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Wednesday, August 22, 2012

पैकेज


डाकिए की ओर से: हाल ही में मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी से गुज़र रहा था और मन्नू की विनम्रता के आगे निहाल था। लेकिन मेरी समस्या दूसरी थी। उसमें जहां जहां उनके पति राजेन्द्र यादव की बुराईयां, झूठ और गलतियां सामने आ रही थी मुझे न जाने क्यों राजेन्द्र यादव के प्रति दिल में एक हमदर्दी पैदा होती जा रही थी। कुछ तो है उनमें खास ऐसा मुझे लगा और आगे चलकर यही मन्नू ने भी लिखा। दूसरों की जिंदगी में झांकने की बीमारी पैदाइशी लेकर आया हूं सो हर पेचीगदी और उलझी हुई चीज में माथा खपाना आदत हो गई है। यह वैसा ही है जैसा लव ट्रेंगल में आप रूचि लेते हैं। कई बार यह त्रिकोण जिंदगी और इसी परिस्थितियां बनाती हैं तो कई बार अपना स्वभाव और आदतें।

वैसे हिन्दी साहित्य में राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी एक मिसाल लगते हैं जहां राजेंद्र ने पूरा जीवन ही साहित्य को समर्पित किया वहीं मन्नू ने दोनों फ्रंट यानि परिवारिक जिम्मेदारी और लेखन कार्य दोनों मोर्चे पर जमकर लड़ीं। इन दोनों की जोड़ी डाकिए को इसलिए भी आकर्षित करती है क्योंकि दोनों ही ने लेखन में ईमानदारी का दामन थामे रखा। आश्चर्य यह भी होता है कि दोनों के पर्याप्त पाठकवर्ग होने के बावजूद इनके रिश्तों की खटास कागज़ पर भी सम्मानित तरीके से आई और मर्यादित तरीके से दोनों ने अपना पक्ष भी रखा। सार्वजनिक तौर पर भी एक दूसरे का सम्मान किया। इससे उनका यह जीवन भी साहित्य की एक अच्छी और स्वस्थ विधा में शामिल हो गई। इसे एक उपलब्धि भरी गर्वित लेखकीय यात्रा कह सकते हैं।

कहीं से बहुत ही अस्पष्ट छपाई में राजेन्द्र यादव लिखित मुड़ मुड़ के देखता हूं का एक टुकड़ा हाथ लगा। उसमें कई कंफेशन हैं और कई चिंताएं और सवाल भी जो डाकिए के उधेड़बुन से मेल खाती लगीं। आप जानते हैं सबसे अच्छी और प्रिय किताब वही होती है जो हमें वैसे ही मनःस्थिति से मेल खाती लगती है। हमें जानी हुई बात ही बताती है। सो आपसे बांट रहा हूं। भरी जुकाम में पढ़ी गई एक सीधी सपाट रीडिंग में कई विराम की गलतियां होंगी कई उतार चढ़ाव की सो अग्रिम क्षमा के साथ आपके समक्ष प्रस्तुत है :-



और अब मन्नू भंडारी की बीबीसी के साथ बातचीत के एक हिस्से को बीबीसी पर ही सुनी जा सकती है : यहाँ

Wednesday, May 9, 2012

कठघरे में आपा और मंटो

डाकिए की ओर से:   मौके पर सही साथ मिला है। हाल ही में इस्मत आपा की आत्मकथा कागज़ी है पैरहन का अंग्रेजी अनुवाद हुआ है। हाथी रूपी समाज के सूंड़ में लाल चींटी के रूप में घुसे मंटो और इस्मत एक ही पहलू के दो सिक्के थे। मंटो थोड़ा ज्यादा था। बकौल मंटो कुछ लोग मुझे प्रगतिशील कहते और जो नहीं कह पाते तो इस्मत चुगताई भी। मंटो ने इस्मत को भी बड़े अलहदा ढंग से याद किया है इस दिलचस्पी के साथ कि लोग हमारा नाम यों  जोड़ते हैं जैसे बंबई में राजकपूर और नरगिस। बहरहाल खत किसी के नाम लिखे लिखाए हों तो आलसी डाकिया छज्जे पर फेंकने भर से गुरेज नहीं करता। शुक्रिया हिन्दुस्तान समाचार पत्र का जिसने इस्मत चुगताई की आत्मकथा कागज़ी है पैरहन किताब के मार्फत इस्मत आपा की 'लिहाफ' और मंटो की 'बू' पर फहाशी का मुकदमा चला। पेश है वो तस्वीर जो मंटो अपने लक्ष्य को लेकर किस हद तक स्पष्ट था यह ज्ञात होता है। वैसे मेरे एक मित्र सुशील कुमार छौक्कड़ ने जब फेसबुक पर यह संदेश डाला कि "मंटो का सौवां जन्मदिन 11 मई को और कोई हलचल नहीं, अफसोस" तो कार्टूनिस्ट काजल कुमार ने सही लिखा कि "न वोट, न गुट तो मंटो कौन?"
*****

