Wednesday, February 9, 2011

मण्टो की जरूरत...




डाकिए की ओर से: वो गाड़ी देखी है आपने? वही, जो बिनायक सेन का चेहरा याद करते ही जाली वाली गाड़ी ज़हन में उभरती है। प्रगति मैदान पर वही गाड़ी लगी थी। थीम था - क्रांतिकारी किताबें। मोज़ेल से पहली बार वहीं मिला था। सच है, मंटो जैसा विरला भी नहीं हुआ। पेश है एक जरुरत...

*****
       "ज़माने के जिस दौर से हम इस वक़्त गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ़ हैं तो मेरे अफ़साने पढ़िए। अगर आप इन अफ़सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि यह ज़माना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराईयां है, वो इस अहद की बुराईयां हैं। मेरी तहरीर में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स को मेरे नाम से मंसूब किया जाता है, दरअस्ल मौजूदा निज़ाम का नुक्स है - मैं हंगामा पसन्द नहीं। मैं लोगों के ख़यालातों-ज़ज्बात में हेजान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहजीबो-तमद्दुन की और सोसायटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि यह मेरा काम नहीं... लोग मुझे सियाह क़लम कहते हैं, लेकिन मैं तख्ता-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफ़ेद चाक इस्तेमाल करता हूं कि तख्ता-ए-सियाह की सियाही और ज्यादा नुमायां हो जाए। यह मेरा ख़ास अन्दाज़, मेरा ख़ाज तर्ज़ है जिसे फ़हशनिगारी, तरक्कीपसंद और ख़ुदा मालूम क्या-क्या कुछ कहा जाता है - लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कमबख्त को गाली भी सलीके से नहीं दी जाती..."

"लेकिन सच तो यह है कि पहले परक्कीपसंद मेरी तहरीरों को उछालते थे कि मंटो हम में से है। अब यह कहते हैं कि मंटो हम में नहीं है। मुझे न उनकी पहली बात पर यक़ीन था, न मौजूदा पर है। अगर कोई मुझ से पूछे कि मंटो किस जमाअत में है तो मैं अर्ज़ करूंगा कि मैं अकेला हूं।"


अकेला होना शायद हर कलाकार की नियति है। जो कलाकार अपनी कृतियों में ज़माने की हक़ीक़त से जितना रू-ब-रू होता जाता है, वह उतना ही अकेला भी होता जाता है। कला हक़ीक़त को उस के उन सभी आयामों और रूपों में एक साथ देखती-दिखाती है जिन्हें किसी एक व्याख्या या फ़लसफ़े में घटाया नहीं जा सकता। इसलिए फ़लसफ़ियों के तो गिरोह हो सकते हैं, होते हैं, लेकिन कलाकारों के नहीं, क्योंकि प्रत्येक कलाकार हक़ीक़त को जिस तरीके से ग्रहण और सम्प्रेषित करता है, वह इतना विशिष्ट होता है कि दूसरा कोई उस तरीके से गुज़र ही नहीं सकता। इसलिए हर कलाकार अपने संवेदना लोक में, अपने अनुभव संसार में और अपनी रचना प्रक्रिया में अकेला ही होता है। चाहे अपने फ़लसफ़े में किसी गिरोह के साथ होने का दावा वह स्वयं भी करता रहे - क्योंकि रचना - रूप के अलावा अनुभूत हक़ीक़त के ग्रहण-सम्प्रेषण का और कोई तरीक़ा उस के लिए प्रामाणिक नहीं हो सकता है। 

         एक कहानीकार की हैसियत से मंटो की प्रामाणिकता इसी बात में है कि वह अनुभव के प्रत्यक्ष ग्रहण को महत्व देता है बल्कि अनुभव का विश्लेषण भी उस के लिए प्रत्यक्ष ग्रहण ही है। इसीलिए उसकी कहानियों को सिर्फ महसूस किया जा सकता है क्योंकि उसकी बनावट भी एक एहसास है। अपनी बनावट में वे किसी बौद्धिक विश्लेषण या व्याख्या-दृष्टि का सहारा नहीं लेती। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कोई विश्लेषण वहां नहीं होता - वह होता है, लेकिन अनुभव प्रक्रिया या कहें एक ऐंद्रिक संवेदन की तरह। जाॅन डन की एक कवितांश है - 

