Wednesday, April 13, 2011

अवध की सरज़मीं पर राम की जलवानुमाई है


रामनवमी के मुबारक मौके पर पेशे-खिदमत है नये और बेहतरीन शायर अजमल हुसैन ’माहक’ की यह नज़्म। राम के पैदा होने के जश्न को बयाँ करती नज़्म अवध की उस गंगा-जमुनी तहजीब के शजर की पैदाइश है जो वक्त और सियासत के तमाम थपेड़ों को सहते हुए भी उतना ही हरा-भरा और मजबूत है।




अवध की सरज़मीं पर “राम” की  जलवानुमाई है
हैं “लछमन” साथ में उनके, ये उनके प्यारे भाई हैं।

भरत औ  शत्रुघ्न से भी मुहब्बत है नहीं कमतर
ऐ चारो ही तो “दशरथ” की जनम भर की कमाई हैं।

है माँओं  को मुहब्बत  बेपनाह  अपने पियारे से
वो हैं लख्ते  जिगर, नूरे नज़र, सबके दुलारे से ।

कभी  गोदी में लेतीं  हैं, कभी  झूला झुलातीं  हैं
कभी चूमें  जबीं उनकी, कभी  सीने  लगातीं  हैं।

है प्यारा बचपना उनका,  बड़ी प्यारी सी सूरत है
लबों पर  मुस्कुराहट, शोख़ चेहरा, क्या ये  मूरत है।

सभी के लब पे है जुमला, बड़ा प्यारा है ये लल्ला
चिराग़े खानदाने-सूर्य है,  न्यारा है ये  लल्ला।

न पूंछो कुछ भी “दशरथ” की, मसर्रत का, है क्या आलम
उन्हे  लगता है,  जैसे पा गये हों  वो नया जीवन।

महल मे रंग बरसा है, अजब  मस्ती सी  छाई है
सभी खुश हैं, सभी ने आज, सब को दी बधाई  है ।


4 comments:

  1. वाह!
    क्या नज्म माहक की आपने पढ़ाई है
    दुआ है ढेर सारी हमारी भी बधाई है

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  2. नज़्म धीर गंभीर राम जी के बचपन के बेहद खूबसूरत शोख पक्ष को दिखाती है..

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  3. Dohe ko nazm ka roop dekar aapne mandir ko tajmahal kar diya...bahut hi khoobsoorat prayaas.badhyee.

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  4. बहुत सुन्दर!

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जाती सासें 'बीते' लम्हें
आती सासें 'यादें' बैरंग.

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