44 में दिसम्बर के महीने में सम्मन मिला कि हमें जनवरी में कोर्ट में हाजिर होना है। सब कह रहे थे जेल-वेल नहीं, बस जुर्माना हो जाएगा। और हम बड़े जोश से लाहौर के लिए गर्म कपड़े तैयार करवाने लगे।
सीमा बहुत छोटी और कमजोर थी और बड़ी ऊंची आवाज से रोती थी। चाइल्ड स्पेशलिस्ट को दिखाया तो उसने कहा, बिल्कुल तन्दुरुस्त है, यूं ही गुल मचाती है। उसे लाहौर की सर्दी में ले जाना ठीक न था। एकदम इतनी सर्दी न ङोल सकेगी। तो हमने बच्चाी को अलीगढ़, सुल्ताना जाफरी की अम्मा के पास छोड़ा और लाहौर रवाना हो गए। देहली से शाहिद अहमद देहलवी और वह कातिब जिन्होंने किताबत की थी, साथ हो गए थे, क्योंकि बादशाह सलामत ने उन्हें भी मुलजिम करार दिया था। यह मुकद्दमा अदबे-लतीफ पर नहीं, बल्कि उस किताब पर चला था, जो शाहिद अहमद देहलवी ने छापी थी। हमें सुल्ताना लेने आ गई। वह उन दिनों लाहौर रेडियो स्टेशन पर काम करती थी और लुकमान साहब के यहां रहती थी। उनकी बड़ी शानदार कोठी थी। बीवी-बच्चाे मैके गए हुए थे, इसलिए बस अपना ही राज था। मंटो भी पहुंच गए थे और पहुंचते ही हमारी खूब दावतें हुईं। ज्यादातर तो मंटों के दोस्त थे, मगर मुङो भी अजूबा जानवर समझकर देखने आ जाते थे। हमारी एक दिन पेशी हुई, कुछ भी न हुआ। बस जज ने नाम पूछा और यह कि मैंने यह कहानी लिखी है या नहीं। मैंने इकबाले-जुर्म किया कि लिखी है। बस। बड़ी ना-उम्मीदी हुई। सारे वक्त कुछ हमारे वकील साहब बोलते रहे। हम चूंकि आपस में खुसर-फुसर कर रहे थे, कुछ पल्ले नहीं पड़ा। उसके बाद दूसरी पेशी पड़ गई और हम आजाद होकर गुलर्छे उड़ाने लगे। मैं, मंटो, शाहिद तांगे में बैठकर खूब शॉपिंग करते फिरे। कश्मीरी दोशाले और जूते खरीदे। जूतों की दुकान पर मंटो के नाजुक सफेद पैर देखकर मुङो बड़ा रश्क आया। अपने भद्दे पैर को देखकर मोर की तरह मातम को जी चाहा।
‘मुङो अपने पैरों से घिन आती है,’ मंटो ने कहा।
‘क्यों? इतने खूबसूरत हैं।’ मैंने बहस की।
‘मेरे पैर बिल्कुल जनाने हैं।’
‘मगर जनानियों से तो इतनी दिलचस्पी है आपको!’
‘आप तो उल्टी बहस करती हैं। मैं औरत से मर्द की हैसियत से प्यार करता हूं। इसका मतलब यह तो नहीं कि खुद जनाना बन जाऊं।’
‘हटाइए भी जनाने और मर्दाने की बहस को, इनसानों की बात कीजिए। पता है नाजुक पैरोंवाले मर्द बड़े हिस्सास और जहीन होते हैं। मेरे भाई अजीम बेग चुगताई के पैर भी बड़े खूबसूरत हुआ करते थे। मगर..।’
.. लाहौर कितना खूबसूरत था! आज भी वैसा ही शादाब कहकहे लगाता हुआ, बाहें फैलाकर आनेवालों को समेट लेनेवाला। टूटकर चाहनेवाले बे-तकल्लुफ जिंदा-दिलों का शहर, पंजाब का दिल। तब मेरे दिल से बेसाख्ता शहंशाह बर्तानिया के हक में दुआइया कलमे निकलने लगे कि उन्होंने हम पर मुकदमा चलाकर लाहौर में ऐश करने का सुनहरा मौका दिया। हम दूसरी पेशी का बड़ी बेकरारी से इंतजार करने लगे। चाहे फांसी भी हो तो कोई परवा नहीं, अगर लाहौर में हुई तो यकीनन शहादत का रुतबा पाएंगे और लाहौरवाले बड़ी धूम से हमारे जनाजे उठाएंगे। दूसरी पेशी नवम्बर के खुशगवार मौसम में पड़ी, यानी 1946 ई. में। शाहिद अपनी फिल्म में उलङो हुए थे। सीमा की आया बहुत होशियार थी और अब सीमा बहुत मोटी-ताजी और तंदुरुस्त थी। इसलिए मैंने उसे बंबई में छोड़ा और खुद हवाई जहाज से देहली और वहां से शाहिद अहमद देहलवी और उनके कातिब के साथ रेल में गई। कातिब साहब से बड़ी शर्मिदगी होती थी, वह बेचारे मुफ्त में घसीट लिए गए। बड़े शामोश, मिस्कीन से थे। हमेशा आंखें झुकीं, चेहरे पर उकताहट, उन्हें देखकर एहसासे-जुर्म एकदम उभर जाता था। मेरी किताब की किताबत में फंस गए। मैंने उनसे पूछा- 
‘आपकी क्या राय है? क्या हम मुकद्दमा हार जाएंगे?’
‘मैं कुछ कह नहीं सकता, मैंने कहानी नहीं पढ़ी।’
‘मगर कातिब साहब, आपने किताबत की है।’
‘मैं अलफाज जुदा-जुदा देखता हूं और लिख देता हूं। उनके मानी पर गौर नहीं करता।’
‘कमाल है! और छपने के बाद भी नहीं पढ़ते?’
‘पढ़ता हूं, कहीं गलती तो नहीं रह गई।’
‘अलग-अलग अलफाज!’
‘जी हां!’ उन्होंने नदामत से सर झुका लिया। थोड़ी देर बाद बोले-
‘एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानेंगी!’
‘नहीं।’
‘आप कियां (के यहां) इमला की बहुत गलतियां होती हैं।’
‘हां, वो तो होती हैं। अस्ल में सीन, से और साद में गड़बड़ा जाती हूं। जो, जाद, जे, जाल में भी बहुत कनफ्यूजन होता है। यही हाल छोटी हे, बड़ी हे और दोचश्मी हे का है।’
‘आपने तख्तियां नहीं लिखीं?’
‘बहुत लिखीं। और मुस्तकिल इन्हीं गलतियों पर बहुत मार खाई मगर..।’
‘दरअस्ल जैसे मैं अलफाज पर ध्यान देता हूं, मानी की तरफ तवज्जह नहीं देता, इसी तरह आप अपनी बात कहने में ऐसी उतावली होती हैं कि हरूफ पर तवज्जह नहीं देतीं।’
‘ऊंह!’ अल्लाह कातिबों को जीता रखे, वो मेरी आबरू रख लेंगे। मैंने सोचा और टाल दिया।
.. पेशी के दिन हम कोर्ट में हाजिर हुए और वह गवाह पेश हुए जिन्हें यह साबित करना था कि मंटो की ‘बू’ और मेरा ‘लिहाफ फुहश’ हैं। मेरे वकील ने मुङो समझा दिया कि जब तक मुझसे बराहे-रास्त सवाल न किया जाए, मैं मुंह न खोलूं। वकील खुद जो मुनासिब समङोगा करेगा।
पहले ‘बू’ का नंबर आया।
‘ये कहानी फुहश है?’ - मंटो के वकील ने पूछा।
‘जी हां,’ गवाह बोला।
‘किस लफ्ज से आपको मालूम हुआ कि फुहश है?’
गवाह : ‘लफ्ज ‘छाती’।’
वकील : ‘माइ लॉर्ड, लफ्ज छाती फुहश नहीं है।’
जज : ‘दुरुस्त।’
वकील : ‘लफ्ज छाती फुहश नहीं है?’
गवाह : ‘नहीं, मगर यहां मुसन्निफ ने औरत के सीने को छाती कहा है।’
मंटो एकदम से खड़ा हो गया और बोला-
‘औरत के सीने को छाती न कहूं तो क्या मूंगफली कहूं?’
कोर्ट में कहकहा पड़ा। मंटो भी हंसने लगा। ‘अगर मुलजिम ने फिर इस किस्म का छिछोरा मजाक किया तो कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट के जुर्म में बाहर निकाल दिया जाएगा या माकूल सजा दी जाएगी।’ मंटो को उसके वकील ने चुपके-चुपके समझाया और वह समझ गया। बहस चलती रही और घूम-फिरके गवाहों को बस एक ‘छाती’ मिलता था जो फुहश साबित न हो पाता था। ‘लफ्ज छाती फुहश है, घुटना या कुहनी क्यों फुहश नहीं?’ मैंने मंटो से पूछा।
‘बकवास!’ मंटो भड़क उठा। बहस चलती रही। हम लोग उठकर बरामदे में डगर-डगर करती बेंचों पर जा बैठे। अहमद नदीम कासमी एक टोकरा माल्टे लाए थे। उन्होंने नफासत से माल्टे खाने की तरकीब बताई। माल्टे को आम की तरह पिलपिलाकर छोटा सा सुराख कर लो और मजे से चूसते रहो। टोकरा भर माल्टे हम बैठे-बैठे चूस गए। माल्टों से पेट भरने के बजाय और शिद्दत से भूख जाग उठी। लंच ब्रेक में किसी होटल पर धावा बोला दिया। सीमा की पैदाइश के सिलसिले में मैं बहुत बीमार रही थी, सारी चर्बी छट गई थी, गुरग्गन खानों का परहेज नहीं रहा था। मुर्गी इतनी कवी-हेकल थी कि बिल्कुल गिद्ध या चील के टुकड़े लग रहे थे। मोटी-मोटी, काली मिर्च छिड़ककर गर्म-गर्म कुल्चों के साथ और पानी की जगह कंधारी अनार का रस। बे-इख्तियार जी से मुकद्दमा चलानेवालों के लिए दुआ निकल रही थी।
 ..
कोर्ट में बड़ी भीड़ थी। कई असहाब हमें राय दे चुके थे कि हम मुआफी मांग लें। वो जुर्माना हमारी तरफ से अदा करने को तैयार थे। मुकद्दमा कुछ ठंडा पड़ता जा रहा था। ‘लिहाफ’ को फुहश साबित करनेवाले हमारे गवाह हमारे वकील की जिरह से कुछ बौखला से रहे थे। कहानी में कोई लफ्ज काबिले-गिरफ्त नहीं मिल रहा था। बड़े सोच-विचार के बाद एक साहब ने फरमाया कि ये जुमला ‘..आशिक जमा कर रही थीं,’ फुहश है।
‘कौन सा लफ्ज फुहश है? जमा या आशिक? वकील ने पूछा।’
‘लफ्ज आशिक!’ गवाह ने जरा तकल्लुफ से कहा।
‘माई लॉर्ड लफ्ज आशिक बड़े-बड़े शुअरा ने बड़ी फरावानी से इस्तेमाल किया है और नातों में इस्तेमाल किया गया है। इस लफ्ज को अल्लाहवालों ने बड़ा मुकद्दस मुकाम दिया है।’
‘मगर लड़कियों का आशिक जमा करना बड़ी मायूब बात है,’ गवाह ने फरमाया।
‘क्यों?’
‘इसलिए, क्योंकि..ये शरीफ लड़कियों के लिए मायूब बात है।’
‘जो लड़कियां शरीफ नहीं उनके लिए मायूब नहीं?’
‘अ..नहीं।’
‘मेरी मुवक्किल ने उन लड़कियों का जिक्र किया है जो शरीफ नहीं होंगी। क्यों साहब, बकौल आपके, गैर-शरीफ लड़कियां आशिक जमा करती हैं?’
‘जी हां।’
‘उनका जिक्र करना फुहाशी नहीं। मगर एक शरीफ खानदान की तालीमयाफ्ता औरत का उनके बारे में लिखना काबिले-मलामत है,’ गवाह साहब जोर से गरजे।
‘तो शौक से मलामत फरमाइए, मगर कानून की गिरफ्त के काबिल नहीं।’
मुआमला बिल्कुल फुसफुसा हो गया।
‘अगर आप लोग मुआफी मांग लें तो हम आपका सारा खर्चा भी देंगे और..’ एक साहब न जाने कौन थे, चुपके से मेरे पास आकर बोले।
‘क्यों मंटो साहब, मुआफी मांग लें! जो रुपए मिलेंगे, मजे से चीजें खरीदेंगे।’ मैंने मंटो से पूछा।
‘बकवास,’ मंटो ने अपनी मोरपंखी आंखें फैलाकर कहा।
‘मुङो अफसोस है, यह सरफिरा मंटो राजी नहीं।’
‘मगर आप! अगर आप ही..।’
‘नहीं, आप नहीं जानते। यह शख्स बड़ा फित्तीन है। बंबई में मेरा रहना दूभर कर देगा। इसके गुस्से से वह सजा बदजर्हा बेहतर होगी जो मुङो मिलनेवाली है।’ वह साहब उदास हो गए क्योंकि हमें सजा नहीं मिली। जज साहब ने मुङो कोर्ट के पीछे एक कमरे में तलब किया और बड़े तपाक से बोले, ‘मैंने आपकी कहानियां पढ़ी हैं और वो फुहश नहीं। और न ‘लिहाफ’ फुहश है। मगर मंटो की तहरीरों में बड़ी गलाजत भरी होती है।’
‘दुनिया में भी गलाजत भरी है,’ मैं मखनी आवाज में बोली।
‘तो क्या जरूरी है कि उसे उछाला जाए!’
‘उछालने से वह नजर आती है और सफाई की तरफ ध्यान जा सकता है।’
जज साहब हंस दिए।
न मुकदमा चलने से परेशानी हुई थी, न जीतने की खुशी हुई। बल्कि गम ही हुआ कि अब फिर लाहौर की सैर खुदा जाने कब नसीब होगी।

--------कागज़ी है पैरहन, इस्मत चुगताई

आभार : हिंदुस्तान

Wednesday, September 21, 2011

लव लेटर्स...



