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Wednesday, September 8, 2010

उजाले उनकी यादों के - 3

मौलाना हसरत मुआनी
{Part-3 & Last}


मौलाना.... देखिए क्या-क्या कीन्स थे मौलाना में, मौलाना subtenant के बड़े कायल थे। सियासत में वो conservative नहीं थे- कि भई कांग्रेस में हैं तो कांग्रेस में रहे मुस्लिम लीग में हैं तो मुस्लिम लीग में रहें। जब कम्युनिस्ट पार्टी की पहली कोंफ्रेंस यानि  formation हुआ कम्यूनिस्ट पार्टी का तो मौलाना वो थे... चेयरमैन reception कमेटी के president थे कम्यूनिस्ट पार्टी की formation वाली conference में मौलाना- कांग्रेस में मौलाना रहे, मुस्लिम लीग में मौलाना रहे। कम्यूनिस्ट पार्टी में मौलाना रहे, सौबियत यूनियन के बहुत मुरीद रहे, सौबियट यूनियन पर बेइन्तहा अशार हैं सौवियत सौवियत सौवियत करते रहते थे। एक दफा उनको लखनऊ में FSU एक Friends of the Saubiyat Union अटैक हुआ हिटलर का सौबियट यूनियन पर तो active हो गई organization एक मीटींग एक conference की जिसमे जवाहर लाल, सरोजिनी नायडू भी आईं। मौलाना भी पहुंचे, उस जमाने में कम्यूनिस्ट पार्टी की लाईन हो गई थी कि हम सौबियट यूनियन पर अटैक हुआ इसलिए ये जंग जो है रूस की जंग हमारी जंग हो गई, हमको उस जंग को support करना चाहिए। पहले तो जंग के खिलाफ थे, तो ये कहते थे कि ये peoples war है तो peoples war को हमको support करना चाहिए। मौलाना के ये बात गले से उतरती नहीं थी कि मैं अंग्रेज के खिलाफ जंग कैसे खत्म कर सकता हूं, छोड़ सकता हूं, अंग्रेज कि खिलाफ लड़ाई लड़नी जरूरी है। कम्यूनिस्ट कहते थे कि अभी नहीं अभी हम रूस के ताहीत कर लें। तो खैर जवाहर लाल ने तकरीर की। सरोजिनी नायडू सदारत कर रहीं थी, उन्होंने तकरीर कि फिर मौलाना को दावत दी गई कि आप तशरीफ़ लाएं। मौलाना खड़े हुए, कहने लगे कि मझसे कहा जाता है कि ये peoples war है peoples war है अरे कहां, अरे साहब, एक भूत पीपल पर बैठा है, एक सर पर बैठा है पीपल के भूत को भगाऊं की सर के भूत को भगाऊं पहले। लफ़्ज़ों से बहुत खेलते थे, जब Crishp Mission आया यहां पर हिन्दुस्तानी आज़ादी के सिलसिले में बड़े सारे मिशन आते रहे न तो यह जो क्रिश्प मिशन था इसके नाम से एक मिशन शुरू हुआ. क्रिश्प मिशन, मौलाना बहुत हंसे, तकरीर करने हम लोगों ने बुलाया कि तक़रीर कीजिए, तक़रीर करने में बोले, I want show good leather and  good soal not crisp, reject, जब सन 1942 में गांधीजी ने Quit India mission शुरू किया तो कहने लगे कि मैंने कहा मौलाना अब तो आप खुश हैं कहने हां अब तो मैंने telegram आज गांधी जी का दे दिया है। क्या मौलाना, क्या गांधी को टेलीग्राम दे दिया है। कहने लगे कि मैंने लिख दिया है कि Congratulations your non-vilance and my vilance मीत.  दोनों में सुलह हो गई। तो मौलाना के पास जब पहुंचे साब तो उन्होंने हमारी दरखवास्त कबूल की- मौलाना के कोई एक दो शेयर तुम लोगों को सुना दें हम अपने एक तो हमने बताया- खैरत का नाम जुनू पड़ गया, जुनू का खैरत जो चाहे कहो हुस्ने करिश्ता साज़ कहे,  ऐ कै नजाम के हिन्द तुझको है दिल से आरज़ू, हिम्मते सरबलन्द है यास का इन्तजात कर मायूस मत होना। इसक खत्म कर दो- हिम्मते सरबलन्द है यास का इन्तजात़ कर- देखिए ये शेयर बड़ा दिलचस्प कहा है इन्होने- हक़ से बाउजरे मसलेहत, वक्त पे जो करे ग़ुरेज़ उसको न पेशवा समझ, उसपे न  ऐतमात कर- यानि ये मसल है कि वक्त में ऐसा है कि मुझे ऐसा करना चाहिए था, इसलिए मैं वहां जेल नही जा सका। जो वक्त पर इस किस्म के मसलेहत कि भई अब मसलेहत अब ऐसी नहीं है। इसलिए छोड़ दो इस तहरीक़ को, ब हक़ से उजरे मसलेहत, वक्त पर जो करे गु़रेज उसको न पेशवा समझ, उसपे न एतमात कर। इसी सलाबत तो character की, मौलाना की आजादी जो थी मौलाना की, सर न झुकाने की जो बात थी- ये बहुत ही लोगों को जाहिर है कि बहुत से लोगों को embrace भी करते थे लोगों को, लेकिन यही चीज़ थी जो मौलाना को इनको हमारे फैज़ अहमद फैज़ ने खराज-ए-अकिदद किया है। 