उसका विशुद्ध और बोलता सा रक्त
उस के कपोलों में बोलता था ओर
इतना स्पष्ट रूप से उत्तेजित था
कि यहां तक कहा जा सकता था
कि उस का शरीर सोचता था।

       मंटों की कहानियों अपनी भाषा और बनावट में कुछ इसी तरह का एहसास करवाती हैं। ये कहानियां जीवन की सुंदरताओं और उसकी क्रूर विडंबनाओं को इस तरह एक दूसरे में गूंथ देती हैं कि उन्हें मंटो के कहानी के अलावा कोई अन्य नाम दिया ही नहीं जा सकता। 

           मोटे तौर पर मंटो को जीवन की विडम्बनाओं का कथाकार कहा जा सकता है। लेकिन ऐसा करना एक तरह का सरलीकरण होगा क्योंकि इन विडम्बनाओं के चित्रण के माध्यम से ही मनुष्य के होने के अनुभव का, उसकी सार्थकता का भी एहसास होता है। मोज़ेल  इस का एक उत्कृष्ट उदाहरण कही जा सकती है जिसके नंगेपन की उपमा मंटो धुले नेत्र से देता है और अंत में वह अनी मौत में सिर्फ एक मनुष्य रह जाती है, जब वह तिरलोचन से उस पगड़ी को ले जाने के लिए कहती है, जिसने उसके नंगे जिस्म को ढक रखा है - "ले जाओ इस को - अपने इस मज़हब को।"

         यह कहानी में कविता का रूपायन है। मंटो की कहानियां, दरअस्ल, कवि - मन की कहानियां हैं और उन का शिल्प भी कविता-सा ही है। कविता की तरह इन कहानियों को उनकी विशिष्ट भाषिक बुनावट से अलग करके के नहीं कहा जा सकता क्योंकि यहां महत्वपूर्ण केवल घटना नहीं, बल्कि घटना के वर्णन की भाषिक बुनावट है। हतक की सौगन्धी के जीवन की शून्यता के अनुभव को जिस रूपाकात्मक भाषा मंटो अभिव्यक्त करता है, वह अन्य प्रकार से संभव ही नहीं है। 

      "माधो डर गया। गिरी हुई टोपी उठाने के लिए वह झुका तो सौगन्धी की गरज सुनाई दी, ‘खबरदार ! पड़ी रहने दे वहीं - तू जा, तेरे पूना पहुंचते ही मैं इस को मनीआॅर्डर कर दूंगी‘। यह कह कर वह और जोर से हंसी और हंसती-हंसती बैंत की कुरसी पर बैठ गई। उस के खारिश वाले कुत्ते ने भौंक-भौंक कर माधो को कमरे से निकाल दिया। उसे सीढ़ियां उतार कर जब कुत्ता मुण्ड दुम हिलाता सौगन्धी के पास वापस आया और उसके कदमों के पास बैठ कर कान फड़फड़ाने लगा तो सौगन्धी चैंकी - उन से अपने चारों तरफ़ एक भयावह सन्नाटा देखा- ऐसा सन्नाटा, जो उसने पहले कभी न देखा था। उसे ऐसा लगा कि प्रत्येक वस्तु खाली है - जैसे मुसाफिरों से लदी हुई रेलगाड़ी स्टेशनों पर मुसाफिरों को उतार कर अब लोहे के शेड में बिल्कुल अकेली खड़ी है... "

         कविता कोमलकान्त पदावली में  नहीं, बल्कि जीवन की जटिल भाव-स्थितियों के एहसास में है और यह एहससास ही मंटो की भाषा को रूपकात्मक स्तर तक उठा देता है, जिस के कारण मंटो की कहानियां निर्मल वर्मा  के इस कथन का प्रमाण हो जाती हैं कि 'कहानी अपनी छोटी सी जीवन यात्रा में उस अजानी और खाली जमीन को पार करती है जो भाषा और समय, कविता और इतिहास के बीच फैली है। निर्मल इसीलिए कहानी को कविता के जमे हुए समय को पिघलाकर कथात्मक क्षेत्र में बहाना कहते हैं।'