डाकिए की ओर सेः        प्रेम पत्रों की अपनी एक अलग दुनिया है। यह घोर निजता है। नितांत अकेले में सिर्फ प्रेमी या प्रेमिका की चहलकदमी में उपजा ख्याल है। प्रेम पत्र यदि तफसील से लिखी गई हो और यदि उसे गौर से पढ़ा जाए उस वक्त का देशकाल उजागर होता है। यह ऐतिहासिक दस्तावेज़ हो सकता है। अब यदि एक रिक्शेवाला प्यार में खत लिखता है तो बेकरारी के साथ साथ मिलन में आने वाली बाधाओं का जिक्र मिलता है, समाज की टेढ़ी नज़र, चाहे अनचाहे लोगों की सोच का पता चलता है। सबमें भावनाएं समान हैं बस फर्क है अंदाज़-ए-बयां का, विचार का। दिक्कत यह है कि हम निजी स्तर पर तो सबका खत पढ़ना चाहते हैं पर सार्वजनिक रूप से विश्वप्रसिद्ध हस्ती का। नेहरू का लार्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना को लिखे प्रेम पत्र आज काॅलेज पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। ज़ाहिर है अप्रत्यक्ष रूप से यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन जाती हैं जो तत्कालीन इतिहास और समाज को थोड़ा और स्पष्ट कर विभिन्न शोधकार्यों में सहायक हो जाती हैं। यहां भी कुछ ऐसे ही अंश दिए जा रहे हैं। 

आभार एक स्त्री पत्रिका बिंदिया का जिसके फरवरी अंक में यह अंश मिला। इसे जूम करके पढ़ा और सेव ऐज कर सहेजा जा सकता है।



-2-

Friday, August 19, 2011

अफसानानिगार और जिंसी मसाइल-2




       जब किसी अच्छे खानदान की जवान, सेहतमंद और खूबसूरत लड़की किसी मरियल, बदसूरत और कलाश लड़के के साथ भाग जाती है तो हम उसे मलऊन करार नहीं देंगे। दूसरे उस लड़की को माज़ी, हाल और मुस्तकबिल अखलाक की फांसी में लटका देंगे लेकिन हम वह छोटी सी गिरह खोलने की कोशिश करेंगे जिसने उस लड़की के इद्राक को बेहिस किया।

इंसान एक दूसरे से कोई ज्यादा मुख्तलिफ नहीं है। जो गलती एक मर्द करता है, दूसरा भी कर सकता है। जब एक औरत बाज़ार में दूकान लगाकर अपना जिस्म बेच सकती है तो दुनिया की सब औरतें ऐसा कर सकती हैं। गलतकार इंसान नहीं, वह हालता हैं जिनकी खेतों में इंसान अपनी गलतियां पैदा करता है और उनकी फस्लें काटता है। 

ज्यादातर जिंसी मसाइल ही आज के नए अदीबों की तवज्जोह का मर्कज़ क्यों बने हैं, इसका जवाब मालूम करना कोई ज्यादा मुश्किल काम नहीं। यह ज़माना अजीबो-गरीब किस्म के अज्दाद का ज़माना है। औरत करीब भी है, दूर भी। कहीं मादरज़ाद बरहनंगी नज़र आती है, कहीं सिर से लेकर पैर तक सत्र। कहीं औरत मर्द के भेस में दिखाई देती है, कहीं मर्द औरत के भेस में।

दुनिया एक बहुत बड़ी करवट ले रही है। हिंदुस्तान भी, जहां आज़ादी का नन्हा मुन्ना बच्चा गुलामी के दामन से अपने आंसू पोंछ रहा है, मिट्टी का नया घरौंदा बनाने के लिए जि़द कर रहा है - मशरिकी तहज़ीब की चोली के बंद कभी खोले जाते हैं, कभी बंद किए जाते हैं मगरिबी तहजीब के चेहरे का ग़ाज़ा कभी हटाया जाता है, कभी लगाया जाता है। एक अफरातफरी सी मची है - नए खटबुने पुरानी खाटों की मूंज उधेड़ रहे हैं। कोई कहता है इसे जिंदा रहने दो। कोई कहता इसे, नहीं इसे फना कर दो। इस धांधली में, इस शोरिश में हम नए लिखने वाले अपने कलम संभाले कभी इस मसले से टकराते हैं, कभी उस मसले से। 

अगर हमारी तहरीरों में औरत और मर्द के ताल्लुकात का जिक्र आपको ज्यादा नज़र आए तो यह एक फितरी बात है - मुल्क, मुल्क से सियासी तौर पर जुदा किए जा सकते हैं। एक मजहब दूसरे मजहब से अकीदों की बिना पर अलहदा किया जा सकता है। दो ज़मीनों को एक कानून एक दूसरे से बेगाना कर सकता है लेकिन कोई सियासत, कोई अकीदा, कोई कानून औरत मर्द को एक दूसरे से दूर नहीं कर सकता। 

औरत और मर्द में जो फासला है, उसको उबूर करने की कोशिश हर ज़माने में होती रहेगी। औरत और मर्द में जो एक लरज़ती हुई दीवार हाइल है, उसे संभालने और गिराने की सई हर सदी, हर कर्न में होती रही है, जो उसे उरियानी समझते हैं, उन्हें अपने एहसास के नंग पर अफसोस होना चाहिए। जो उसे अखलाक की कसौटी पर परखते हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि अखलाक जंग है जो समाज के उस्तरे पर बेएहतियाती से जम गया है। 

जो समझते हैं कि नए अदब ने जिंसी मसाइल पैदा किए हैं, गलती पर हैं क्योंकि हकीकत यह है कि जिंसी मसाइल ने इस नए अदब को पैदा किया है, यह नया अदब जिसमें आप कभी कभी अपना ही अक्स देखते हैं और झंुझला उठते हैं - हकीकत ख्वाह शक्कर ही में लपेटकर पेश की जाए, उसकी कड़वाहट दूर नहीं होगी। 

हमारी तहरीरें आपकी कड़वी और कसैली लगती हैं मगर अब तक जो मिठासें आपको पेश की जाती रहीं हैं, उनसे इंसानियत को क्या फाइदा हुआ है ? नीम के पत्ते कड़वे सही मगर खून जरूर साफ करते हैं। 
- सआदत हसन मंटो

Thursday, August 18, 2011

अफसानानिगार और जिंसी मसाइल-1


डाकिए की ओर से: चार लम्हा फुर्सत का मिला है, इससे गुरेज नहीं। ये डाकिए का काम भी बड़ा जिम्मेदारी का होता है। आपको क्या पढ़ने को दूं यही सबसे बड़ा सवाल है। अच्छा पढ़ना आपके पहंुच में हैं तो क्यों ना थोड़ी दिमाग मांज लें। बस यही सोचकर... आज की चिठ्ठी। दो भागों में दे रहा हूं। मंटो ने यह निबंध अफसानानिगार और जिंसी मसाइल के नाम से लिखा है। जब उस पर कई मुकदमे चलाकर उसे बुरी तरह परेशान किया गया। आईए पढ़ें उसका बयानः

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मलिक बिल्ंिडग, मेव रोड,
लाहौर।

भाईजान, सलामे-शौक !
ब्रादरम आगा खलिश साहिब का गिरामीनामा परसों मिला था। आपकी अलालत का इल्म हुआ। अल्लाह करे, आप सब अच्छे हों। जब आपको अपनी सेहत का अंदाज़ा है तो इतना काम क्यों करते हैं कि इन दिनों साहिबे-फराश रहते हैं। मुझे लौटती डाक में आनी सेहत की हालत से मुत्तला कीजिए और लिल्लाह इतनी मेहनत न कीजिए कि आप इंजेक्शनों के कांटों में घिरे रह जाएं। अभी बरसों तक आपकी जरूरत है। 

