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Wednesday, August 22, 2012

पैकेज


डाकिए की ओर से: हाल ही में मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी से गुज़र रहा था और मन्नू की विनम्रता के आगे निहाल था। लेकिन मेरी समस्या दूसरी थी। उसमें जहां जहां उनके पति राजेन्द्र यादव की बुराईयां, झूठ और गलतियां सामने आ रही थी मुझे न जाने क्यों राजेन्द्र यादव के प्रति दिल में एक हमदर्दी पैदा होती जा रही थी। कुछ तो है उनमें खास ऐसा मुझे लगा और आगे चलकर यही मन्नू ने भी लिखा। दूसरों की जिंदगी में झांकने की बीमारी पैदाइशी लेकर आया हूं सो हर पेचीगदी और उलझी हुई चीज में माथा खपाना आदत हो गई है। यह वैसा ही है जैसा लव ट्रेंगल में आप रूचि लेते हैं। कई बार यह त्रिकोण जिंदगी और इसी परिस्थितियां बनाती हैं तो कई बार अपना स्वभाव और आदतें।

वैसे हिन्दी साहित्य में राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी एक मिसाल लगते हैं जहां राजेंद्र ने पूरा जीवन ही साहित्य को समर्पित किया वहीं मन्नू ने दोनों फ्रंट यानि परिवारिक जिम्मेदारी और लेखन कार्य दोनों मोर्चे पर जमकर लड़ीं। इन दोनों की जोड़ी डाकिए को इसलिए भी आकर्षित करती है क्योंकि दोनों ही ने लेखन में ईमानदारी का दामन थामे रखा। आश्चर्य यह भी होता है कि दोनों के पर्याप्त पाठकवर्ग होने के बावजूद इनके रिश्तों की खटास कागज़ पर भी सम्मानित तरीके से आई और मर्यादित तरीके से दोनों ने अपना पक्ष भी रखा। सार्वजनिक तौर पर भी एक दूसरे का सम्मान किया। इससे उनका यह जीवन भी साहित्य की एक अच्छी और स्वस्थ विधा में शामिल हो गई। इसे एक उपलब्धि भरी गर्वित लेखकीय यात्रा कह सकते हैं।

कहीं से बहुत ही अस्पष्ट छपाई में राजेन्द्र यादव लिखित मुड़ मुड़ के देखता हूं का एक टुकड़ा हाथ लगा। उसमें कई कंफेशन हैं और कई चिंताएं और सवाल भी जो डाकिए के उधेड़बुन से मेल खाती लगीं। आप जानते हैं सबसे अच्छी और प्रिय किताब वही होती है जो हमें वैसे ही मनःस्थिति से मेल खाती लगती है। हमें जानी हुई बात ही बताती है। सो आपसे बांट रहा हूं। भरी जुकाम में पढ़ी गई एक सीधी सपाट रीडिंग में कई विराम की गलतियां होंगी कई उतार चढ़ाव की सो अग्रिम क्षमा के साथ आपके समक्ष प्रस्तुत है :-



और अब मन्नू भंडारी की बीबीसी के साथ बातचीत के एक हिस्से को बीबीसी पर ही सुनी जा सकती है : यहाँ

Wednesday, May 9, 2012

कठघरे में आपा और मंटो

डाकिए की ओर से:   मौके पर सही साथ मिला है। हाल ही में इस्मत आपा की आत्मकथा कागज़ी है पैरहन का अंग्रेजी अनुवाद हुआ है। हाथी रूपी समाज के सूंड़ में लाल चींटी के रूप में घुसे मंटो और इस्मत एक ही पहलू के दो सिक्के थे। मंटो थोड़ा ज्यादा था। बकौल मंटो कुछ लोग मुझे प्रगतिशील कहते और जो नहीं कह पाते तो इस्मत चुगताई भी। मंटो ने इस्मत को भी बड़े अलहदा ढंग से याद किया है इस दिलचस्पी के साथ कि लोग हमारा नाम यों  जोड़ते हैं जैसे बंबई में राजकपूर और नरगिस। बहरहाल खत किसी के नाम लिखे लिखाए हों तो आलसी डाकिया छज्जे पर फेंकने भर से गुरेज नहीं करता। शुक्रिया हिन्दुस्तान समाचार पत्र का जिसने इस्मत चुगताई की आत्मकथा कागज़ी है पैरहन किताब के मार्फत इस्मत आपा की 'लिहाफ' और मंटो की 'बू' पर फहाशी का मुकदमा चला। पेश है वो तस्वीर जो मंटो अपने लक्ष्य को लेकर किस हद तक स्पष्ट था यह ज्ञात होता है। वैसे मेरे एक मित्र सुशील कुमार छौक्कड़ ने जब फेसबुक पर यह संदेश डाला कि "मंटो का सौवां जन्मदिन 11 मई को और कोई हलचल नहीं, अफसोस" तो कार्टूनिस्ट काजल कुमार ने सही लिखा कि "न वोट, न गुट तो मंटो कौन?"
*****