जैसे हमने बताया था कि मग़दूद मुइनुद्दीन के लिए उन्होंने दो गज़लें लिखी थीं वैसे ही इनके मौलाना के लिए भी, इन्हीं के बहर में, खैर फैज़ ने भी इनके पेश किया है इनके Tribute में, मौलाना के मिजाज में जो सलाबत्त थी जो लोहे की तरह की सख़्ती थी कि हठ नहीं सकते थे अपने लाईन से कभी उसने लोगों मुत्तासिर किया और फिर.... 


एक दिलचस्प वाकया और सुनाएं वहां हैदराबाद में एक Conference हुयी कि तरक्की पसन्द मुसन्नफीन की वहां हमारे दोस्त सिब्तेहसन ने और दूसरे लोगों ने एक resolution  पेश किया कि साहब ये फोहश अफसीन चीजें लिखते हैं और तरक्की पसन्द कहते हैं कि तरक्की पसन्द नहीं होते वो हम उसके तनकीत करते और और उसके मुखालिफत करते हैं ये नहीं होना चाहिए अदब में। उसकी मुखालिफ़त किसने की ? हमारे मौलाना ने, कहने लगे नाजु़क किस्म की चीजों पर बहुत रूहानी किस्म की चीजें इस किस्म की चीजें, को उन्होनें argument दिया कि ये बहुत जरूरी है अगर आप इस किस्म की चीजें निकाल देंगे तो शेयर ही नहीं रह जाएगा लेकिन क्या फायदा कहने से तो थोड़ी बहुत तो opportunity  फराहत होनी चाहिए लेकिन फोहश नहीं होता वो... बल्कि दिल को छू लेने वाला होता है। कानपुर ही वो मुकाम है जहां हम गिरफ्तार हुए उसकी वजह ये हुयी कि जवाहर लाल नेहरू गलिबन गिरफ्तार हुए थे कोई मौका था। 

हां मौलाना के कुछ अशार सुनाए थे न, और उनकी खिदमत में नज़रे पेश किया है, आज के शायर थे हमारे जमाने के जो बड़े शायर जो था फैज़ अहमद फैज़ उन्होंने मौलना की नज़रे अकीदत पेश किया है गज़ल में जो मौलाना की ही गज़ल पर गज़ल कही है उन्होंने। वो दो चार शेयर पढ़के सुनाता हूं। कि किस तरह से लोगों को मौलना ने मुत्तासिर किया था। फैज़ भी उनसे मुत्तासिर हुए हैं।
"मर जाएंगे ज़ालिम की हिमायत न करेंगे
एहराग कभी तरके रवायत न करेंगे 
क्या कुछ न मिलेगा है जो कभी तुझसे मिले थे
अब तेरे न मिलने की शिकायत न करेंगे।
शत बीत गई तो गुजर जाएगा दिन भी, 
हर लहजा जो गुजरी वो हिकायत न करेंगे, 
ये फ़करे दिले जार का, आज़ाना बहुत है, 
शाही न मांगेंगे विलायत न करेंगे। 
हम शेख न लीडर, न मुसाहिब, न सहाफी, 
जो खुद नहीं करते वो हिदायत न करेंगे"

... मौलाना हसरत मुआनी पर फैज़ का ट्रिब्यूट
*****

डाकिये की ओर से: : यह ऑडियो रेकॉर्डिंग को सुनकर लिखा गया है... उर्दू शब्दों की भरपूर गलतियाँ होंगी. तो मुआफी.... और अब फिल्म निकाह का ग़ुलाम अली साहब की आवाज़ में 'चुपके-चुपके रात दिन... " भी सुन आइये जिसे मौलाना हसरत मुआनी से लिखा है. 