लीजिए ‘खैमाम‘, ‘आईना‘ और दीगर मेहरबानों के दम से अदबे लतीफ का सालनामा जेरे दफा 292 ताज़ीराते हिंद और 38 डिफेंस आॅफ इंडिया रूल्ज़, 29 मार्च की शाम को जब्त हो गया। पुलिस ने छापा मारा और सालनामें के बाकी मांदा नंबर ले गई। अभी प्रोपराइटर और एडिटरों की गिरफ्तारी अमल में नहीं आई लेकिन अफवाह है कि हम बहुत जल्द गिरफ्तार कर लिए जाएंगे। यह जब्ती आपके मज़मून और अफसाने की वजह से अमल में आई है। 

अहमद नदीम कासमी
एडिटर अदले-लतीफ 

कोई हकीर से हकीर चीज़ ही क्यों नहो, मसाइल पैदा करने का बायस हो सकती है। मसहरी के अंदर एक मच्छर घुस आए तो उसको बाहर निकालने, मारने और आइंदा के लिए दूसरे मच्छरों की रोकथाम करने के मसाइल पैदा हो जाते हैं लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा मसला यानी तमाम मसलों का बाप उस वक्त पैदा हुआ था, अब आदम में भूख महसूस की थी और उससे छोटा मगर दिलचस्प मसला उस वक्त परदा-ए-जहूर पर आया था, जब दुनिया के उस सबसे पहले मर्द की दुनिया की सबसे पहली औरत से मुलाकात हुई थी। 

यह दोनों मसले जैसा कि आप जानते हैं, दो मुख्तलिफ किस्म की भूखें हैं जिनका आपस में बहुत गहरा ताल्लुक है - यही वजह है कि हमें इस वक्त जितने मआशरती, मजलिसी, सियासी और जंगी मसाइल नज़र आते हैं, उनके अकब में यही दो भूखें जलवागर हैं। 

मौजूदा जंग की खूनीं पर्दा अगर उठा दिया जाए तो लाशों के अंबार के पीछे आपको मुल्कगीरी की भूख के सिवा और कुछ नज़र नहीं आएगा।

भूख किसी भी किस्म की हो खतरनाक होती है। आजादी के भूखों को अगर गुलामी की जंजीरें ही पेश की जाती रही तो इन्किलाब जरूर बरपा होगा। रोटी के भूखे अगर फाके ही खींचते रहे तो वह तंग आकर दूसरे का निवाला जरूरी छीनेंगे। मर्द की नज़रों से अगर औरत की दीदार का भूखा रखा गया तो शायद वह अपने हमजिंसों और हैवानों ही में इसका अक्स देखने की कोशिश करे। 

दुनिया में जितनी लानतें हैं, भूख उनकी मां है - भूख गदागरी सिखाती है, भूख जराइम की तरगीब देती है, भूख इस्मत फरोशी पर मजबूर करती है, भूख इंतिहापसंदी का सबक देती है। इनका हमला बहुत शदीद, इसका वार बहुत भरपूर और इसका ज़ख्यम बहुत गहरा होता है। भूख दीवाने पैदा करती है, दीवानगी भूख पैदा नहीं करती। 

दुनिया के किसी कोने का मुसन्निफ हो, तरक्कीपसंद हो या तनज़्ज़ुलपसंद, बूढ़ा हो या जवान, उसके पेशे नज़र दुनिया के तमाम बिखरे हुए मसाइल रहते हैं। चुन-चुनकर वह उन पर लिखता रहता है। कभी किसी के हक़ में कभी किसी के खिलाफ। 

आज का अदीब बुनियादी तौर पर आज से पांच सौ साल पहले के अदीब से कोई ज्यादा मुख्तलिफ नहीं। हर चीज़ पर नए पुराने का लेबिल वक्त लगाता है, इंसान नहीं लगाता। हम आज नए अदीब कहलाते हैं। आने वाली कल हमें पुराना करके अल्मारियों में बंद कर देगी लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम बेकार जिए, हमने मुफ्त में मग़ज़दर्दी की। घड़ी की सुई जब एक से गुज़र कर दो की तरफ रेंगती है तो एक का हिंदसा मेमसरफ नहीं हो जाता। पूरा सफर तय करके सुई फिर इसी हिंदसे की तरफ लौटती है - यह घड़ी का भी उसूल है और दुनिया का भी। 

आज के नए मसाइल भी गुजरी हुई कल के पुराने मसाइल हैं बुनियादी तौर पर मुख्तलिफ नहीं। जो आज की बुराईयां हैं, गुज़री हुई कल ही ने उनके बीज बोए थे। 

जिंसी मसाइल जिस तरह आज के नए अदीबों के पेशे नज़र हैं, उसी तरह पुराने अदीबों के पेशे नज़र भी थे। उन्होंने उन पर अपने रंग में लिखा, हम आज अपने रंग में लिख रहे हैं।

मुझे मालूम नहीं, मुझसे जिंसी मसाइल के मुताल्लिक बार बार क्यों पूछा जाता है। शायद इसलिए कि लोग मुझे तरक्कीपसंद कहते हैं, या शायद इसलिए कि मेरे चंद अफसाने जिंसी मसाइल के मुताल्लिक हैं या फिर इसलिए कि आज के नए अदीबों को बाज़ हज़रात जिंसज़दा करार देकर उन्हें अदब, मज़हब और समाज से यक कलम खारिज कर देना चाहते हैं। वजह कुछ भी हो मैं अपना नुक्ता ए नज़र पेश कर देता हूं:

रोटी और पेट, औरत और मर्द - यह दो बहुत पुराने रिश्ते हैं, अज़ली और अबदी। रोटी ज्यादा अहम है या पेट ? औरत ज्यादा जरूरी है या मर्द ? मैं इसके मुताल्लिक कुछ नहीं कह सकता, इसलिए कि मेरा पेट रोटी मांगता है लेकिन मुझे यह मालूम नहीं कि गेहूं भ्ीा मेरे पेट के लिए उतना ही तरसता है जितना की मेरा पेट। फिर भी जब मैं सोचता हूं कि ज़मीन ने गेहूं के खोशों को बेकार जन्म नहीं दिया होगा तो मुझे खुशफहमी होती है कि मेरे पेट ही के लिए वसी ओ अरीज़ खेतों में सुनहरी बालियां झूमती हैं और फिर हो सकता है कि मेरा पेट पहले पैदा हुआ हो और गेहूं की यह बुच्चियां कुछ देर बाद।

कुछ भी हो, यह बात रोज़े-रोशन की तरह अयां है कि दुनिया का अदब सिर्फ इन दो रिश्तों से ही मुताल्लिक है -इल्हामी किताबें भी जिनको आसमानी अदब कहना चाहिए, रोटी और पेट, औरत और मर्द के जज्किरों से खाली नहीं। 
सवाल पैदा होता है कि जब यह मसाइल इतने पुराने हैं कि इनका जि़क्र इल्हामी किताबों में भी आ चुका है कि तो फिर क्यों आज के अदीब इन पर खामा फरसाई करते हैं। क्यों औरत और मर्द के ताल्लुकात को बार बार कुरेदा जाता है और बकौल शख्से उरियानी फैलाई जाती है - जवाब इस सवाल का यह है कि अगर एक ही बार, झूठ न बोलते और चोरी न करने की तलकीन करने पर सारी दुनिया झूठ और चोरी से परहेज करती तो शायद एक ही पैगंबर काफी होता - लेकिन जैसा आप जानते हैं, पैगंबरों की फेहरिस्त खासी लंबी है। 

हम लिखने वाले पैगंबर नहीं। हम एक ही चीज को, एक ही मसले को मुख्तफिल हालात में मुख्तलिु जावियों में देखते हैं और जो कुछ हमारी समझ में आता है दुनिया के सामने पेश कर देते हैं और दुनिया को कभी मजबूर नहीं करते कि वह उसे कबूल ही करे। 

हम कानूनसाज नहीं, मुहतसिब भी नहीं। एहतिसाब और कानूनसाजी दूसरों का काम है -हम हुकूमतों पर नुकताचीनी करते हैं लेकिन खुद हाकिम नहीं बनते। हम इमारतों के नक्शे बनाते हैं लेकिन हम मैमार नहीं। हम मजऱ् बताते हैं लेकिन दवाखानों के मुहतमिम नहीं। 

हम जिंसियात पर नहीं लिखते। जो समझते हैं कि हम ऐसा करते हैं, यह उनकी गलती है। हम अपने अफसानों में खास औरतों और खास मर्दों के हालात पर रोशनी डालते हैं किसी अफसाने की हिरोइन से अगर उसका मर्द सिर्फ इसलिए मुतनफ्फिर हो जाता है कि वह सफेद कपड़े पसंद करती है या सादगी पसंद है तो दूसरी औरत को इसे उसूल नहीं समझ लेना चाहिए। यह नफरत क्यों पैदा हुई और किन हालात में पैदा हुई इस इस्तिफ्हाम का जवाब आपको हमारे अफसाने में जरूर मिल जाएगा। 

जो लोग हमारे अफसानों में लज्जत हासिल करने के तरीके देखना चाहते हैं, उन्हें यकीनन नाउम्मीदी होगी। हम दांव पेंच बताने वाले खलीफे नहीं। हम जब अखाड़े में किसी को गिरता देखने हैं तो अपनी समझ के मुताबिक आपको समझाने की कोशिश करते हैं कि वह क्यों गिरा था ?