       खोल दो जैसी कहानी में मंटो इसी हिकमत का प्रमाण देते हैं जब दो शब्द खोल दो से विभाजन की मानवीय यन्त्रणाओं के समूचो इतिहास की ग्लानि का एक जटिल और संश्लिष्ट किन्तु चाकू की तरह मर्म को चीर देने वाला एहसास हमें बिलबिला जाता है। 

            मंटो पर नग्नता और अश्लीलता के आरोप केवल साहित्यिक ही नहीं, क़ानूनी अदालतों में भी लगाए गए। लेकिन यह अजीब बात है कि जिन कहानियों को ले कर ये आरोप लगाए गए, उनमें कहीं भी सेक्स का चटाखेदार वर्णन नहीं है - बल्कि उनके माध्यम से मनुष्य की क्रूरता और प्रेमहीन दैहिक सम्बंधों के खोखलेपन को ही बेनक़ाब करते हुए प्रेम के वास्तविक अनुभव को - दैहिक सीमा से परे उस के आनंद और यन्त्रणा - तथा अपने सीमित स्व का अतिक्रमण करने का सामथ्र्य देने वाली उसकी ताक़त को व्यंजित किया गया है। बाबू गोपीनाथ, मोज़ेल और काली सलवार जैसी कहानियां इसके उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में प्रस्तुत की जा सकती हैं। 

      मैंने शुरू में कहा कि मोटे तौर पर मंटो को विडम्बना का कथाकार कहा जा सकता है। लेकिन मंटो विडम्बना की स्थिति को भी एक ऐसी कथात्मक युक्ति की तरह इस्तेमाल करते हैं, जिससे वह एक स्थिति नहीं, बल्कि मानवीय नियति बन जाती है - और शायद यही कारण रहा होगा जिसकी वजह से तरक़्क़ीपसन्दों ने उसे अपने अपने से अलग कर दिया क्योंकि अन्यथा मंटो से बड़ा यथार्थवादी कथाकार और कौन हो सकता है। बाबू गोपीनाथ का यह अंश देखिए-

"रण्डी का कोठा और पीर का मज़ार - बस ये दो जगह हैं जहां मेरे मन को शान्ति मिलती है। ... कौन नहीं जानता कि रण्डी के कोठे पर मां-बाप अपनी औलाद से पेशा कराते हैं और मक़बरों और तकियों में इंसान अपने ख़ुदा से।"

     टोबा टेक सिंह  में विडम्बना युक्ति की सार्थकता इस में है कि उसे पढ़ते हुए हम समझने लगते हैं कि वास्तविक पागल कौन है - टोबा टेक सिंह या हम सब ! यह कहानी, इस प्रकार विभाजन से पीड़ित किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक पूरी क़ौम के पागल हो जाने की विडम्बना को सम्प्रेषित करती है। मंटो के कई चरित्र प्रसिद्ध हुए हैं - अपनी विचित्र विडम्बनापूर्ण स्थितियों और व्यवहार के कारण - लेकिन लेखक का प्रयोजन चरित्र नहीं, बल्कि उन के माध्यम से मानवीय विडम्बनाओं को उद्घाटित करना है। महत्वपूर्ण चरित्र नहीं, वह मानवीय नियति है, जिस की ओर ये चरित्र इशारा करते हैं। अन्त में पाकिस्तानी आलोचक सलीम अख्तर के इस कथन को उद्धृत करना चाहूंगा: 

जरूरत है ऐसे सिरफिरे की जो खिड़की खोलने की हिम्मत रखता हो। आज का युग अपना मंटो पैदा करने में असफल रहा है। इसलिए न केवल सआदत हसन मंटो की आज ज़रूरत है, बल्कि पहले से अधिक शिद्दत से...