वक़्त-ए-रुखसत अलविदा का लफ्ज़ कहने के लिए,
वो तीरे सूखे लबों का थरथराना याद है.

बेरुखी के साथ सुनना दर्द-ए-दिल की दास्ताँ 
और कलाई में तेरा वो कंगन घुमाना याद है.
(यह दोनों शेर ऑफ़ थे रिकॉर्ड हैं ) साथ बने रहने का शुक्रिया.

Friday, September 3, 2010

उजाले उनकी यादों के - 2

मौलाना हसरत मुआनी
{Part-2}

... तो मैं ये कह रहा था कि जब हम गिरफ्तार हो गए, हमारे लीडर लोग- और हमारे स्टूडेंट यूनियन के लोग भी गिरफ्तार हो गए। कांग्रेस के लोग गिरफ्तार हो गए, अब क्या करें। तो मैं पहुंचा मौलाना क्या परेड, एक महल्ला है हमारे कानपुर में। उसे कई गलियां गई हैं। एक गली में गए नीचे, चलते चलते मालूम है एक बहुत छोटा सा मामूली सा घर था। वहां जाके कुण्डी खटखटाई, गर्मी का ज़माना था, कुण्डी खोली गई, अन्दर से आए मौलाना बाहर आए। नंगे बदन, बहुत मैला सा एक पाजामा। और हाथ में पखिया झालते हुए निकले, पसीने में । मतलब ये था कि बिजली घर में नहीं थी। जी फरमाईये, मैंने अर्ज किया मौलाना ऐसा ऐसा है अच्छा ठहरिए, फिर अन्दर गए, कुर्ता पहना जो बहुत ही पुराना किस्म का मैला, सर पर टोपी रखी, वही मशहूर और महरूफ टोपी जिसमें इतना इतना मैल लग गया था और चलिए आईये मेरे साथ चलिए। चले साहब, रास्ते भर समझाते रहे मौलाना साहब, ऐसा है, वैसा है, जी बेहतर है मैं तैयार हूं लेकिन डायरेक्टर मुझे बनाना पड़ेगा, उस जमाने में कांग्रेस का एक कल्चर  निकला था कि जो शख्स इंचार्ज होता था उसे डायरेक्टर कहते थे, फिर वो उसकी बात मानी जाएगी क्योंकि सब जेल चले जाते थे तो एक आदमी कोई इचार्ज होता था फिर वो जेल चला जाता था फिर दूसरा आदमी इंचार्ज हो जाता था। तो इंचार्ज को डायरेक्टर कहते थे। कहने लगे जी बेहतर है लेकिन मुझे डायरेक्टर बनाएंगे तभी मैं काम करूंगा, वरना नहीं। एक तरकारी वाली जमींन पर फेलाए बैठा था तरकारी वाली सब्जी बेच रहा था, उसको इकन्नी दी, इकन्नी में चार पैसे होते थे। एक पैसे का ये दे दीजिए, एक पैसा का वो, एक पैसे का वो, तीन पैसे तो हो गए। चौथे पैसे में धेले कहिए, धेले का वो सब चीजें हुयीं। लीजिए, उसने तराजू में रखा लीजिए, इन्होंने कुर्ते का दामन आगे फैलाया, उसने कुर्ते के इनके दामन में तरकारी डाली, अरे रूंगन तो डाला ही नहीं तुमने, उसने थोड़ा धनिया लेकर और डाल दी। मौलाना उनका नीचे से पेट उनका नज़र आ रहा है वो इकमिनान से, उनको मालूम ही नहीं कोई नयी चीज़ हो रही है। वापस आ रहे हैं घर। 