हम रजाई हैं। दुनिया की सियाहियों में भी हम उजाले की लकीरें देख लेते हैं। हम किसी को हिकारत की नज़र से नहीं देखते। चकलों में जब कोई टखयाई अपने कोठे पर से किसी राहगुज़र पर पान की पीक थूकती है तो हम दूसरे तमाशाईयों की तरह न तो कभी उस पर हंसते हैं और न कभी उस टखयाई को गालियां देते हैं। हम यह वाका देख रूक जाएंगे। हमारी निगाहें इस गलीज़ पेशेवर औरत के नीम उरियां लिबास को चीरती हुई उसके सियाह इस्यां भरे जिस्म के अंदर दाखिल होकर उसके दिल पर पहुंच जाएंगी, उसको टटोलेंगी और टटोलते-टटोलते हम खुद कुछ अर्से के लिए तसव्वुर में वही करीह और मुतअफ्फिन रंडी बन जाएंगे, सिर्फ इसलिए कि हम उस वाके की तसवीर ही नहीं बल्कि उसे असल मुहर्रिक की वजह भी पेश कर सकें। 

(ज़ारी...)

Monday, June 27, 2011

डायरी के पन्ने : आंद्रेई तारकोवस्की - 2


डाकिए की ओर से: एक नज़र में तारकोवस्की का हाल भी हमारे देश के महान फिल्मकार ऋत्विक घटक जैसा ही था। जब फिल्में बनाते सरकार विद्रोह या बकवास करार देकर प्रतिबंध लगाती। दोनों जगह यह साजिश थी। जैसे ऋत्विक घटक के जाने के बाद सिनेमा के छात्रों को उनकी बनाई फिल्में देखने को कहा जाता है। तारकोवस्की ने अपनी डायरी में मठाधीशों और सरकारी अधिकारियों को जमकर कोसा है। यहां यह सवाल भी उठता है कि देश में विषय वाइज विशेषज्ञ होना चाहिए अन्यथा इज्जत नहीं मिलती। उदाहरणार्थ हमारे यहां स्पोटर्स में खिलाडि़यों ज्यादा जानकार नेता होते हैं। देखिए चीजें कैसे लिंक्ड हो जाती हैं और कहां से कहां चली जाती हैं। 


*****

1973 
5 फरवरी
यूगोस्लाविया द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समारोह में रूबल्योव को ग्रैंड प्राइज प्राप्त हुआ। 
नजायज़ मानी गई इस फिल्म रूबल्योव को यह चैथा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। 

17 जून,
रूबल्योव को स्वीडर में दिखाया जा रहा है, एंडरसन के बताए अनुसार बर्गमन ने कहा उन्होंने इतनी बढि़या फिल्म आज तक नहीं देखी। 

उसे पूरी तरह खोलना होगा, उससे सीधे सीधे भिड़ना होगा, उसकी तरफ दूर से नहीं आया जा सकेगा, छिलका निकाल फेंकना होगा, उसे अपने ही ढंग से पढ़ो, कलाकार के एकांत की ट्रेजेडी ही सर्वोपरि है और सत्य को समझने के लिए उसकी कीमत चुकाना भी।

1975 
3 जुलाई
कोई योजना कैसे परिपक्व होती है ?

निस्संदेह यह अत्यंत भेदभरी और अत्यंत दुग्र्राह्य प्रक्रिया है। हमारे बंधन से छुटी वह अचेतन में आज़ाद जारी रहती है, और तंतःकरण की दीवारों पर निश्चिमत रूप धारण करती है। फिर अंतःकरण का रूप ही उसे विलक्षण बनाता है, दरअसल सिर्फ अंतःकरण ही उसके उस बिंब की प्रच्छन्न गर्भावधि तय करता है जो सामान्य नज़रों से नहीं देखा जा सकता। 

1976
8 फरवरी 
मेरा पूरा यकीन है कि समय उत्क्रमणीय है, किसी भी हालत में वह सीधी रेखा में नहीं चलता। 

13 सितंबर
हम या तो एक दूसरे के गुणों को कम आंकते हैं या फिर बढ़ा चढ़ा कर बताते है। बहुत कम लोग दूसरों का आकलन उनकी योग्यता के आधार पर करने के काबिल होते हैं। यह कोई खास तरह की प्रतिभा होती है, सचमुच यहां तक कह सकता हूं कि केवल कुछ एक महान लोग ही इस योग्य होते हैं। 

1977
28 दिसंबर
कमज़ोरी महान चीज़ है, ताकत गौण है। जब मनुष्य जन्म लेता है त बवह कमज़ोर और कोमल होता है। जब मरता है तब मजबूत और कठोर होता है। 
जब एक पेड़ उगता है तब वह लचीला और मुलायम होता है, और जब वह सूख कर कड़क होता है तब मर जाता है। कठोरता और ताकत मृत्यु के सहचर हैं। 
नमनशीलता और कमज़ोरी ‘होने‘ की ताज़गी के निशान हैं। जो कड़ा हो गया वह कभी सफल नहीं होगा।  (लाओ-त्से)

1978
13 अप्रैल
वाकई... मैं दि मास्टर एंड मार्गारिता पर फिल्म क्यों नहीं बना रहा ? क्योंकि वह किसी प्रतिभाशाली लेखक का उन्यास है ? हालांकि, सवाल गद्य कैसा क्य है यह नहीं, विषयवस्तु का निरूपण कैसा और क्या है इसका नहीं नहीं, कथानक का नहीं, भाषा का भी नही !

मध्य-युग और नवजागरण की सारी चित्रकला की और संगीत कला की, अंततः एक ही, वही की वही, विषयवस्तु रही। द्यूरर, क्रोनेच, ब्रूघेल, बाख, हांदेल, लिओनार्दो, माइकलएंजेलो आदि सभी की...

इसमें आदिम स्त्रोतों को धंुधला करने जैसी कोई बात नहीं। यहां बात है दक्षता की, और वस्तु की, और फिर कलाकार ही उस्ताद है, क्योंकि उसे मालूम है किससे क्या बनाना है। 

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पुस्तक : अनंत में फैलते बिम्ब : तारकोवोस्की का सिनेमा
साभार : संवाद प्रकाशन, हिंदी अनुवाद.

पुनःश्च:- आज एस पी सिंह की पुण्यतिथि है। पत्रकारिता के इस पारखी पत्रकार को डाकिए का सलाम। कुछ आलेख यहां और एक यहाँ पढ़ा जा सकता है।

Thursday, June 16, 2011

खूब पहचान लो असरार हूँ मैं...





डाकिए की ओर से: सुबह मजाज़ की सोहबत में गुज़री, तो हैंगओवर सा हो गया, पर ये नशा ज़रूरी था। अभी चिठ्ठी डालने निकला तो सोचा क्यों न यही खत आप तक भी पहुंचाया जाए। वैसे भी एक नज़र फेसबुक पर डाली तो लोहा गर्म लगा। कुरजां (जयपुर से नई मैगज़ीन) में भी अलसुबह इनके बारे में विस्तार से जाना। लेकिन फिलहाल यहां एक छोटा सा पोस्टकार्ड डाल रहा हूं। खत और भी आएंगे और तारकोवोस्की की डायरी भी चलती रहेगी, मगर फिलहाल यह फुहार...
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मजाज़ लखनवी हकीकत में उस असरार का नाम है जिसे जमाना उसकी मौत के बाद भी समझने की कोशिश में मुब्तला है। उर्दू के तमाम शायरों में अगर सबसे शायराना जिंदगी किसी की रही तो ये मजाज़ ही थे। उर्दू अदब की दुनिया में ये किस्से पहले ही अमर हो चुके हैं कि एक ज़माने में कुंवारी लड़कियां अपने बेटों के नाम मजाज़ के नाम पर रखने की कसमें खातीं थीं। मजाज़ के लिए लड़कियों में लाॅटरी निकाली जाती थीं और उनकी नज्में गल्र्स होस्टल के तकियों में दबी मिलती थीं लेकिन मजाज़ ताजिंदगी जिन्स-ए-उल्फत (प्यार) के तलबगार ही रहे। एक दफा अलीगढ़ विश्वविद्यालय में ही इस्मत चुगताई ने उनसे कहा कि लड़कियां मजाज़ से मुहब्बत करती हैं, इस पर मजाज़ ने तपाक से कहा - ‘और शादी पैसे वालों से कर लेती हैं‘।

जिं़दगी में सब कुछ बदलता रहा लेकिन हाजि़रजवाबी का ये असासा हर दौर में मजाज़ के साथ रहा। जब इस्मत चुगताई ने उनसे पूछा कि मजाज़ तुम्हारी जिंदगी को बर्बाद लड़की ने किया या शराब ने तो मजाज़ ने कहा कि मैंने दोनों को बराबर का हक दिया है। मजाज़ के ऐसे कई लतीफे जिन्हें बाद में मजाज़ीफे कहा जाने लगा, आज भी लखनऊ की आबो-हवा में बिखरे पड़े हैं। लेकिन इनके पीछे की तल्खी यह है कि इन्हें कहने वाला पूरी जिंदगी बेहद दुखी रहा। 