------ नंदकिशोर आचार्य  
प्रसिद्ध हिन्दी कवि, नाटककार एवं आलोचक।

साभार: वाक्देवी प्रकाशन 

13 comments:

  1. bhai..... ye mantomay mahaul banaye rakhne ka bahut bahyt shukriya...in dinon kaafi zaroorat hai... :)

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  2. फ़लसफ़ियों के तो गिरोह हो सकते हैं, होते हैं, लेकिन कलाकारों के नहीं,

    बाकी और भी पढूंगा , पहला कमेन्ट इस लाइन पे ... मैं इसका अर्थ दूसरा लूँगा ...

    इसीलिए मैं समसामयिक मुद्दों पर नहीं लिखता

    फिर भी अगर मैं उसी अर्थ मैं लूँ जिसमे आप कहना चाह रहे हैं तो ...

    कोई किसी के जैसे लिख ही नहीं सकता, इसलिए किसी नामचीन का लेख लेने पर सन्दर्भ देने की कोई आवश्यकता नहीं है |

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  3. मंटो की कहानियों का निर्मल की कहानियों से तुलना वाली बात अच्छी लगी | दोनों परिवेश का विश्लेषण करने के बजाये उसे महसूस करते हुए लिखते थे | उनकी कहानियों में एक एक बात अपने आप को जरूरी मुकाम पे ले आती थी, बेवजह की डिटेल्स नहीं | निर्मल जरूर अपने मन की तहों के अन्दर एकांतवास में घुसते से चले गए | लेकिन मंटो बाहर जिस बेरहमी से समाज के नंगेपन पर टूट पड़ा था, वैसा कोई मिलना मुश्किल है |

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  4. @ नीरज,

    पहला कथन - सत्य वचन किन्तु कॉपी राईट का धयान रखना पड़ता है.

    दूसरा कथन - लेख में मंटो की निर्मल से तुलना नहीं है भाई बस निर्मल की कहानी की परिभाषा ली गयी है जो उसे चरितार्थ करती है. दोनों बहुत विपरीत सब्जेक्ट पर लिखते थे, दोनों की दृष्टि भी अलग थी पर दोनों अपने फन में माहिर थे.

    पढ़ते रहिये लेख रुपी एक ख़त और फैंकने वाला हूँ आपके बालकनी में जाहिर है प्रेम पत्र ही होगा मगर दुसरे नज़रिए से. शुक्रिया

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  5. मुझे याद है अपनी उम्र के उस दौर में मैंने मंटो की कहानिया पढ़ी थी ...जब पढ़कर सर गर्म हो जाता था ओर किताब पापा से छुपानी पढ़ती थी.....मंटो मुझे बड़ा दिलचस्प शख्स लगा .....इतना खुला कैसे लिख सकता है कोई....गौर से देखे तो उनकी कहानियों में भाषाई विद्धता नहीं है .....न लेखक के सिग्नेचर जैसे कुछ कोट्स...वे शुरू होने से पहले जानती है उनका अंत क्या है ....वे उस दौर की कहानियो से कुछ जुदा थी....जब लोग केवल सभ्य भाषा पढने के आदी थे ओर साहित्य किसी खास वर्ग के भीतर बहसियाने वाला सब्जेक्ट ..मंटो ने उसमे पहला छेद किया.......इस्मत चुगताई ने शायद दूसरा ........
    मंटो कहानिया लिखकर अमर हो गए ......गौर से देखे तो उनकी लघु कथायो का एक ही सब्जेक्ट था ...दंगा ......सच कहूँ तो मुझे लगता है आदमी के" कमीनेपन" पे लिखना उन्हें बेहद पसंद था ....कई छोटी कहानिया तो हकीक़त लगती है जैसे किसी बार में बैठकर सुंय गए किस्से हो.....जिन्हें ज्यू का त्यु बिना कोई लेखकीय लिबास पहनाये सामने लाया हो........
    ये आदमी मुझे बड़ा अजीब लगता है जैसे इसे खुद किसी "ओरा" की जरुरत नहीं ........न उसे ये डर ...के जो लोग उसे एक बड़ा लेखक समझते है उसके कबूलनामे से उसकी इमेज पर शायद कुछ छींटे पड़े ....मसलन ये शख्स लिखता है ....