     बेइन्तहा सादा मिजाज पसन्द इंसान, बेइन्तहा सादगी पसन्द इंसान- इस हद तक कि एक बार लखनऊ के स्टूडेंट यूनियन फेडरेशन वालों ने कहा कि भई हमारे यहं तकरीर करने के लिए procite करने के लिए, inaugurate करने के लिए मौलाना का भेज दो। मौलाना के दरखवास्त की मौलाना कहने लगे कि ठीक है मैं चला जाता हूं मुझे किराया दे दीजिए। एक रूपया दे दीजिए, एक रूपया दे दिया मौलाना को। वापस आए, तो एक आना मुझे वापस कर दिया। मैनें कहा मौलाना ये एक आना काहे का। कहने लगे हिसाब पूरा देख लीजिए जरा। यहां जब मैं घर गया तो स्टेशन तक एक आना। इसलिए इक्के पर आप जाएं तो इधर उधर बैठें तो दो आने पड़ते थे अगर आगे बैठें कोचवान के पास तो एक आना पड़ता था, तो मौलाना हमेशा आगे बैठते थे 13 आने का टिकट कानपुर से लखनऊ का- जी, वहां ख़लीक मिल गए मुझे, ख़लीक उल्ज़ामा जा रहे थे अपनी कार से तो उन्होंने कहा कि मैं आपको drop किए देता हूं। तो उन्होंने मुझे वहां उतार दिया कान्फ्रेंस जहां हो रही थी। कान्फ्रेंस में तकरीर की मैंने आपके एक दोस्त मुनीश सक्सेना साहब थे उन्होंने मुझे साईकिल के करियर पर बैठाया स्टेशन ले आए। वहां टिकट खरीद के मुझे दिया, लखनऊ कानपुर का वापस आ गया- घर पहुंचा एक आना और 15 आने हो गए। ये 16 आने एक आना, आपकी इकन्नी वापस। आदमी बहुत ही वो थे popular थे- आनी साथी की वजह से अपनी determination की वजह से constitution assembly  जो बनी हिन्दुस्तान की आजादी से पहले constitution बनाने के लिए उसके मैम्बर भी हो गए मौलाना select हुए। लेकिन वहां problem पैदा हो गई। इसीलिए कि एक तो ये कि cigar-ate areate  वालों ने उनसे कहा कि मौलाना ये किराया आपका और ये दस्तखत कर दीजिए तो उन्होंने देखा कि फर्स्ट क्लास के आने जाने का किराया रहने का डी.ए., कहने लगे कि मैं तो थर्ड क्लास में चलता हूं आपने फर्स्ट क्लास का किराया क्यों दिया ? दूसरी बात ये कि आपने डी.ए. क्या कर दिया मेरा, मैं तो यहां मिस्जद-ए-अब्दुनबी में ठहरता हूं। मैं कहीं ठहरता ही नहीं हूं, आपने मेरा मेरे नाम डी.ए. कैसे कर दिया ? अरे उन्होंने कहा, मौलाना, कहने लगे हमारे यहां एक उसूल है कि हम फर्स्ट क्लास का किराया देते हैं, मौलाना कहने लगे आपका उसूल गलत है। जिस क्लास में लोग चलते हैं उसी क्लास का किराया देना चाहिए मैं फर्स्ट क्लास क्या कभी सेकेण्ड क्लास में भी नहीं चलता। मैं तो थर्ड क्लास में चलता हूं। और ठहरता हूं मिस्जद में। गरज के झगड़ हुआ, लेकिन मौलाना ने लिया नहीं कहने लगे आप चोरी करना मुझे सिखाते हैं, मैं चोरी नहीं करूंगा। हार के बेचारों ने पता नहीं क्या क्या करके आखिर में थर्ड क्लास का किराया दे के रूख़सत किया। 

Constitution पर मौलाना ने दस्तखत नहीं किए। क्यों, इसलिए कि उसमें मजदूरों और किसानों की Government का कोई वो नहीं था कि हिन्दुस्तान में मजदूरों और किसानों की Government कायम होगी ये उसमें नहीं था तो मैंने उसमें दस्तख़त नहीं कर सकता।


(...ज़ारी)