उर्दू के जाॅन कीट्स कहे जाने वाले असराल उल हक मजाज़ की पैदाइश 1911 में रूदौली कस्बे में हुई थी। मजाज़ की शायरी को मुकाम अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में मिला। यहां उस दौर में मशहूर शायरों की एक पूरी जमात थी जिनमें मोईन अहसन जज्बी, अली सरदार जाफरी और जांनिसार अख्तर भी शमिल थे। लेकिन इन सबमें जो नाम सबसे ज्यादा मकबूल हुआ वह मजाज़ लखनवी का ही था। अलीगढ़ मुसमिल यूनिवर्सिटी का तराना भी मजाज़ का ही लिखा हुआ है। मजाज़ प्रगतिशीलता के सारे तत्वों के स्वाभाविक समर्थक थे। असल में नाजुक तबीयत वाले मजाज़ हर उस व्यक्ति से नजदीकी महसूस करते थे जिसे उसका बुनियादी हक नहीं मिला। यही निकटता उन्हें प्रगतिशीलता की राह पर ले गई। स्त्री मुक्ति और नारीवाद के जिस आंदोलन की बात आज होती है उसे मजाज़ 30 के दशक में ही अपनी नज्मों के ज़रिए कह रहे थे। कम लोग जानते हैं कि मजाज़ साहब के पुश्तैनी घर में आज लड़कियों का स्कूल चल रहा है। 

मजाज़ तरक्कीपसंद शायरों में होते हुए भी अपनी रूमानियत के चलते अलग ही नज़र आते हैं। फैज अहमद फैज उनके बारे में लिखते हैं - मजाज़ की इंकलाबियत आम इंकलाबी शायरों से अलग है। आम इंकलाबी शायर इंकलाब को लेकर गरजते हैं, सीना कूटते हैं इंकलाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते। वो इंकलाब की भीषणता को देखते हैं उसके हुस्न को नहीं पहचानते। 

मजाज़ की शायरी अल्फाज की कारीगरी से नहीं बनती, वहां भावों की सहज आमद है। इसलिए रूमानी शायरी में तो वो कीट्स का दर्जा रखते ही हैं। तरक्कीपसंद शायरी में ज़रा भी बनावटी नहीं लगते। मजाज़ की शायरी की गहरी समझ रखने वाले मोहसिन जमाल कहते हैं - अगर मजाज़ को उतनी लंबी उम्र मिली होती जितनी उनके साथ के बाकी शायरों को मिली तो इसमें कोई शक नहीं कि मजाज़ का नाम ग़ालिब इकबाल के बाद मकाम पाता। मजाज़ को याद करते हुए उनकी भतीजी सहबा अली कहती हैं - मजाज़ साहब की सरलता का अगर लोगों ने गलत फायदा न उठाया होता तो हम इतनी जल्दी उस बड़े शायर से महरूम न होते। जोश मलीहाबादी ने एक बार मजाज़ को सामने घड़ी रखकर पीने की सलाह दी तो मजाज़ ने कहा - आप घड़ी रख के पीते हैं, मैं घड़ा रख के पीता हूं। इस बेतहाशा शराबनोशी ने मजाज़ को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया। कई बार वो पागलपन के दौरे के शिकार हो चुके थे। 

मजाज़ की मौत के बाद उन पर जितना लिखा पढ़ा गया उतना किसी और शायर पर नहीं लिखा गया। 2006 में भारत सरकार ने उनकी याद में एक डाक टिकट भी ज़ारी किया। लखनऊ में मजाज़ की खस्ताहाल कब्र पर एक शेर लिखा है ‘‘अब इसके बाद सुबह है और सुबह-ए-नौ मजाज़, हम पर है खत्म शामे गरीबाने लखनऊ...''

 साभार: तहलका, उत्तराखंड संस्करण, फरवरी, 2011

Monday, June 6, 2011

डायरी के पन्ने : आंद्रेई तारकोवस्की - 1


डाकिये कि ओर से:  ये अजीब है कि हर युग में प्रतिभाशाली को कष्ट उठाने पड़े हैं. मातृभूमि भी कई बार छोडनी पड़ी है. इस दर्द के साथ सर्वोत्कृष्ट काम करना और फिर भी गरीबी रहना एक और भी अजीब स्थिति है. 

आंद्रेई तारकोवस्की को सिनेमा का मास्टर माना जाता है. सोलारिस, आंद्रेई रुब्ल्योब, मिरर, स्टाकर, नास्टेल्जिया और द सेक्रिफाइस बनाने वाले इस महान रूसी फिल्कार को सिनेमा की नई दृश्य-भाषा देने के लिए डाकिए का सलाम। 

यहां पेश है 1970 से 1986 तक की उनकी डायरी के महत्वपूर्ण अंश जो मैं यहां एडिट कर दे रहा हूं।

 विभिन्न कडि़यों के तहत लंबी चलेगी और आशा है आप सब जुड़े रहेंगे। 


1970

27 अगस्त

ओवचिन्निकोव द्वारा रचित जापान के शानदार शब्दचित्रों को नोवी मीर में पढ़ रहा हूं। विलक्षण! सूक्ष्म और प्रखर। मैं कितना भाग्यवान कि ओसाका जाने से पूर्व उन्हें पढ़ पाया।

14 सितंबर

दाॅस्तोएवस्की दो मोमबत्तियों की रोशनी में पढ़ते थे। उन्हें लैंप पसंद नहीं थे। काम के दौरान बेहद धूम्रपान करते। यदा कदा खूब कड़क चाय पीते। स्ताराया रूस्स्या से आरंभ हुआ उनका जीवन शुरू से ही ऊब और नीरसता से भरा था। उनका प्रिय रंग - - सागर की लहरों का था, अपनी नायिकाओं को उन्होंने प्रायः उसी रंग में सजाया है। 

9 जून

किसी भी किस्म की प्रशंसा का एक लक्षण यह कि अंततः वह ग्लानि में, हताशा में, यहां तक कि किसी-न-किसी हैंग ओवर में, बल्कि अपराध - भावना में जा डुबाती है। 

मैंने कहा है कि मेरा काम है कि सोवियत सिनेमा के उच्च स्तर को कायम रखूं, न कि सामयिक अथवा प्रासंगिक के पीछे भागूं। 

1973

27 जनवरी 

जिंदगी कितनी उदास है! मुझे उस शख्स़ होता है जो अपना काम राज्य से इज़ाज़त लिए बगैर कर सकते हैं। यों तो हर कोई, प्रायः हर जगह, आज़ादी से काम कर सकता है, केवल रंगमंच और सिनेमा को छोड़कर (मैं टेलीविज़न को शामिल नहीं कर रहा, क्योंकि मैं उसे कला नहीं मानता)। बेशक उन्हें पगार नहीं मिलती, लेकिन अपना काम तो कर सकते हैं।

सत्ताधारी कितने स्थूलबुद्धि हैं! क्या उन्हें साहित्य, कला, संगीत, चित्रकला, सिनेमा की सचमुच जरूरत महसूस होती है ? बेशक कतई नहीं। उलटे, उनके बगैर जीवन कितना आसान होगा ! (ऐसा वे सोचते होंगे)

मैं काम करना चाहता हूं, बस। और कुछ नहीं। काम ! यह बेशक बेतुका उन्माद और अपराध है, कि इतालवी समीक्षकों, समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने जिस निर्देशक को प्रतिभावान कहा उसे यहां बेरोज़गार रहने पर मज़बूर किया जा रहा है। 

दरअसल, मेरे ख्याल से जैसे तैसे उच्च पदों पर जा पहुंचे औसत लोगों ही की ये करतूतें मेरे खिलाफ हो सकती हैं। बेशक, औसत दर्जे के लोग कलाकारों को झेल नहीं पाते, और अधिकारीगण तो निर्विवाद रूप से घटिया स्तर ही के हैं। 

सबसे सुंदर पेड़ कौन सा है ? चिरबेल का। उसे ही पूरा विकसित होने में खूब लंबा समय लगता है। कौन जल्दी बढ़ता है ? - - बांस या पहाड़ी पीपल ? पहाड़ी पीपल बहुत सुंदर पेड़ है।

ज़रा सा और जानिये - यहाँ.
पुस्तक : अनंत में फैलते बिम्ब : तारकोवोस्की का सिनेमा
साभार : संवाद प्रकाशन, हिंदी अनुवाद. 