44 में दिसम्बर के महीने में सम्मन मिला कि हमें जनवरी में कोर्ट में हाजिर होना है। सब कह रहे थे जेल-वेल नहीं, बस जुर्माना हो जाएगा। और हम बड़े जोश से लाहौर के लिए गर्म कपड़े तैयार करवाने लगे।
सीमा बहुत छोटी और कमजोर थी और बड़ी ऊंची आवाज से रोती थी। चाइल्ड स्पेशलिस्ट को दिखाया तो उसने कहा, बिल्कुल तन्दुरुस्त है, यूं ही गुल मचाती है। उसे लाहौर की सर्दी में ले जाना ठीक न था। एकदम इतनी सर्दी न ङोल सकेगी। तो हमने बच्चाी को अलीगढ़, सुल्ताना जाफरी की अम्मा के पास छोड़ा और लाहौर रवाना हो गए। देहली से शाहिद अहमद देहलवी और वह कातिब जिन्होंने किताबत की थी, साथ हो गए थे, क्योंकि बादशाह सलामत ने उन्हें भी मुलजिम करार दिया था। यह मुकद्दमा अदबे-लतीफ पर नहीं, बल्कि उस किताब पर चला था, जो शाहिद अहमद देहलवी ने छापी थी। हमें सुल्ताना लेने आ गई। वह उन दिनों लाहौर रेडियो स्टेशन पर काम करती थी और लुकमान साहब के यहां रहती थी। उनकी बड़ी शानदार कोठी थी। बीवी-बच्चाे मैके गए हुए थे, इसलिए बस अपना ही राज था। मंटो भी पहुंच गए थे और पहुंचते ही हमारी खूब दावतें हुईं। ज्यादातर तो मंटों के दोस्त थे, मगर मुङो भी अजूबा जानवर समझकर देखने आ जाते थे। हमारी एक दिन पेशी हुई, कुछ भी न हुआ। बस जज ने नाम पूछा और यह कि मैंने यह कहानी लिखी है या नहीं। मैंने इकबाले-जुर्म किया कि लिखी है। बस। बड़ी ना-उम्मीदी हुई। सारे वक्त कुछ हमारे वकील साहब बोलते रहे। हम चूंकि आपस में खुसर-फुसर कर रहे थे, कुछ पल्ले नहीं पड़ा। उसके बाद दूसरी पेशी पड़ गई और हम आजाद होकर गुलर्छे उड़ाने लगे। मैं, मंटो, शाहिद तांगे में बैठकर खूब शॉपिंग करते फिरे। कश्मीरी दोशाले और जूते खरीदे। जूतों की दुकान पर मंटो के नाजुक सफेद पैर देखकर मुङो बड़ा रश्क आया। अपने भद्दे पैर को देखकर मोर की तरह मातम को जी चाहा।
‘मुङो अपने पैरों से घिन आती है,’ मंटो ने कहा।
‘क्यों? इतने खूबसूरत हैं।’ मैंने बहस की।
‘मेरे पैर बिल्कुल जनाने हैं।’
‘मगर जनानियों से तो इतनी दिलचस्पी है आपको!’
‘आप तो उल्टी बहस करती हैं। मैं औरत से मर्द की हैसियत से प्यार करता हूं। इसका मतलब यह तो नहीं कि खुद जनाना बन जाऊं।’
‘हटाइए भी जनाने और मर्दाने की बहस को, इनसानों की बात कीजिए। पता है नाजुक पैरोंवाले मर्द बड़े हिस्सास और जहीन होते हैं। मेरे भाई अजीम बेग चुगताई के पैर भी बड़े खूबसूरत हुआ करते थे। मगर..।’
.. लाहौर कितना खूबसूरत था! आज भी वैसा ही शादाब कहकहे लगाता हुआ, बाहें फैलाकर आनेवालों को समेट लेनेवाला। टूटकर चाहनेवाले बे-तकल्लुफ जिंदा-दिलों का शहर, पंजाब का दिल। तब मेरे दिल से बेसाख्ता शहंशाह बर्तानिया के हक में दुआइया कलमे निकलने लगे कि उन्होंने हम पर मुकदमा चलाकर लाहौर में ऐश करने का सुनहरा मौका दिया। हम दूसरी पेशी का बड़ी बेकरारी से इंतजार करने लगे। चाहे फांसी भी हो तो कोई परवा नहीं, अगर लाहौर में हुई तो यकीनन शहादत का रुतबा पाएंगे और लाहौरवाले बड़ी धूम से हमारे जनाजे उठाएंगे। दूसरी पेशी नवम्बर के खुशगवार मौसम में पड़ी, यानी 1946 ई. में। शाहिद अपनी फिल्म में उलङो हुए थे। सीमा की आया बहुत होशियार थी और अब सीमा बहुत मोटी-ताजी और तंदुरुस्त थी। इसलिए मैंने उसे बंबई में छोड़ा और खुद हवाई जहाज से देहली और वहां से शाहिद अहमद देहलवी और उनके कातिब के साथ रेल में गई। कातिब साहब से बड़ी शर्मिदगी होती थी, वह बेचारे मुफ्त में घसीट लिए गए। बड़े शामोश, मिस्कीन से थे। हमेशा आंखें झुकीं, चेहरे पर उकताहट, उन्हें देखकर एहसासे-जुर्म एकदम उभर जाता था। मेरी किताब की किताबत में फंस गए। मैंने उनसे पूछा- 
‘आपकी क्या राय है? क्या हम मुकद्दमा हार जाएंगे?’
‘मैं कुछ कह नहीं सकता, मैंने कहानी नहीं पढ़ी।’
‘मगर कातिब साहब, आपने किताबत की है।’
‘मैं अलफाज जुदा-जुदा देखता हूं और लिख देता हूं। उनके मानी पर गौर नहीं करता।’
‘कमाल है! और छपने के बाद भी नहीं पढ़ते?’
‘पढ़ता हूं, कहीं गलती तो नहीं रह गई।’
‘अलग-अलग अलफाज!’
‘जी हां!’ उन्होंने नदामत से सर झुका लिया। थोड़ी देर बाद बोले-
‘एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानेंगी!’
‘नहीं।’
‘आप कियां (के यहां) इमला की बहुत गलतियां होती हैं।’
‘हां, वो तो होती हैं। अस्ल में सीन, से और साद में गड़बड़ा जाती हूं। जो, जाद, जे, जाल में भी बहुत कनफ्यूजन होता है। यही हाल छोटी हे, बड़ी हे और दोचश्मी हे का है।’
‘आपने तख्तियां नहीं लिखीं?’
‘बहुत लिखीं। और मुस्तकिल इन्हीं गलतियों पर बहुत मार खाई मगर..।’
‘दरअस्ल जैसे मैं अलफाज पर ध्यान देता हूं, मानी की तरफ तवज्जह नहीं देता, इसी तरह आप अपनी बात कहने में ऐसी उतावली होती हैं कि हरूफ पर तवज्जह नहीं देतीं।’
‘ऊंह!’ अल्लाह कातिबों को जीता रखे, वो मेरी आबरू रख लेंगे। मैंने सोचा और टाल दिया।
.. पेशी के दिन हम कोर्ट में हाजिर हुए और वह गवाह पेश हुए जिन्हें यह साबित करना था कि मंटो की ‘बू’ और मेरा ‘लिहाफ फुहश’ हैं। मेरे वकील ने मुङो समझा दिया कि जब तक मुझसे बराहे-रास्त सवाल न किया जाए, मैं मुंह न खोलूं। वकील खुद जो मुनासिब समङोगा करेगा।
पहले ‘बू’ का नंबर आया।
‘ये कहानी फुहश है?’ - मंटो के वकील ने पूछा।
‘जी हां,’ गवाह बोला।
‘किस लफ्ज से आपको मालूम हुआ कि फुहश है?’
गवाह : ‘लफ्ज ‘छाती’।’
वकील : ‘माइ लॉर्ड, लफ्ज छाती फुहश नहीं है।’
जज : ‘दुरुस्त।’
वकील : ‘लफ्ज छाती फुहश नहीं है?’
गवाह : ‘नहीं, मगर यहां मुसन्निफ ने औरत के सीने को छाती कहा है।’
मंटो एकदम से खड़ा हो गया और बोला-
‘औरत के सीने को छाती न कहूं तो क्या मूंगफली कहूं?’
कोर्ट में कहकहा पड़ा। मंटो भी हंसने लगा। ‘अगर मुलजिम ने फिर इस किस्म का छिछोरा मजाक किया तो कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट के जुर्म में बाहर निकाल दिया जाएगा या माकूल सजा दी जाएगी।’ मंटो को उसके वकील ने चुपके-चुपके समझाया और वह समझ गया। बहस चलती रही और घूम-फिरके गवाहों को बस एक ‘छाती’ मिलता था जो फुहश साबित न हो पाता था। ‘लफ्ज छाती फुहश है, घुटना या कुहनी क्यों फुहश नहीं?’ मैंने मंटो से पूछा।
‘बकवास!’ मंटो भड़क उठा। बहस चलती रही। हम लोग उठकर बरामदे में डगर-डगर करती बेंचों पर जा बैठे। अहमद नदीम कासमी एक टोकरा माल्टे लाए थे। उन्होंने नफासत से माल्टे खाने की तरकीब बताई। माल्टे को आम की तरह पिलपिलाकर छोटा सा सुराख कर लो और मजे से चूसते रहो। टोकरा भर माल्टे हम बैठे-बैठे चूस गए। माल्टों से पेट भरने के बजाय और शिद्दत से भूख जाग उठी। लंच ब्रेक में किसी होटल पर धावा बोला दिया। सीमा की पैदाइश के सिलसिले में मैं बहुत बीमार रही थी, सारी चर्बी छट गई थी, गुरग्गन खानों का परहेज नहीं रहा था। मुर्गी इतनी कवी-हेकल थी कि बिल्कुल गिद्ध या चील के टुकड़े लग रहे थे। मोटी-मोटी, काली मिर्च छिड़ककर गर्म-गर्म कुल्चों के साथ और पानी की जगह कंधारी अनार का रस। बे-इख्तियार जी से मुकद्दमा चलानेवालों के लिए दुआ निकल रही थी।
 ..
कोर्ट में बड़ी भीड़ थी। कई असहाब हमें राय दे चुके थे कि हम मुआफी मांग लें। वो जुर्माना हमारी तरफ से अदा करने को तैयार थे। मुकद्दमा कुछ ठंडा पड़ता जा रहा था। ‘लिहाफ’ को फुहश साबित करनेवाले हमारे गवाह हमारे वकील की जिरह से कुछ बौखला से रहे थे। कहानी में कोई लफ्ज काबिले-गिरफ्त नहीं मिल रहा था। बड़े सोच-विचार के बाद एक साहब ने फरमाया कि ये जुमला ‘..आशिक जमा कर रही थीं,’ फुहश है।
‘कौन सा लफ्ज फुहश है? जमा या आशिक? वकील ने पूछा।’
‘लफ्ज आशिक!’ गवाह ने जरा तकल्लुफ से कहा।
‘माई लॉर्ड लफ्ज आशिक बड़े-बड़े शुअरा ने बड़ी फरावानी से इस्तेमाल किया है और नातों में इस्तेमाल किया गया है। इस लफ्ज को अल्लाहवालों ने बड़ा मुकद्दस मुकाम दिया है।’
‘मगर लड़कियों का आशिक जमा करना बड़ी मायूब बात है,’ गवाह ने फरमाया।
‘क्यों?’
‘इसलिए, क्योंकि..ये शरीफ लड़कियों के लिए मायूब बात है।’
‘जो लड़कियां शरीफ नहीं उनके लिए मायूब नहीं?’
‘अ..नहीं।’
‘मेरी मुवक्किल ने उन लड़कियों का जिक्र किया है जो शरीफ नहीं होंगी। क्यों साहब, बकौल आपके, गैर-शरीफ लड़कियां आशिक जमा करती हैं?’
‘जी हां।’
‘उनका जिक्र करना फुहाशी नहीं। मगर एक शरीफ खानदान की तालीमयाफ्ता औरत का उनके बारे में लिखना काबिले-मलामत है,’ गवाह साहब जोर से गरजे।
‘तो शौक से मलामत फरमाइए, मगर कानून की गिरफ्त के काबिल नहीं।’
मुआमला बिल्कुल फुसफुसा हो गया।
‘अगर आप लोग मुआफी मांग लें तो हम आपका सारा खर्चा भी देंगे और..’ एक साहब न जाने कौन थे, चुपके से मेरे पास आकर बोले।
‘क्यों मंटो साहब, मुआफी मांग लें! जो रुपए मिलेंगे, मजे से चीजें खरीदेंगे।’ मैंने मंटो से पूछा।
‘बकवास,’ मंटो ने अपनी मोरपंखी आंखें फैलाकर कहा।
‘मुङो अफसोस है, यह सरफिरा मंटो राजी नहीं।’
‘मगर आप! अगर आप ही..।’
‘नहीं, आप नहीं जानते। यह शख्स बड़ा फित्तीन है। बंबई में मेरा रहना दूभर कर देगा। इसके गुस्से से वह सजा बदजर्हा बेहतर होगी जो मुङो मिलनेवाली है।’ वह साहब उदास हो गए क्योंकि हमें सजा नहीं मिली। जज साहब ने मुङो कोर्ट के पीछे एक कमरे में तलब किया और बड़े तपाक से बोले, ‘मैंने आपकी कहानियां पढ़ी हैं और वो फुहश नहीं। और न ‘लिहाफ’ फुहश है। मगर मंटो की तहरीरों में बड़ी गलाजत भरी होती है।’
‘दुनिया में भी गलाजत भरी है,’ मैं मखनी आवाज में बोली।
‘तो क्या जरूरी है कि उसे उछाला जाए!’
‘उछालने से वह नजर आती है और सफाई की तरफ ध्यान जा सकता है।’
जज साहब हंस दिए।
न मुकदमा चलने से परेशानी हुई थी, न जीतने की खुशी हुई। बल्कि गम ही हुआ कि अब फिर लाहौर की सैर खुदा जाने कब नसीब होगी।