Thursday, August 26, 2010

उजाले उनकी यादों के -1

मौलाना हसरत मुआनी
{Part-1}

तो हम पहुंचे मौलाना हसरत मुआनी के पास- अब मौलाना हसरत मुआनी कहते हुए, पता नहीं  हमारी नौजवान नस्ल वाले कभी नाम सुना भी होगा या नहीं मौलाना हसरत का। मौलाना हसरत मुआनी वो हैं शायर उर्दू के गज़ल गोशोनामे जिनकी अहमियत बहुत जियादा है। यानि इक़बाल के बाद जिन लोगों ने गज़लें वगैरह लिखी हैं, शायरी की है उनमें बहुत अहम नाम है मौलना हसरत मुआनी कि एक नया रंग, ग़ज़ल में, दिया है मौलाना ने। तो एक शायर की हैसियत से उनका रूतबा बहुत बुलन्द। लेकिन वो एक शायर से ज्यादा एक बहुत बड़े सियासतदां थे, सियासतदां का मतलब वो हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए जद्दोजेहद करना इमान समझते थे। अगर आप न करें जद्दोजेहद तो आपका इमान नहीं है। अजी हमेशा से बहुत दिलचस्प जिन्दगी रही उनकी, यहां पढ़ने आए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी- तो सुना है हुलिया ये था कि रंगीन पाजामा होता था और बगल में पानदान रखते थे। तो लड़कों ने उनका नाम रख दिया था ख़ाला जहान लेकिन उन कोई असर नहीं पड़ा उस वक्त। यहां हर साल एक नुमाईश लगती है, अलीगढ़ में। वहां एक 10 पैसे 12 पैसे की बांसुरी उन्होंने खरीद ली थी, बांसुरी से इश्क, हमेशा से ही... पता नहीं क्या था, वो बांसुरी बजाया करते थे अपना, अब लोग बोर हो रहे है, परेशान हो रहे हैं, कि हम पढ़ रहे हैं और ये आ गया है आदमी ये बांसुरी बजाता है। तो चले जाते थे। तो पखाने में बैठ जाते थे जब बजाना होता था। पखाने में पहुंच जाते थे तो वहां बजाया करते थे। लोगों ने कहा कि ये क्या ? अरे ये जो पंजाबी डग्गे जो हैं ये क्या जानें मौसिकी क्या होती है, बजाने नहीं देते तो मैं यहां आके बजा लेता हूं भई।  तो अलग टेढ़ी किस्म के आदमी थे। यहां मुशायरा किया मौलाना हसरत ने- बहुत कामयाब मुशायरा हुआ लेकिन उसमें ऐसे शायर भी थे जैसे रामपुर के एक शायर गए थे गुस्ताख, दिलचस्प शायर, अच्छे शायर, मज़ाहिया शेर कहते थे। किसी ने रिर्पोट की प्रिंसिपल मॉरीसन  अंग्रेज़ था। उसने रिर्पोट कर दी कि मौलाना ने मुशायरा किया कि बहुत अफसीन बहुत फ़ोहश किस्म के शेर बहुत पढ़े गए। उसने इनको बुलाया, क्या हुआ ? तो उसने कहा कुछ नहीं, कोई फोहश शेर नहीं पढ़ा गया। अच्छे शेयर पढ़े गए कुछ भी नहीं। कहने लगे कि नहीं... तुम लोगों के अखलाक़ तो हैं, तुम लोग समझते नहीं कि अखलाक़ क्या होता है। मौलाना ने तलब के जवाब दिया कि आपका अखलाक़ क्या अलग होगा। हमारा अखलाक़ अलग है, हम इसको बुरा नहीं समझते, आप बुरा समझा करें। उसने फौरन उनको.. कॉन्फ्रेंस की अपने लोगों की और इनको एक्सपेल कर दिया गया कि अच्छा इम्तिहान दे लीजिए लेकिन आपको एक्सपेल किया जाता है। तो ये एक्सपेल हो गए। 