Tuesday, March 29, 2011

नवाब काश्मीरी






समाज की एक बाइज्जत शख्सियत ने कहा: "दुनिया के हर सभ्य देश और हर सभ्य समाज में यह नियम प्रचलित है कि मरने के बाद, ख्वाह दुश्मन ही क्यों न हो, उसे अच्छे अल्फाज़ के साथ याद किया जाता है। उसके सिर्फ गुण बयान किए जाते हैं और दोषों पर पर्दा डाला जाता है।"

मंटो न जवाब दिया: "मैं ऐसी दुनिया पर, ऐसे मुहज़्ज़ब मुल्क पर, ऐसे मुहज्जब समाज पर हज़ार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल मुरव्वज हो कि मरने के बाद हर शख्स का किरदार और तखख़्खुस लांडरी में भेज दिया जाए, जहां से वह धुल-धुलाकर आए और रहमतुल्लाह अलैह की खूंटी पर लटका दिया जाए। मेरे इसलाहखाने में कोई शाना नहीं, कोई शैम्पू नहीं, कोई घूंघर पैदा करने वाली मशीन नहीं। मैं बनाव-सिंगार करना नहीं जानता। इस किताब (गंजे फरिश्ते) में जो फरिश्ता भी आया है, उसका मुंडन हुआ है और यह रस्म मैंने बड़े सलीके से अदा की है।"

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डाकिए की ओर से: जब यह प्रस्तावना पढ़ी तो ऐज यूजअल कोई असर न हुआ कि यह काम मंटो ही करेगा और सचमुच सलीके से करेगा। फिर जब नवाब काश्मीरी के बारे में दो पन्ने तक तारीफ ही तारीफ पढ़ी तो लग गया था कोई गड़बड़ है। मंटो किसी की भी इतनी तारीफ नहीं करता। गंजे फरिश्ते में उसने बताया है कि किसी को याद करने का तरीका क्या होता है और कैसे किसी की भी यथासंभव खोल खोल खोली जाती है। मिशन बड़ा होता है उसके सामने शख्सियत छोटी हो जाती है। यह अंश सम्पादित कर पेश कर रहा हूँ, चाहता तो था की इस्मत चुगताई वाला पाठ दूँ लेकिन उतना टाइप कर पाना काफी वक़्त लेगा. इसलिए सबसे छोटा किस्सा.

*****

यूं तो तो कहने को वह एक एक्टर था जिसकी इज्जत अक्सर लोगों की नज़ में कुछ नहीं होती, जिस तरह मुझे महज़ अफसानानिगार समझा जाता है यानि एक फुजूल सा आदमी, पर यह फुजूल सा आदमी उस फुजूल से आदमी का जितना एहतिराम करता था, उतना एहतिराम कोई बेफुजूल सी शख्सीयत किसी बेफुजूल सी शख्सीयत का नहीं कर सकती।

वह अपने फन का बादशाह था। उस फन के मुताल्लिक आपको यहां का कोई वज़ीर कुछ न बता सकेगा। आप किसी चीथड़े पहने हुए मजदूर से पूछ देखिए, जिसने चवन्नी देकर नवाब काश्मीरी को किसी फिल्म में देखा है तो वह उसके गुण गाने लगेगा और वह अपनी ख़ाम ज़बान में आपको बताएगा कि नवाब काश्मीरी ने क्या-क्या कमाल दिखाए हैं। इंगलिस्तान की यह रस्म है कि जब उनका कोई बादशाह मरता है तो फौरन ऐलान किया जाता है ‘बादशाह मर गया है, बादशाह की उम्र दराज़ हो।‘

नवाब काश्मीरी मर गया है - मैं किस नवाब काश्मीरी की दराज़ी-ए-उम्र के लिए दुआ मांगू। मुझे तो उसके मुकाबले में तमाम किरदार निगार प्यादे मालूम होते हैं।

नवाब काश्मीरी से मेरी मुलाकात बंबई में हुई। खान काश्मीरी, जो उसका करीबी रिश्तेदार है, साथ था। बंबई के एक स्टूडियो में हम देर तक बैठे और बातें करते रहे। इसके बाद मैंने उसको अपनी एक कहानी सुनाई। उस पर कुछ असर न हुआ। उसने मुझसे बिला तकल्लुफ कह दिया: ठीक है, लेकिन मुझे पसंद नहीं।

मैं उसकी इस बेबाक तन्कीद से बहुत मुत्तासिर हुआ। 

दूसरे रोज़ मैंने उसे फिर एक कहानी सुनाई। सुनने के दौरान में उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे - जब मैंने कहानी खत्म की तो उसने रूमाल से आंसू खुश्क करके मुझसे कहा: यह कहानी आप किस कंपनी को दे रहे हैं ? भड़वे का रोल मुझे बहुत पंसद है।

नवाब मर्हूम को पहली बार मैंने ‘यहूदी की लड़की‘ में देखा था, जिसमें रतनबाई हीरोइन थी। नवाब, अज़रा यहूदी का पार्ट अदा कर रहा था - मैंने इससे पहले यहूदियों की शक्ल तक नहीं देखी थी। जब मै। बंबई गया तो यहूदियों को देखकर मैंने महसूस किया कि नवाब ने उनका सही, सौ फीसदी चरबा उतारा है। जब नवाब मरहूम से बंबई में मुलाकात हुई तो उसने मुझे बताया कि अज़रा यहूदी का पार्ट अदा करने के लिए उसने कलकत्त में पार्ट अदा करने से पहले कई यहूदियों के साथ मुलाकात की, उनके साथ घंटों बैठा रहा। जब उसने महसूस किया कि वह अज़रा यहूदी का रोल अदा करने के काबिल हो गया है तो उसने मिस्टर बी.एन. सरकार, मालिक ‘न्यू थियेटर्ज‘ से हामी भर ली।

जिन अस्हाब ने यहूदी की लड़की फिल्म देखा हे, वह नवाब काश्मीरी को कभी नहीं भूल सकते। उसने बूढ़ा बनने के लिए और पोपले मुंह से बातें करने के लिए अपने सारे दांत निकलवा दिए थे ताकि किरदार निगाारी पर कोई हर्फ न आए। 

नवाब बहुत बड़ा किरदारनिगार था। वह किसी फिल्म में हिस्सा लेने के लिए तैयार न था जिसमें कोई ऐसा रोल न हो, जिसमें वह समा न सकता हो। चुनांचे वह किसी फिल्म कंपनी से मुआहिदा करने से पहले पूरी कहानी सुनता था। फिर घर जाकर उस पर कई दिन गौर करता था। आइने के सामने खड़ा होकर अपने चेहरे पर मुख्तलिफ जज्बात पैदा करता था - ज बवह अपनी तरफ से मुतमईन हो जाता तो मुआहिदे पर दस्तखत कर देता।

वह खेल देखकर घर आता तो घंटों उसे ड्रामे के याद रहे हुए मुकालमे अपने अंदाज में बोलता।
मुझे याद नहीं, कौन-सा सन था। गालिबन यह वह ज़माना था, जब बंबई की इंपीरियल फिल्म कंपनी ने हिंदुस्तान का पहला बोलता फिल्म -आलम आरा बनाया था। जब बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो मिस्टर बी एन सरकार ने, जो बड़े तालीमयाफ्ता और सूझबूझ के मालिक थे, ‘न्यू थियेटर्' की बुनियाद रखी। वह नवाब काश्मीरी से अक्सर मिलते रहते थे। उन्होंने नवाब को इस बात पर आमादा कर लिया था कि वह थियेटर छोड़कर फिल्मी दुनिया में आ जाए।

बी एन सरकार, नवाब को अपना मुलाजिम नहीं, महबूस समझते थे। उनका ज़ौक बहुत अरफा व आला था। वह आर्ट के गरवीदा थे। नवाब मरहूम का पहला फिल्म यहूदी की लड़की था। उस फिल्म के डायरेक्टर एक बंगाली मिस्टर अठार्थी थे जो अब दुनिया त्याग चुके हैं। उस टीम में हाफिज जी और म्यूजिक डायरेक्टर बाली थे - उस तिगड़म में क्या कुछ होता था, मेरा ख्याल है, इस मज्मून में जाइज़ नहीं।

मिस्टर अठार्थी ने, जो बहुत पढ़े लिखे और काबिल आदमी थे, मुझसे कहा था - नवाब जैसा एक्टर फिर कभी पैदा नहीं होगा। वह अपने रोल में ऐसे धंस जाता है जैसे दस्ताने में हाथ। वह अपने फन का मास्टर है।

मरहूम की जिंदगी बड़ी पाक साफ थी, उसका एक अज़ीज़ ए एम अम्माद है। उसने मुझे बताया कि नवाब बड़ा तहारत पंसद था। शिया था। कोई काम बग़ैर इस्तिखारे के नहीं करता था। सुन्नी और शिया होने में क्या फर्क है, इसे जाने दीजिए। जब इन दो फिर्कों में लड़ाई झगड़े होते हैं तो इतना समझ में आता है कि उनके दिमागों में मजहबी फुतूर है।

मैं ज्यादा तफ्सील में नहीं जाना चाहता, लेकिन आपको यह इत्तिला देना चाहता हूं जो अभी तक किसी पर्चे में शाया नहीं हुई। उसकी पहली बीवी उसके अपने वतन की थी। उस लड़की से उसकी शादी कब हुई, इसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। उस बीवी से उसकी कोई औलाद न हुई। जब उस तरफ से नाउम्मीदी हुई तो नवाब ने इधर-उधर किसी दूसरे रिश्ते को टटोलना शुरू किया। आखिर उसने प्रिंस महर कद्र बादशाहे अवध के बड़े लड़के की बेटी से निकाह कर लिया।

जब यह शादी हुई तो घर में कोहराम मच गया। नवाब ने कोई परवा न की। नतीजा इसका यह हुआ कि उसकी पहली बीवी ने खुदकुशी कर ली- अब आप उसे खुदकुशी का मुख्तसर हाल सुन लीजिए:

जब उसकी पहली बीवी को मालूम हुआ कि उसके खाबिंद ने दूसरी शादी कर ली है तो उसने नौकरानी से तोशक मंगवाई। उस पर मिट्टी का तेल छिड़का। इसके बाद अपने तनबदन पर भी यही तेल मला। अपने   कपड़ों को भी उससे मानूस किया। फिर आराम से चारपाई पर लेटी, दियासलाई जलाई और खुद को आग लगा ली और मर गई। नवाब को मालूम ही नहीं था कि उसकी बीवी कोयला बन गई है। वह अपनी दूसरी बीवी के साथ दूसरे घर में था। 

जब नवाब को मालूम हुआ कि वो मर गई है तो उसने उसकी तज्हीज़ो-तकफ़ीन का इंतिजाम किया- बाद में उसे मालूम हुआ कि आखिरी वक्त वह यह वसीयत कर गई थी: मैं अपनी दस हज़ार की इन्शोरेन्स पालिसी अपने खाविंद के नाम करती हूं। इसके अलावा एक सौ साठ तोले सोना भी उनकी तहवील में देती हूं।

नवाब सुनकर बहुत मुताज्जिब हुआ - उसे देर तक मिट्टी के तेल की बू आती रही। 

मैं जब कभी सोचता हूं तो मुझे यूं महसूस होता है कि मैं मिट्टी का तेल हूं, कैरोसीन हूं, नवाब काश्मीरी हूं - काश्मीरी मैं भी हूं लेकिन इतना ज़ालिम नहीं, जितना कि वह था, इसलिए कि उसने सिर्फ औलाद की खातिर अपनी पहली बीवी को खुदकुशी करने पर मजबूर कर दिया। 

मैं भी काश्मीरी हूं। मुझे काश्मीरियों से बहुत मुहब्बत है, लेकिन मैं ऐसे काश्मीरियों से नफरत करता हूं जो अपने बीवियों से बुरा सुलूक करते हैं।

मैं नवाब मर्हूम के फन का काइल हूं। मैं उसे बहुत बड़ा फनकार मानता हूं लेकिन जब भी मैंने उसे स्क्रीन पर देखा, मुझे घासलेट यानि मिट्टी के तेल की बू आई। 

खुदा करे, उसे दोज़ख (नरक) नसीब हो कि वहां वह ज्यादा खुश रहेगा।

Tuesday, February 15, 2011

मंटो को पढ़ते हुए


डाकिए की ओर से: शीन काफ निजाम ने मंटो पर विशेष अध्यन किया है. इत्तेफाक से वे मेरे पसंदीदा शाइर भी हैं। उनकी गज़ल संग्रह 'सायों के साये में' मेरी पसंदीदा है। सन् 2002 के अंधेरे में इस किताब ने बहुत सहारा दिया था। ज्ञातव्य हो कि इसी बरस उन्हें उर्दू अदब के क्षेत्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला है।

*****

मंटो को उर्दू का मोपासाँ कहा गया है लेकिन मुहम्मद हसन अक्करी ने लिखा है:
"अगर मंटो मोपासाँ के बराबर नहीं पहुंच सका तो इस में इतना क़सूर खुद मंटो का न था जितना उस अदबी-रिवायत का, जिसमें वह पैदा हुआ। जिस बात में मंटो ‘मोपासाँ से पीछे रह जाता है, वह मोपासाँ का गद्य है।"

इन परम्पराओं में एक फर्क तो यही है कि एज़रा पाउण्ड शाइरों को मोपासाँ का पढ़ने की सलाह देते हैं जबकि उर्दू में प्रामाणिक या मानक भाषा काव्य की है। दूसरा फर्क यह है कि मोपासाँ को वाल्तेयर और फ्लाबेयर जैसे रचनाकारों का ग़ मिला था और मंटो को मिला था दास्तानवी गद्य, जो श्रव्य-गद्य का लिखित रूप् था। 

मंटो तक पहुंचते-पहुंचते उर्दू कहानी भी वक्त बिताने के बजाय वक्त बचाने का हुनर हो गई थी। वह बताने में छिपाने और छिपाने में बचाने का आर्ट सीख रही थी। फिर मंटो तो पाठक पर भरोसा करने वाला, संवेदनशील लेखक था। कहता था, क्या ही अच्छा होता, अगर आदमी लिखे बगैर अपने खयालात दूसरे तक पहुंचा सकता। विभाजन के बाद पाकिस्तान पहंुच कर वह अफसाने नहीं, लेख लिखता है इसलिए कि वह इस कला-रूप को बहुत संगीन समझता है। वह चाहता था कि कथा-भाषा में कोई लफ्ज गैर जरूरी न हो। पाकिस्तान में वह पहला अफसाना ठण्डा गोश्त लिखता है और दूसरा खोल दो। खोल दो का एक अंश है:

"रंग गोरा है और बहुत खूबसूरत है। मुझ पर नहीं थी अपनी मां पर थी। 
उम्र सत्रह के करीब थी..... मेरी इकलौती बेटी है। "

पहला वाक्य है पर खत्म होता है। दूसरा थी पर तो तीसरा है पर। यह संदेह और विश्वास, आशा और निराशा के बीच झूलते बूढ़े असहाय बाप की मनःस्थिति है, क्रिया-प्रयोग का दोष नहीं। सिराजुद्यीन यह तक भूल गया है क रज़ाकारों ने न उसकी बीवी को देखा है, न वो उसकी बेटी को पहचानते हैं। काहनी लाख उपमा का आर्ट हो, लेकिन उपमा में दो में से एक की जानकारी जरूरी है। कहानी के अंत में, सकीना की हरकत पर सिराजुद्यीन न आंखे बंद करता है, न मुंह फेरता है और न सर पीटता है, बल्कि खुशी से चिल्लाता है। पसीने में गर्क़ तो उस समाज को होना चाहिए न जो सकीना का है! दृष्टव्य है कि सकीना के साथ दुव्र्यवहार भारत के स्वयंसेवकों ने नहीं, पाकिस्तान के रज़ाकारों ने किया है। ठण्डा गोश्त में वह ईशर सिंह - सिक्ख - की इंसानियत को उजागर करता है। पाकिस्तानी समाज को यह नागवार गुज़रता है और मुक़दमा चलता है। 

मंटो के किरदार बुरे हैं, परन्तु वे बुराई के बावजूद अच्छे लगते हैं अच्छाई उन के लिए ओढ़ने की नहीं, बरतने की चीज़ है। ये चरित्र प्यार चाहते हैं, सहानुभूति नहीं। हतक की सौगन्धी ग्राहक के सामने स्वयं को सम्पूर्ण समर्पण के साथ प्रस्तुत करती है, इसलिए कि उसमें प्रेम करने की अहलियत भी है और निबाहने की सलाहियत भी। झूठे-सच को जानते हुए भी उसने दीवार पर चार मर्दों के चित्र टांग रखे हैं। 

मंटो की तवाइफें कोठे पर नहीं, कोठरीनुमा कमरों में रहती हैं। वहां लोग तमीज़ सीखने नहीं, जिस्म की जिजारत के लिए जाते हैं। उनमें फरेबकारी नहीं, शराफत है। शिकायत नहीं, हालात से निपटने की सकत है। 

मंटो के पात्रों के नाम और चीज़ों की हरकत तथा रंग भी ध्यान देने योग्य है। मिसाल में हतक ही को लें। सौगन्धी नाम है पात्र का। उर्दू में सुगन्ध भी इसी तरह लिखा जाएगा। इसे सौ गन्धी भी पढ़ा जा सकता है। कई स्थानों पर वेश्या को सौ गन्धी कहते हैं। अगर इसे सुगन्धि पढ़ें जो उर्द लिपि में संभव है, तो इसका अर्थ होगा पुण्यात्मा, धर्म पर रहना आदि। एक पात्र है माधव, जिसका एक अर्थ वसन्त भी है - अब यह वाक्य देंखे, 

"उसे (सौगन्धी को) महसूस होने लगा कि उसे माधव की जरुरत है। "

कुत्ता, इस्लाम की मान्यता के अनुसार त्याज्य है। महाभारत में इन्द्र युधिष्ठिर से कहते हैं, कुत्ते रखने वालों के लिए स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है। अफसाने की रूह में ऐसे अनेक संभावित अर्थ छिपे हैं। इसी तरह सिराजुद्यीन का अर्थ धर्म का दिया है तो सकीना हज़रत इमाम हुसैन, जो कर्बला में शहीद हुए, की बेटी का नाम है। तोता, खुजली वाला कुत्ता, कुत्ते का भौंकना, तोते का चुप रहना आदि अनेक स्थल विचारणीय हैं। 

मंटो कहता था, दुनिया को समझाना नहीं चाहिए उस को खुद समझना चाहिए। कलात्मक समझ पर जब तक भरोसा रहेगा, मंटो जैसे लोग प्रासंगिक रहेंगे। 
उर्दू के विख्यात शायर एवं आलोचक 
साभार : वाक्देवी प्रकाशन 
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