--------कागज़ी है पैरहन, इस्मत चुगताई

आभार : हिंदुस्तान

Friday, March 16, 2012

यह कौन नहीं चाहेगा...

डाकिए की ओर से: गलती हुई यह सोचालय पर पोस्ट हो गई। ग़लती का एहसास घंटे भर बाद हुआ। यह हमारी अनामत कब थी? कविता का ट्रीटमेंट अच्छा लगा था, ज्यादा तामझाम भी नहीं। बीच की धुन एक लय को पकड़ती हुई। शुक्रिया हमारे दफ्तर के स्क्रिट रायटर कपिल शर्मा का जिन्होंने यह उपलब्ध करवाई। कवि वीरेन डंगवाल हैं। प्रतिक्रिया कुछ नहीं कि कोरस में गाना अब अच्छा लगता है। गुलाल का शहर याद आता है। और झूम कर वो सीन याद आता है जब पीयूष मिश्रा हमारे दिल की बात बताते हुए सरफरोशी की तमन्ना को रीडिफाइंड करते हैं तो एक एक्सट्रा मग्न होकर ताली बजाता है। अपने कालखण्ड के दुख की जब लत आम जनता को लग जाए तो जश्न मनाना भी क्या अनुकूलन है ! 




Tuesday, November 1, 2011

पानी एक रोशनी है


डाकिए की ओर से: नहीं इसकी जरूरत नहीं थी लेकिन इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। नींद की दो गोलियां खा कर भी यदि गोधूलि बेला तक जागते रहें तो लानत है विज्ञान की तरक्की पर। ऐसे में केदारनाथ सिंह की कविताएं अच्छी हैं जो कंबल के बाहर निकलते और ठंडे होते पैर को गर्म करती हैं। बहुत बेचैनी में एक बेहतर कविता बहुत जिम्मेदारी से कंधे को कुव्वत देता हैं। तो आभार इसका कि जिसने अक्सर ही शरीर के अंदर विलुप्त होती कुछ प्रजाति को खोज निकाला है। 



*****

पानी एक रोशनी है

इन्तज़ार मत करो
जो कहना हो
कह डालो
क्योंकि हो सकता है 
फिर कहने का कोई अर्थ न रह जाए

सोचो 
जहां खड़े हो वहीं से सोचो
चाहे राख से ही शुरू करो
मगर सोचो

उस जगह की तलाश व्यर्थ है 
जहां पहंचकर यह दुनिया 
एक पोस्ते के फूल में बदल जाती है 

नदी सो रही है 
उसे सोने दो
उसके सोने से
दुनिया के होने का अन्दाज मिल रहा है 

पूछो 
चाहे जितनी बातर पूछना पड़े
चाहे पूछने में जितनी तकलीफ हो 
मगर पूछो
पूछो कि गाड़ी अभी कितनी लेट है !

पानी एक रोशनी है 
अंधेरे में यही एक बात है
जो तुम पूरे विश्वास के साथ
कह सकते हो दूसरे से। 

*****

मुक्ति 

मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिला
मैं लिखने बैठ गया हूं

मैं लिखना चाहता हूं ‘पेड़‘
यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है 
मैं लिखना चाहता हूं ‘पानी‘

‘आदमी‘ ‘आदमी‘ - मैं लिखना चाहता हूं 
एक बच्चे का हाथ 
एक स्त्री का चेहरा 

मैं पूरी ताकत के साथ 
शब्दों को फेंकना चाहता हूं आदमी की तरफ 
यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा
मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूं वह धमाका
जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है 

यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा
मैं लिखना चाहता हूं। 

साभार: केदारनाथ सिंह की प्रतिनिधि कविताएं।

Saturday, September 24, 2011

फादर फोरगेट्स


डाकिए की ओर से: पिता पुत्र का रिश्ता बड़ा गर्वीला होता है। पुरूषत्व की गंध उसी में से आती है। एक गीत है - प्यार के लिए चार पल कम नहीं थे, कभी हम नहीं थे कभी तुम नहीं थे। उपस्थित रहिए। हमेशा। क्योंकि मैं नहीं रहता, और जब जो नहीं रहता वो रहने का महत्व जानता है बस। ज़मीन की अहमियत और अर्थ फलस्तीन सऔर शरणार्थीयों से पूछिए। रोटी का मतलब भूखों से। और बेछत वालों से पूछिए छत का मतलब? यकीनन उसका जवाब ज्यादा मौलिक, सच और अनुभूतियों में डूबा मिलेगा।

*****

फादर फोरगेट्स उन छोटे लेखों में से एक है -- जो गहन अनुभूति के किसी क्षण में लिखे जाते हैं -- जो पाठकों के दिल को छू जाते हैं। यह लेख लगातार पुनर्प्रकाशित हो रहा है। यह लेख हज़ारों पत्रिकाओं और अखबारों में छप चुका है। इसे कई विदेशी भाषाओं में भी उतनी ही लोकप्रियता मिली है और उनमें भी यह लेख बहुत ज्यादा बार छपा है। हैरानी की बात है कि काॅलेज की पत्रिकाओं और हाई स्कूल की पत्रिकाओं में भी यह लेख छपा। कई बार एक छोटा सा लेख रहस्यमयी कारणों से क्लिक हो जाता है।

फादर फोरगेट्स

सुनो बेटे ! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं। तुम गहरी नींद में सो रहे हो। तुम्हारा नन्हा सा हाथ तुम्हारे नाजुक गाल के नीचे दबा है। और तुम्हारे पसीना-पसीना ललाट पर घुंघराले बाल बिखरे हुए हैं। मैं तुम्हारे कमरे में चुपके से दाखिल हुआ हूं, अकेला। अभी कुछ मिनट पहले जब मैं लायब्रेरी में अखबार पढ़ रहा था, तो मुझे बहुत पश्चाताप हुआ। इसीलिए तो आधी रात को मैं तुम्हारे पास खड़ा हूं, किसी अपराधी की तरह।