    "लोग कला को इतना ऊँचा रूतबा देते हैं कि इसके झंडे सातवें असमान से मिला देते हैं. मगर क्या यह हक़ीक़त नहीं कि हर श्रेष्ठ और महान चीज़ एक सूखी रोटी की मोहताज है?

    मैं लिखता हूँ इसलिए कि मुझे कुछ कहना होता है. मैं लिखता हूँ इसलिए कि मैं कुछ कमा सकूँ ताकि मैं कुछ कहने के काबिल हो सकूँ."....continue....

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  6. मेरे पड़ोस में अगर कोई औरत हर रोज़ खाविंद से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ़ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए ज़र्रा बराबर हमदर्दी पैदा नहीं होती. लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई औरत अपने खाविंद से लड़कर और खुदकशी की धमकी देकर सिनेमा देखने चली जाती है और मैं खाविंद को दो घंटे सख़्त परेशानी की हालत में देखता हूँ तो मुझे दोनों से एक अजीब व ग़रीब क़िस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है.

    किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए तो मैं उसे ज़ुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ ज़रूर खींचेगा जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ो लड़कियाँ जान देती हैं लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित वाशिंदा. इस बज़ाहिर कामयाब आशिक की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियाँ भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूंगा और दूसरों को सुनाऊंगा.

    चक्की पीसने वाली औरत जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मिनान से सो जाती है, मेरे अफ़सानों की हीरोइन नहीं हो सकती. मेरी हीरोइन चकले की एक टखयाई रंडी हो सकती है. जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाज़े पर दस्तक देने आ रहा है. उसके भारी-भारी पपोटे, जिनमें वर्षों की उचटी हुई नींद जम गई है, मेरे अफ़सानों का मौजूँ (विषय) बन सकते हैं. उसकी गलाजत, उसकी बीमारियाँ, उसका चिड़चिड़ापन, उसकी गालियाँ-ये सब मुझे भाती हैं-मैं उसके मुताल्लिक लिखता हूँ और घरेलू औरतों की शस्ताकलामियों, उनकी सेहत और उनकी नफ़ासत पसंदी को नज़रअंदाज कर जाता हूँ.

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  7. continue.......
    मैं जानता हूँ कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बड़ा नाम है. अगर यह ख़ुशफ़हमी न हो तो ज़िदगी और भी मुश्किल बन जाए. पर मेरे लिए यह एक तल्ख़ हक़ीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूंढ नहीं पाया हूँ. यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है. मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ.

    मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता? मैं अपनी जिंदगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेजियों की भेट चढ़ा चुका हूँ. अब तो यह हालत है- मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ.

    मैं समझता हूँ कि जिंदगी अगर परहेज़ से गुजारी जाए तो एक क़ैद है. अगर वह बदपरहेजियों से गुज़ारी जाए तो भी एक क़ैद है. किसी न किसी तरह हमें इस जुराब के धागे का एक सिरा पकड़कर उधेड़ते जाना है और बस.......manto



    अजीब है न......कितना खुला....कितना बेपरवाह....कितना आम सा.ये शख्स.....you love this man..and you hate him too some time....don"t read him in the morning,,,don"t read him while eating..

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  8. शुक्रिया डॉ. साब,

    आपने तो दिल जीत लिया,

    न दिनों उनका लिखा गंजे फ़रिश्ते पढ़ रहा हूँ जिनमें वे अपने से जुड़े लोगों को याद करते हैं... ज़रा उसकी भूमिका देखते हैं

    फ़िल्मों में रहकर बहुत सी फ़िल्मी हस्ती पर कहानियां लिखीं जिनमें नसीम बानो पृथ्वीराज कपूर, नसीम बानो, नर्गिस, अशोक कुमार, श्याम, कॉमेडियन दीक्षित और बहुत से लोग शामिल हैं. उस संग्रह का नाम उन्होंने गंजे फ़रिश्ते रखा जिसकी भूमिका में उन्होंने लिखा, "वक़्त ने उनके सर से बाल उड़ा दिए और बचे थे वो मैंने उड़ा दिए."