उसी जमाने में एक इन्होंने एक पर्चा निकाला, उर्दू-ए-मौअल्ला सारी जिन्दगी भर निकालते रहे। पैसा जेब में एक नहीं, लेकिन पर्चा वो बहराल निकलता रहा। और उसी में सारी कार्यवाहियां इस किस्म की छपती रहीं। वो जहां भी गए, अलीगढ़ की जेल में खैर... जब जेल में थे तो मजबूरी थी, अलीगढ़ की जेल में बहुत रहे। इसी कारण कि agitation के सिलसिले में, गिरफ्तार हो जाते थे, और हमेशा सज़ा होती थी चक्की पीसने की। Regrisim Prison  तो उसमें चक्की पीसनी पड़ती थी बहुत से कैदी थे कुछ अपना... हिसाब-किताब करके कैदियों से कि तुम पीस दिया करो हमारे हिस्से का राशन फलाना फलाना.... मौलाना के साथ ये हो ही नहीं सकता था सारा... जितना गेहूं लाकर रखा गया, जितना चना लाकर रखा जाए सारा पीस डालते थे हाथों में गट्टे पड़ गए, खून बहने लगा कोई फर्क नहीं पड़ता मौलाना पीसते जाते थे। शेर कहा था इसी पर `है मशके शुकन जारी चक्की की मशक्कत भी- एक तुरफा तमाशा है हसरत की तबीयत भी` तो मौलाना तिलक के बड़े कायल थे। गांधी के खिलाफ तिलक, गांधी तो उस वक्त ज्यादा नहीं थे। दूसरे जो मॉडरेट  थे कांग्रेस के अन्दर थे उनके खिलाफ और तिलक extremis उनके हिमायत में बड़ी नज़में लिखी हैं तिलक की हिमायत में इन्होंने- मौलाना के एक चीज़ और थी वो दिलचस्प आदमी थे, इनमे कुछ, एक तो ये था कि हर साल बहुत ही मज़हबी आदमी थे, नमाज़ रोजे़ के पाबन्द, कादरिया सिलसिले के मुरीद, लेकिन ये इमान था उनका कि किसी के मज़हब को बुरा कहना और न ये समझना कि वो बुरा है अपना मजहब अपने साथ उसका मज़हब उसके साथ। सिर्फ यही नहीं बल्कि जितने और रिचुअल थे मसलन हज़ करने वो हर साल जाया करते थे। हर साल हज करके आ रहे हैं तो एक दफ़ा मैंने मौलाना से पूछा कि मौलाना ये एक दफा हज होता है दो दफ़ा हज होता है आप हर साल क्यों जाते हैं ? कहने लगे कि आपा समझते नहीं हैं, नाक से... मिनमिना के बोला करते थे बहुत पतली सी आवाज थी। आप समझे नहीं हैं ये एक इंटरनेश्नल गैदरिंग होती है। जिसमें तरह तरह के मसायल आते हैं और मैं अपनी बात कहता हूं। मैं अपनी बात समझाने की कोिशश करता हूं लोगों को- फिर वापस आते में या जाते में किसी हसीना को देख लेते थे तो उस पर शेर जरूर कहते थे कभी वो कबरिस की हसीना होती थी कभी इटली की हसीना होती थी- उसपे वो साफ साफ शेर... कबरिस की हसीना से जो मुलाकात हुयी तो हम कितना उनसे मुत्तासिर हुए मैं चुपके से उनके बालों को उनके प्यार कर लिया- फिर वो बच्चों की तरह चीजें मौलाना किया करते थे। एक खुसूसियत ये थी मौलाना की कि वो कृष्ण जी को नबी समझते थे और बड़े मौतकित्त थे- और अपना हज़, कहते थे मेरा हज मुक्कमिल नहीं होता जब तक मैं वापस आके मथुरा और वृन्दावन में सलाम न कर लूं। तो वहां से आके पहले पहुंचे थे मथुरा, वृन्दावन और वहां सलाम करते थे और फिर बेइन्तहा कतात और वहाईयां कृष्ण जी के बारे में उनकी मौजूद हैं। हसरत मुआनी की, उनका ये भी था, एक दिलचस्प करकत वो करते थे वो ये कि नमाज फौरन वो दो मिनट में खत्म कर देते थे। लोग कहते कि अभी हमने शुरू भी नहीं किया अभी अलहम पर पहुंचे हैं और तुम... नमाज भी खत्म हो गई तुम्हारी, वो कहते थे कि देखिए आप ख़त लिखते हैं तो बिसमिल्लाह पूरा लिखते हैं क्या करते हैं ? कहने लगे 786 लिखते हैं न आप। क्यों ? इसलिए कि आपने बिसमिल्लह इर्र रहमान रहीम को हुरूफ़ को बदल दिया अपने नम्बर्स में। यानि 786 में कहने का मतलब है कि बिसमिल्लाह इर्र रहमान ऐ रहीम। तो नमाज में जितनी सूरते हैं जितनी आयतें पढ़नी होती हैं सबके नम्बर उसके निकाल लिए हैं इसी हिसाब से और वो नम्बर पढ लेता हूं तो आयत हो जाती है पूरी तो नमाज होत जाती है मेरी। इस किस्म की चीजें मौलाना में बहुत ही कीन्स थे। 

(...जारी )
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