जिन बातों के बारे में मैं सोच रहा था, वह ये हैं बेटे। मैं आज तुम पर बहुत नाराज़ हुआ। जब तुम स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तब मैंने तुम्हें खूब डांटा... तुमने टाॅवेल के बज़ाय पर्दे से हाथ पोंछ लिए थे। तुम्हारे जूते गंदे थे, इस बात पर भी मैंने तुम्हें कोसा। तुमने फर्श पर इधर उधर चीजें फेंक रखी थी... इस पर मैंने तुम्हें भला बुरा कहा। 

नाश्ता करते वकत भी मैं तुम्हारी एक के बाद एक गलतियां निकालता रहा। तुमने डाइनिंग टेबल पर खाना बिखरा दिया था। खाते समय तुम्हारे मुंह से चपड़-चपड़ की आवाज़ आ रही थी। मेज़ पर तुमने कोहनियां भी टिका रखी थीं। तुमने ब्रेड पर बहुत सारा मख्खन भी चुपड़ लिया था। यही नहीं जब मैं आॅफिस जा रहा था और तुम खेलने जा रहे थे और तुमने मुड़कर हाथ हिलाकर बाय बाय, डैडी कहा था, तब भी मैंने भृकुटी तानकर टोका था, अपनी काॅलर ठीक करो।

शाम को भी मैंने यही सब किया। आॅफिस से लौटकर मैंने देखा कि तुम दोस्तों के साथ मिट्टी में खेल रहे थे। तुम्हारे कपड़े गंदे थे, तुम्हारे मोजों में छेद हो गए थे। मैं तुम्हें पकड़कर ले गया और तुम्हारे दोस्तों के सामने तुम्हें अपमानित किया । मोज़े महंगे हैं जब तुम्हें खरीदने पड़ेगे तब तुम्हें इनकी कीमत समझ में आएगी। ज़रा सोचो तो सही, एक पिता अपने बेटे का इससे ज्यादा दिल किस तरह दुखा सकता है ?

क्या तुम्हें याद है जब मैं लाइबे्ररी में पढ़ रहा था तब तुम रात को मेरे कमरे में आए थे, किसी सहमें हुए मृगछौने की तरह। तुम्हारी आंखें बता रही थीं कि तुम्हें कितनी चोट पहुंची है। और मैंने अखबार के ऊपर से देखते हुए पढ़ने में बाधा डालने के लिए तुम्हें झिड़क दिया था कभी तो चैन से रहने दिया करो। अब क्या बात है ? और तुम दरवाज़े पर ही ठिठक गए थे। 

तुमने कुछ नहीं कहा। तुम बस भागकर आए, मेरे गले में बांहें डालकर मुझे चूमा और गुडनाइट करके चले गए। तुम्हारी नन्ही बांहों की जकड़न बता रही थी कि तुम्हारे दिल में ईश्वर ने प्रेम का ऐसा फूल खिलाया था जो इतनी उपेक्षा के बाद भी नहीं मुरझाया। और फिर तुम सीढि़यों पर खट खट करके चढ़ गए। 

तो बेटे, इस घटना के कुछ ही देर बाद मेरे हाथों से अखबार छूट गया और मुझे बहुत ग्लानि हुई। यह क्या होता जा रहा है मुझे ? गलतियां ढूंढ़ने की, डांटने-डपटने की आदत सी पड़ती जा रही है मुझे। अपने बच्चे के बचपने का मैं यह पुरस्कार दे रहा हूं। ऐसा नहीं है बेटे, कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता, पर मैं एक बच्चे से जरूरत से ज्यादा उम्मीदें लगा बैठा था। मैं तुम्हारे व्यवहार को अपनी उम्र के तराजू पर तौल रहा था। 

तुम इतने प्यारे हो, इतने अच्छे और सच्चे। तुम्हारा नन्हा सा दिल इतना बड़ा है जैसे चैड़ी पहाडि़यों के पीछे से उगती सुबह। तुम्हारा बड़प्पन इसी बात से साबित होता है कि दिन भर डांटते रहने वाले पापा को भी तुम रात को गुडनाइट किस देने आए। आज की रात और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है, बेटे। मैं अंधेरे में तुम्हारे सिरहाने आया हूं और मैं यहां घुटने टिकाए बैठा हूं, शर्मिंदा। 

यह एक कमज़ोर पश्चाताप हैं। मैं जानता हूं कि अगर मैं तुम्हें जगाकर यह सब कहूंगा, तो शायद तुम नहीं समझोगे। पर कल से मैं सचमुच तुम्हारा प्यारा पापा बनकर दिखाऊंगा। मैं तुम्हारे साथ खेलूंगा, तुम्हारी मज़ेदार बातें मन लगाकर सुनूंगा, तुम्हारे साथ खुलकर हंसूंगा और तुम्हारी तकलीफों को बाॅंटूंगा। आगे से जब भी मैं तुम्हें डांटने के लिए मुंह खोलूंगा, तो इसके पहले अपनी जीभ को अपने दांतों में दबा लूंगा। मैं बार बार किसी मंत्र की तरह यह कहना सीखूंगा , वह तो अभी छोटा बच्चा है.... छोटा बच्चा।

मुझे अफसोस है कि मैंने तुम्हें बच्चा नहीं, बड़ा मान लिया था। परंतु आज जब मैं तुम्हें गुड़ी-मुड़ी और थका-थका पलंग पर सोया देख रहा हूं, बेटे, तो मुझे एहसास होता है कि तुम अभी बच्चे ही तो हो। कल तक तुम अपनी मां की बांहों में थे, उसके कांधे पर सिर रखे। मैंने तुमसे कितनी ज्यादा उम्मीदें की थीं, कितनी ज्यादा!

----- डब्ल्यू. लिविंग्स्टन लारनेड

साभार: लोक व्यवहार, डेल कारनेगी


डाकिए की ओर से: नज़र के तीर बड़े चुभते हैं। आप आगे बढ़ जाते हैं और वो कातरता पीठ पर खंज़र मानिंद गड़ी हुई मालूम होती है। कुछ ऐसा ही होता हुआ यहां

Wednesday, September 21, 2011

लव लेटर्स...



डाकिए की ओर सेः        प्रेम पत्रों की अपनी एक अलग दुनिया है। यह घोर निजता है। नितांत अकेले में सिर्फ प्रेमी या प्रेमिका की चहलकदमी में उपजा ख्याल है। प्रेम पत्र यदि तफसील से लिखी गई हो और यदि उसे गौर से पढ़ा जाए उस वक्त का देशकाल उजागर होता है। यह ऐतिहासिक दस्तावेज़ हो सकता है। अब यदि एक रिक्शेवाला प्यार में खत लिखता है तो बेकरारी के साथ साथ मिलन में आने वाली बाधाओं का जिक्र मिलता है, समाज की टेढ़ी नज़र, चाहे अनचाहे लोगों की सोच का पता चलता है। सबमें भावनाएं समान हैं बस फर्क है अंदाज़-ए-बयां का, विचार का। दिक्कत यह है कि हम निजी स्तर पर तो सबका खत पढ़ना चाहते हैं पर सार्वजनिक रूप से विश्वप्रसिद्ध हस्ती का। नेहरू का लार्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना को लिखे प्रेम पत्र आज काॅलेज पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। ज़ाहिर है अप्रत्यक्ष रूप से यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन जाती हैं जो तत्कालीन इतिहास और समाज को थोड़ा और स्पष्ट कर विभिन्न शोधकार्यों में सहायक हो जाती हैं। यहां भी कुछ ऐसे ही अंश दिए जा रहे हैं। 

आभार एक स्त्री पत्रिका बिंदिया का जिसके फरवरी अंक में यह अंश मिला। इसे जूम करके पढ़ा और सेव ऐज कर सहेजा जा सकता है।



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Saturday, July 16, 2011

अदब या तो अदब है, वर्ना बहुत बड़ी बेअदबी



डाकिए की ओर से: दिल्ली, बारिश और शनिवार... कुनैन की गोलियां। अफीम की आदत। कड़वाहट चबाने का लत गोया इससे निकला रस मीठा होता है। बेर खाने के बाद का पानी पीना जैसे। 