    "आग़ा हश्र की भेंगी आंख मुझसे सीधी नहीं हो सकती, उसके मुंह से गालियों के बजाए मैं फूल नहीं झड़वा सकता. नर्गिस सुरीली नहीं हो सकती. मीरा जी की ज़लालत पर मुझसे स्त्री नहीं हो सकती, और न मैं अपने दोस्त श्याम को मजबूर कर सका हूं कि वह ग़लत औरतों को सालियां न कहे." "गंजे फ़रिश्ते में जो फ़रिश्ता आया है उसका मुंडन हुआ है और ये रस्म मैंने बड़े सलीक़े से अदा की है." मंटो ने अपनी क़ब्र की तख़्ती के लिए खुद ही लिखा था यहां मंटो दफ़्न और उसके साथ ही दफ़्न है कहानी का फ़न.

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    1. sagar ji kya aap apna no. mujhe de sakte hain

      mera pta hai avinashk48@gmail.com

      sadar
      avinash kumar chanchal

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  9. @Daakiya:
    आओ हम सब पहन ले आईना,
    सारे देखेंगे अपना ही चेहरा.
    सबको सारे हसीं लगेंगे यहाँ.(-Gulzar)

    @Anurag Sir: Liked Your comment.
    Don't read him in the morning...
    ...सुबह सुबह ही टल्ली हो गए? छि: छि: !!
    Don't read him while eating.
    ...खाना अच्छा था लव, बाई द वे, बनाया क्या था आज?

    :-P

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  10. मंटो को तब पढ़ा था , जब उसके बारे में बताने के लिए कोई नहीं था, न मैं किसी से डिस्कशन ही कर सकता था | उसे पढ़कर जो डर बैठ गया था, शायद ब्लॉग होता उस वक़्त तो निकाल देता डर वहीँ पर | आज कुछ भी अच्छा लिखता हूँ या पढता हूँ तो शेयर कर देता हूँ , इमोशन ख़तम | लेकिन एक हैरानी भी होती है , दुनिया में पढने वाले इतना सारे लोग हैं , मैं तो सोचता था कि मैं अकेला ही हूँ |

    खैर बड़ी बात ये कि मंटो को मैंने मेरठ में ही पढ़ा था | और मेरठ मुझे मंटो का ही शहर लगा था | ऐसा लगा जैसे कि घंटाघर से थोडा आगे या फिर शम्भुदास गेट के पास बस्ती में उसका घर है | कबाड़ी बाजार से होते हुए साइकिल पे ट्यूशन जाया करता था , बिना कुछ ख़ास जाने उस बाजार के बारे में | कभी नजर उठा के ऊपर देखा ही नहीं, बाद में ये सब चीजों का पता चला तो रास्ता बदल दिया, मंटो का डर | ऐसा लगता था जैसे वो हमारे अन्दर देख सकता हो | हममें और उसकी कहानी के चरित्रों में फर्क कितना है, सिर्फ दंगो का |

    जैसे वो एलेन मूर कि कोमिक्स है न 'दि किलिंग जोक' जिसका डायलोग 'All it takes is one bad day to reduce the sanest man alive to lunacy.' थोड़ा बदलाव के साथ 'दि डार्क नाईट' में भी है - 'See, I'm not a monster, I'm just ahead of the curve'

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  11. मंटो की कोई भी किताब उठा लीजिए जब तक आप उसे पूरा नही पढ लेते तब तक आपको चैन नही आता है और कमाल देखिए कि पढने के बाद भी चैन नहीं मिलता। रह रह कर उसके शब्द याद आते हैं और उनकी कहानी आपको अंदर से सुलगा रही होती है| और ....
    सागर जी और अनुराग जी इस सिलसिले को यूँ ही जारी रखिए....

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जाती सासें 'बीते' लम्हें
आती सासें 'यादें' बैरंग.

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