। बिना किसी मनमाने दस्तावेजों के हम इस ढर्रे को बदलें। पूरी ईमानदारी से, सबके सामने और सच के साथ।

अध्यक्ष महोदय, हम वेनेजुएला की तरफ से पूछते हैं कि हम कब तक इस अन्याय और असमानता को जारी रखेंगे? कब तक हम मौजूदा वैश्विक अर्थ तंत्र और सर्वग्रासी बाजार व्यवस्था को बर्दाश्त करते जायेंगे? कब तक हम एचआईवी एड्स जैसी भयानक महामारियों के सामने पूरी मनुष्यता को बिलखने के लिए छोड़ देंगे? कब तक हम भूखे लोगों को खाना नहीं मिलने देंगे या उनके बच्चों को भूखों मरने देंगें? कब तक लाखों बच्चों की मौत उन बिमारियों के चलते बर्दाश्त करते रहेंगे, जिनका इलाज संभव है? आखिर कब तक हम दूसरे लोगों के संसाधनों पर ताकतवरों द्वारा कब्जा करने के लिए जारी सशस्त्र हमलों में लाखों लोगों को कत्ल होते हुए देखते रहेंगे?

इसलिए हमलों और युद्धों को बंद किया जाए। साम्राज्यों से, जो पूरी दुनिया को दबाने और शोषण करने में लगे हुए हैं, हम दुनिया के लोग चीखकर कहते हैं कि इन्हें बंद किया जाए। साम्राज्यवादी सैन्य हमले और सैन्य तख्तापलट अब और नहीं! आइए एक ज्यादा न्यायपूर्ण और समानतामूलक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था बनाएं, आइए गरीबी मिटा दें, आइए तुरंत इस विनाशकारी उत्सर्जन को रोक दें, आइए पर्यावरण के इस क्षरण को समाप्त करें और जलवायु परिवर्तन के भीषण दुष्परिणामों से इस धरती को बचावें। आइए, पूरी दुनिया को ज्यादा आजाद और एकताबद्ध करने के महान उद्देश्य के साथ खुद को जोड़ लें।

अध्यक्ष महोदय, लगभग दो शताब्दियों पहले महान सीमोन बोलिवर ने कहा था कि ‘अगर प्रकृति हमारा विरोध करती है तो हमें उससे लड़ना होगा और उसे अपनी सेवा में लाना होगा’। यह राष्ट्रों के मुक्तिदाता, आने वाली नस्लों की चेतना के अग्रदूत महान साइमन बोलिवर का कहना था। बोलिवेरियन वेनेजुएला से, जहां हमने लगभग 10 साल पहले आज जैसे ही एक दिन अपने इतिहास की भीषणतम जलवायु त्रासदी (वर्गास त्रासदी) का सामना किया था, उस वेनेजुएला से जहां क्रांति ने सबको न्याय देने का प्रयास किया है, हम कहना चाहते हैं कि ऐसा करना सिर्फ समाजवाद के रास्ते से संभव है।

समाजवाद, वह दूसरा भूत जिसकी कार्ल माक्र्स ने चर्चा की थी, जो यहां भी चला आया है, दरअसल यह तो उस पहले भूत का विरोधी है। समाजवाद यही दिशा है, इस ग्रह के विनाश को रोकने का यही रास्ता है। मुझे कोई शक नहीं है कि पूंजीवाद नर्क का रास्ता है, दुनिया की बर्बादी का रास्ता है। यह हम वेनेजुएला की तरफ से कह रहे हैं जो समाजवाद के कारण अमेरिकी साम्राज्य के कोप का सामना कर रहा है।

अल्बा के सदस्य देशों की तरफ से बोलिवेरियन गठबंधन की तरफ से हम आह्वान करते हैं, और मैं भी पूरे आदर के साथ अपनी अंतरात्मा से इस ग्रह के सभी लोगों का आह्वान करता हूं, हम सभी सरकारों और पृथ्वी के सभी लोगों से कहना चाहते हैं, साइमन बोलिवर का सहारा लेते हुए कि यदि पूंजीवाद का विनाशक चरित्र हमारा विरोध करता है, हम इसके विरुद्ध लडेंगे और इसे जीतेंगे; हम मनुष्यता के खत्म हो जाने तक इंतजार में नहीं बैठे रह सकते। इतिहास हमें एकताबद्ध होने के लिए और संघर्ष के लिए पुकार रहा है।

यदि पूंजीवाद विरोध करता है, हम इसके खिलाफ युद्ध के लिए प्रतिबद्ध हैं, और यह युद्ध मानव जाति की मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करेगा। यीशु, मुहम्मद, समानता, प्रेम, न्याय, मानवता- सच्ची और सबसे गहरी मानवता का झंडा उठाए हम लोगों को यह करना है। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो इस ब्रह्मण्ड की सबसे विलक्षण रचना, मनुष्य, का अंत हो जाएगा, मानव जाति विलुप्त हो जाएगी।

यह ग्रह करोड़ों वर्ष पुराना है, यह ग्रह करोड़ों वर्ष हमारे वजूद के बिना ही अस्तित्व में रहा है। स्पष्ट है यह अपने अस्तित्वं के लिए हम पर निर्भर नहीं है। सारतः बिना धरती के हमारा अस्तित्व संभव नहीं है और हम इसी ‘धरती मां’ को नष्ट कर रहे हैं, जैसा इवो मोरेल्स कह रहे थे, जैसा दक्षिण अमेरिका से हमारे देशज भाई कहते हैं।

अंत में, अध्यक्ष महोदय, मेरे खत्म करने से पहले कृपया फिदेल कास्त्रो को सुनिए, जब वे कहते हैं: ‘एक प्रजाति खात्मे के कगार पर हैः मनुष्यता’।

रोजा लग्जमबर्ग को सुनिए जब वे कहती हैं: ‘समाजवाद या बर्बरतावाद’।

उद्धारक यीशु को सुनिए जब वे कहते हैं: ‘गरीब सौभाग्यशाली हैं क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है’।

अध्यक्ष महोदय, देवियों और सज्जनों, हम इस धरती को मनुष्यता का मकबरा बनने से रोक सकते हैं। आइए, इस धरती को स्वर्ग बनाएं। एक स्वर्ग जीवन के लिए, शांति के लिए, पूरी मनुष्यता की शांति और भाईचारे के लिए, मानव प्रजाति के लिए।

अध्यक्ष महोदय, देवियों और सज्जनों, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! दोपहर के भोजन का आनंद उठाइए।

----- 22 दिसंबर, 2009  को कोपेनहेगन में ‘जलवायु परिवर्तन’ पर ह्यूगो शावेज का सन्देश
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