ऐसे में गालिबन मंटो। कहते हैं मंटो बड़ा जटिल इंसान था। लेकिन उसे पढते हैं तो लगता है वो बहुत सीधा था। एक बच्चे जितना मासूम और सीधा लेकिन हम उसका यह सीधापन झेल नहीं सके तो साजिश के तहत उसे काॅम्पलेक्स करार दे दिए।

मंटो के मजामीन हाथ लगे हैं। दस्तावेज का चौथा हिस्सा जिसमें मुदकमे, पत्र और निबंध हैं और जिसकी शुरूआत कुछ यूं होती है -


जब कोई ईमानदान नागरिक रात को सो नहीं पाता 
जब कोई देशभक्त उदास हो जाता है
जब कोई काबिल जवान इम्प्लायमेंट एक्सचेंज की सीढि़यों पर दिन गुजारता है
जब कोई बुद्धिजीवी किसी कारण किसी का पिछलग्गू बन जाता है 
जब कोई लेखक इनाम और खिताब के मोह में दर दर भटकता है
जब कोई व्यक्ति अदालत के बरामदे में बचपन से बुढापे में पहंुच जाता है
जब कोई मरीज़ अस्पताल के दालान में बिस्तर लगाता है
जब कोई स्मगलर समाज में रूत्बा पाता है 
जब कोई मुलाजिम ताल्लुकात की सीढि़यां चढ़कर ऊपर पहंुचता है 
दोस्तों, 
तब सआदत हसन मंटो ये मज़ामीन लिखता है।

सच भी है, इस हिस्से में उन दिनों की दास्तां है जब लगातार मुकदमे से मंटो परेशां हो गया था। लिखने से ज्यादा उसे सफाई देनी पड़ रही थी। उसे सरोकार याद दिलवाए जा रहे थे और औकात बताई जा रही थी। हैरानी होती है जो कहानी में बेदर्दी से खाल उतारता था वो किस कदर हस्सास नज़र रखता था।

यहां पाठकों से रू ब रू होता मंटो। कुछ सवालों का जवाब देता हुआ...

(मेरी खुद की भूमिका लंबी हो गई। माफी)

*****

मेरे मज़मून का उनवान अदबे-जदीद है। लुत्फ की बात यह है कि मैं इसका मतलब ही नहीं समझता लेकिन यह जमाना ही कुछ ऐसा है कि लोग उसी चीज़ के मुताल्लिक बातें करते हैं जिनका मतलब उनकी समझ में नहीं आता। पिछले दिनों गांधी जी ने आगा खां के महल में मरन ब्रत रखा। जब लोगों की समझ में न आया कि वह किस तरह जिंदा रह सके हैं तो एक नारंगी पैदा कर दी गई। यह नारंगी भी कुछ दिनों बाद नाकाबिले फहम हो गई। बाज आदमियों ने कहा कि नारंगी नहीं थी, मौसंबी थी। बाज ने कहा: नहीं मौसंबी, नारंगी हर्गिज नहीं थी, माल्टा था। बात बढ़ती गई। फिर इसकी सारी जातें गिनवा दी गई। फिर डाक्टरों ने इनमें से हर एक की विटामिन गिनवाई। गिजाइयत को कैलोरीज में तकसीम किया गया। एक बरस में पिचहत्तर बरस के बुड्डे को कितनी कैलोरीज की जरूरत होती है, इस पर बहस की गई और साहिब, गांधी जी की यह नारंगी या मौसंबी जो कुछ भी थी, वह सआदत हसन मंटो बन गई। यह मेरा नाम हैं लेकिन बाज लोग अदबे-जदीद अलमारूफ नए अदब, यानी तरक्कीपसंद अदब को सआदत हसन मंटो भी कहते हैं और जिन्हें सिन्फे करख्त पसंद नहीं, वो उसे इस्मत चुगताई भी कह लेते हैं। 

जिस तरह मैं यानी सदादत हसन मंटो अपने आपको नहीं समझता, तरक्कीपसंद लिट्रेचर भी उन लोगों की समझ से भी ऊंचा है हो इसको समझने की कोशिश करते हैं।

मैं चीजों को नाम रखने को बुरा नहीं समझता। मेरा अपना नाम अगर न होता तो वो गालियां किसे दी जातीं जो अब तक हजारों और लाखों की तादाद में मैं अपने नक्कादों से वुसूल कर चुका हूं। नाम हो तो गालियां और शाबाशियां देने और लेने में बहुत सहूलत पैदा हो जाती है लेकिन अगर एक ही चीज के बहुत से नाम हों तो उलझाव पैदा होना जरूरी है।

सबसे बड़ा उलझाव इस तरक्कीपसंद अदब के बारे में पैदा हुआ है हालांकि पैदा नहीं होना चाहिए था - अदब या तो अदब है, वर्ना बहुत बड़ी बेअदबी। 

मैं दूसरों की तरफ से जवाब नहीं दूंगा। अपने मुताल्लिक अर्ज करना चाहता हूं कि दुनिया का नक्शा बदल रहा है लेकिन अगर मैंने उसके मुताल्लिक कुछ लिखा है तो मेरा भी हुलिया बदल जाएगा। डरपोक आदमी हूं, जेल से बहुत डर लगता है। यह जिदंगी जो बसर कर रहा हूं, जेल से कम तकलीफदेह नहीं है। अगर इस जेल के अंदर एक और जेल पैदा हो जाए और मुझे उसमें ठूंस दिया जाए तो चुटकियों में मेरा दम घुट जाएगा। जिंदगी से मुझे प्यार है। हरकत का दिलदादा हूं। चलते-फिरते सीने में गोली खा सकता हूं लेकिन जेल में खटमल की मौत नहीं मरना चाहता। यहां इस प्लेफार्म पर यह मज़मून सुनाते सुनाते आप सबसे मार खा लूंगा और उफ तक नहीं करूंगा लेकिन हिंदू मुस्लिम फसाद में अगर कोई मेरा सिर फोड़ दे तो मेरे खून की हर बूंद रोती रहेगी। मैं आर्टिस्ट हूं, ओछे ज़ख्म और भद्दे घाव मुझे पसंद नहीं। जंग के बारे में कुछ लिखूं और दिल में पिस्तौल देखने और छूने की हसरत दबाए किसी तंगो तारीक कोठरी में मर जाऊं, ऐसी मौत से तो यही बेहतर है कि लिखना विखना छोड़कर डेरी फार्म खोल लूं और पानी मिला दूध बेचना शुरू कर दूं। 

मुझे चुस्त वर्दी पहनने का शौक नहीं है। पीतल और तांबे के मतगों और कपड़े के रंगीन बिल्लों से मुझे कोई दिलचस्पी नहीं। होटलों में डांस करके, क्लबों में शराब पीकर और टैक्सियों में चूना-कत्था लगी लड़कियों के साथ घूमकर मैं वार ऐफर्ट की मदद नहीं करना चाहता। इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प मशागिल मुझे मयस्सर हैं। मिसाल के तौर पर यह मश्ग़ला क्या बुरा है कि मैं हर रोज़ बंबई सैंट्रल से गोरेगांव और गोरेगांव से बंबई सैंट्रल तक बर्की ट्रेन में सैकड़ों वर्दीपोश फौजियों को देखता हूं जो फतह-ओ-नुसरत को ओर ज्यादा करीब लाने के लिए शराब के नशे में मदहोश या तो टांगे पसारे सो रहे होते हैं या निहायत ही बदनुमा औरतों से, मेरी मौजूदग से गाफिल, निहायत ही वाहियात किस्म का रोमांस लड़ाने में मसरूफ होते हैं। 

मैं इस जंग के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा लेकिन जब मेरे हाथ में पिस्तौल होगा और दिल में यह धड़का नहीं रहेगा कि यह खुद ब खुद चल पड़ेगा तो मैं उसे लहराता हुआ बाहर निकल जाऊंगा और अपने असली दुश्मन को पहचानकर या तो सारी गोलियों उसके सीने में खाली कर दूंगा या खुद छलनी हो जाऊंगा। इस मौत पर जब मेरा कोई नक्काद यह कहेगा कि पागल था तो मेरी रूह इन लफ्जों ही को सबसे बड़ा तमगा समझकर उठा लेगी और अपने सीने पर आवेजां कर लेगी।

Thursday, June 16, 2011

खूब पहचान लो असरार हूँ मैं...





डाकिए की ओर से: सुबह मजाज़ की सोहबत में गुज़री, तो हैंगओवर सा हो गया, पर ये नशा ज़रूरी था। अभी चिठ्ठी डालने निकला तो सोचा क्यों न यही खत आप तक भी पहुंचाया जाए। वैसे भी एक नज़र फेसबुक पर डाली तो लोहा गर्म लगा। कुरजां (जयपुर से नई मैगज़ीन) में भी अलसुबह इनके बारे में विस्तार से जाना। लेकिन फिलहाल यहां एक छोटा सा पोस्टकार्ड डाल रहा हूं। खत और भी आएंगे और तारकोवोस्की की डायरी भी चलती रहेगी, मगर फिलहाल यह फुहार...
*****
मजाज़ लखनवी हकीकत में उस असरार का नाम है जिसे जमाना उसकी मौत के बाद भी समझने की कोशिश में मुब्तला है। उर्दू के तमाम शायरों में अगर सबसे शायराना जिंदगी किसी की रही तो ये मजाज़ ही थे। उर्दू अदब की दुनिया में ये किस्से पहले ही अमर हो चुके हैं कि एक ज़माने में कुंवारी लड़कियां अपने बेटों के नाम मजाज़ के नाम पर रखने की कसमें खातीं थीं। मजाज़ के लिए लड़कियों में लाॅटरी निकाली जाती थीं और उनकी नज्में गल्र्स होस्टल के तकियों में दबी मिलती थीं लेकिन मजाज़ ताजिंदगी जिन्स-ए-उल्फत (प्यार) के तलबगार ही रहे। एक दफा अलीगढ़ विश्वविद्यालय में ही इस्मत चुगताई ने उनसे कहा कि लड़कियां मजाज़ से मुहब्बत करती हैं, इस पर मजाज़ ने तपाक से कहा - ‘और शादी पैसे वालों से कर लेती हैं‘।

जिं़दगी में सब कुछ बदलता रहा लेकिन हाजि़रजवाबी का ये असासा हर दौर में मजाज़ के साथ रहा। जब इस्मत चुगताई ने उनसे पूछा कि मजाज़ तुम्हारी जिंदगी को बर्बाद लड़की ने किया या शराब ने तो मजाज़ ने कहा कि मैंने दोनों को बराबर का हक दिया है। मजाज़ के ऐसे कई लतीफे जिन्हें बाद में मजाज़ीफे कहा जाने लगा, आज भी लखनऊ की आबो-हवा में बिखरे पड़े हैं। लेकिन इनके पीछे की तल्खी यह है कि इन्हें कहने वाला पूरी जिंदगी बेहद दुखी रहा। 

उर्दू के जाॅन कीट्स कहे जाने वाले असराल उल हक मजाज़ की पैदाइश 1911 में रूदौली कस्बे में हुई थी। मजाज़ की शायरी को मुकाम अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में मिला। यहां उस दौर में मशहूर शायरों की एक पूरी जमात थी जिनमें मोईन अहसन जज्बी, अली सरदार जाफरी और जांनिसार अख्तर भी शमिल थे। लेकिन इन सबमें जो नाम सबसे ज्यादा मकबूल हुआ वह मजाज़ लखनवी का ही था। अलीगढ़ मुसमिल यूनिवर्सिटी का तराना भी मजाज़ का ही लिखा हुआ है। मजाज़ प्रगतिशीलता के सारे तत्वों के स्वाभाविक समर्थक थे। असल में नाजुक तबीयत वाले मजाज़ हर उस व्यक्ति से नजदीकी महसूस करते थे जिसे उसका बुनियादी हक नहीं मिला। यही निकटता उन्हें प्रगतिशीलता की राह पर ले गई। स्त्री मुक्ति और नारीवाद के जिस आंदोलन की बात आज होती है उसे मजाज़ 30 के दशक में ही अपनी नज्मों के ज़रिए कह रहे थे। कम लोग जानते हैं कि मजाज़ साहब के पुश्तैनी घर में आज लड़कियों का स्कूल चल रहा है। 

मजाज़ तरक्कीपसंद शायरों में होते हुए भी अपनी रूमानियत के चलते अलग ही नज़र आते हैं। फैज अहमद फैज उनके बारे में लिखते हैं - मजाज़ की इंकलाबियत आम इंकलाबी शायरों से अलग है। आम इंकलाबी शायर इंकलाब को लेकर गरजते हैं, सीना कूटते हैं इंकलाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते। वो इंकलाब की भीषणता को देखते हैं उसके हुस्न को नहीं पहचानते। 

मजाज़ की शायरी अल्फाज की कारीगरी से नहीं बनती, वहां भावों की सहज आमद है। इसलिए रूमानी शायरी में तो वो कीट्स का दर्जा रखते ही हैं। तरक्कीपसंद शायरी में ज़रा भी बनावटी नहीं लगते। मजाज़ की शायरी की गहरी समझ रखने वाले मोहसिन जमाल कहते हैं - अगर मजाज़ को उतनी लंबी उम्र मिली होती जितनी उनके साथ के बाकी शायरों को मिली तो इसमें कोई शक नहीं कि मजाज़ का नाम ग़ालिब इकबाल के बाद मकाम पाता। मजाज़ को याद करते हुए उनकी भतीजी सहबा अली कहती हैं - मजाज़ साहब की सरलता का अगर लोगों ने गलत फायदा न उठाया होता तो हम इतनी जल्दी उस बड़े शायर से महरूम न होते। जोश मलीहाबादी ने एक बार मजाज़ को सामने घड़ी रखकर पीने की सलाह दी तो मजाज़ ने कहा - आप घड़ी रख के पीते हैं, मैं घड़ा रख के पीता हूं। इस बेतहाशा शराबनोशी ने मजाज़ को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया। कई बार वो पागलपन के दौरे के शिकार हो चुके थे। 

मजाज़ की मौत के बाद उन पर जितना लिखा पढ़ा गया उतना किसी और शायर पर नहीं लिखा गया। 2006 में भारत सरकार ने उनकी याद में एक डाक टिकट भी ज़ारी किया। लखनऊ में मजाज़ की खस्ताहाल कब्र पर एक शेर लिखा है ‘‘अब इसके बाद सुबह है और सुबह-ए-नौ मजाज़, हम पर है खत्म शामे गरीबाने लखनऊ...''

 साभार: तहलका, उत्तराखंड संस्करण, फरवरी, 2011

Monday, June 6, 2011

डायरी के पन्ने : आंद्रेई तारकोवस्की - 1


डाकिये कि ओर से:  ये अजीब है कि हर युग में प्रतिभाशाली को कष्ट उठाने पड़े हैं. मातृभूमि भी कई बार छोडनी पड़ी है. इस दर्द के साथ सर्वोत्कृष्ट काम करना और फिर भी गरीबी रहना एक और भी अजीब स्थिति है. 

आंद्रेई तारकोवस्की को सिनेमा का मास्टर माना जाता है. सोलारिस, आंद्रेई रुब्ल्योब, मिरर, स्टाकर, नास्टेल्जिया और द सेक्रिफाइस बनाने वाले इस महान रूसी फिल्कार को सिनेमा की नई दृश्य-भाषा देने के लिए डाकिए का सलाम। 

यहां पेश है 1970 से 1986 तक की उनकी डायरी के महत्वपूर्ण अंश जो मैं यहां एडिट कर दे रहा हूं।

 विभिन्न कडि़यों के तहत लंबी चलेगी और आशा है आप सब जुड़े रहेंगे। 


1970

27 अगस्त

ओवचिन्निकोव द्वारा रचित जापान के शानदार शब्दचित्रों को नोवी मीर में पढ़ रहा हूं। विलक्षण! सूक्ष्म और प्रखर। मैं कितना भाग्यवान कि ओसाका जाने से पूर्व उन्हें पढ़ पाया।

14 सितंबर

दाॅस्तोएवस्की दो मोमबत्तियों की रोशनी में पढ़ते थे। उन्हें लैंप पसंद नहीं थे। काम के दौरान बेहद धूम्रपान करते। यदा कदा खूब कड़क चाय पीते। स्ताराया रूस्स्या से आरंभ हुआ उनका जीवन शुरू से ही ऊब और नीरसता से भरा था। उनका प्रिय रंग - - सागर की लहरों का था, अपनी नायिकाओं को उन्होंने प्रायः उसी रंग में सजाया है। 

9 जून

किसी भी किस्म की प्रशंसा का एक लक्षण यह कि अंततः वह ग्लानि में, हताशा में, यहां तक कि किसी-न-किसी हैंग ओवर में, बल्कि अपराध - भावना में जा डुबाती है। 

मैंने कहा है कि मेरा काम है कि सोवियत सिनेमा के उच्च स्तर को कायम रखूं, न कि सामयिक अथवा प्रासंगिक के पीछे भागूं। 

1973

27 जनवरी 

जिंदगी कितनी उदास है! मुझे उस शख्स़ होता है जो अपना काम राज्य से इज़ाज़त लिए बगैर कर सकते हैं। यों तो हर कोई, प्रायः हर जगह, आज़ादी से काम कर सकता है, केवल रंगमंच और सिनेमा को छोड़कर (मैं टेलीविज़न को शामिल नहीं कर रहा, क्योंकि मैं उसे कला नहीं मानता)। बेशक उन्हें पगार नहीं मिलती, लेकिन अपना काम तो कर सकते हैं।

सत्ताधारी कितने स्थूलबुद्धि हैं! क्या उन्हें साहित्य, कला, संगीत, चित्रकला, सिनेमा की सचमुच जरूरत महसूस होती है ? बेशक कतई नहीं। उलटे, उनके बगैर जीवन कितना आसान होगा ! (ऐसा वे सोचते होंगे)

मैं काम करना चाहता हूं, बस। और कुछ नहीं। काम ! यह बेशक बेतुका उन्माद और अपराध है, कि इतालवी समीक्षकों, समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने जिस निर्देशक को प्रतिभावान कहा उसे यहां बेरोज़गार रहने पर मज़बूर किया जा रहा है। 

दरअसल, मेरे ख्याल से जैसे तैसे उच्च पदों पर जा पहुंचे औसत लोगों ही की ये करतूतें मेरे खिलाफ हो सकती हैं। बेशक, औसत दर्जे के लोग कलाकारों को झेल नहीं पाते, और अधिकारीगण तो निर्विवाद रूप से घटिया स्तर ही के हैं। 

सबसे सुंदर पेड़ कौन सा है ? चिरबेल का। उसे ही पूरा विकसित होने में खूब लंबा समय लगता है। कौन जल्दी बढ़ता है ? - - बांस या पहाड़ी पीपल ? पहाड़ी पीपल बहुत सुंदर पेड़ है।

ज़रा सा और जानिये - यहाँ.
पुस्तक : अनंत में फैलते बिम्ब : तारकोवोस्की का सिनेमा
साभार : संवाद प्रकाशन, हिंदी अनुवाद. 

Friday, April 1, 2011

उथों अगे फ़राक दियां मंज़लां सन...

एक पंजाबी कविता जिसका संशिप्तीकरण-भावानुवाद सा कुछ करने का प्रयास किया है, यकीन करिए ये भावानुवाद के पश्चात हिंदी में तो नहीं किन्तु अपनी मूल भाषा, पंजाबी, में उत्कृष्ट लगती हैं. तथापि आपसे भावानुवाद बाटने का लोभ संवरण नहीं हो पाया तो नहीं हो पाया. चूँकि अनुवाद केवल कुछ ही पंक्तियों का है सम्पूर्ण कविता का नहीं, और चूँकि इस कविता के पीछे एक कहानी चलती है अतः प्रस्तावना की आवश्यकता पड़ी...

..कहानी यूँ है कि एक लड़की जो शायद गाड़ी में या पैदल किसी स्थान से अपने घर जा रही हैं, उसके साथ उसका बेटा भी है इतने में उसे अपने नैनिहाल का कोई (दूर का शायद) भाई (वीर) मिलता है, लड़की पहली नज़र में ही बिछड़े हुए वीर को पहचान जाती है, लड़की पाठकों को उस 'वीर' के माध्यम से अपनी व्यथा बताती है, कि किस तरह उसके पिताजी ने अपनी मृत्यु के समय लडकी का विवाह लड़की से उम्र में काफी सयाने पुरुष से करने का वचन दे दिया. क्यूंकि मुसीबत के समय में उस सयाने पुरुष ने ही लड़की के पिताजी का हाथ थामा था. इस निर्णय से लड़की के 'नैनिहाल' वाले प्रसन्न नहीं होते फलतः लड़की से भी नाराज़ हो जाते हैं. किन्तु लड़की बताती है कि इसमें उसका कोई दोष नहीं. क्यूंकि पिताजी कि अंतिम आज्ञा का पालन करना ही उसका फ़र्ज़ था, यद्यपि उसके पति का उसके साथ विवाह होने से पूर्व पिछली पत्नी से एक बच्चा भी था तो भी.

जाते जाते लड़की अपने बिछड़े हुए वीर को और अपने नैनिहाल को दुआएं देती है....


' भाई' तुम कुजाह के तो नहीं?
तुम्हारा नाम शरीफ तो नहीं?
आगे से ही सोच रही हूँ दिखता बिलकुल उस सा है. .
आज का शुभ दिन, दिन न होकर मानो कोई किस्सा है.
खुदा कहीं नहीं है माना,
फिर-भी यहीं कहीं है जाना....
...तूने भी मुझको देखो तो, अब जाकर पहचाना है.
नियामत... ! याद है बचपन की, या अब भी कुछ याद आना है?
हाँ, आखिर, चलते कुओं में ही तो पानी रहता है.
मिलते रहने से ही आखिर रिश्तों का मानी रहता है. (वीर के उसे भूल जाने पर)
कभी वहाँ (नैनिहाल) जा जा कर भी मेरा मन नहीं भरता था,
अब वो सपने में भी आए तो उससे मन डरता था.
क्यूँ कर आखिर मेरी मामी भी मुझसे नाराज़ है.
प्रायश्चित का मूल वही है बढ़ता जाता ब्याज है.
बोलो तो, नानी के घर से कोई भला कुछ तोलेगी ?
लेकिन बाप के आगे आखिर कोई लड़की क्या बोलेगी?
और फिर सोचो, शरम का ताला, इसको कैसे खोलेगी ?
मेरे बाप का हाथ तो आखिर 'इन्होने' ही थामा था,
जाते-जाते उनके मुंह में 'इनका' नाम ही आना था.
ठीक है बेशक 'उनका' मेरा उम्र का कोई मेल नही.
लेकिन फिर भी वचन पिता का, वचन पिता का, खेल नहीं.
और फिर बाप की जो न माने वो भी क्या इंसान हुए?
बाप को भी तो अपने बच्चे मानो अपना प्राण हुए.
प्राण गए थे प्रण को लेकर लेकिन प्रण के प्राण रहे,
मैंने भी तब ये सोचा कि इन प्राणों का मान रहे.
मुझको यहीं उतरना है, तू भी आता अच्छा होता,
एक रात भूली बहना के घर खाता अच्छा होता.
ठीक है !तू, 'जीते रहना' ,
जीने से मिलना होता है.
मेरी ओर से उनसे (नैनिहाल वालों से) कहना,
अब भी कोई, उन्हें सोच के, कभी-कभी तो रोता है.



वीर तूं कुंजाह दा ऐ?
तेरा नां शरीफ़ ऐ?
अगे इ में आखदी सी लगदा ते उहो ऐ?
अज केहा नेक दिहाड़ा ,
रब्ब णे भरा मेल दित्ता ऐ,
मुंडिया! इह तक तेरा मामा ऐ,
मेनू तूं सिंझानिया ना होवे दा,
कदे निक्के हुंदे असी रल के खेडदे सां,
मेरा नां निआमते वे,
महिर नूर दीन दी में दोह्त्री आं,
मिलदिया दे साक णे ते वाहनदिया दे खूह णे,
कदे वरा-वरा उथे जा के रह आवीदा सी,
अज्ज उहना थांवां नूं वेखने नूं सहक्दी आं,
मेरे उतों पता इ जे मामी साडे नाल अफ्सोसी ऐ,
वीर दस इस विच मेरा की कसूर सी?
नानकिया नालो मेनू अग्गे थां किहडी सी?
मापिया दे अग्गे पर धीयाँ नहीं बोलदीयां,
वज्जे होए शर्मां दे जन्दरे ना खोलदीयां.
ओहना नूं जमीयां तों अग्गे शेय किहडी ऐ?
उहना दा उह बुरा कदे नहीं मंग सकदे,
थुडां दी धरेमिया ' च तिलक इंज पईदा ऐ ,
अखिया पियो नू जदो हार दे गईआं सन,
दुखां दियां साडे उते वाईं झुल पईआं सन,
नानके वी कन्नी खिसकान लग पाए सन,
तक के ते,
खिदने ड़ी थावें मुर्झान लग पए सन,
असी कच्ची आवी सी ते अग्ग पाई बुझदी सी,
उस वेले जडो कोई गल वी ना सुझ्दी सी,
हर शैय छड गयी,
ऐस दे पियु मेरे पियु दी बांह नप्प लई,
मरण लगा ऐस नूं जबान ओह दे गया.
में ते लै के बह गयी सां ऐस ख़्याल नू,
जग लायी सोंकण दे पीते होए दूध दे हंगाल नू,
मेरा सब्र कबूल कर लित्ता ऐ,
मेनू ऐ चन्न जेहा पुत दे दित्ता ऐ,
लै फेर में ते इत्थे लह बहिणा ऐ,
तुमीं की होयिया अज्ज इथे लह बहों खां,
इक रात भूली होई भैण दे वी कोल कल रहो खां,
हछा जग जीवंदियाँ दे मेले ने,
मेरे वलों सबनां नू बहुत-बहुत पुछना.

-शरीफ़ कुंजाही(गुजरात के कस्बे कुंजाह में १९१५ में जन्म हुआ,उर्दू और फारसी में भी लिखते हैं)




चलते चलते दो और भावानुवाद (मूल भाषा:पंजाबी)

बादल उड़े तो गुम आसमान देखा,
पानी उतरा तो अपना मकान देखा.

जहाँ पहुँच के उसका निशान देखा.

उसके सामने ये जग विराना था,
उसकी आँखों में ऐसा जहाँ देखा.

हमारे हाल की खबर वो रखता है,
सारी उम्र जिसको अनजान देखा.

काम वही 'मुनीर' मुश्किल था,
जिसे शुरू में बड़ा आसान देखा.

-मूल लेखक : मुनीर नियाज़ी(१९२८ में खानपुर जिला हुशियारपुर में जन्मे आजकल लाहौर में रहते हैं)


एक पूरा कमरा किताबों से भरा हुआ,
एक खाली टोकरी रोटियों वाली,
क्या 'ज्ञान' लूँ इन किताबों से,
जिससे मेरी टोकरी रोटियों से भर जाए,
जिससे मुझे और किताबें बेचने का कोई तनाव न हो?

-मूल लेखक : शाइस्ता हबीब (१९४९ में सियालकोट में जन्मीं  उर्दू में कविता रचती हैं  रेडियो पकिस्तान में प्रोडियूसर हैं)






मधानियाँ

Wednesday, February 23, 2011

अरूंधति-1


डाकिए की ओर से: एक चीज होती है हार्ट लाइन. इसमें एक ही वक्त पर कम से कम दो आदमी एक ही बात सोचते हैं. कुछ दिन पहले हिन्दुस्तान में उदय प्रकाश का साक्षात्कार पढ़ा था कि आज के दौर में आप बिना कुछ किए भी अपने दुश्मन बना सकते हैं।

ये कविता ऐसे ही किसी हार्ट लाइन की बात कहती है। शुक्र है उदयप्रकाश सिर्फ इसे सुन ही नहीं रहे साथ में बोल भी रहे हैं। यहां तीन दी जा रही है, शेष दो अगली बार।
*****

यह कविता इसी तरह लिखी जा रही है, अलग-अलग समय और मूड्स में। यह किसी सूची में शामिल होने के लिए नहीं, अपने समय की चिंता का हिस्सा बनने के लिए लिखी जा रही है। जीवन की अनिश्तिताओं और बिखरावों के बीच। यह किसी भाषा-विशेष की अभिव्यक्ति या उसकी कला-परम्परा का अंग नहीं है। यकीन मानिए, अगर कोई अन्य भाषा मैं इतनी जानता कि उसमें कविता लिख सकूं, तो उसी भाषा में लिखता। कहते हैं, हर कविता सबसे पहले अपने लिए प्राथमिक शर्त की तरह ‘सहानुभूति‘ की मांग करती है, तो यह भी करेगी - उदय प्रकाश

अरूंधति 

एक 

जेठ की रात में 
छप्पर के टूटे खपड़ैलों से दिखता था आकाशा
अपनी खाट पर डेढ़ साल से सोई मां की मुरझाई सफेद- जर्द 
तर्जनी उठी थी
एक सबसे धंुधले, टिमटिमाते, मद्धिम लाल तारे की ओर -

‘वह देखो अरूंधति।‘

मां की श्वाल नली में कैंसर था और वह मर गई थी, इसके बाद 

उसकी उंगली उठी गई थी आकाश की ओर 

कल रात मैंने
फिर देखा अरूंधति को 
वैशाली के अपने फ्लैट की छत से

पूरब का अकेला लाल तारा
अपनी असहायता की आभा में 
हमारी उम्मीद की तरह कभी-कभी बुझता
और फिर जलता हर बार

साठ की उम्र में भी 
मैं मां की अंगुलियां भूल नहीं पाता। 


दो 

उसका चेहरा
हमारे आंसुओं की बाढ़ में 
बार-बार उतराता है

उसके अनगिन खरोंचों में से
हमारे अनगिन घावों का लहू रिसता है 

हमारे हिस्से की यातना ने
वर्षों से उसकी नींद छीन रखी है 

हमारे बच्चों के लिए लोरियां खोजने 
वह जिस जंगल की ओर गई है 
वहां से जानवरों की आवाज़ आ रही है 
उधर, गोलियां चल रही हैं

उसकी बहुत बारीक और नाजुक
कांपती आवाज़ में हमारी भाषा नई सदी की नई लिपि 
और व्याकरण सीखती है

सोन की रेत में वह पैरों के चिन्ह छोड़ गई है 

नर्मदा की धार में उसका चेहरा
चुपचाप झिलमिलाता हुआ बहता है

तीन 

लुटियन के टीले से कभी नहीं दिखती अरूंधति 
वहां अक्सर दिखता है पृथ्वी के निकट आता हुआ
अमंगलकारी रक्ताभ मंगल

या अंतरिक्ष में अपनी कक्षा से भटका कोई 
गिरता हुआ टोही खुफिया उपग्रह

रोहतक या मथुरा से देखो तो सूर्योदय के ठीक पहले 
राजधानी के ऊपर हर रोज उगता है किसी गंुबद-सा
कोहरे का रहस्यपूर्ण रंगीन छाता
वर्णक्रम के सारे रंगों को किसी डरावनी आशंका में बदलता 

संसद या केंद्रीय सचिवालय के आकाश में 
नक्षत्र नहीं दिखते, आजमा लो
न सात हल-नागर, न शुकवा, न धुरू, न गुरू
वहां तो चंद्रमा भी अपनी गहरी कलंकित झाइयों के साथ 
किसी पीलिया के बीमार-सा उगता है, महीने में कुछ गिनी-चुनी रात
नत्रजन, गंधक और कार्बन में बमुश्किल किसी तरह अपनी सांस खींचता 

कभी-कभी आधी रात टीवी चैनल जरूर दिखाते हैं 
टूटती उल्काओं की आतिशबाजी
किंग खान और माही के करिश्मों के बाद

दिल्ली से नहीं दिखता आकाश
यहां से नहीं दिखता हमारा गांव-देश, हमारे खाने की थाली, 
हमारे कपड़े, हमारी बकरियां और बच्चे 

दिल्ली से तो दादरी के खेत और निठारी की तंदूर तक नहीं दिखते 

यहां के स्काइस्क्रैपर्स की चोटी पर खड़े होकर
गैलीलियो की दूरबीन से भी 
लगभग असंभव है 
अरूंधति की मद्धिम लाल 
टिमटिमाती रोशनी को देख पाना।

साभार - अहा! ज़िंदगी पत्रिका, जनवरी अंक, 2011
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